गुरुवार, 10 मार्च 2016

Mazdoor Todte Patthar


मज़दूर तोड़ते पत्थर

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


इस बार गर्मियों के शुरू होते ही हम तीनों को, मीश्का को, कोस्तिक को और मुझे, वाटर-स्टेशन ‘दिनामो’ की लत लग गई और हम क़रीब-क़रीब हर रोज़ वहाँ जाने लगे. पहले हमें तैरना नहीं आता था, मगर बाद में धीरे-धीरे सबने कहीं-कहीं जाकर तैरना सीख लिया: किसी ने – गाँव में, किसी ने – पायनीयर कैम्प्स में, और मैं, मिसाल के तौर पे, दो महीने हमारे स्विमिंग पूल ‘मॉस्को’ जाता रहा. जब हम सब तैरना सीख गए तो हमें फ़ौरन समझ में आ गया कि तैरने का उतना मज़ा कहीं नहीं आयेगा, जितना वाटर-स्टेशन में. ग्यारंटी.

ओह, कितना अच्छा लगता है एक साफ़-सुबह को वाटर-स्टेशन के नम और गर्माहट भरे रास्तों पर लेटना, पूरी नाक से नदी से आ रही ताज़ा और उत्तेजित करने वाली ख़ुशबू सूंघना! ये देखना कि कैसे ऊँचे-ऊँचे मस्तूलों और पतली-पतली छड़ों पर रंगबिरंगे रेशमी झण्डे हवा में फ़ड़फ़ड़ा रहे हैं और तुम्हारे ठीक नीचे, लकड़ी की दरारों में पानी हिलोरें ले रहा है और थपकियाँ दे रहा है; अच्छा लगता है इस तरह हाथों को फ़ैलाये लेटना, और चुपचाप पड़े रहना, और धूप तापना, और कुहनी के नीचे से देखना, कि कैसे वाटर-स्टॆशन से दूर, बहाव से कुछ ऊपर, पत्थर तोड़ने वाले मज़दूर पुल की मरम्मत कर रहे हैं और गुलाबी पत्थर पे हथौड़ों से वार कर रहे हैं, और आवाज़ उनके मारने के कुछ देर बाद तुम तक पहुँच रही है, इतनी महीन और नज़ाकत भरी, जैसे कोई काँच के हथौड़ों से चाँदी का ज़ाइलोफ़ोन बजा रहा हो.  और, ख़ास तौर से अच्छा तब लगता है, जब धूप में पर्याप्त तपने के बाद, पानी में छलाँग लगाना, और जी भर के तैरना, और मीटर के निशान वाले प्लेटफॉर्म से कूदना, जी भर के डाइव लगाना, इतना कि थक के चूर हो जाओ. फिर, जब थक जाओ, तो अपने दोस्तों के पास जाना अच्छा लगता है, गरम-गरम बोर्ड्स के ऊपर चल कर जाना, पेट को भीतर खींच कर और सीने को बाहर निकाले, पैर फ़ैलाते हुए, हाथ के मसल्स फुलाते हुए, और पैरों के पंजे भीतर की ओर मोड़े, क्योंकि ये बहुत ख़ूबसूरत लगता है, और वाटर-स्टॆशन पर सब इसी तरह चलते हैं, किसी और तरह से चल ही नही सकते. ये कोई गन्दी रेत और कागज़ के टुकड़ों वाला काम चलाऊ ‘बीच’ नहीं है, यहाँ कोई घास वाला किनारा नहीं है – जहाँ तुम जो चाहो, जैसा चाहो, कर सकते हो, - बल्कि ये, वाटर-स्टॆशन है, यहाँ बड़ी अच्छी व्यवस्था है, सफ़ाई है, फुर्ती है, स्पोर्ट्स है, हर चीज़ चकाचक है, और इसलिए सब लोग यहाँ चैम्पियन्स की तरह चलते हैं, “एक्सेलेंट” ग्रेड जैसे, फ़ैशनेबल तरीके से चलते हैं – कभी कभी तो जितना अच्छा तैरते हैं, उससे भी ज़्यादा बढ़िया चलते हैं.

और इसलिए हम तीनों – मीश्का, कोस्तिक और मैं – हम कोई भी दिन नहीं छोड़ते थे, पूरी गर्मियाँ यहाँ तैरने के लिए आते रहे, और धूप सेंकते-सेंकते हमारा रंग शैतानों जैसा हो गया, हम ख़ूब अच्छी तरह तैरना सीख गए, और हमारे मसल्स भी ख़ूब बन गए, बाइसेप्स और ट्राइसेप्स भी, और हम अपने वाटर-स्टेशन के सभी ओनों-कोनों पर घूमते. हम जान गए थे कि मेडिकल-पॉइन्ट कहाँ है, गेम्स कहाँ हैं वगैरह, वगैरह, और आख़िरकार जैसे यहाँ की हर चीज़ हमें अपनी और साधारण लगने लगी. हमें आदत हो गई.

एक बार हम हमेशा की तरह लकड़ी के बोर्ड्स पर लेटे थे और धूप सेंक रहे थे, अचानक कोस्तिक ने बे-बात के पूछा:
 “डेनिस्का! क्या तू सबसे ऊँचे टॉवर से पानी में छलांग मार सकता है?”

मैंने टॉवर की ओर नज़र डाली और देखा कि वो कोई बहुत ज़्यादा ऊँचा नहीं है, कोई डरने वाली बात नहीं है, दूसरी मंज़िल से ज़्यादा ऊँचा नहीं है, उसमें कुछ भी ख़ास नहीं है.
इसलिए मैंने फ़ौरन कोस्तिक को जवाब दिया:
 “बेशक, मार सकता हूँ! क्या बकवास है.”
मीश्का ने फ़ौरन कहा:
“फेंकू!”
मैंने कहा:
 “बेवकूफ़ है तू, मीश्का, पक्का बेवकूफ़!”
कोस्तिक ने कहा:
 “वो क़रीब दस मीटर्स है!”
 “तो, तो क्या?” मैंने कहा.
 “फेंकू!” कोस्तिक ने मेरी बात काट दी.
मीश्का उसीकी साइड ले रहा था:
 “फेंकू, सही में, फेंकू!” और
आगे बोला, “फेंकू–कीं-कूँ!!!”
मैंने कहा:
”तुम दोनों ही बेवकूफ़ हो! पक्के बेवकूफ़!”
मैं फ़ौरन खड़ा हो गया, पैरों को चौड़ा किया, हाथों के मसल्स फुलाने लगा और टॉवर की ओर चल पड़ा. जब मैं चल रहा था, तो पूरे समय पंजों को अन्दर की ओर मोड़ रहा था.
पीछे से कोस्तिक चिल्लाया:
 “फें-कू-कीं-को-के!”
मगर मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया. मैं टॉवर पे चढ़ रहा था.
जबसे हमने वाटर-स्टेशन जाना शुरू किया था, मैं रोज़ देखता था कि इस टॉवर से बड़े अंकल लोग पानी में छलांग लगाते थे. मैं देखता था कि जब वो बटरफ़्लाय स्टाइल में कूदते थे, तो कितनी ख़ूबसूरती से अपनी पीठ को झुकाते, ये भी देखता था कि कैसे वे अपने सिर को डेढ़ बार घुमाते, या कमर को इधर-उधर घुमाते, या हवा में दुहरे हो जाते और पानी में हौले-हौले, एकदम सही-सही गिरते, ज़रा भी पानी उछाले बिना, और जब बाहर निकलते, तो लकड़ी के बोर्ड तक आते, हाथों के मसल्स फुलाए और सीना बाहर निकाले...
ये बेहद ख़ूबसूरत और आसान था, और मुझे पूरी ज़िन्दगी यक़ीन था कि मैं भी इन अंकल लोगों से बुरा नहीं कूदता, मगर इस समय, जब मैं चढ़ रहा था, तो मैंने फ़ैसला किया कि हवा में कोई भी कलाबाज़ी नहीं दिखाऊँगा, सिर्फ सीधे सीधे कूदूँगा, अटेन्शन में खड़े सैनिक की तरह, - ये सबसे आसान है! शुरू में मैं, बस, सादगी से, बिना किसी दिखावे के कूदूँगा, और बाद में, अगली बार ख़ास तौर से मीश्का के लिए, ऐसी ऐसी कलाबाज़ियाँ दिखाऊँगा कि उसका मुँह खुला रह जाएगा. बेहतर है कि वो और कोस्तिक चुप रहें बजाय इसके कि मेरे पीछे चिल्लाएँ ‘फेंकू-की-को-का!!!’.”
जब मैं ये सब सोच रहा था, मेरा मूड बहुत अच्छा था, और मैं फ़ौरन भाग कर छोटी-छोटी सीढ़ियाँ चढ़ गया, और मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि कितनी जल्दी मैं सबसे ऊँचे ‘डेक’ पर पहुँच गया हूँ, स्टेशन से दस मीटर्स की ऊँचाई पर.
यहाँ आकर अचानक मैंने देखा कि ये डेक बहुत छोटा है, और उसके सामने, और किनारों पे, और चारों तरफ़ दूर तक कोई फ़ैला हुआ, खूब बड़ा और ख़ूबसूरत शहर है, वो किसी हल्के कोहरे में लिपटा है, और यहाँ, डेक पर, हवा शोर मचा रही है, पूरी भयंकरता से तूफ़ान की तरह शोर मचा रही है, देखते देखते तुम्हें इस डेक से उड़ा देगी. मज़दूरों के पत्थर तोड़ने की आवाज़ बिल्कुल भी सुनाई नहीं दे रही है, हवा ने उनके काँच के हथौड़ों को गूँगा बना दिया है. और जब मैंने नीचे नज़र दौड़ाई तो मुझे अपना वाटर-स्टॆशन दिखाई दिया, वो नीला-नीला था, मगर इतना छोटा सा था, जैसे सिगरेट का पैकेट हो, मैंने सोचा कि अगर मैं कूदता हूँ, तो मुश्किल से ही उसमें गिरूँगा, चूक जाने की संभावना बहुत ज़्यादा है, ऊपर से ये हवा जो बोफ़ोर्ट स्केल पर ज़रूर 6 पॉइंट्स होगी, देखते-देखते मुझे किसी कोने में उड़ा ले जाएगी, या तो नदी में, या हो सकता है कि मैं रेस्टॉरेंट में धम् से किसी के सिर पे गिरूँ, हंगामा हो जाएगा! या, हो सकता है कि मैं सीधा किचन में जा गिरूँ, सूप वाली कड़ाही में! ये भी कम मज़ेदार नहीं होगा. इन ख़यालों से मेरे घुटनों में कुछ खुजली होने लगी, और मेरा दिल फिर से पुल की मरम्मत कर रहे मज़दूरों के हथौड़ों की आवाज़ सुनने के लिए, कोस्तिक और मीश्का को अपने साथ देखने के लिए बेचैन होने लगा, आख़िर वो मेरे दोस्त जो हैं...
और मैं धीरे-धीरे कुछ क़दम पीछे हटा, हैण्डल्स पकड़ लिए और नीचे उतरने लगा, और जब मैं नीचे उतर रहा था, तो मेरा मूड फिर से अच्छा हो गया और दिल में इत्ता हल्का-हल्का महसूस हो रहा था, जैसे कंधों से पहाड़ उतर गया हो. जब मैंने मीश्का और कोस्तिक को देखा, तो बहुत ख़ुश हो गया, मैं उनकी ओर भागा, मगर जब उनके पास पहुँचा तो जैसे ज़मीन में गड़ गया!...ये बेवकूफ़ गला फाड़ कर ठहाके लगा रहे थे और ऊँगली से मेरी तरफ़ इशारा कर रहे थे! ऐसा लग रहा था कि हँसते-हँसते उनके पेट फट जाएँगे.
वो चीख़ रहे थे:
 “ये कूदा!”
 “हा-हा-हा!”
“इसने छलाँग लगाई!”
“हो-हो-हो!”
 “बटरफ्लाय स्टाइल में!”
 “हे-हे-हे!”
 “सैनिक जैसे!”
 “ही-ही-ही!”
 “बहादुर!”
 “शाबाश!”
 “शेख़ीमार!”
मैं उनके पास बैठा और बोला;
 “तुम लोग सिर्फ बेवकूफ़ हो, और कुछ नहीं! कहीं तुम लोग ये तो नहीं सोच रहे हो, कि मैं डर गया?”
अब तो वो जैसे चीत्कार करने लगे:
 “नहीं! हा-हा-हा!”
 “नहीं सोचते! हो-हो-हो!”
 “तू डरा थोड़े ही था!”
 “तू, बस, थोड़ा घबरा गया!”
 “अब हम तेरे बारे में अख़बार में लिखेंगे!”
 “कि तुझे मेडल  दिया जाए!”
 “ख़ूबसूरती से सीढ़ियाँ उतरने के लिए!”
मैं गुस्से से उबलने लगा! कैसे बेशरम हैं, ये पतली डंडी जैसा कोस्तिक और ख़ासतौर से मीश्का, भद्दी आवाज़ वाला! शायद वे सचमुच में समझ रहे हैं कि मैं डर गया! कैसी बेवकूफ़ी है! आसमानी बादशाह के उल्लू!
मगर मैंने उन्हें गालियाँ नहीं दीं, न ही उनका अपमान किया, जैसे उन्होंने मेरा किया था. क्योंकि मुझे तो मालूम था कि इतने छोटे टॉवर से कूदना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है! इसलिए मैंने बड़ी शांति और शराफ़त से कहा:
“थूकता हूँ, तुम पर!”
और मैं तीर की तरह टॉवर की तरफ़ लपका, और पाँच ही सेकण्ड में ऊपर तक चढ़ गया! इस समय सूरज बादल के पीछे छुप गया था. यहाँ ठण्ड थी और उदासी थी, हवा चिंघाड़ रही थी, और टॉवर कुछ चरमरा रहा था और हिल रहा था. मगर मैं रुका नहीं, मैं बिल्कुल किनारे की तरफ़ गया, हाथ अटेन्शन की मुद्रा में रखे, आँखें सिकोड़ीं, छलाँग लगाने से पहले घुटने थोड़े-से मोड़े, और...अचानक, एकदम अप्रत्याशित रूप से मुझे मम्मा की याद आई. और पापा की भी. और दादी की. मुझे याद आया कि आज सुबह, जब मैं ‘डिनामो’ आ रहा था, मैंने उन्हें बाय-बाय नहीं कहा था और ये कि, हो सकता है, मैं गिरकर मर जाऊँ, और मैंने सोचा, कि उनके लिए ये कितना बड़ा दुर्भाग्य होगा. दुख का पहाड़ टूट पड़ेगा. उनकी ज़िन्दगी में कोई भी नहीं होगा जिसे वे प्यार कर सकें. मैंने कल्पना की, कि कैसे मम्मा मेरी फोटो की ओर देखा करेगी और रोती रहेगी, क्योंकि मैं उसका इकलौता बच्चा जो हूँ और पापा का भी. उनके लिए तो ज़िन्दगी में हमेशा मातम ही रहेगा, और वो कभी किसी के घर नहीं जाएँगे, फिल्म देखने भी नहीं जाएँगे – ये भी कोई ज़िन्दगी है? और, जब वो बूढ़े हो जाएँगे, तो उनका ख़याल कौन रखेगा? मुझे भी उनके बगैर अच्छा नहीं लगेगा, मैं भी तो उनसे प्यार करता हूँ! हालाँकि मुझे तो बुरा नहीं लगेगा, क्योंकि मैं तो ज़िन्दा ही नहीं होऊँगा, मैं तो मर चुका होऊँगा, और नीले आसमान को फिर कभी न देख सकूँगा, पुल पर मज़दूर कितनी नज़ाकत से पत्थर तोड़ते हैं, ये भी नहीं सुन पाऊँगा!...
ये सब इन बेवकूफों की वजह से – डंडी कोस्तिक और मक्खी मीश्का की वजह से!
मैं बेहद परेशान हो गया और गुस्से से उबलने लगा, कि इन बेवकूफ़ों के कारण इतने लोग दुख उठाएँगे, और मैंने सोचा कि इससे बेहतर है कि मैं जाकर उन्हें एक-एक झापड़ जमा दूँ, और ये जितनी जल्दी करूँ उतना ही अच्छा होगा.
और मैं फिर से नीचे उतर गया.
जब कोस्तिक ने मुझे देखा, तो वो चौपायों जैसा खड़ा हो गया और उसने अपना सिर फर्श में गड़ा लिया. और इस तरह, सिर के बल वो गोल-गोल घूमा, जैसे कोई भौंरा चक्कर लगाता है. और मीश्का तो पूरा नीला हो गया और वह फुफुफुफु कर रहा था, उसे हँसी का दौरा पड़ा था.
उनके पास एक छोटा सा ग्रुप बैठा था, लड़के और लड़कियाँ. वो भी हँस रहे थे. ज़ाहिर है, कि कोस्तिक और मीश्का ने उन्हें सारी बात बता दी थी. वो बहुत ख़ुशी से हँस रहे थे, ये अनजान लोग, और मेरे दोस्त उनके साथ मिलकर मुझ पर हँस रहे थे, वे सब एक होकर मुझ पर हँस रहे थे...
तब मैंने महसूस किया, कि जो अब तक हुआ – वो पागलपन था! मैं समझ नहीं पाया था कि इसका मतलब क्या है! मगर अब, शायद, समझ गया. और मैं मुड़कर वापस टॉवर पे चढ गया. तीसरी बार! वो लोग पीछे से मुझे हूट कर रहे थे, चिढ़ा रहे थे. मगर मैं ऊपर तक चढ़ गया और बिल्कुल किनारे पे आया. मेरे घुटने काँप रहे थे. मगर मैंने हाथों से उन्हें थामा और दबाया, और हौले से अपने आप से कहने लगा, और जब मैं कह रहा था, तो सुन रहा था, कि मेरी आवाज़ कैसे काँप रही है और दाँत किटकिटा रहे हैं.
मैं बुदबुदाया:
 “रोतले!...पोतले!! मोतले!...कूद अभ्भी! चल! वर्ना मैं तुझसे बात नहीं करूँगा! तुझसे हाथ भी नहीं मिलाऊँगा! चल1 कूद भी! तूतले! कतूतले! वतूतले!”
और जब मैंने अपने आप को वतूतले कहा, तो मैं अपमान को सह नहीं पाया और मैंने क़दम आगे बढ़ा दिया. मेरा पेट और दिल जैसे लुढ़क कर गले तक आ गए. और मैं, जब उड़ रहा था, तो कुछ भी नहीं सोच पाया, मैं सिर्फ इतना जानता था कि मैंने छलांग लगा दी है. मैं कूद गया! मैं कूद गया! आख़िर कूद ही गया!!!
और, जब मैं बाहर निकला, तो मीश्का और कोस्तिक ने हाथ बढ़ाए और मुझे बोर्ड पर खींचा. हम पास पास लेट गए, मीश्का और कोस्तिक ख़ामोश थे.
मगर मैं लेटा था और सुन रहा था कि कैसे मज़दूर गुलाबी पत्थर को हथौड़ों से तोड़ रहे हैं. आवाज़ यहाँ तक पहुँच रही थी हल्के से, नज़ाकत से, शरमाते हुए, जैसे कोई काँच के हथौड़े से चाँदी का ज़ाइलोफ़ोन बजा रहा हो.


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सोमवार, 7 मार्च 2016

Ukrain Ki Shant Raat


युक्रेन की शांत रात

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

                     
हमारी लिटरेचर की टीचर रईसा इवानोव्ना बीमार हो गईं. उनकी जगह पे हमारी क्लास में आईं एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना. वैसे तो एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना हमें भूगोल और विज्ञान पढ़ाती हैं, मगर आज कोई ख़ास बात थी, और हमारे डाइरेक्टर ने उनसे बीमार रईसा इवानोव्ना की क्लास लेने के लिए कहा.                           

एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना आईं. हमने नमस्ते किया, और वो टीचर वाली मेज़ पे बैठ गईं. वो, मतलब, बैठी, और मैंने और मीश्का ने अपना ‘युद्ध’ जारी रखा – आजकल समुद्री-युद्ध का फ़ैशन है. एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना के आने तक इस मैच में मेरे पॉइन्ट्स ज़्यादा थे: मैंने मीश्का के डेस्ट्रॉयर को टक्कर मार दी थी और उसकी तीन पनडुब्बियों को बेकार कर दिया था. अब मुझे सिर्फ ये पता करना था कि उसके बैटलशिप पर कहाँ से वार करूँ. मैंने अपने   दिमाग़ पर ज़ोर दिया और अपने अगले मूव के बारे में मीश्का को बताने के लिए मुँह खोला ही था, कि तभी एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने रजिस्टर में देखा और कहा;
 “कराब्लेव!”
मीश्का फ़ौरन फ़ुसफ़ुसाया:
 “डाइरेक्ट अटैक!”
मैं खड़ा हो गया.
एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने कहा:
 “ब्लैक बोर्ड के पास आओ!”
मीश्का फिर से फ़ुसफ़ुसाया:
 “अलबिदा, प्यारे कॉम्रेड!”

मैंने मातमी चेहरा बनाया.
और मैं ब्लैकबोर्ड के पास आया. एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने कहा:
 “डेनिस्का, सीधे खड़े रहो! और मुझे बताओ, कि लिटरेचर में आजकल आप लोग क्या पढ़ रहे हो.”
 “हम ‘पल्तावा’ पढ़ रहे हैं, एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना,” मैंने कहा.
 “लेखक का नाम बताओ,” उसने कहा; ज़ाहिर था कि वो परेशान हो रही थीं कि मुझे मालूम है या नहीं.
  “पूश्किन, पूश्किन.” मैंने शांति से जवाब दिया.
“तो,” उन्होंने कहा, “ग्रेट पूश्किन, अलेक्सान्द्र सेर्गेयेविच, लेखक हैं लाजवाब कविता ‘पल्तावा’ के. सही है. अच्छा, बताओ तो, क्या तुमने इस कविता की कुछ पंक्तियाँ याद की हैं?”
 “बेशक,” मैंने कहा.
 “कौन सी पंक्तियाँ याद कीं हैं?” एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने पूछा.
 “शांत है युक्रेनी रात...”
 “बहुत ख़ूब,” एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने कहा और वो ख़ुशी से झूम उठीं. – “शांत है युक्रेनी रात...” ये मेरी पसन्द की पंक्ति है! सुनाओ, कराब्लेव.”

उनकी पसंद की पंक्ति! ये बढ़िया बात हुई! ये तो मेरी भी पसन्द की पंक्ति है! मैंने उसे तभी याद कर किया था, जब मैं छोटा था. तब से, जब भी मैं ये कविता सुनाता हूँ, बोल कर या मन ही मन, मुझे हर बार ऐसा लगता है, कि हालाँकि मैं अभी उसे सुना रहा हूँ, मगर कोई दूसरा उसे सुना रहा है, न कि मैं, और असली वाला मैं तो गरम, दिन भर में तप चुके लकड़ी के बरामदे में खड़ा हूँ, सिर्फ एक कमीज़ पहने नंगे पाँव, और क़रीब-क़रीब सो रहा हूँ, और सिर इधर-उधर घुमाता हूँ, और लड़खड़ा रहा हूँ, मगर फिर भी ये आश्चर्यजनक सुन्दरता देख रहा हूँ: उनींदा सा छोटा सा शहर अपने चांदी जैसे पोप्लर वृक्षों समेत; छोटा सा सफ़ेद चर्च देख रहा हूँ, कि वो भी कैसे सो रहा है और घुंघराले बादल के ऊपर मेरे सामने तैर रहा है, और ऊपर तारे हैं, वो टिड्डों के समान चहचहा रहे हैं और सीटी बजा रहे हैं; और कहीं मेरे पैरों के पास एक मोटा, दूध में नहाया कुत्ता सो रहा है और नींद में पंजे हिला रहा है, जो इस कविता में नहीं है. मगर मैं चाहता हूँ कि वो भी होता, और पास ही बरामदे में हल्के बालों वाले मेरे दद्दू बैठे हैं और गहरी-गहरी साँस ले रहे हैं, वो भी इस कविता में नहीं हैं, मैंने उन्हें कभी नहीं देखा, वो युद्ध में शहीद हो गए, वो इस दुनिया में नहीं हैं, मगर मैं उनसे इत्ता प्यार करता हूँ, कि मेरा दिल भर आता है...

 “सुना, डेनिस, क्या कर रहा है!” एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने आवाज़ ऊँची की.
मैं आराम से खड़ा होकर कविता सुनाने लगा:

...शांत युक्रेनी रात.
 साफ़ है आसमान. चमचमाते सितारे.
उनींदेपन को अपने नहीं चाहती
खोना हवा. सरसराते हौले हौले
 चांदी से पोप्लर के पत्ते.
चमकता है चाँद ख़ामोशी से ऊँचाई पे
ऊपर सफ़ेद चर्च के ...

 “स्टॉप, स्टॉप, बस है!” एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने मुझे रोक दिया. “हाँ, महान है पूश्किन, विशाल! तो, कराब्लेव, अब मुझे ये बताओ इस कविता से तुमने क्या समझा?”

आह, उन्होंने मुझे क्यों रोक दिया! कविता तो और भी बची थी, और उन्होंने मुझे तभी रोक दिया जब मैं पूरे फॉर्म में था. मैं अभी होश में नहीं आया था! इसलिए, मैंने ऐसा दिखाया, कि मैं सवाल नहीं समझ पाया, और मैंने कहा:
 “क्या? कौन? मैं?”
 “हाँ, तुम. तो, क्या समझ में आया?”
 “सब कुछ,” मैंने कहा. “मैं सब समझ गया. चाँद, चर्च. पोप्लर्स. सब सो रहे हैं.”
 “हुँ...” नाराज़गी से एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने शब्द को खींचते हुए कहा, “ये तू कुछ सतही तौर पे समझा है... गहराई से समझना चाहिए. छोटे नहीं हो. आख़िर ये पूश्किन है...”
 “तो फिर कैसे,” मैंने पूछा, “कैसे पूश्किन को समझना चाहिए?” और, मैंने मासूम सा चेहरा बनाया.
 “एक एक वाक्य से चलो,” उसने अप्रसन्नता से कहा. “जब तू ऐसा है. “शांत युक्रेनी रात...” इससे क्या समझ में आया?”
 “मैंने समझा कि शांत रात है.”
 “नहीं,” एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने कहा. “तू ये समझ कि “शांत युक्रेनी रात” इन शब्दों में बड़ी बारीकी से बताया गया है कि युक्रेन मुख्यभूमि में हवा की जो गतिविधि होती है, उससे हट के है, एक तरफ़ को है. तुम्हें ये बात जानना और समझना चाहिए. कराब्लेव! पक्का? आगे सुना!”
 “पारदर्शी आसमान,” मैंने कहा, “आसमान, मतलब, पारदर्शक है. साफ़ है. पारदर्शक आसमान. ऐसा ही लिखा है. “आसमान पारदर्शी”.
 “ऐह, कराब्लेव, कराब्लेव,” दुख से और कुछ निराशा से एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना ने कहा. “ये क्या तू, तोते की तरह, एक ही बात कह रहा है: पारदर्शी आसमान, पारदर्शी आसमान”. गाए जा रहा है. मगर इन दो शब्दों में कितना बड़ा मतलब छिपा है. जैसे, इन दो, बेमतलब से शब्दों में पूश्किन ने हमें बताया है कि इस प्रदेश में अवक्षेपण की मात्रा बहुत कम है, जिसके कारण हम निरभ्र आकाश देख सकते हैं. क्या अब तुम समझे कि पूश्किन की योग्यता कितनी ज़बर्दस्त है? चल, आगे.”
मगर न जाने क्यों अब मेरा दिल ही नहीं कर रहा था पढ़ने को. हर चीज़ उकताने लगी. और इसलिए मैं जल्दी-जल्दी बुदबुदाया:
.... चमचमाते सितारे.
उनींदेपन को अपने नहीं चाहती
खोना हवा..
 “मगर क्यों?” एलिज़ाबेता मानो जोश में आ गई.
 “क्या क्यो?” मैंने कहा.
 “क्यों नहीं चाहती?” उन्होंने दुहराया.
  “क्या नहीं चाहती?”
 “उनींदेपन को खोना.”
 “कौन?”
 “हवा.”
 “कौन सी?”
 “क्या कौनसी – युक्रेनी! तुमने ख़ुद ही तो अभी बताया था: ‘उनींदेपन को अपने नहीं चाहती खोना हवा..’
तो वो क्यों नहीं चाहती?” 
 “नहीं चाहती, और बस,” मैंने अपने दिल से जवाब दिया. “जागना नहीं चाहती! ऊँघना चाहती है, और बस!”
 “ओह, नहीं,” एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना को गुस्सा आ गया और उसने मेरी नाक के सामने इधर से उधर अपनी तर्जनी घुमाई. ऐसा लग रहा था, मानो वो कहना चाहती हो कि: “आपकी हवा के साथ ये नख़रे नहीं चलेंगे”. मगर नहीं, उसने दुहराया. “यहाँ बात ये है कि पूश्किन इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि युक्रेन के ऊपर सात सौ चालीस मिलिमीटर्स दबाव का एक छोटा चक्रवात का केन्द्र स्थित है. और जैसा कि हम जानते हैं, चक्रवात में हवा बाहरी किनारों से भीतर की ओर चलती है. इस चमत्कार ने ही कवि को अमर पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा दी: ‘सरसराते हौले-हौले, म्-म्-म्...म्-म्-म्, किन्हीं पोप्लर वृक्षों के पत्ते!’ समझा कराब्लेव? आत्मसात् कर लिया! बैठ जा!”
मैं बैठ गया. क्लास के बाद मीश्का ने अचानक मुझसे मुँह फेर लिया, वो लाल हो गया, और बोला:
 “और मेरी पसन्दीदा कविता है – चीड़ के बारे में: जंगली उत्तर में खड़ा अकेला, नंगी चोटी पर चीड़... जानता है?”  
 “बेशक जानता हूँ,” मैंने कहा. “कयों नहीं जानूँगा?”
मैंने वैज्ञानिकों जैसा चेहरा बनाया.
 “जंगली उत्तर में” – इन शब्दों में लेरमोंतोव हमें सूचित करते हैं, कि चीड़ का पेड़, चाहे कुछ भी कहो, ठण्ड का मुक़ाबला करने वाला पेड़ है. और शब्द रचना “ नंगी चोटी पर खड़ा है”, ये भी बताती है कि चीड़ एक सुपर-मज़बूत जड़ वाला पेड़ है...”
मीश्का ने घबराकर मेरी तरफ़ देखा. और मैंने उसकी तरफ़. और फिर हम दोनों ने ठहाका लगाया. बड़ी देर तक ठहाके लगाते रहे, पागलों जैसे. पूरा इंटरवल.

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शनिवार, 5 मार्च 2016

Gaate hain....

               
                          
गाते हैं पहिये – त्रा-त्ता-त्ता


लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


इन गर्मियों में पापा को काम से यास्नागोर्स्क शहर जाना था, और जाने के दिन उन्होंने कहा:
 “मैं डेनिस्का को अपने साथ ले जाऊँगा!”
मैंने फ़ौरन मम्मा की ओर देखा. मगर मम्मा चुप रही.
तब पापा ने कहा;
 “उसे अपने स्कर्ट से बांध के रख लो. तुम्हारे पीछे-पीछे जाएगा, हिलगा हुआ.”
मम्मा की आँखें फ़ौरन झरबेरी जैसी हरी-हरी हो गईं. उसने कहा:
 “जो जी में आए, करो! चाहे तो अन्टार्क्टिका भी ले जाओ!”

उसी शाम को मैं और पापा ट्रेन में बैठकर निकल पड़े. हमारे कम्पार्टमेंट में अलग-अलग तरह के कई लोग थे: बूढ़ी औरतें और सैनिक, जवान लड़के, और कण्डक्टर्स, और गाइड्स, और एक छोटी बच्ची. ख़ूब शोर हो रहा था, बहुत ख़ुशी का माहौल था. हमने खाने के बन्द डिब्बे खोले, होल्डर में रखे गिलासों में चाय पी, और सॉसेज के बड़े बड़े टुकड़े खाए. फिर एक नौजवान ने अपना कोट उतार दिया और सिर्फ बनियान पहने रहा; उसके खूब गोरे हाथ थे और गोल-गोल मसल्स थे, बॉल्स जैसे. उसने ऊपर वाली बर्थ से एकॉर्डियन उठाया और बजाने लगा, वो एक कम्सोमोल (यंग कम्युनिस्ट लीग का सदस्य) के बारे में दुखभरा गीत गाने लगा, कि कैसे वह घास पे, अपने घोड़े के पैरों के पास गिर पड़ा और अपनी भूरी आँखें बन्द कर लीं, और लाल खून हरी घार पर बहने लगा.

मैं खिड़की के पास गया, और खड़ा रहा. मैं देख रहा था कि कैसे अंधेरे में रोशनी झिलमिला रही है, और कम्सोमोल के बारे में ही सोचता रहा, कि अगर मैं भी उसके साथ जासूसी के काम पर घोड़े पे जाता, तो हो सकता है, कि उसे नहीं मारते.

फिर पापा मेरे पास आए, हम दोनों कुछ देर चुपचाप खड़े रहे, पापा ने कहा:
 “तू ‘बोर’ मत होना. हम परसों लौट आएँगे, और तब मम्मा को बताना कि कितना मज़ा आया.”
वो जाकर बिस्तर बिछाने लगे, फिर उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा:
 “तू किस तरफ़ सोएगा? दीवार के पास?”
मगर मैंने कहा:
 “बेहतर है कि तुम ही दीवार के पास सो जाओ. मैं किनारे पे सोऊँगा.”

पापा दीवार के पास लेट गए, करवट लेकर, और मैं किनारे पे लेटा, मैं भी करवट पे लेटा था, और ट्रेन के पहिए खड़खड़ा रहे थे: त्रत्ता-ता - त्रत्ता-ता...

अचानक मेरी नींद खुल गई, मैं आधा हवा में लटक रहा था और एक हाथ से मैंने छोटी वाली मेज़ पकड़ रखी थी, जिससे गिर न जाऊँ. ज़ाहिर था, कि पापा नींद में ख़ूब हाथ-पाँव चला रहे थे, और उन्होंने मुझे बर्थ के एकदम किनारे पे धकेल दिया था. मैं आराम से लेटना चाहता था, मगर अब नींद मेरी आँखों से उड़ गई थी, और मैं बर्थ के किनारे पे बैठकर चारों ओर देखने लगा.

कम्पार्टमेन्ट में उजाला हो गया था, और चारों तरफ़ से अलग-अलग हाथ और पैर लटक रहे थे. पैर अलग-अलग रंगों के मोज़ों में थे या नंगे थे, और बच्ची का छोटा सा पैर भी था, जो एक छोटे से भूरे ब्लॉक जैसा था.

हमारी ट्रेन बहुत धीरे-धीरे चल रही थी. पहिये घिसट रहे थे, खड़खड़ा रहे थे. मैंने देखा कि हरी-हरी टहनियाँ हमारी खिड़कियों को क़रीब-क़रीब छू रही हैं, और ऐसा लग रहा था, जैसे हम जंगल के कॉरीडोर से गुज़र रहे हैं, मैं ये सब देखना चाहता था, कि ऐसा कैसे हो रहा है, और मैं नंगे पाँव ही वेस्टिब्यूल में भागा. वहाँ दरवाज़ा पूरा खुला था, और मैंने हैण्डल पकड़े और सावधानी से पैर लटका दिए.

बैठने में ठण्ड लग रही थी, क्यों कि मैं सिर्फ शॉर्ट्स था, और लोहे का फ़र्श मुझे एकदम ठण्डा कर रहा था, मगर कुछ देर में वो गरम हो गया और मैं हाथों को बगल में दबाए बैठ गया. हवा धीमी थी, मुश्किल से चल रही थी, और ट्रेन धीरे-धीरे चल रही थी, वो पहाड़ पे चढ़ रही थी, पहिये खड़खड़ा रहे थे, मैं हौले-हौले उनकी धुन में समाता गया और मैंने गाना बना लिया;

चल रही है ट्रेन – कितनी है सुंदरता!
गाते हैं पहिये – त्रा-त्ता-त्ता!


बाइ चान्स, मैंने दाईं ओर नज़र दौड़ाई और हमारी ट्रेन का आख़िरी सिरा देखा: वो आधा गोल था, पूँछ जैसा.

तब मैंने बाईं ओर देखा तो मुझे हमारा इंजिन नज़र आया: वो ऊपर-ऊपर रेंग रहा था, जैसे कोई भौंरा हो. मैंने अंदाज़ लगाया कि यहाँ कोई मोड़ है.

ट्रेन के बिल्कुल साथ-साथ पगडंडी थी, बिल्कुल संकरी, मैंने देखा कि इस पगडंड़ी पर एक आदमी जा रहा है. दूर से वो बिल्कुल छोटा नज़र आ रहा था, मगर ट्रेन तो उससे ज़्यादा तेज़ चल रही थी, और धीरे-धीरे मैंने देखा कि ये तो बड़ा आदमी है, उसने नीली कमीज़ पहनी है, और भारी-भारी जूते पहने हैं. इन जूतों से पता चल रहा था कि आदमी चलते-चलते थक गया है. उसने हाथों में कुछ पकड़ा था.

जब ट्रेन उसके पास पहुँची, तो ये अंकल अपनी पगडंड़ी से छिटक कर ट्रेन के साथ-साथ भागने लगा, उसके जूते कंकरों पर चरमरा रहे थे, और भारी जूतों के नीचे से कंकर उड़ कर इधर उधर उड़ रहे थे. अब मैं उसके बराबर आया, उसने तौलिए में लिपटी हुई अपनी जाली वाली थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई और मेरी बगल में भागता रहा, उसका चेहरा लाल और गीला था. वो चिल्लाया:
 “थैली पकड़, बच्चे!” और उसने हौले से उसे मेरे घुटनों पे घुसा दिया.
मैंने थैली को कस के पकड़ लिया, और अंकल हैण्डल पकड़ कर आगे झुका, फूटबोर्ड पे उछला और मेरी बगल में बैठ गया:
 “मुश्किल से चढ़ पाया...”
मैंने कहा;
 “ये रही आपकी थैली.”
मगर उसने नहीं ली. उसने पूछा:
 “तेरा नाम क्या है?”
मैंने जवाब दिया:
 “डेनिस.”
उसने सिर हिलाया और कहा:
 “और मेरे बच्चे का – सिर्योझ्का.”
मैंने पूछा:
 “वो कौन सी क्लास में है?”
अंकल ने कहा;
 “दूसरा में.”
 “ऐसे कहना चाहिए: दूसरी में,” मैंने कहा.

तब वह खीझते हुए मुस्कुराया और थैली से तौलिया हटाने लगा. तौलिए के नीचे चांदी जैसी चमचमाती पत्तियाँ थीं, और ऐसी ख़ुशबू आ रही थी, कि मैं बस पागल होते-होते बचा. अंकल इन पत्तियों को एक एक करके अच्छी तरह हटाने लगा, और मैंने क्या देखा - रसभरी से पूरा भरा हुआ थैला था. हालाँकि वो बेहद लाल थीं, कहीं कहीं चांदी जैसी भी थीं, सफ़ेद; मगर हर फल अलग अलग था, जैसे बहुत कड़ा हो. मैं आँखें फ़ाड़े रसभरी की तरफ़ देख रहा था.
 “ये हल्की ठण्ड ने इसे ढाँक दिया है, कोहरे से धुंधली हो गई है,” अंकल ने कहा. “चल, खा!”

मैंने एक बेरी उठाई और खा ली, फिर एक और खाई, और उसे जीभ से दबाया, इस तरह एक एक करके खाने लगा, ख़ुशी के मारे मैं पिघला जा रहा था, और अंकल बैठा हुआ मुझे देखे जा रहा था, उसका चेहरा ऐसा हो रहा था, जैसे मैं बीमार हूँ और उसे मुझ पर दया आ रही है. उसने कहा;
 “तू ऐसे एक-एक न खा. पूरी मुट्ठी भर-भर के खा.”            
 और उसने मुँह फेर लिया. शायद इसलिए कि मैं शरमा न जाऊँ. मगर मैं उससे ज़रा भी नहीं शरमा रहा था: मैं अच्छे लोगों से नहीं शरमाता, मैं फ़ौरन मुट्ठी भर-भर के खाने लगा और मैंने फ़ैसला कर लिया कि चाहे मेरा पेट फूट ही क्यों न जाए, मैं इन रसभरियों को ख़तम कर दूँगा.
अपने मुँह में इतना अच्छा स्वाद मैंने कभी महसूस नहीं किया था और दिल को भी इतनी ख़ुशी कभी नहीं हुई थी. मगर फिर मुझे सिर्योझा की याद आई और मैंने अंकल से पूछा:
 “क्या आपके सिर्योझा ने खा लीं?”
 “कैसे नहीं खाईं,” उसने कहा, “एक समय था, जब खाता था.”
मैंने पूछा:
 “एक समय क्यो? मेरा मतलब है, क्या आज उसने खा लीं?”
अंकल ने जूता उतारा और उसमें से छोटा सा कंकर बाहर झटका.”
 “पैर में चुभता है, दर्द पहुँचाता है, देख! और कहने को है इत्ता छोटा कंकर.”
वो कुछ देर ख़ामोश रहा और कहने लगा:
 “मगर रूह को छोटी सी बात लहूलुहान कर सकती है. सिर्योझ्का, मेरे नन्हे भाई, अब शहर में रहता है, मुझसे दूर चला गया.”
मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. कैसा लड़का है! दूसरी क्लास में है, और पापा से दूर भाग गया!
मैंने पूछा:
 “क्या वो अकेला भाग गया, या किसी दोस्त के साथ गया है?”
मगर अंकल ने ग़ुस्से से कहा:
 “अकेला क्यों? अपनी माँ के साथ! उसे, समझ रहा है, पढ़ने का शौक चर्राया! वहाँ उसके रिश्तेदार हैं, दोस्त हैं, परिचित हैं....जैसे फ़िल्म में होता है: सिर्योझा रहता है शहर में, और मैं यहाँ. अजीब है ना?”
मैंने कहा:
 “फ़िकर न कीजिए, ड्राइवर का काम सीख लेगा और वापस आएगा. इंतज़ार कीजिए.”
उसने कहा:
 “बहुत लम्बा इंतज़ार करना होगा.”
मैंने पूछा:
 “और, वो कौन से शहर में रहता है?”
 “कुर्स्की में.”
मैंने कहा:
 “कुर्स्क में – ऐसे कहना चाहिए.”
अब अंकल फिर से हँसने लगा – भर्राते हुए, जैसे ज़ुकाम हो गया हो, और फिर चुप हो गया. वो मेरी तरफ़ झुका और बोला:
 “ठीक है, बहुत तेज़ दिमाग़ है तेरा. मैं भी पढूँगा. युद्ध की वजह से मैं स्कूल नहीं जा सका. जब तेरी उमर का था, तो पेड़ की छाल उबाल कर खाता था.” वो सोचने लगा. फिर अचानक हाथ हिलाकर जंगल की ओर इशारा करते हुए बोला, “ ये, इसी जंगल में, भाई. इसके पीछे, देख, अभी क्रास्नोए गाँव आएगा. मेरे हाथों से ये गाँव बना है. मैं वहीं उतर जाऊँगा.”
मैंने कहा:
”मैं बस एक और मुट्ठी खाऊँगा, फिर आप अपनी रसभरी बांध लीजिए.”
मगर उसने थैली को मेरे घुटनों पर ही दबाए रखा:
 “बात ये नहीं है. तू ले ले.”

उसने मेरी नंगी पीठ पर हाथ रखा, और मैंने महसूस किया कि कितना भारी और मज़बूत था उसका हाथ, सूखा, गर्माहट भरा, और खुरदुरा, और उसने कस के मुझे अपनी नीली कमीज़ से चिपटा लिया, और मैंने महसूस किया कि वो पूरा गरम है, उससे रोटी की और तमाखू की गंध आ रही थी, और सुनाई दे रहा था कि वो कैसे धीरे-धीरे और शोर मचाते हुए साँस ले रहा है.

उसने इसी तरह कुछ देर मुझे पकड़े रखा और बोला:
 “तो, ऐसा होता है, बेटा. देख, अच्छी तरह रहना...”

उसने मुझे सहलाया और अचानक रास्ते में कूद गया. मैं संभल भी न पाया, और वो पीछे रह गया, और मैंने फिर से सुना कि उसके भारी जूतों के नीचे कंकर कैसे चरमरा रहे हैं.
मैंने देखा, कि वो कैसे मुझसे दूर होने लगा, जल्दी से ऊपर चढ़ाई पे चला गया, नीली कमीज़ और भारी जूतों वाला इतना अच्छा आदमी.

जल्दी ही हमारी ट्रेन तेज़ रफ़्तार से जाने लगी, हवा भी काफ़ी तेज़ हो गई, और मैंने बेरीज़ का थैला उठाया और उसे कम्पार्टमेन्ट में ले आया, और पापा के पास पहुँच गया. 

रसभरी अब पिघलने लगी थी और अब इतनी सफ़ेद नहीं नज़र आ रही थी, मगर ख़ुशबू वैसी ही थी, जैसे पूरा गार्डन हो.

पापा सो रहे थे; वो हमारी बर्थ पे फ़ैल के सो गए थे, और मुझे बैठने के लिए ज़रा भी जगह नहीं थी. कोई भी नहीं था जिसे मैं ये बेरीज़ दिखाऊँ और नीली कमीज़ वाले अंकल के बारे में और उसके बेटे के बारे में बताऊँ. 

कम्पार्टमेंट में सब सो रहे थे, और चारों ओर, पहले ही की तरह अलग-अलग रंगों की एडियाँ लटक रही थीं.

मैंने थैली फ़र्श पे रख दी और देखा कि मेरा पूरा पेट, और हाथ और घुटने लाल हो गए हैं, ये बेरीज़ का रस था, और मैंने सोचा, कि इसे धो लेना चाहिए, मगर अचानक मैंने सिर हिलाया.

कोने में बड़ी सूटकेस खड़ी थी, कस के बंधी हुई, वो सीधी खड़ी थी; कल हमने उस पर खाने के डिब्बे खोले थे और सॉसेज काटा था. मैं उसके पास गया और उस पे कुहनियाँ और सिर टिका दिया, ट्रेन अचानक ज़ोर-ज़ोर से खड़खड़ाने लगी, मुझे कुछ गर्माहट महसूस हो रही थी और मैं देर तक ये आवाज़ सुनता रहा, और फिर से मेरे दिमाग़ में गाना तैरने लगा:

चल रही है ट्रेन –
कितनी है
सुं
रता!
गाते हैं पहिये –
त्रा-
त्ता-
त्ता!


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