मंगलवार, 23 फ़रवरी 2016

Hare Tendue

हरे तेंदुए

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


मैं, मीश्का और अल्योन्का हाऊसिंग कमिटी के ऑफ़िस के पास रेत पर बैठे थे और स्पेस शिप लाँच करने के लिए प्लेटफॉर्म बना रहे थे. हमने गढ़ा खोद कर उसमें ईंटें और काँच के टुकड़े भर दिए थे, और  बीचोंबीच रॉकेट के लिए थोड़ी ख़ाली जगह भी छोड़ी थी. मैं बकेट लाया और सारे औज़ार उसमें रख दिए.
मीश्का ने कहा:
“रॉकेट के नीचे साइड में एक छेद रखना चाहिए, जिससे कि जब वो ऊपर उड़ेगा, तो गैस इस रास्ते से बाहर निकले.”
और हम फिर से खुरचने और खोदने लगे और जल्दी ही थक गए, क्योंकि वहाँ बहुत पत्थर थे.
अल्योन्का ने कहा:
“मैं थक गई हूँ! स्मोकिंग ब्रेक!”
और हम आराम करने लगे.
इसी समय दूसरे प्रवेश द्वार से कोस्तिक अन्दर आया. वो इतना दुबला हो रहा था, कि उसे पहचानना मुश्किल हो रहा था. उसका रंग फ़ीका पड़ गया था, धूप में भी रंग गहराया नहीं था. वो हमारे पास आया और बोला:
 “हैलोS, साथियों!”
हम सबने कहा:
  “हैलोS, कोस्तिक!”
वो चुपचाप हमारे पास आकर बैठ गया.
मैंने कहा:
”क्या रे, कोस्तिक, तू इतना दुबला क्यों हो गया है? बिल्कुल कोश्ची (रूसी लोककथाओं का एक पात्र, जो बेहद दुबला और बूढ़ा है – अनु.) जैसा...
उसने कहा;
 “हूँ, मुझे मीज़ल्स हो गए थे.”
 “क्या अब तू अच्छा हो गया?”
 “हाँ,” कोस्तिक ने कहा, “अब मैं पूरा अच्छा हो गया हूँ.”
मीश्का कोस्तिक से दूर सरक गया और बोला:
 “मेरा ख़याल है कि ये ‘इन्फ़ेक्शस’ है?”
मगर कोस्तिक मुस्कुराकर बोला: “नहीं, क्या कह रहा है तू, घबरा मत. मुझे इन्फ़ेक्शन नहीं है. कल डॉक्टर ने कहा कि मैं बच्चों के ग्रुप में घूम फिर सकता हूँ.”
मीश्का वापस कोस्तिक की ओर सरक गया, और मैंने पूछा:
 “जब तू बीमार था, तो क्या दर्द होता था?”
 “नहीं”, कोस्तिक ने जवाब दिया, “दर्द नहीं होता था. मगर ‘बोरिंग़’ बहुत था. वैसे और कोई बात नहीं थी. मुझे खूब सारी स्टिकर्स वाली तस्वीरें प्रेज़ेंट में मिलीं, मैं पूरे समय उन्हें बनाता रहा, इत्ता बोर हो गया...”
अल्योन्का बोली:
 “हाँ, बीमार पड़ना अच्छा है! जब बीमार होते हो तो हमेशा कुछ न कुछ प्रेज़ेंट देते हैं.”
मीश्का ने कहा:
 “वो तो जब तुम अच्छे होते हो, तब भी देते हैं. बर्थ-डे पर या क्रिसमस पे.”
मैंने कहा:
 “जब ‘ए’ ग्रेड लेकर अगली क्लास में जाते हो, तब भी देते हैं.”
मीश्का ने कहा:
 “मुझे नहीं देते. मेरी तो हमेशा ‘सी’ ग्रेड ही आती है! मगर जब मीज़ल्स होते हैं, तो कोई ख़ास चीज़ नहीं देते, क्योंकि बाद में सारे खिलौने जला देने पड़ते हैं. बुरी बीमारी है मीज़ल्स, किसी काम की नहीं.”
कोस्तिक ने पूछा:
 “और, क्या अच्छी बीमारियाँ भी होती हैं?”
 “ओहो,” मैंने कहा, “जित्ती चाहो! मिसाल के तौर पे, चिकन-पॉक्स. बहुत अच्छी, मज़ेदार बीमारी है. जब मैं बीमार पड़ा था, तो हर दाने के ऊपर एक-एक करके हरा ऑइन्टमेंट पोता गया था. मैं हरे तेंदुए की तरह हो गया था. क्या ये बुरी बात है?”
 “बेशक, अच्छी बात है,” कोस्तिक ने कहा.
अल्योन्का ने मेरी तरफ़ देखा और कहा:
 “जब हर्पीज़ हो जाती है, तो वो भी बड़ी ख़ूबसूरत बीमारी है.”
मगर मीश्का सिर्फ हँसा:
 “लो, सुन लो – ‘ख़ूबसूरत’! बस दो तीन धब्बे लगा देते हैं, और बस, यही सारी ख़ूबसूरती है. नहीं हर्पीज़ – छोटी-मोटी चीज़ है. मुझे तो सबसे ज़्यादा ‘फ्लू’ पसन्द है. जब ‘फ्लू’ होता है, तो रास्पबेरी-जैम के साथ चाय देते हैं. जितना चाहो, उतना खाओ, यक़ीन ही नहीं होता. एक बार जब मैं बीमार पड़ा था, तो जैम का पूरा डिब्बा खा गया था. मम्मा को भी बड़ा अचरज हुआ: “देखिए, वो बोली, बच्चे को ‘फ्लू’ हुआ है, टेम्परेचर 380 है, और भूख कितनी लगी है”. और दादी ने कहा: “फ्लू भी अलग-अलग तरह का होता है, ये कोई नई तरह का फ्लू है, उसे और दो, उसका शरीर मांग कर रहा है”. और, मुझे और जैम दिया गया, मगर मैं ज़्यादा नहीं खा सका, कितनी अफ़सोस की बात थी...इस फ्लू का मुझ पर शायद इतना बुरा असर हुआ है”.
अब मीश्का हाथ पर चेहरा टिकाकर बैठ गया और सोचने लगा, मैंने कहा:
 “फ्लू, बेशक, अच्छी बीमारी है, मगर टॉन्सिल्स से उसका कोई मुक़ाबला ही नहीं है, वो बात ही और है!”
 “ वो क्या?”
“वो ये कि”, मैंने कहा, “जब टॉन्सिल्स काटकर निकाल देते हैं, तो बाद में आईस्क्रीम देते हैं, जमा देने के लिए. ये तुम्हारे जैम से ज़्यादा अच्छा है!”
अल्योन्का ने कहा:
”टॉन्सिल्स क्यों हो जाते हैं?”
मैंने कहा:
 “सर्दी-ज़ुकाम से. वो नाक में पनपते हैं, जैसे मशरूम्स, क्योंकि वहाँ नमी होती है.”
मीश्का ने गहरी साँस लेकर कहा:
 “ज़ुकाम, बहुत बकवास बीमारी है. नाक में कुछ डालते हैं, नाक और भी तेज़ बहने लगती है.”
मैंने कहा:
 “मगर केरोसिन पी सकते हैं. ज़रा भी बू नहीं होती.”
”और केरोसिन क्यों पीना चाहिए?”
मैंने कहा:
 “मतलब, पीना नहीं, मुँह में रखना. जैसे कि जादूगर पूरा मुँह भर लेता है, और फिर हाथ में जलती हुई दियासलाई लेकर... और मुँह से ऐसी आग निकलती है! बिल्कुल आग का ख़ूबसूरत फ़व्वारा दिखाई देता है. बेशक, जादूगर इसके पीछे का सीक्रेट जानता है. बिना सीक्रेट जाने ये मत करना, कुछ भी हासिल नहीं होगा.”
 “सर्कस में तो मेंढ़क भी निगल जाते हैं,” अल्योन्का ने कहा.
 “और मगरमच्छ भी!” मीश्का ने पुश्ती जोड़ी.
मैं हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया. क्या ऐसी गप भी मारी जा सकती है. सबको मालूम है, कि मगरमच्छ ‘शेल्स’ से बना होता है, उसे कैसे खा सकते हैं?
मैंने कहा:
 “मीश्का, साफ़ पता चल रहा है, कि तेरा दिमाग़ चल गया है! तू मगरमच्छ को कैसे खा सकता है, जब वो इतना कड़ा होता है. उसे किसी भी तरह से चबा नहीं सकता.”
 “अगर वो बॉइल्ड हो तो!” मीश्का ने कहा.
 “क्या कह रहा है! अब तू मगरमच्छ उबालेगा!” मैं मीशा पे चिल्लाया.
 “उसके तो नुकीले दाँत होते हैं,” अल्योन्का ने कहा, और ज़ाहिर था कि वो डर गई थी.
और कोस्तिक ने आगे जोड़ा:
 “वो ख़ुद ही हर रोज़ अपने ट्रेनर्स को खा जाता है.”
 अल्योन्का ने कहा:
 “ऐसा?” और उसकी आँखें सफ़ेद बटन्स जैसी हो गईं.
कोस्तिक ने एक ओर थूक दिया.
अल्योन्का ने होंठ टेढ़े किए:
 “अच्छी-अच्छी बातों के बारे में बात कर रहे थे – मशरूम्स के बारे में और हर्पीज़ के बारे में, और अब मगरमच्छों के बारे में. मुझे उनसे डर लगता है...”
मीश्का ने कहा;
 “बीमारियों के बारे में खूब बातें कर लीं. खाँसी, मिसाल के तौर पे. उसमें क्या दम है? जब तक स्कूल की छुट्टी न करनी पड़े...”
  “चलो, ये भी ठीक है.” कोस्तिक ने कहा, “और, वैसे आपने सही कहा कि जब बीमार पड़ते हो, तो सब लोग तुमसे ज़्यादा प्यार करते हैं.”                          
 “ प्यार करते हैं,” मीश्का ने कहा, “सहलाते हैं...मैंने ‘नोट’ किया है: जब बीमार पड़ते हो, तो हर चीज़ की फ़रमाइश कर सकते हो. जो ‘गेम’ चाहो, या हथियार, या सोल्डरिंग मशीन.”
मैंने कहा:
 “बेशक. बस, ये ज़रूरी है कि बीमारी ज़्यादा ख़तरनाक किस्म की हो. जैसे, अगर टाँग या गर्दन तुड़वा बैठो, तब तो जो चाहो, ख़रीद देंगे.”
अल्योन्का ने कहा:
 “और साइकल?”
कोस्तिक हिनहिनाया:
  “अगर पैर टूटा है, तो साइकल किसलिए?”
 “मगर वो तो जुड़ जाएगा ना!” मैंने कहा.
कोस्तिक ने कहा:
 “सही है!”
मैंने कहा:
 “और वो जाएगा कहाँ! हाँ, मीश्का?”
मीश्का ने सिर हिलाया, और तभी अल्योन्का ने अपनी ड्रेस घुटनों तक खींची और पूछा:
 “और ऐसा क्यों होता है, कि, जैसे थोड़ा सा जल जाओ, या घूमड़ निकल आए, या कोई नील पड़ जाए, तो उल्टे, ऊपर से धुलाई ही होती है. ऐसा क्यों होता है?”
 “ये तो अन्याय है!” मैंने कहा और पैर से बकेट को ठोकर मारी, जिसमें हमारे औज़ार रखे थे.
कोस्तिक ने पूछा:
 “और, ये आपने क्या बनाया है?”
मैंने कहा:
 “स्पेस-शिप की लॉन्चिंग के लिए प्लेटफॉर्म!”
कोस्तिक चीख़ पड़ा:
 “तो, तुम लोग चुप क्यों हो! धारियों वाले शैतानों! बातें बन्द करो. चलो, जल्दी से बनाएँगे!!!”
और हमने बातचीत बन्द करके बनाना शुरू कर दिया.

****

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

Mujhe Singapore ke Baare me Bataie

मुझे सिंगापुर के बारे में बताइये!

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


मैं और पापा इतवार को अपने रिश्तेदारों से मिलने गए. वो लोग मॉस्को के पास ही एक छोटे से शहर में रहते थे, और हम इलेक्ट्रिक ट्रेन से जल्दी वहाँ पहुँच गए.
अंकल अलेक्सेइ मिखाइलोविच और आण्टी मीला ने प्लेटफॉर्म पर हमारा स्वागत किया.
अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने कहा:
 “ओहो, डेनिस्का कितना बड़ा हो गया है!”
और मीला आण्टी बोली:
 “डेनिस्का, आ जा, मेरे साथ चल.” और उसने पूछा: “ये बास्केट कैसी है?”
 “इसमें प्लास्टिसीन (रंग-बिरंगी मिट्टी का गूदा) है, पेन्सिलें हैं और पिस्तौलें भी हैं...”

 मीला आण्टी मुस्कुराने लगी, और हम रेल की पटरियाँ पार करके स्टेशन की बगल से निकलकर एक कच्चे रास्ते पर आए: रास्ते के किनारों पर पेड़ थे. मैंने जल्दी से जूते उतार दिए और नंगे पैर चलने लगा, कुछ गुदगुदा रहा था, एडियों में कुछ चुभ रहा था, वैसे ही जैसे पिछले साल हुआ था, जब मैं सर्दियों के बाद पहली बार नंगे पैर चला था. अब रास्ता किनारे की ओर मुड़ गया, और हवा में नदी की और कोई मीठी-मीठी ख़ुशबू फ़ैल गई, मैं घास पर दौड़ने लगा, उछलने लगा और चिल्लाने लगा: “ओ-हा-हा-आ!” मीला आण्टी ने कहा:
 “बछड़े जैसी ख़ुशी!”

जब हम घर पहुँचे तो लगभग अंधेरा हो चुका था, और हम सब छत पर चाय पीने बैठे, मुझे भी बड़े कप में चाय दी गई.

अचानक अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने पापा से कहा;
 “पता है, आज रात को 00.40 मिनट पर हमारे यहाँ चैरितोशा आने वाला है. वो हमारे यहाँ एक दिन रहेगा, कल रात को ही जाएगा. वो इस तरफ़ से गुज़र रहा है.”
पापा तो बेहद ख़ुश हो गए.
 “डेनिस्का,”  पापा ने कहा, “मेरा ‘कज़िन’ – मतलब तेरा बड़ा चाचा चैरिटोन वासिल्येविच आ रहा है! वो कब से तुझसे मिलना चाहता था!”
मैंने कहा:
 “मैं उसे क्यों नहीं जानता?”
मीला आण्टी फिर से हँसने लगी.
 “क्योंकि वो ‘नॉर्थ’ में रहता है,” उसने कहा, “और मॉस्को बहुत कम आता है.”
मैंने पूछा:
 “और वो करता क्या है?”
अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने ऊँगली ऊपर उठाई:
 “ वो - लम्बी समुद्री यात्राओं का कप्तान है.”
मेरी पीठ पर जैसे चींटियाँ रेंगने लगीं. ऐसा कैसे? मेरे बड़े अंकल – समुद्री कप्तान हैं? मुझे इस बारे में बस अभी पता चला? पापा हमेशा ऐसे ही हैं – सबसे ज़रूरी बात भी उन्हें ‘बाइ-चान्स’ ही याद आती है!
 “क्या है, पापा! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि मेरे अंकल लम्बी समुद्री यात्राओं के कप्तान हैं? जाओ, अब मैं भी तुम्हारे जूते साफ़ नहीं करूँगा!”

मीला आण्टी फिर से खिलखिलाने लगी. मैंने कब से नोट किया है कि मीला आण्टी बात-बेबात हँसने लगती है. इस समय वो बिना किसी बात के हँस रही थी. मगर पापा बोले:
 “मैंने तुझे पिछले से पिछले साल ही बताया था, जब वो सिंगापुर से आया था, मगर तब तू बहुत छोटा था. और तू, शायद, भूल गया. मगर कोई बात नहीं, अब सो जा, कल तू उससे मिलने ही वाला है!”

अब मीला आण्टी ने मेरा हाथ पकड़ा और छत से घर के भीतर ले गई, हम एक छोटे कमरे से गुज़रते हुए दूसरे छोटे कमरे में आए. वहाँ कोने में एक छोटा सा दीवान रखा था. खिड़की के पास एक बड़ा फूलदार पार्टीशन रखा था.
 “ये यहाँ, सो जा,” मीला आण्टी ने कहा. “कपड़े बदल ले! तेरी ये पिस्तौलों वाली बास्केट मैं पैरों के पास रखती हूँ.”
मैंने पूछा:
 “और पापा कहाँ सोएँगे?”
उसने कहा:
 “शायद, छत पे ही सोएँगे. तुझे तो मालूम है कि तेरे पापा को ताज़ी हवा कितनी पसन्द है. क्या हुआ? क्यों पूछ रहा है? क्या तुझे डर लगेगा?”
मैंने कहा:
 “बिल्कुल नहीं.”
मैं कपड़े बदल कर लेट गया.
मीला आण्टी ने कहा:
 “आराम से सोना, हम यहीं, पास में ही हैं.”
और वो चली गई.

मैं दीवान पे लेट गया और बड़ी चौख़ाने वाली चादर ओढ़ ली. लेटे-लेटे मैं सुन रहा था कि छत पर हल्की आवाज़ में बातें कर रहे हैं और हँस रहे हैं, और मैं सोना चाहता था, मगर पूरे समय अपने कप्तान बड़े चाचा के बारे में सोचता रहा.

मैं ताज्जुब से सोच रहा था, कि कैसी होगी उसकी दाढ़ी? क्या दाढ़ी सीधे गर्दन से निकल रही होगी, जैसा कि मैंने तस्वीरों में देखा था? और पाईप कैसा होगा? सीधा या मुड़ा हुआ? और तलवार – डिज़ाइन वाली या प्लेन? लम्बी समुद्री यात्राओं के कप्तानों को बहादुरी दिखाने के लिए डिज़ाइन वाली तलवार से सम्मानित किया जाता है. सही है, क्योंकि अपनी यात्राओं के दौरान वे लगभग हर रोज़ आइसबर्ग्स से टकराते हैं, या येS  बड़ी-बड़ी व्हेलों और सफ़ेद  भालुओं का सामना करते हैं, या मुसीबत में फँसे जहाज़ों को बचाते हैं. साफ़ है, कि ऐसी परिस्थिति में बहादुरी दिखाना ही पड़ती है, वर्ना तो तुम ख़ुद ही अपने सभी नाविकों के साथ डूब जाओगे, और जहाज़ भी बर्बाद कर दोगे. और अगर ऐसा जहाज़, जैसे न्यूक्लियर उपकरणों से लैस बर्फ तोड़ने वाला जहाज़ ‘लेनिन’ – नष्ट हो जाए, तो दुख तो होगा ही, है ना? और, वैसे भी, ज़रूरी नहीं है कि लम्बी यात्राओं वाले कप्तान सिर्फ ‘नॉर्थ’ की तरफ़ ही जाएँ, ऐसे भी होते हैं जो अफ्रीका जाते हैं, और उनके जहाज़ों पर बन्दर और मुंगूस रखे जाते हैं, जो साँपों को मार डालते हैं, उनके बारे में मैंने किताब में पढ़ा था. ये ही मेरा वाला लम्बी यात्रा का कप्तान – पिछले से पिछले साल सिंगापुर से आया था. कितना वण्डरफुल नाम है: “सिं-गा-पुर”!... मैं अंकल से ज़रूर कहूँगा कि मुझे सिंगापुर के बारे में बताए: वहाँ कैसे लोग रहते हैं, कैसे बच्चे हैं, कैसी नौकाएँ और कैसे उनके पाल हैं...ज़रूर पूछूँग़ा. और मैं इत्ती देर तक सोचता रहा, और न जाने कब मेरी आँख़ लग गई...

मगर बीच रात में ही मैं भयानक गुरगुराहट से जाग गया. शायद ये कोई कुत्ता था, जो कमरे में घुस आया था, उसने सूंघ लिया कि मैं यहाँ सो रहा हूँ, और उसे ये अच्छा नहीं लगा. वो बड़े खूँख़ार तरीके से गुर्रा रहा था, कहीं फूलदार पार्टीशन के नीचे से, और मुझे ऐसा लगा, कि मैं अंधेरे में उसकी झुर्रियों वाली नाक और सफ़ेद नुकीले दाँत भी देख रहा हूँ. मैं पापा को आवाज़ देना चाहता था, मगर मुझे याद आया कि वो दूर सो रहे हैं, छत पे, और मैंने सोचा कि आज तक तो मैं कभी भी कुत्तों से नहीं डरा था और इस समय भी घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है. वैसे भी मैं जल्दी ही आठ साल का होने वाला हूँ.
मैं चिल्लाया:
 “तूबा! सो जा!”

कुत्ता फ़ौरन चुप हो गया.

मैं खुली आँखों से अँधेरे में लेटा था. खिड़की से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सिर्फ एक टहनी नज़र आ रही थी. वो ऊँट जैसी थी, जैसे वो पिछले पैरों पर खड़ा होकर कुछ कर रहा हो. और मैं सात की टेबल (पहाड़ा) दुहराने लगा, इससे मुझे फ़ौरन नींद आ जाती है. और सही में : मैं सात सत्ते तक भी नहीं पहुँचा, कि मेरे दिमाग़ में सब गड्ड-मड्ड होने लगा, और मैं लगभग सो ही गया, मगर तभी कोने में, पार्टीशन के पीछे कुत्ता, जो कि शायद नहीं सोया था, फिर से गुर्राने लगा. और वो भी कैसे! पहले से सौ गुना ज़्यादा डरावनी आवाज़ में. मेरे भीतर कुछ-कुछ चुभने लगा. मगर फिर भी मैं उसके ऊपर चिल्लाया:
 “तूबा! लेटा रह! फ़ौरन सो जा!...”

वो फिर से थोड़ा सा शांत हो गया. तभी मुझे याद आया कि मेरी ट्रेवल-बास्केट मेरे पैरों के पास रखी है और उसमें मेरी अपनी चीज़ों के अलावा खाने का एक पैकेट भी है, जो मम्मा ने रास्ते के लिए रख दिया था. मैंने सोचा कि अगर इस कुत्ते को थोड़ा सा खिला दूँ, तो उसका मूड अच्छा हो जाएगा और वो मुझ पर गुर्राना बन्द कर देगा. मैं उठकर बैठ गया, बास्केट में हाथ डालकर टटोलने लगा, और हालाँकि अंधेरे में समझना मुश्किल था, फिर भी मैंने उसमें से कटलेट और दो अंडे निकाले – मुझे उनके बारे में कोई अफ़सोस नहीं था, क्योंकि वो सॉफ्ट-बॉइल्ड थे. जैसे ही कुत्ता फिर गुर्राया, मैंने एक के बाद एक दोनों अंडे पार्टीशन के पीछे फेंक दिए:
 “तूबा! खा ले! और फ़ौरन सो जा!...”

पहले तो वो चुप रहा, मगर फिर इतने गुस्से से गुर्राया, कि मैं समझ गया: उसे भी सॉफ्ट-बॉइल्ड अंडे पसन्द नहीं हैं. तब मैंने उसकी तरफ़ कटलेट फेंका, सुनाई दे रहा था कि कैसे कटलेट उससे टकराया, कुत्ता चुप हो गया और उसने गुर्राना बन्द कर दिया.
मैंने कहा:
 “अब ठीक है. और अब – सो जा! फ़ौरन!”

कुत्ता और नहीं गुर्राया, बल्कि सिर्फ नाक सूँ-सूँ करता रहा. मैंने अपने आपको कम्बल में कसके बन्द कर लिया और सो गया...

सुबह सूरज की तेज़ धूप से मैं उछलकर उठा और सिर्फ अंडरवियर में छत पे भागा. पापा अलेक्सेइ मिखायलोविच और मीला आण्टी मेज़ पे बैठे थे. मेज़ पे सफ़ेद मेज़पोश था और पूरी प्लेट भरके लाल-मूली रखी थी, और ये बहुत ही ख़ूबसूरत लग रहा था, और सब लोग नहाए-धोए, साफ़-सुथरे लग रहे थे कि मेरा दिल ख़ुश हो गया, और मैं भी आंगन में नहाने के लिए भागा. सिंक घर के दूसरी तरफ़ लगा था, जहाँ सूरज की रोशनी नहीं आ रही थी, और ठण्डक थी, पेड़ की छाल नम थी, और नल से बर्फ़ जैसा ठण्डा पानी आ रहा था, वो नीले रंग का था, मैं बड़ी देर तक पानी से छपछपाता रहा, और ठण्ड से जम गया, और मैं ब्रेकफ़ास्ट के लिए भागा. मैं मेज़ पर बैठा और कुर-कुर करके मूली खाने लगा, काली ब्रेड के की स्लाईस में रखकर, उस पर नमक डाला, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था – मैं पूरे दिन उसी तरह कुरकुराती मूली खाता रहता. मगर फिर अचानक मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात याद आई!

 मैंने कहा:
 “और, लम्बी यात्राओं वला कप्तान कहाँ है? कहीं आपने मुझे बुद्धू तो नहीं बनाया!”

मीला आण्टी खिलखिलाने लगी, और अलेक्सेइ मिखायलोविच ने कहा:
 “ऐह, तू भी! सारी रात तो उसीकी बगल में सोता रहा और तुझे पता भी नहीं चला....अच्छा, चल, ठीक है, मैं अभी उसे लाता हूँ, वर्ना वो पूरा दिन सोता रहेगा. यात्रा से थक कर आया है.”

मगर तभी छत पर लाल चेहरे और हरी-हरी आँखों वाला एक लम्बा आदमी आया. वो नाइट सूट में था. उसकी कोई दाढ़ी-वाढ़ी नहीं थी. वह मेज़ के पास आया और भयानक मोटी आवाज़ में बोला:
 “गुड मॉर्निंग! और ये कौन है? कहीं डेनिस तो नहीं?”
उसकी आवाज़ इतनी भारी थी, कि मुझे ताज्जुब होने लगा कि वह उसके गले में समाती कैसे है.
पापा ने कहा:
 “हाँ, ये सौ ग्राम झाईयाँ – यही है डेनिस. मिलिए. डॆनिस, ये है तुम्हारा कप्तान जिसका तुम बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे!”
मैं फ़ौरन खड़ा हो गया. कप्तान ने कहा:
 “वॉव!”
और उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ा दिया. वो इतना कड़ा था, जैसे बोर्ड हो.

कप्तान बहुत प्यारा था. मगर उसकी आवाज़ बहुत डरावनी थी. और फिर, तलवार कहाँ है? कोई पैजामा पहना है. और, पाईप कहाँ है? सीधा या मुड़ा हुआ – चाहे जैसा भी हो, मगर कोई पाईप तो हो! मगर नहीं था...
 “नींद कैसी आई, चैरितोशा?” मीला आण्टी ने पूछा.
 “बहुत बुरी!” कप्तान ने कहा. “पता नहीं, क्या बात थी. पूरी रात कोई मुझ पर चिल्ला रहा था. समझ रहे हैं, जैसे ही मेरी आँख लगती, कोई चिल्लाता:
 “सो जा! फ़ौरन सो जा!” यही सुनकर मेरी नींद खुल जाती! फिर थकावट अपना असर दिखा रही थी, पूरे पाँच दिनों से सफ़र कर रहा था, आँखें चिपकी जा रही थीं, मैं फिर से ऊँघने लगता, सो जाता, और, सपने में, समझ रहे हैं, फिर से वही चीख़: “सो जा! लेट जा!” ऊपर से, न जाने कहाँ से मुझ पर तरह-तरह की चीज़ें गिरने लगीं – अण्डे, या कुछ और....शायद, सपने में मुझे कटलेट्स की ख़ुशबू भी आई थी. और नींद में कुछ अजीब-अजीब से शब्द भी सुनाई दे रहे थे : या तो ‘कूश,’ या ‘अपोर्त’...
 “तूबा,” मैंने कहा.  “अपोर्त” नहीं, बल्कि “तूबा”. क्योंकि मैंने सोचा कि वहाँ कोई कुत्ता है...कोई उसी तरह से गुर्रा रहा था!”
 “मैं गुर्रा नहीं रहा था, मैं, शायद, खर्राटे ले रहा था?”
 ये तो बहुत भयानक था. मैं समझ गया कि वो मुझसे कभी भी दोस्ती नहीं करेगा. मैं उठकर अटेन्शन की पोज़ में खड़ा हो गया. मैंने कहा:
 “कॉम्रेड, कैप्टन! बिल्कुल गुर्राहट जैसा था. और मैं, शायद कुछ डर गया था.”
कप्तान ने कहा:
 “आराम से. बैठ जा.”
मैं मेज़ पे बैठा था, और महसूस कर रहा था, कि मेरी आँखों में किसीने रेत डाल दी है, वो चुभ रही है, और मैं कप्तान की तरफ़ देख नहीं पा रहा हूँ. हम सब बड़ी देर तक चुप रहे.
फिर उसने कहा:
 “ध्यान रख, मैं ज़रा भी गुस्सा नहीं हूँ.”
मगर फिर भी मैं उसकी तरफ़ नहीं देख सका.
तब उसने कहा;
”अपनी डिज़ाइन वाली तलवार की कसम.”
उसने ये इतनी प्रसन्नता से कहा, कि मेरे सीने से जैसे फ़ौरन बोझ हट गया.
मैं कप्तान के पास गया और बोला;
 “अंकल, मुझे सिंगापुर के बारे में बताइए.”

****

शनिवार, 20 फ़रवरी 2016

Angrez Pavlya

अंग्रेज़ पाव्ल्या

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


 “कल पहली सितम्बर है,” मम्मा ने कहा. “देखते-देखते शरद ऋतु आ गई, और तू दूसरी क्लास में जाएगा. ओह, टाईम कैसे उड़ता है!...”
 “इस ख़ुशी में,” पापा ने पुश्ती जोड़ी, “हम अभी ‘काटेंगे’ तरबूज़!”

उन्होंने चाकू लिया और तरबूज़ काटा. जब वो काट रहे थे, तो ऐसी भरी-भरी, प्यारी-प्यारी, हरी-हरी कर-कर सुनाई दे रही थी, कि मेरी पीठ में इस ख़याल से ठंडक दौड़ गई कि ये तरबूज़ मैं कैसे खाऊँगा. मैंने अपना मुँह खोल लिया, जिससे कि तरबूज़ की गुलाबी स्लाईस को पकड़ लूँ, मगर तभी दरवाज़ा खुला, और कमरे में आया पाव्ल्या (पावेल को प्यार से पाव्ल्या, पाव्लिक पुकारते हैं. अंग्रेज़ी में ये नाम है – पॉल – अनु. ). हम सब बेहद ख़ुश हुए, क्योंकि वो बहुत दिनों से हमारे यहाँ नहीं आया था, और हमें उसकी याद आती थी.

 “ओहो, कौन आया है!” पापा ने कहा. “ख़ुद पाव्ल्या. ख़ुद पाव्ल्या-दाढ़ीवाला!”
 “हमारे साथ बैठो, पाव्लिक, तरबूज़ खाओ,” मम्मा ने  कहा, “डेनिस्का, थोड़ा सरक जा.”
मैंने कहा:
 “हैलो!” और उसे मेरे पास जगह दे दी.
“हैलो!” उसने कहा और बैठ गया.

हमने तरबूज़ खाना शुरू किया और बड़ी देर तक चुपचाप खाते रहे. बातें करने को दिल नहीं चाह रहा था.

जब मुँह में इतनी स्वादिष्ट चीज़ भरी हो, तो कोई बात कैसे कर सकता है!

जब पाव्ल्या को तीसरी स्लाईस दी गई, तो उसने कहा:
 “आह, मुझे तरबूज़ पसंद है. बेहद पसंद है. मुझे दादी कभी भी जी भरके नहीं खाने देती.”
 “ऐसा क्यों?” मम्मा ने पूछा.
 “वो कहती है, कि तरबूज़ खाने के बाद मुझे नींद नहीं आएगी, मैं बस मस्ती करने लगूँगा.”
 “सही है,” पापा ने कहा. “इसीलिए तो हम तरबूज़ सुबह, जल्दी खाते हैं. शाम तक उसका असर ख़त्म हो जाता है, और बड़ी अच्छी नींद आती है. चल, खा ले, घबराने की ज़रूरत नहीं है.”
 “मैं नहीं घबराता,” पाव्ल्या ने कहा.

और हम फिर से खाने लगे और फिर से बड़ी देर तक चुप रहे. जब मम्मा छिलके उठाने लगी, तो पापा ने कहा:
 “पाव्ल्या, तू इतने दिन हमारे यहाँ क्यों नहीं आया?”
 “हाँ,” मैंने कहा. “तू कहाँ ग़ायब हो गया था? क्या कर रहा था?”

पाव्ल्या अकड़ दिखाने लगा, वो लाल हो गया, उसने इधर-उधर देखा और अचानक ऐसे बोला, जैसे ज़बर्दस्ती बता रहा हो:
 “क्या कर रहा था, क्या कर रहा था?... ये कर रहा था, कि अंग्रेज़ी सीख रहा था.”

मैं एकदम सन्न हो गया. मैं फ़ौरन समझ गया कि मैं पूरी गर्मियाँ बस बेवकूफ़ियाँ करता रहा. साही से खेलता रहा, बैट-बॉल खेलता रहा, बेकार की चीज़ें करता रहा. और इस पाव्ल्या ने समय नहीं बर्बाद किया, नहीं, शरारतें नहीं कीं, वह अपने आप को अच्छा बनाने में लगा रहा, अपनी शिक्षा के स्तर को बढ़ाता रहा.

वो अंग्रेज़ी सीख रहा था और अब इंग्लैण्ड के पायनीयर्स से पत्र-व्यवहार कर सकेगा और अंग्रेज़ी किताबें पढ़ सकेगा!

मुझे लगा कि मैं जलन के मारे मर जाऊँगा, और ऊपर से मम्मा ने भी कहा:
 “देख डेनिस्का, सीख. ये कोई बैट-बॉल नहीं है!”
”शाबाश!” पापा ने कहा. “मैं इज़्ज़त करता हूँ!”
पाव्ल्या का चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा.
 “हमारे यहाँ एक स्टूडेंट, सीवा आया है. वो हर रोज़ मुझे सिखाता है. पूरे दो महीने हो गए. पूरी तरह तंग कर दिया है.”
”क्या अंग्रेज़ी कठिन है?” मैंने पूछा.
 “पागल हो जाते हो,” पाव्ल्या ने गहरी साँस ली.
 “मुश्किल कैसे नहीं होगी,” पापा भी बात में शामिल हो गए. “वहाँ तो शैतान को भी नानी याद आ जाए. बेहद मुश्किल है अंग्रेज़ी लिखना. लिखते हो लिवरपूल और कहते हो मैनचेस्टर.”
 “वाह, वा!!” मैंने कहा. “क्या ये सही है, पाव्ल्या?”
 “बिल्कुल मुसीबत है,” पाव्ल्या ने कहा. “इन लेसन्स से मैं बेज़ार हो गया हूँ, मेरा वज़न भी दो सौ ग्राम्स कम हो गया है.”
 “तो तू अपने ज्ञान का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है, पाव्लिक?” मम्मा ने कहा. “जब तू आया, तो तूने अंग्रेज़ी में हमसे ‘नमस्ते’ क्यों नहीं कहा?”
 “अभी मैंने ‘नमस्ते’ सीखा नहीं है,” पाव्ल्या ने कहा.
 “अच्छा, जब तूने तरबूज़ खाया, तो ‘धन्यवाद’ क्यों नहीं कहा?”
 “मैंने कहा था,” पाव्ल्या ने जवाब दिया.
 “हाँ, रूसी में तो तूने कहा था, मगर अंग्रेज़ी में?”
 “हम अभी ‘धन्यवाद’ तक नहीं पहुँचे हैं,” पाव्ल्या ने कहा. “बहुत मुश्किल है...”
तब मैंने कहा:
 “पाव्ल्या, चल, तू मुझे सिखा कि अंग्रेज़ी में ‘एक, दो, तीन’ कैसे कहते हैं.”
 “ये मैंने अभी नहीं सीखा है,” पाव्ल्या ने कहा.
 “तो तूने सीखा क्या है?” मैं चिल्लाया. “दो महीनों में तूने कुछ तो सीख होगा?”
 “मैंने सीखा कि अंग्रेज़ी में ‘पेत्या’ को कैसे बुलाते हैं,” पाव्ल्या ने कहा.
 “कैसे?”
  “‘पीट’!” पाव्ल्या ने शान से जवाब दिया. “अंग्रेज़ी में ‘पेत्या’ होगा ‘पीट’. वह ख़ुशी से मुस्कुराया और आगे बोला: “कल क्लास में जाकर पेत्का गोर्बूश्किन से कहूँगा: “पीट, ऐ पीट, रबर दे!” वो अचरज से मुँह खोलेगा, कुछ भी नहीं समझेगा. बड़ा मज़ा आएगा! है ना, डेनिस?”
 “सही है,” मैंने कहा. “अच्छा, और क्या क्या जानता है तू अंग्रेज़ी में?”
 “बस, अभी इतना ही,” पाव्ल्या ने कहा.

*****