शनिवार, 9 जनवरी 2016

Mujhe kya achchhaa lagta hai...

मुझे क्या अच्छा लगता है...और क्या अच्छा नहीं लगता

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

मुझे पापा के घुटने पे पेट के बल लेटना बहुत अच्छा लगता है, हाथ और पैर नीचे छोड़कर घुटने पर यूँ लटकते रहना जैसे फेंसिंग पर कोई कपड़ा सूख रहा हो. मुझे ड्राफ्ट्स, शतरंज और दोमिनो खेलना अच्छा लगता है, सिर्फ़ इस शर्त पर कि मैं बस, जीतता रहूँ. अगर जीतता नहीं हूँ, तो नहीं खेलता.

डिब्बे में बन्द भुनगे की लगातार खुरखुर करने की आवाज़ सुनना मुझे अच्छा लगता है. और छुट्टी वाले दिन सुबह पापा के बिस्तर में दुबकना अच्छा लगता है जिससे मैं पापा के साथ कुत्ते के बारे में बातें कर सकूँ: कैसे हम एक बड़े घर में रहने जाएँगे, और कुत्ता खरीदेंगे, और उसकी देखभाल करेंगे, और उसे खाना खिलाएँगे, और वह कितना शांत और अक्लमन्द होगा, और वह कैसे शुगर क्यूब्स चुराएगा, और कैसे मैं ख़ुद उसके पीछे पीछे गंदा पानी पोंछता रहूँगा, और वह मेरे पीछे पीछे चलता रहेगा, एक वफ़ादार कुत्ते की तरह.

 मुझे टी.वी. देखना भी अच्छा लगता है : चाहे कुछ भी दिखा रहे हों, चाहे सिर्फ़ कोई टेबल्स ही क्यों न हों.

मुझे मम्मा के कान में नाक से साँस छोड़ना अच्छा लगता है. गाना मुझे ख़ासकर अच्छा लगता है और मैं हमेशा ख़ूब ज़ोर से गाता हूँ.

लाल घुड़सवारों के बारे में कहानियाँ सुनना मुझे बेहद अच्छा लगता है, और यह भी अच्छा लगता है कि वे हमेशा जीतते रहें.

आईने के सामने खड़ा होना और तरह तरह से मुँह बनाना मुझे अच्छा लगता है, जैसे मैं डॉल्स-थियेटर का पेत्रूश्का होऊँ. मछली का अचार भी मुझे बहुत अच्छा लगता है.

कांचिल के बारे में कहानियाँ पढ़ना मुझे पसन्द है. ये एक छोटा सा, होशियार और शरारती हिरन है. उसकी हँसती हुई आँखें हैं, और छोटे छोटे सींग हैं, और गुलाबी खुर हैं. जब हम बड़े घर में रहने जाएंगे तो हम अपने लिए एक कांचिल खरीदेंगे, वो बाथ-हाऊस में रहा करेगा. मुझे उस जगह तैरना भी पसन्द है जो उथली हो, जिससे बालू वाले तल को हाथों से पकड़ सकूँ.  

मुझे जुलूसों में लाल झंडा हिलाना और पाइप से  ‘तुत्-तुत् ! ’ करना अच्छा लगता है.

टेलिफ़ोन पे बात करना तो ख़ूब ही अच्छा लगता है.

मुझे लकड़ी को समतल करना, बुरादा बनाना अच्छा लगता है, मैं प्राचीन योद्धाओं के और भैंसों के सिर बना सकता हूँ, और मैंने मिट्टी से तीतर और सम्राट-तोप बनाई है. ये सब गिफ़्ट में देना मुझे अच्छा लगता है.

जब मैं पढ़ता हूँ तो उस समय टोस्ट या कोई और चीज़ खाते रहना मुझे अच्छा लगता है.

मुझे मेहमान अच्छे लगते हैं.

और, मुझे घास के साँप, छिपकलियाँ और मेंढक अच्छे लगते हैं. वो इतने फुर्तीले होते हैं. मैं उन्हें अपनी जेबों में रखता हूँ. मुझे अच्छा लगता है, जब मैं खाना खा रहा होता हूँ, और घास का साँप मेज़ पर पड़ा हो. अच्छा लगता है, जब दादी मेंढक को देखकर चिल्लाती है, “हटाओ इस गन्दगी को!” – और कमरे से भाग जाती है.

मुझे हँसना अच्छा लगता है...कभी कभी मेरा दिल बिल्कुल हँसने को नहीं करता, मगर मैं अपने आप को मजबूर करता हूँ,  ज़बर्दस्ती हँसी निकालता हूँ – और देखता हूँ कि सचमुच में हँसी आ जाती है.

जब मैं अच्छे मूड में होता हूँ तो मेरा दिल उछलने-कूदने को करने लगता है. एक बार मैं पापा के साथ ज़ू-पार्क गया, और मैं रास्ते पर उसके चारों ओर उछलता-कूदता रहा, और उन्होंने पूछा:
 “ये तू उछल क्यों रहा है?”
और मैंने कहा:
“मैं इसलिए उछल रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे पापा हो!”
वो समझ गए.
मुझे ज़ू-पार्क जाना अच्छा लगता है! वहाँ ग़ज़ब के हाथी हैं. और एक हाथी का बच्चा भी है.

जब हम बड़े घर में रहने लगेंगे, तो हम एक हाथी का बच्चा खरीदेंगे. मैं उसके लिए एक गैरेज बनाऊँगा.

मुझे कार के पीछे खड़ा होना बहुत अच्छा लगता है, जब वह घर्र –घर्र करती है, और पेट्रोल सूंघना पसन्द है. 

मुझे कैफ़े में जाना अच्छा लगता है – आईस्क्रीम खाना और उसके ऊपर मिनरल वाटर पीना. उससे नाक में चुभन होती है और आँखों में आँसू आ जाते हैं.

जब मैं कॉरीडोर में दौड़ता हूँ, तो पूरी ताक़त से पैर पटकना अच्छा लगता है.

मुझे घोड़े बहुत पसन्द हैं, उनके चेहरे इतने सुन्दर और भले होते हैं.

मुझे बहुत कुछ अच्छा लगता है!
  
...और क्या अच्छा नहीं लगता

क्या अच्छा नहीं लगता, तो वो है दाँतों का इलाज करवाना. दाँत वाली कुर्सी देखते ही, फ़ौरन दुनिया के दूसरे छोर पे भाग जाने को जी करता है. ये भी अच्छा नहीं लगता, कि जब मेहमान आते हैं, तो कुर्सी पर खड़े होकर कविताएँ सुनाना पड़ता है.
जब पापा मम्मा को लेकर थियेटर जाते हैं, तो अच्छा नहीं लगता.
सॉफ्ट-बॉइल्ड अण्डे तो मैं बर्दाश्त ही नहीं कर पाता, जब उन्हें ग्लास में हिलाते हैं, उसमें ब्रेड मिलाते हैं, और ज़बर्दस्ती खिलाते हैं....
मुझे ये भी अच्छा नहीं लगता, कि जब मम्मा मेरे साथ घूमने निकलती है, और अचानक रोज़ा आण्टी मिल जाती है!
तब वे सिर्फ एक दूसरे से ही बातें करती रहती हैं, और मैं समझ ही नहीं पाता कि क्या करूँ.
नई ड्रेस में घूमना अच्छा नहीं लगता – उसमें मैं लकड़ी जैसा लगता हूँ.
जब हम ‘रेड और व्हाईट’ का खेल खेलते हैं, तो मुझे ‘व्हाईट’ होना अच्छा नहीं लगता. तब मैं खेल से बाहर हो जाता हूँ, और बस! और जब मैं ‘रेड’ बनता हूँ, तो मुझे क़ैद होना अच्छा नहीं लगता. तब भी मैं भाग जाता हूँ.
जब मुझे हराते हैं, तो अच्छा नहीं लगता.
मुझे जन्म दिन पर “कारवाँ” खेलना अच्छा नहीं लगता: मैं छोटा नहीं हूँ.
मुझे अच्छा नहीं लगता, जब लड़के शान बघारते हैं.
और, ये तो बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता, जब मेरी ऊँगली कट जाती है, और ऊपर से उस पर आयडीन लगाना पड़ता है.
मुझे ये अच्छा नहीं लगता कि हमारा कॉरीडोर बेहद तंग है और बड़े लोग हर पल कुछ न कुछ लिए इधर से उधर घूमते ही रहते हैं – कोई बर्तन ले जा रहा होता है, तो कोई चाय की केतली और चिल्लाते हैं:
”बच्चों, पैरों के बीच में न कड़मड़ाओ! होशियार, मेरे हाथों में गरम बर्तन है!”
और, जब मैं सोने लगता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता कि पड़ोस के कमरे में बच्चे कोरस गाते हैं...
जब रेडियो पर बच्चे बूढ़ों की आवाज़ में बातें करते हैं, तो मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगता!...

    

शुक्रवार, 8 जनवरी 2016

Kuchh BHi Nahin Badlega

कुछ भी नहीं बदलेगा
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

मैं बहुत पहले ही समझ गया हूँ कि बड़े लोग छोटों से बेहद बेवकूफ़ी भरे सवाल पूछते हैं. जैसे कि उन्होंने आपस में सलाह कर ली हो. नतीजा ये निकलता है, मानो उन सबने एक ही तरह के सवाल याद कर लिए हैं और सभी बच्चों से वे एक के बाद एक यही सवाल पूछते हैं. मुझे तो इस बात की इतनी आदत हो गई है कि मुझे पहले से पता होता है कि अगर किसी बड़े इन्सान से मेरा परिचय होगा तो आगे क्या क्या होगा. ये इस तरह से होगा.
घंटी बजेगी, मम्मा दरवाज़ा खोलेगी , कोई इन्सान देर तक बुदबुदाकर समझ में न आने वाली बातें कहेगा, फिर कमरे में नया बड़ा आदमी आएगा. वो हाथ मलेगा. फिर कान, फिर चश्मा. जब वह उसे  फिर से पहन लेगा तो मुझे देखेगा, और हालाँकि उसे काफ़ी पहले से ही मालूम है कि मैं इस दुनिया में रहता हूँ, और ये भी बड़ी अच्छी तरह जानता है कि मेरा नाम क्या है, फिर भी वह मुझे कंधों से पकड़ेगा, उन्हें काफ़ी ज़ोर से दबाएगा, मुझे अपनी ओर खींचेगा और कहेगा:
”हैलो, डेनिस, तेरा नाम क्या है?”
बेशक, अगर मैं बदतमीज़ इंसान होता तो उससे कहता:
“आप ख़ुद ही जानते तो हैं! अभी अभी आपने मुझे मेरे नाम से ही तो पुकारा, फिर ये बेहूदापन क्यों कर रहे हैं?”
मगर मैं एक शरीफ़ लड़का हूँ. इसलिए मैं ऐसा दिखाता हूँ कि मैंने ऐसी कोई बात सुनी नहीं, मैं बस मुँह 
 टेढ़ा करके मुस्कुराता हूँ, नज़रें एक ओर को घुमाते हुए जवाब देता हूँ:
 “डेनिस.”
वह आगे पूछेगा:
 “कितने साल का है तू?”
जैसे कि उसे ये दिखाई ही नहीं दे रहा है कि मैं न तो तीस साल का हूँ, और न चालीस का! देख तो रहा है कि मैं कितना ऊँचा हूँ, और, मतलब, उसे मालूम होना चाहिए कि मैं ज़्यादा से ज़्यादा सात साल का हूँ, हद से हद आठ का – फिर क्यों पूछना है? मगर उसके अपने बड़े विचार हैं, बड़ी आदतें हैं, और वह ज़ोर दिए जाता है:
 “आँ? कितने साल का है तू? आँ?”
मैं उससे कहता हूँ:
 “साढ़े सात.”
अब वह अपनी आँखें फाड़ेगा और सिर पकड़ लेगा, मानो मैंने उससे ये कह दिया हो कि कल ही मेरे एक सौ इकसठ साल पूरे हुए हैं. वो एकदम कराहने लगेगा, जैसे कि उसके तीन दाँतों में दर्द हो रहा हो:
 “ओय-ओय-ओय! साढ़े सात! ओय-ओय-ओय!”
मैं कहीं उस पर तरस खाकर रोने न लगूँ और समझ जाऊँ कि ये मज़ाक है, वो कराहना बन्द कर देगा. अब वो दो उँगलियाँ मेरे पेट में ज़ोर से गड़ाएगा और जोश में चहकेगा:
 “जल्दी ही फ़ौज में जाएगा! आँ?”
 और फिर वह वापस इस खेल की शुरुआत पर जाएगा और मम्मा से, पापा से सिर हिलाते हुए कहेगा:
 “क्या हो रहा है, क्या हो रहा है! साढ़े सात! हो चुके!” और फिर मेरी ओर मुड़ कर कहेगा: “और मैंने तुझे इत्ता सा देखा था!”
वह हवा में क़रीब बीस सेंटीमीटर दिखाता है. वो भी तब, जब मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि मेरी लम्बाई इक्यावन सेंटीमीटर थी. मम्मा के पास तो ऐसा सर्टिफिकेट भी है. सरकारी. मगर मैं इस बड़े  आदमी की बात का बुरा नहीं मानता. वे सब एक जैसे ही होते हैं. मुझे पक्का मालूम है कि अब वह सोच में पड़ जाएगा. और वह सोचने लगेगा. गहरी सोच. वह अपना सिर सीने पर लटका लेगा, जैसे सो गया हो. मैं हौले से उसके हाथों से छूटने की कोशिश करूँगा. मगर वैसा नहीं होता. बड़ा आदमी सिर्फ ये याद करेगा कि उसकी जेब में और कौन कौन से सवाल पड़े हैं, वह उन्हें याद करेगा और आख़िरकार ख़ुशी से मुस्कुराते हुए पूछेगा:
 “ओह, हाँ! और तू क्या बनेगा? आँ? क्या बनना चाहता है?”
 सच कहूँ तो, मैं तो गुफ़ा विज्ञान पढ़ना चाहता हूँ, मगर मैं यह भी जानता हूँ कि नये बड़े आदमी को ये बोरिंग लगेगा, समझ में नहीं आएगा, अजीब सा लगेगा, और इसलिए उसे उसकी लाइन से न हटाने के लिए मैं कहूँगा:
 “मैं आईसक्रीम बेचने वाला बनना चाहता हूँ. उसके पास हमेशा जितनी चाहो उतनी आईस्क्रीम होती है”.
नए बड़े आदमी का चेहरा फ़ौरन चमकने लगेगा. सब कुछ ठीक है, सब वैसे ही हो रहा है जैसे वह चाहता  है, बिना लीक से हटे. इसलिए वह मेरी पीठ थपथपाएगा (खूब दर्द होता है) और मेहेरबानी से कहेगा:
 “करेक्ट! लगे रहो! शाबाश!”
मैं अपनी मासूमियत में सोचता हूँ कि सब हो गया, किस्सा ख़तम, और थोड़ी हिम्मत से उससे दूर हटने की कोशिश करूँगा, क्योंकि मेरे पास टाइम नहीं है, अभी मेरा होम वर्क नहीं हुआ है और दूसरे हज़ारों काम पड़े हैं, मगर वह मेरी इस आज़ाद होने की कोशिश को भाँप लेगा और उसे जड़ से ही ख़त्म कर देगा, वो मुझे अपने पैरों के बीच मुझे दबोचेगा, और उँगलियाँ गड़ाएगा, मतलब, साफ़ साफ़ कहूँ तो वह ताक़त आज़माएगा, और जब मैं थक जाऊँगा और छटपटाना छोड़ दूँगा, तो वह मुझसे सबसे ख़ास सवाल पूछेगा:
 “मुझे ये बताओ, मेरे दोस्त....” वह कहेगा, और उसकी आवाज़ में साँप जैसा ज़हर रेंगने लगेगा, “बताओ, तुम किसे ज़्यादा प्यार करते हो? पापा को या मम्मा को?”
बेहूदा सवाल. ऊपर से वह मेरे मम्मा और पापा के सामने पूछा गया है. होशियारी दिखानी होगी.
 “मिखाइल ताल को,” मैं कहूँगा.
वह ठहाका मार कर हँसेगा. उसे न जाने क्यों ऐसे बेवकूफ़ी भरे जवाब ख़ुश कर देंगे. वह सौ बार दुहराएगा:
 “मिखाइल ताल को! हा-हा-हा-हा-हा-हा! क्या बात है? तो? ख़ुशनसीब पेरेंट्स, इस पर आप क्या कहेंगे?”
और वह आधे घंटे तक हँसता रहेगा, और मम्मा और पापा भी हँसेंगे. मुझे उन पर और अपने आप पर शरम आएगी. मैं अपने आप सो वचन दूँगा कि बाद में, जब यह ख़ौफ़नाक ड्रामा ख़त्म हो जाएगा, मैं किसी तरह, पापा की नज़र बचा कर मम्मा को किस करूँगा, मम्मा की नज़र बचा कर पापा को किस करूँगा. क्योंकि मैं उन दोनों से एक सा प्यार करता हूँ, ए-क-सा---!! अपने सफ़ेद भालू की क़सम! ये इतना आसान है. मगर, बड़ों को न जाने क्यों, इत्मीनान नहीं होता. मैंने कई बार ईमानदारी से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है, और हमेशा देखा कि बड़े लोग इस जवाब से ख़ुश नहीं होते, उन पर निराशा छा जाती है, शायद. उन सबकी आँखों में जैसे एक ही बात दिखाई देती है, कुछ ऐसी: ऊ-ऊ-ऊ...कितना मामूली जवाब है! वो मम्मा और पापा से एक सा प्यार करता है! कितना बोरिंग है बच्चा.
इसीलिए मैं मिखाईल ताल के बारे में गप मार देता हूँ, हँसने दो उन्हें, तब तक मैं फिर से अपने नए परिचित की फ़ौलादी गिरफ़्त से छूटने की कोशिश करूँगा! मगर कहाँ की कोशिश, ज़ाहिर है कि वह यूरी व्लासोव से ज़्यादा ताक़तवर है. और अब वो मुझसे एक और सवाल पूछेगा. मगर उसके अन्दाज़ से मैं समझ जाता हूँ कि मामला ख़तम होने को है. ये सबसे ज़्यादा बेवकूफ़ी भरा सवाल होगा, जैसे ख़ाने के बाद वाली स्वीट डिश. अब उसके चेहरे पर एक कृत्रिम डर दिखाई देता है.
 “और तूने आज हाथ-मुँह क्यों नहीं धोए?”
बेशक, मैंने धोए थे, मगर मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि वो किस तरफ़ जा रहा है.
और उसे ये पुराना, दकियानूसी खेल बोर क्यों नहीं करता.
बात को और लम्बा न तानने की गरज़ से, मैं अपने चेहरे पर हाथ फेरता हूँ.
 “कहाँ?!” मैं चीखूँगा. “क्या लगा है?! कहाँ?!”
करेक्ट! सीधा हमला! बड़ा आदमी अपनी पुराने फ़ैशन का राग अलापता है:
 “और आँखें?” वह शरारत से कहेगा. “आखें इतनी काली क्यों हैं? उन्हें धोना चाहिए! जा, फ़ौरन बाथरूम में जा!”
और आख़िर में वो मुझे छोड़ ही देगा! अब मैं आज़ाद हूँ और अपना काम कर सकता हूँ.
ओह, ये नये परिचय कितनी मुश्किलें खड़ी करते हैं मेरे लिए!
मगर कर क्या सकते हो? सभी बच्चे इस दौर से गुज़रते हैं! न तो मैं पहला हूँ, और न ही आख़री...
इसमें किसी भी तरह की तबदीली करना नामुमकिन है.
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Professor Shekhimar

प्रोफेसर शेखीमार

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

जब मैं पेपर पढ़ते समय पापा को तंग करता हूँ तो उन्हें अच्छा नहीं लगता. मगर मैं हमेशा इस बारे में भूल जाता हूँ, क्योंकि उनसे बात करने को मेरा जी बहुत चाहता है. आख़िर, वो मेरे इकलौते पापा हैं! मैं  हमेशा उनके साथ बातें करना चाहता हूँ.
एक बार वो बैठे हुए पेपर पढ़ रहे थे, और मम्मी मेरे जैकेट पर टोप सी रही थीं.
मैंने कहा:
 “पापा, तुम्हें मालूम है कि बायकाल लेक में कितने अज़ोव सागर समा सकते हैं?”
उन्होंने कहा:
 “डिस्टर्ब मत करो...”
 “92! अच्छा है ना?”
 “अच्छा है. डिस्टर्ब मत करो, ठीक है?”
 और वो फिर से पढ़ने लगे.
मैंने कहा:
 “क्या तुम आर्टिस्ट एल ग्रेको को जानते हो?”
उन्होंने सिर हिला दिया. मैंने कहा:
 “उसका असली नाम है दोमेनिको तियोतोकोपूली! क्योंकि वह क्रीत द्वीप का रहने वाला ग्रीक है. इसी आर्टिस्ट को स्पैनिश लोग कहते थे एल ग्रेको!...
बड़ी दिलचस्प बातें हैं. व्हेल, मिसाल के तौर पर,पापा, पाँच किलोमीटर दूर तक सुन सकती है.”
पापा ने कहा:
 “थोड़ी देर तो चुप हो जा...कम से कम पाँच मिनट...”
मगर मेरे पास तो पापा को सुनाने के लिए इत्ती सारी ख़बरें थीं कि मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा  था. मेरे अन्दर से ख़बरें बिखर रही थीं, एक के बाद एक उछलती हुई बाहर आ रही थीं. क्योंकि वे थीं भी तो ढेर सारी. अगर वे कुछ कम होतीं, तो हो सकता कि बर्दाश्त करना मेरे लिए आसान होता, तब मैं चुप हो जाता, मगर वे तो ख़ूब सारी थीं, और इसीलिए मैं मजबूर था.
मैंने कहा:
 “पापा! सबसे ख़ास ख़बर तो तुम्हें मालूम ही नहीं है: ग्रेट ज़ोन्द आइलैंड्स में छोटी-छोटी भैंसे रहती हैं. पापा, वे बौनी होती हैं. उन्हें केन्टूस कहते हैं. ऐसे केन्टूस को सूटकेस में बन्द करके ला सकते हैं!”
 “ओह, अच्छा?” पापा ने कहा , “बड़े अचरज की बात है! अब तू मुझे आराम से पेपर पढ़ने दे, ठीक है?”

“पढ़ो, पढ़ो,” मैंने कहा, “प्लीज़, पढ़ लो! पापा, समझ रहे हो, ऐसा लगता है कि हमारे कॉरीडोर में ऐसी भैंसों का पूरा झुण्ड चर सकता है!... हुर्रे?”
 “हुर्रे,” पापा ने कहा. “चुप रहेगा, या नहीं?”
 “और सूरज आसमान के बीचोंबीच थोड़ी ना होता है,” मैंने कहा, “बल्कि किनारे पर होता है!”
 “ऐसा हो ही नहीं सकता,” पापा ने कहा.
 “शर्त लगाता हूँ,” मैंने कहा, “वो किनारे पे होता है! एकदम किनारे पे.”
पापा ने धुँधलाई आँखों से मेरी ओर देखा. फिर उनकी आँखें साफ़ हो गईं, और उन्होंने मम्मी से कहा:
 “उसे ये सब कैसे पता चला? कहाँ से? कब?”
 मम्मी मुस्कुराईं:
 “वो मॉडर्न बच्चा है. वह पढ़ता है, रेडिओ सुनता है. टीवी. लेक्चर्स. और तुम्हें क्या लगा?”
 “वंडरफुल,” पापा ने कहा, “कितनी जल्दी सब कुछ पता चल जाता है.”
उन्होंने फिर से अख़बार के पीछे अपने आपको छुपा लिया, और मम्मी ने उनसे पूछा:
 “ इतनी दिलचस्पी से तुम क्या पढ़ रहे हो?”
 “अफ्रीका,” पापा ने कहा. “ खौल रहा है! उपनिवेशवाद का अंत!”
 “अभी अंत नहीं हुआ है!” मैंने कहा.
 “क्या?”
मैं अख़बार के नीचे से रेंग कर उनके सामने खड़ा हो गया.
 “अभी भी कई सारे गुलाम देश हैं,” मैंने कहा. “कई सारे गुलाम देश हैं.”
उन्होंने कहा, “तू बच्चा नहीं है. नहीं. तू तो प्रोफ़ेसर है! असली प्रोफ़ेसर...शेखीमार !”
और वो हँसने लगे, और मम्मी भी उनके साथ हँसने लगीं.
 “ठीक है, डेनिस, जा थोड़ी देर घूम के आ,” उसने मेरी ओर जैकेट बढ़ाया और मुझे धकेलते हुए बोली,  “जा! जा!”
मैं जाने लगा, जाते-जाते मैंने मम्मी से कॉरीडोर में पूछा :
 “मम्मी, ये प्रोफ़ेसर शेखीमार क्या होता है? पहली बार ऐसी बात सुन रहा हूँ! क्या उन्होंने मज़ाक में मुझे ‘शेखीमार’ कहा? क्या यह अपमानजनक है?”
 मगर मम्मी बोली:
 “ क्या कहता है! ये बिल्कुल अपमानजनक नहीं है. क्या पापा तेरा अपमान कर सकते हैं? बल्कि उन्होंने तो, उल्टे, तेरी तारीफ़ की थी!”
जब उन्होंने मेरी तारीफ़ की थी, तो मुझे फ़ौरन इत्मीनान हो गया, और मैं शांत होकर घूमने चल पड़ा.
मगर सीढ़ियों पर मुझे याद आया कि मुझे अल्योन्का को देखना है, सब कह रहे हैं कि वह बीमार है और    
कुछ भी नहीं खा रही है. मैं अल्योन्का के घर पहुँचा. उनके यहाँ कोई अंकल बैठे थे, नीले सूट में, हाथ  गोरे-गोरे. वे मेज़ के पास बैठकर अल्योन्का की मम्मी से बातें कर रहे थे. अल्योन्का दीवान पर लेटी थी और घोड़े का पैर चिपका रही थी. जब अल्योन्का ने मुझे देखा, वह फ़ौरन चिल्लाई:

 “डेनिस्का आया है! ओहो –हो!”

 मैंने शराफ़त से कहा:
 “हैलो! पागल की तरह चिल्ला क्यों रही है?”

और मैं दीवान पर उसके क़रीब बैठ गया.

 गोरे- गोरे हाथों वाले अंकल उठे और बोले:
 “मतलब, सब कुछ नॉर्मल है. हवा, हवा और हवा. ये तो पूरी तरह से नॉर्मल बच्ची है!”

और मैं फ़ौरन समझ गया कि ये डॉक्टर है.

अल्योन्का की मम्मी ने कहा:
 “बहुत, बहुत धन्यवाद , प्रोफेसर! बहुत, बहुत धन्यवाद, प्रोफेसर!”
और उसने उनसे हाथ मिलाया. ज़ाहिर है कि ये इतना अच्छा डॉक्टर था कि उसे सब कुछ मालूम था, और इसलिए उसे ‘प्रोफेसर’ कहते   थे.
वह अल्योन्का के पास गया और बोला:
 “बाय, बाय, अल्योन्का, जल्दी से अच्छी हो जाओ.”

वह लाल हो गई, उसने ज़ुबान बाहर निकाली, दीवार की ओर पलट गई और वहाँ से फुसफुसाई:
 “बाय-बाय...”

उसने उसके सिर पर हाथ फेरा और मेरी ओर मुड़ा:
 “और आपका क्या नाम है, यंग मैन?”

ओह, कितना अच्छा है ये: मुझे “आप” कहा!
 “ मैं डेनिस कोराब्ल्येव हूं! और आपका क्या नाम है?”

उसने मेरा हाथ अपने गोरे-गोरे, बड़े, नरम हाथ में लिया. मुझे अचरज भी हुआ कि वह कितना नरम है. बिल्कुल रेशम! और उसके पूरे बदन से इतनी साफ़, और प्यारी ख़ुशबू आ रही थी. उसने मेरा हाथ हिलाते हुए कहा:
 “ और मेरा नाम है वासिली वासिल्येविच सेर्गेयेव. प्रोफेसर.”

मैंने कहा:
 “शेखीमार? प्रोफेसर शेखीमार?”

अल्योन्का की मम्मी  हाथ नचाने लगी. और प्रोफेसर लाल हो गया और खाँसने लगा. और वे दोनों कमरे से बाहर निकल गए.

और मुझे ऐसा लगा जैसे वे नॉर्मल तरीके से नहीं निकले. जैसे भाग कर निकल गए.

मुझे ये भी लगा कि मैंने कुछ गलत बोल दिया है. मालूम नहीं, क्या बात थी.


या , हो सकता है कि “शेखीमार” – वाक़ई में अपमानजनक है, हाँ?

Dimka aur Anton

दीम्का और अन्तोन
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

पिछली गर्मियों में मैं अपने वोलोद्या चाचा के फार्म-हाऊस गया था. उनका घर बेहद ख़ूबसूरत है, रेल्वे स्टेशन जैसा, मगर उससे थोड़ा छोटा.
मैं वहाँ पूरे हफ़्ते रहा, और जंगल में घूमा, अलाव जलाए, और तैराकी भी की.
मगर ख़ास बात ये है कि वहाँ मेरी कुत्तों से दोस्ती हुई. वहाँ ख़ूब सारे कुत्ते थे, और सब उन्हें नाम और उपनाम से पुकारते थे. जैसे, झूच्का ब्रेद्नेव, या तूज़िक मुराशोव्स्की, या बार्बोस ईसाएन्को.
इस तरह ये जानना आसान हो जाता है कि किसे किस कुत्ते ने काटा है.
हमारे घर में रहता था कुत्ता दीम्का. उसकी पूँछ मुड़ी हुई और झबरीली थी, और पैरों में ऊनी पतलून थी.
जब मैं दीम्का की ओर देखता तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता कि उसकी कितनी ख़ूबसूरत आँखें हैं. पीली-पीली और बेहद समझदार. मैं दीम्का को शक्कर देता, और वह हमेशा मेरी ओर देखकर पूँछ हिलाता. और, बस दो ही घर छोड़कर रहता था कुत्ता अन्तोन. वह वान्का का था. वान्का का उपनाम था दीखोव, तो अंतोन को सब लोग अन्तोन दीखोव कहते थे. इस अन्तोन के बस तीन ही टाँगें थीं, शायद चौथी टाँग को पंजा नहीं था. उसने उसे कहीं खो दिया था. मगर फिर भी वह खूब तेज़ भागता था और हर जगह पहुँच जाता था. वह घुमक्कड़ था, कभी-कभी तीन-तीन दिनों तक गायब हो जाता, मगर हमेशा वान्का के पास लौटकर आ जाता था. अन्तोन को जो भी सामने आ जाए, वो चुराना अच्छा लगता था, मगर वह चालाक नहीं था. एक बार का किस्सा सुनाता हूँ.
मेरी मम्मी ने दीम्का को एक बड़ी हड्डी दी. दीम्का ने उसे ले लिया, अपने सामने रखा, पंजों में पकड़ लिया, आँखें सिकोड़ीं और उसे कुतरने ही वाला था कि अचानक उसे हमारी बिल्ली मूर्ज़िक दिखाई दी. वह किसी को छेड़ नहीं रही थी, चुपचाप घर जा रही थी, मगर दीम्का उछला और उसके पीछे पड़ गया! मूर्ज़िक – दौड़ने लगी और दीम्का बड़ी देर तक उसे खदेड़ता रहा, जब तक कि उसे सराय के पीछे न भगा दिया.
मगर ख़ास बात ये थी कि अन्तोन कबसे हमारे आँगन में था, और जैसे ही दीम्का मूर्ज़िक के पीछे भागा, अन्तोन ने बड़े आराम से उसकी हड्डी उठाई और उसे लेकर भाग गया! हड्डी उसने कहाँ छुपाई, मालूम नहीं, मगर एक ही सेकण्ड बाद वापस आकर बैठ गया, इधर उधर देखने लगा, जैसे कह रहा हो, “लड़कों, मुझे कुछ भी मालूम नहीं है.”
अब दीम्का वापस आया तो देखता क्या है कि हड्डी नहीं है, और बस अन्तोन बैठा है. उसने उसकी ओर देखा, मानो पूछ रहा हो, “तूने ली है?” मगर जवाब में ये बदमाश उसे देखकर हँसने लगा! फिर उकतायेपन से मुड़ गया. तब दीम्का भागकर उसके आगे गया और सीधे उसकी आँखों में देखने लगा. मगर अन्तोन ने पलक तक नहीं झपकाई. दीम्का काफ़ी देर तक उसे देखता रह मगर फिर समझ गया कि उसका कोई ईमान नहीं है, और वहाँ से हट गया.
अन्तोन जैसे उसके साथ खेलना चाह रहा था, मगर दीम्का ने उससे बात करना बन्द कर दिया.
मैंने कहा, “ अन्तोन! आ-आ-आ!”
वह मेरे पास आया, और मैंने उससे कहा, “मैंने सब देखा है. अगर तुम फ़ौरन हड्डी नहीं लाए तो मैं सबसे कह दूँगा.    
वह बुरी तरह लाल हो गया. मतलब, बेशक, वो, हो सकता है, लाल हुआ भी न हो, मगर उसकी शक्ल बता रही थी कि वह बहुत शर्मिन्दा है, और वह सही में लाल हो गया.
ओह, कितना होशियार! अपनी तीन टाँगों से उछलता हुआ वह कहीं गया, और वापस आया तो उसने दाँतों में हड्डी दबाई हुई थी. और हौले से, शराफ़त से, उसे दीम्का की सामने रख दिया. मगर दीम्का उसे खा ही नहीं रहा था. उसने अपनी पीली आँखों से कनखियों से देखा और मुस्कुराया – मतलब, माफ़ कर दिया!
और वे खेलने लगे, भाग-दौड़ करने लगे, और फिर, जब थक गए तो नदी की ओर भागे एक दूसरे से बिल्कुल सटे-सटे.
मानो हाथ में हाथ लिए चल रहे हों.

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Bachpan Ka Dost

बचपन का दोस्त
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


जब मैं छह या साढ़े छह साल का था, तो बिल्कुल नहीं जानता था कि इस दुनिया में मैं आख़िर क्या बनूँगा. मुझे अपने चारों ओर के सब लोग अच्छे लगते थे और सारे काम भी अच्छे लगते थे. तब मेरे दिमाग़ में बड़ी भयानक उलझन थी, मैं काफ़ी परेशान था और तय नहीं कर पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए.

कभी मैं एस्ट्रोनॉमर बनने की सोचता, जिससे कि रात को सोना न पड़े और मैं रात भर टेलिस्कोप में दूर-दराज़ के तारे देख सकूँ; या फिर दूर की यात्रा करने वाले जहाज़ का कप्तान बनने का सपना देखता, जिससे कप्तान के ब्रिज पर पैर फैलाए खड़ा रहूँ और दूर-दूर वाले सिंगापुर की सैर कर सकूँ और वहाँ एक अच्छा–सा दिलचस्प बन्दर ख़रीद सकूँ. कभी-कभी मेरा दिल बुरी तरह चाहता कि मेट्रो-ड्राइवर या स्टेशन-मास्टर बन जाऊँ, लाल कैप पहनूँ और मोटी आवाज़ में चिल्लाऊँ:
 “रे-ए-डी!”

कभी मैं ऐसा आर्टिस्ट बनने का ख़्वाब देखता जो सड़क पर आने-जाने वाली मोटर गाड़ियों के लिए सफ़ेद पट्टे बनाता है. या फिर मुझे ऐसा लगता कि एलेन बोम्बार जैसा बहादुर यात्री बनना – छोटी-सी बोट पर सारे महासागर तैर जाना, वो भी सिर्फ मछली खाकर – ये भी बुरी बात नहीं है. ये सच है कि अपनी समुद्री यात्रा के बाद बोम्बार का वज़न पच्चीस किलो कम हो गया था, और मेरा तो कुल वज़न ही सिर्फ छब्बीस किलो है, तो इसका मतलब ये हुआ कि अगर मैं भी बोट में जाऊँ, उसकी तरह, तो मैं तो इतना दुबला हो ही नहीं सकता; सफ़र ख़तम होने पर मेरा वज़न रह जाएगा सिर्फ एक किलो. और, अगर अचानक,  मान लो कभी एकाध-दूसरी मछली भी न पकड़ पाऊँ और इससे भी ज़्यादा दुबला हो जाऊँ तो? तब तो मैं बस हवा में पिघल ही जाऊँगा धुँए की तरह, फिर तो बस हो गई छुट्टी.

जब मैंने इन सारी बातों पर गौर किया तो तय किया कि मैं ये जोख़िम नहीं उठाऊँगा; मगर दूसरे ही दिन मेरा दिल बॉक्सर बनने के लिए मचलने लगा, क्योंकि  मैंने टी.वी. पर बॉक्सिंग की यूरोपियन चैम्पियनशिप का ड्रा-मैच देखा. हा! कैसे वे एक दूसरे को धुन रहे थे – बहुत डरावना था! और फिर उनकी ट्रेनिंग कैसे होती है ये दिखाया गया, यहाँ वे मुक्के बरसाए जा रहे थे एक बड़ी भारी चमड़े की “नाशपाती” पर – ये ऐसी लम्बी, भारी-भरकम गेंद होती है; उस पर पूरी ताक़त से मुक्के बरसाए जा सकते हैं, उसका कचूमर बनाया जा सकता है, जिससे कि आपके भीतर इस मार का फोर्स बढ़ता जाए. मैं ये सब देखते-देखते इतना मगन हो गया, कि मैंने अपने कम्पाउण्ड में सबसे ज़्यादा ताक़तवर इन्सान बनने का फ़ैसला कर लिया, जिससे कि ज़रूरत पड़ने पर मैं सबको मार सकूँ.

मैंने पापा से कहा:
 “पापा, मेरे लिए नाशपाती ख़रीद दो.”
 “अभी जनवरी का महीना है, नाशपातियाँ नहीं मिलतीं. फ़िलहाल तुम गाजर खा लो.”
मैं हँसने लगा:
 “नहीं, पापा, वो वाली नहीं! खाने वाली नाशपाती नहीं! तुम, प्लीज़ मुझे ऑर्डिनरी वाली, चमड़े की,  बॉक्सरों वाली नाशपाती खरीद दो.”         
 “वो तुझे किसलिए चाहिए?” पापा ने कहा.
 “ट्रेनिंग के लिए,” मैंने कहा. “क्योंकि मैं बॉक्सर बनूँगा और सबको मारा करूँगा. खरीदोगे ना, हाँ?
 “कितने की आती है वो नाशपाती?” पापा ने दिलचस्पी से पूछा.
 “बहुत कम में,” मैंने कहा, “यही कोई दस या पचास रुबल की होगी.”
 “तू पागल हो गया है, मेरे भाई,” पापा ने कहा , “बिना नाशपाती के ही किसी तरह मैनेज करो. तुम्हें कुछ नहीं होगा.”

 और वो कपड़े पहन कर काम पे चले गए.

और मैं उनके ऊपर इसलिए गुस्सा  हो गया कि उन्होंने हँसकर मुझे टाल दिया. मगर मम्मी फ़ौरन ताड़ गईं कि मैं गुस्सा हो गया हूँ, वो फ़ौरन बोलीं:
 “ ठहर ज़रा, मेरे दिमाग़ में शायद कोई ख़याल आया है. क्या-है, क्या-है, सबर-कर एक मिनट.”
वह झुकी और दीवान के नीचे से एक बड़ी बुनी हुई बास्केट निकाली; उसमें पुराने खिलौने रखे हुए थे जिनसे मैं अब नहीं खेलता था. क्योंकि मैं अब बड़ा हो गया था और पतझड़ में मेरे लिए स्कूल यूनिफॉर्म और शानदार कैप खरीदी जाने वाली थी.

मम्मी बास्केट में कुछ ढूँढ़ने लगी, और, जब तक वह ढूँढ़ रही थी, मैंने अपनी पुरानी ट्रामगाड़ी देखी – बिना पहियों के, रस्सी से बँधी हुई, प्लैस्टिक की बाँसुरी देखी, धारियों वाला लट्टू देखा, एक तीर रेक्ज़ीन के टुकड़े में लिपटा हुआ; नाव के पाल का टुकड़ा, बहुत सारे झुनझुने, और भी बहुत कुछ टूटे-फूटे खिलौने देखे. और अचानक मम्मी ने बास्केट की तली से तन्दुरुस्त, मोटे-ताज़े, रोएँदार मीश्का (टैडी बेअर) को निकाला.

उसने उसे मेरी ओर दीवान पर फेंका और बोलीं:
 “ये देख. ये वही है जो तुझे मीला आंटी ने दिया था. तू तब दो साल का हुआ था. अच्छा मीश्का है, बढ़िया. देख, कैसा टाइट है! पेट कितना मोटा है! ओफ़, कितना खेलता था तू इससे! क्या ये नाशपाती जैसा नहीं है? उससे भी बढ़िया है! और खरीदने की भी ज़रूरत नहीं है! जी भर के इस पर प्रैक्टिस कर! शुरू हो जा!"

मगर तभी उसे टेलिफोन सुनने कोरीडोर में जाना पड़ा.

मैं बहुत ख़ुश हो गया, कि मम्मी ने इतनी बढ़िया बात सोची. मैंने मीश्का को दीवान पर अच्छी तरह से बैठा दिया, जिससे मैं उस पर प्रैक्टिस कर सकूँ और मार की ताकत बढ़ा सकूँ.

वो मेरे सामने बैठा था - ऐसे बढ़िया चॉकलेट-कलर का, मगर उसका रंग काफ़ी उड़ चुका था; और उसकी आँखें भी अलग-अलग तरह की थीं: एक, जो उसकी ख़ुद की थी – पीली काँच की, और दूसरी बड़ी, सफ़ेद – तकिए के गिलाफ़ से बनी बटन की; मुझे तो ये भी याद नहीं कि वो कब आया था. मगर ये ज़रूरी नहीं था, क्यों कि मीश्का अपनी अलग-अलग तरह की आँखों से मेरी ओर इतनी ख़ुशी से देख रहा था, और उसने अपने पैर फ़ैलाए हुए थे, मुझसे मिलने के लिए अपने पेट को बाहर निकाल लिया था, और दोनों हाथ ऊपर उठा लिए थे, जैसे मज़ाक कर रहा हो कि वो पहले ही हार मान रहा है....

मैं उसकी ओर देखता रहा और अचानक मुझे याद आया कि कैसे मैं इस मीशा से एक मिनट को भी अलग नहीं होता था, हर जगह उसे अपने साथ घसीट कर ले जाता था, उसको गोद में खिलाता, उसके लाड करता, और खाना खाते समय उसे अपनी बगल में मेज़ पर बिठाता, उसे चम्मच से नूडल्स खिलाता, और जब मैं उसके चेहरे पर कुछ पोत देता - चाहे वही नूडल्स या पॉरिज हो - तो उसका चेहरा इतना मज़ेदार और प्यारा हो जाता, जैसे बिल्कुल ज़िन्दा हो! मैं उसे अपने साथ सुलाता, उसे अपनी गोद में झुलाता मानो वो मेरा छोटा भाई हो; उसके मखमली, मज़बूत कानों में कहानियाँ फुसफुसाता; तब मैं उसे प्यार करता था, अपनी पूरी आत्मा से प्यार करता था, उसके लिए उस समय मैं अपनी जान भी दे देता. और इस समय वो बैठा है दीवान पर – मेरा पुराना, सबसे बढ़िया दोस्त, बचपन का सच्चा दोस्त. वो बैठा है, अपनी अलग-अलग तरह की आँखों से मुस्कुरा रहा है, और मैं हूँ कि उस पर मार की ताक़त आज़माना चाहता हूँ...

 “तू क्या,” मम्मी ने कहा, वह कॉरिडोर से वापस आ गई थी, “क्या हुआ है तुझे?”

मगर मैं नहीं जानता था कि मुझे क्या हुआ है, मैं बड़ी देर तक ख़ामोश रहा और फिर मैंने मुँह फेर लिया, जिससे कि वह मेरे होठों से और मेरी आवाज़ से कोई अन्दाज़ न लगा सकें कि मुझे क्या हुआ है, और मैंने झटके से सिर छत की ओर उठा दिया जिससे आँसू वापस लौट जाएँ, और फिर जब मैंने अपने आप पर थोड़ा काबू पा लिया तो मैंने कहा:
  “किस बारे में पूछ रही हो, मम्मी? मुझे कुछ भी नहीं हुआ...बस मैंने अपना इरादा बदल दिया है. बस, मैं कभी भी बॉक्सर नहीं बनूँगा.
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