गुरुवार, 3 मार्च 2016

Neele Chehre Wala Aadmi

नीले चेहरे वाला आदमी

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


हम वोलोद्या अंकल की समर-कॉटेज के पास लट्ठों पर बैठे थे. पापा अखरोट के पेड़ की एक बड़ी टहनी को मेरे धनुष के लिए चिकना कर रहे थे, और मैं धनुष की प्रत्यंचा के लिए रस्सी को मोम लगा रहा था.

हर तरफ़ सुकून और ख़ामोशी थी, सिर्फ गली में रोड-रोलर शोर मचा रहा था. इस मशीन में पहियों के बदले दो रोलर्स थे – मशीन हमारी बस्ती में डामर का रोड बना रही थी.  

इस गाड़ी में बैठने की सीट्स बेहद ऊँची थी, और जब वो हमारे पास से गुज़रती, तो हमारी फ़ॆन्सिंग के ऊपर सड़क पर काम करने वाले एक ‘वर्कर’ का सिर तैर जाता. उसका चेहरा पूरा नीला था, क्योंकि उसकी दाढ़ी बहुत जल्दी बढ़ती थी. वह हर रोज़ ‘शेव’ करता था, और इससे उसका चेहरा हमेशा नीला रहता था. इस नीले चेहरे की बगल में एक गुलाबी लड़की का चेहरा भी तैरता, ये उसकी सहायक थी, उसकी ख़ूबसूरत काली-काली आँखें और लम्बी-लम्बी पलकें थीं.

मुझे मालूम था कि ये ‘वर्कर्स’ सोसेन्की में अपनी ‘बेस’ पे लंच के लिए गए हैं, क्योंकि वो रात ही से काम करना शुरू कर देते थे, जब सब लोग सो रहे होते और धूप तेज़ न हुई होती.

इस नीले चेहरे वाले अंकल ने एक बार मुझे एक टहनी से पैरों पर ज़ोर से मारा था, क्योंकि जब वो चला गया था, तो मैंने उसकी मशीन चलाई थी. उसने जमके मेरी धुलाई की थी, और मैं उसे पसन्द नहीं करता था. मैं डरता भी था कि कहीं अब पापा से मेरी शिकायत न कर दे, कि मैं बहुत शरारत करता हूँ, मगर उसने, थैंक्स गॉड, मुझे देखा नहीं और सीधे निकल गया.

तो, मैं और पापा एक दूसरे के पास लट्ठों पर बैठे थे, मैं सीटी बजा रहा था, और पापा ख़ामोश थे, और हम एक दूसरे की ओर देखकर सिर्फ मुस्कुरा देते थे, क्योंकि हमें इस बस्ती में रहना बहुत अच्छा लगता था. हमें यहाँ आये छह दिन हो गए थे, मेरी पड़ोस के लड़कों से दोस्ती हो गई थी, अपने कुत्तों से फिर से मुलाक़ात हो गई थी, और मैं उनमें से हरेक को उसके नाम और उपनाम से जानता था. हम बोटिंग करते, अलाव जलाते और मशरूम्स चुनने जंगल में जाते और देखते कि कैसे गाय और बछड़ा दूर खेत में भाग रहे हैं.

आज मैं और पापा पहले तीरंदाज़ी करने वाले हैं, और उसके बाद पतंग उड़ाने वाले हैं – ऊँची, ख़ूब ऊँची, सूरज के ठीक नीचे तक.

जब मैं ये सब सोच रहा था, तभी अचानक गेट बजा, और हमारे पड़ोसी अलेक्सान्द्र सिम्योनिच आँगन में आए. उनके पास अपनी गाड़ी है – ‘वोल्गा’. वो पापा के दोस्त हैं.
वो हमारे पास बैठ गए और बोले:
 “मुसीबत!”
 “क्या हुआ?”
अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने कहा:
 “उसकी, पता है, शादी है! तो, मुझे क्या लेना देना है? आज शादी है - आज शादी, कल बाप्तिज़्मा, परसों नामकरण!...तो मुझे क्या करना चाहिए!...बिना ड्राइवर के बैठा रहूँ?” उन्होंने मुट्ठी से किसी को धमकाया. “मेरे पास तुम्हारी शादी से ज़्यादा ज़रूरी काम है!”
पापा ने कहा:
 “संक्षेप में बताइए.”

और अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने बताया, कि उनके ड्राइवर लेशा ने अपनी पहचान की एक लड़की से शादी का फ़ैसला किया है और आज उसकी शादी है.
 “करने दो शादी,” पापा ने कहा, “आपको क्या प्रॉब्लेम है?”
मगर अलेक्सान्द्र सिम्योनिच गरम हो गए.
“मुझे शहर जाना है,” उन्होंने कहा, “ये बात है! समझ में आया?”
और उन्होंने अपनी हथेली को गले पर फेरा. जैसे, ज़िन्दगी और मौत का सवाल हो. मगर पापा ख़ामोश रहे.
 “आहा,” अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने व्यंग्य से कहा, “ख़ामोश बैठे हैं? डंड़ियाँ बना रहे हैं? और कॉम्रेडशिप की भावना कहाँ है?”
”भाई, छुट्टी है,” पापा ने कहा, “बेटे के साथ भी तो वक़्त गुज़ारना चाहिए.”
“वो कहीं नहीं जाएगा,” अलेक्सान्द्र सिम्योनोविच ने ज़ाहिर किया और मेरी पीठ थपथपाई. “हम उसे भी अपने साथ ले जाएँगे! लड़के को थोड़ी सी ख़ुशी भी देना चाहिए. घूम आएगा!”

आख़िर मै समझ ही गया कि वो क्या कहना चाहते हैं. ये मैं फ़ौरन ही क्यों नहीं समझा? वो तो गाड़ी में जा नहीं सकते. अपनी ख़ुद की ‘वोल्गा’ चलाना उन्हें नहीं आता. मगर पापा को आता है. ‘वोल्गा’ भी, ‘पबेदा’ भी, ‘गाज़-51’ भी, और जो भी चाहो. क्योंकि पापा के पास ड्राइविंग लाइसेन्स है, वो मॉस्को-खबारोव्स्क ऑटो-रेस में भी गए थे, बस अपनी ख़ुद की कार उनके पास नहीं है, मगर ड्राइविंग वो बढ़िया करते हैं! और अलेक्सान्द्र सिम्योनिच हमारे पास इसलिए आए हैं कि पापा उन्हें शहर ले जाएँ और वापस ले आएँ.

हालाँकि मैं देख रहा था कि पापा का जाने का मन नहीं है, क्योंकि वो धूप ताप रहे थे, और उन्हें पुरानी पतलून पहनकर गोदाम के पास बैठना और चुपचाप टहनी छीलना अच्छा लगता है, और उन्हें कहीं भी जाना अच्छा नहीं लगता, मगर मैं तो बहुत ख़ुश हो गया, कि गाड़ी में ‘ज़ूम’ से जाने को मिलेगा, और इसलिए मैं फ़ौरन चीखा:
 “चलो, जाएँगे! कोई बहस ही नहीं!”
अलेक्सान्द्र सिम्योनिच भी ऐसे उछले, जैसे किसी ने काटा हो, और ज़ोर से गरजे:
  “राईट! हुर्रे! चलो!...”
अब पापा भी मान गए और उन्होंने सिर्फ इतना कहा:
 “सिर्फ जाएँगे-और-आएँगे. जल्दी से! जिससे तीन बजे तक वापस!”
अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने ठहाका लगाया और सीने पे हाथ रखा:
 “दो बजे तक!” और क़सम खाई, “नहीं तो मैं इसी जगह धरती में समा जाऊँ! दो बजते-बजते हम यहाँ होंगे. बिल्कुल घड़ी की नोंक पर!”

मैं और पापा कपड़े बदलने चले गए, फिर हमने गाड़ी को अलेक्सान्द्र सिम्योनिच के आँगन से बाहर निकाला, और वो लोग सामने बैठे, पापा स्टीयरिंग पे. मुझे पीछे वाली सीट पर भेज दिया और दोनों दरवाज़ों को लॉक कर दिया. मैं फ़ौरन पापा की पीठ के पीछे खड़ा हो गया, जिससे कि सामने की ओर देख सकूँ, रास्ते पर, स्पीडोमीटर पर, जंगल को, सामने से आने वाली गाड़ियों को, और ये कल्पना कर सकूँ कि गाड़ी मैं चला रहा हूँ, मैं, न कि पापा, और ये, कि ये गाड़ी नहीं, बल्कि स्पेस-शिप है, और आकाश में उड़ने वाला, ठण्डे सितारों पर जाने वाला – मैं पहला इन्सान हूँ.

मुझे गाड़ी में जाने में बहुत मज़ा आ रहा था, बेहद ख़ुशी हो रही थी! चारों ओर ख़ूब हरियाली थी. घास, और बड़े-बड़े पेड़, और पतले-पतले बर्च के पेड़ – चारों ओर ख़ूब हरियाली थी. हवा इतनी तेज़ और गर्माहट भरी थी, और वो भी हरियाली की सुगंध से सराबोर थी.

मैं पापा के पीछे खड़ा था और सीटी बजा रहा था, सामने रास्ते की ओर देख रहा था; रास्ता चाँदी की तरह चमक रहा था, और, अगर सिर नीचा करूं, तो दिखाई दे रहा था कि कैसे गर्म हवा उसके ऊपर गोल-गोल चक्कर लगा रही है.

कहीं रास्ते में एक बोर्ड गिरा पड़ा है – ज़ाहिर है, कि किसी ट्रक ने गिरा दिया है, या घास की छोटी सी पूली, साफ़ समझ में आ रहा था कि वो रास्ते पे कैसे आई, या ड्राइवर का हाथ पोंछने का कपड़ा. ऐसा लग रहा था, कि रास्ता बता रहा है कि मेरे, पापा के और अलेक्सान्द्र सिम्योनिच के जाने से पहले उसके ऊपर से कौन गुज़रा था.

अब हम काफ़ी स्पीड से जा रहे थे, स्पीडोमीटर 70 दिखा रहा था, और अंत में मैं स्पेस-शिप का खेल खेलने ही लगा. मैंने उपकरणों को चालू किया, पैडल्स दबाए, लीवर्स खटखटाए, और उड़ने लगा और ‘मार्स’ और ‘मून’ के क़रीब से, और भी ज़्यादा-ज़्यादा दूर, और जल्दी ही मैंने फ़ैसला कर लिया कि भारहीनता की स्थिति आ गई है, और मैं उछलने–कूदने लगा, जिससे कि जाँच कर सकूँ कि मैं भार वाला हूँ या भारहीन.

मगर पापा ने बिना मुड़े कहा:
 “चुपचाप खड़ा रह!”

मैं फिर से रास्ते की ओर देखने लगा. जैसे ही मैंने सामने की ओर नज़र डाली, मैंने अचानक देखा कि एक छोटी लड़की रास्ते से गुज़र रही है! मतलब, वो ठीक हमारे कार के सामने ही भाग रही है. भाग रही है- बस भागती जा रही है. ये आई कहाँ से, अब तक तो नहीं थी. जैसे ज़मीन के नीचे से बाहर उछली हो! हमारी कार तेज़ी से दाईं ओर मुड़ी, और भयानक ज़ोर से हॉर्न बजा...मैंने बस इतना देखा, कि लड़की भी दाईं ओर मुड़ी, फिर से कार के नीचे, और तभी एक चिंघाड़ती सी आवाज़, खड़खड़ाहट और चीत्कार सुनाई दी, ऐसा लगा जैसे कार को किसी ने पूँछ पकड़ कर खींच लिया हो, इसके आगे कुछ भी समझ में नहीं आया. मुझे लगा कि मेरे भीतर से इलेक्ट्रिक शॉक गुज़र गया, और कोई चीज़ बड़ी दयनीयता से झनझना रही है, और फिर जैसे चूर चूर हो गई है, हॉर्न लगातार बजे जा रहा था, और मैं पूरा सामने की सीट से चिपक गया, मैंने उसे हाथों से, कुहनियों से, सीने से कस के पकड़ा था, और अचानक मैंने देखा कि खिड़की से बाहर बर्च के पेड एक साथ बाईं ओर गिर गए हैं, जैसे उन्हें काट दिया हो, वे फ़ौरन फिर से दिखाई दिए और फिर से बाईं ओर गिर गए...इसके बाद सब कुछ जैसे ठहर गया. मैं चारों – हाथों-पैरों पर खड़ा था. मेरे ऊपर थी खुली खिड़की, जैसे मैं पनबुब्बी में था या किसी कुँए के अन्दर. फिर अचानक, न जाने क्यों, मैं बिल्ली की तरह घिसटने लगा, और जो हाथ आया उसी को पकड़ लिया – चाहे कवर हो या कोई हैंडिल हो, जो भी मिला उसीको – और, एक पल में कूदकर बाहर आ गया.

हमारी कार ढलान पे जैसे एक करवट पड़ी थी. उसमें कोई काँच नहीं थे. इंजिन के नीचे से थोड़ा सा धुँआ निकल रहा था. छत पुरानी हैट की तरह चपटी हो गई थी. कार लगातार हॉर्न बजाए जा रही थी. उसके पहिए ऐसे घूम रहे थे, जैसे उल्टे पड़े भौंरे के पंजे चलते रहते हैं.

दूसरी खिड़की से एक आदमी बाहर आया. ये अलेक्सान्द्र सिम्योनिच थे. वो बाहर निकल कर फ़ौरन मेरे पास आए.
उन्होंने कहा;
 “क्या तुझे मालूम है कि मेरा बायाँ जूता कहाँ है?”
सही में, उनके एक पैर में जूता नहीं था...उन्होंने कार की तरफ़ देखा, अपना सिर पकड़ लिया और फिर से कहा;
 “समझ में नहीं आता कि जूता कहाँ चला गया...ढूँढ़ तो.”
मैं घास में ढूँढ़ने लगा.
जूता कहीं भी नहीं था, और कार पूरे समय दुख भरी आवाज़ में हॉर्न बजाए जा रही थी. मैं ये सुन न सका, मेरे दिमाग़ में चीटियाँ रेंगने लगीं, और मैं उससे दूर हट गया.

रास्ते के किनारे पे एक लॉरी रुकी, उसमें से सिपाही कूदे और नीचे की ओर, हमारे पास, दौड़े. एक सिपाही ने कार में झाँक़ा और हाथ हिला-हिलाकर औरों से कहने लगा:
“यहाँ एक आदमी है! जल्दी!...”

सिपाहियों ने कार को पकड़ा और उठाकर वापस पहियों पर रख दिया, वो हॉर्न बजाए ही जा रही थी, जैसे पुकार रही हो. तभी मुझे याद आया, कि वहाँ, स्टीयरिंग पे, मेरे पापा बैठे हैं!
मैं इस बारे में भूल कैसे गया! मुझे बहुत डर लगा...मैं कार के पास भागा.

पापा बैठे थे, बुरी तरह से गुड़ीमुड़ी हुए, पूरा शरीर पीछे की ओर मुड़ गया था, जैसे वह पीछे वाली खिड़की से देख रहे हों. उनका हाथ स्टीयरिंग पर था, वो हॉर्न दबा रहा था. कलाई के पास वाली हाथ की हड्डी स्टीयरिंग व्हील में फँस गई थी. हाथ नीला पड़ गया था, फूल गया था, और उसमें से ख़ून बह रहा था.

सिपाहियों ने स्टीयरिंग व्हील को उखाड़ा. उन्होंने दरवाज़े खोले, और पापा बाहर आए. उनका चेहरा सफ़ेद हो गया था, और आँखें सफ़ॆद थीं, हाथ लटक रहा था, जैसे वो किसी और आदमी का हाथ हो. मैं पापा के पास भागा और उनके सामने खड़ा हो गया, मगर वो मुझे देख नहीं पाए, क्योंकि इसी समय मोटरसाइकल पर मिलिशियामैन आ गए थे.

उनमें से एक ने कहा:
 “लाइसेन्स दिखाइए!”

पापा साइड से खड़े थे, और इस मिलिशियामैन ने उनका हाथ नहीं देखा था, मगर पापा धीरे-धीरे, फ़ूहड़पन से अपनी दाईं जेब में अपना बायाँ हाथ डालने लगे मगर हाथ अन्दर डाल ही नहीं सके. तब मैं उनके बिल्कुल पास सरका और लाइसेन्स निकाला. पापा ने मेरी ओर देखा. ज़ाहिर था कि उन्हें, सिर्फ अभी याद आया कि मैं पूरे समय उनके साथ था. उन्होंने बाएँ हाथ से मेरे कंधे को पकड़ा और मेरे बिल्कुल ऊपर झुके. उन्होंने, जैसे बहुत दूर से, पूछा:
“ये तू है?” और वो मुझे झकझोरने लगे, और चिल्लाए, “कहाँ दर्द है? बोल...”
मैंने कहा:
 “कहीं भी दर्द नहीं है. मैं एकदम सही-सलामत हूँ...”

पापा नीचे बैठ गए और पहिए पर लुढ़क गए. उनका चेहरा गीला हो रहा था. उनके माथे से पसीने की मोटी-मोटी बूँदें बह रही थीं. वो अचानक एक साईड पे फिसलने लगे, जैसे लेटना चाहते हों. मैंने फ़ौरन उनकी कमीज़ पकड़ ली, जिससे वो ज़मीन पे न लेटॆं. मगर तभी उनके पास सफ़ेद एप्रन पहने एक आदमी बढ़ा. वो पापा के सामने घुटनों पर बैठा और उसने अचानक उनका दायाँ हाथ पकड़ लिया.
पापा बोले:
 “भाड़ में जाओ...”
डॉक्टर उठ कर खड़ा हो गया, वो बोला:
 “फ्रेक्चर. डबल.”

और उसने पापा को उठाया और उन्हें बड़ी गाड़ी के पास लाया. चारों ओर बहुत सारे लोग इकट्ठे हो गए थे, और रास्ते के किनारे पर बसें, और ‘मस्क्विच’ और ‘गाज़िक’ गाड़ियाँ खड़ी थीं. मैंने देखा कि हमारे रास्ते वाला रोड-रोलर भी वहाँ था. मैं डॉक्टर के और पापा के पीछे गया, मगर भीड़ ने मुझे दूर धकेल दिया और मैं बड़ी मुश्किल से पीछे से आगे सरकने की कोशिश कर रहा था. जब पापा ढलान के ऊपर चढ़े, तो मैंने देखा कि उनके पास नीले चेहरे वाला ‘वर्कर’ भागा, वो ही जिसने बहुत पहले मेरे पैरों पर टहनी से मारा था. उसने चलते-चलते पापा से कुछ कहा, और पापा ने सिर हिलाया. फिर पापा ‘एम्बुलेन्स’ में बैठने लगे, और मैं समझ गया कि वो फिर से मेरे बारे में एकदम भूल गए हैं. मगर, मैंने फ़ैसला कर लिया कि मैं पापा के पीछे और गाड़ी के पीछे भागूँगा, जब तक उन्हें पकड़ नहीं लेता. तभी पापा मुड़े और उन्होंने चिल्लाकर मुझसे कुछ कहा. मैं सुन नहीं पाया था कि उन्होंने क्या कहा था. गाड़ी आगे बढ़ी और चल पड़ी , मैं उसके पीछे भागा, मगर चढ़ाव पे नहीं भाग सका – बहुत ऊँचा था, और मैं रुक गया, क्योंकि दिल बुरी तरह से धड़क रहा था.

ऊपर से हमारी ‘वोल्गा’ दिखाई दे रही थी. वो नष्ट हुए टैंक की तरह खड़ी थी. उसके पीछे से अलेक्सान्द्र सिम्योनिच निकले और बोले:
 “ज़रा सोच, जूता डिक्की में पड़ा था. फ़न्टास्टिक!”

मिलिशियामैन उनके पास आया.
“तो,” उसने कहा और अपनी नोटबुक में कुछ लिखने लगा, “अब अपनी बात जारी रखते हैं...और ये लड़का, शायद कवच पहने पैदा हुआ था. एक भी खरोंच नहीं! ये, शायद, आपकी कार है?”
मैं उससे पूछना चाहता था कि पापा को कब वापस लाएँगे, मगर तभी ऊपर से कोई चिल्लाया:
 “कॉम्रेड चीफ़! हम बच्चे को अपने साथ ले जा रहे हैं, यहाँ धूप में क्यों तपता रहे!...हम उसकी वाली सड़क पर ही डामर बिछा रहे हैं. ठीक उनके घर के पास. बच्चे, इधर आओ!”
 ये नीले चेहरे वाला आदमी अपनी गाड़ी से चिल्ला रहा था.
मिलिशियामैन ने पूछा:
 “जाएगा?”

मुझे मालूम नहीं था कि क्या जवाब देना है, क्योंकि मुझे अलेक्सान्द्र सिम्योनिच को अकेला छोड़ कर जाना अच्छा नहीं लग रहा था. वो समझ गए, कि मैं क्या सोच रहा हूँ, और बोले:
 “कोई बात नहीं, चला जा...”
मगर मैं अपनी जगह से नहीं हिला.

तब ऊपर से वो सुन्दर लड़की कूदी, जो नीले चेहरे वाले के पास बैठी थी. उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा:
 “और हम उसे स्टीयरिंग पकड़ने देंगे. हाँ, वान्या? कॉम्रेड चीफ़, आप प्लीज़ उसे स्टीयरिंग पकड़ने की इजाज़त दीजिए. वो ख़ुद हमारी गाड़ी चलाएगा, पक्का प्रॉमिस! वो, अगर चाहे, तो हॉर्न भी बजाएगा, सब लोग उससे जलेंगे, और आप, कॉम्रेड चीफ़, शायद, आप भी जलेंगे. हाँ? आ जा यहाँ, बच्चे, मेरे सोना, ले, स्टीयरिंग पकड़, तू तन्दुरुस्त रहे!”

वो मेरे ऊपर इस तरह गा रही थी, जैसे बिल्कुल छोटॆ बच्चे के लिए गाते हैं, और उसने मुझे नीले आदमी के सामने बिठा दिया. उससे पेट्रोल की तेज़ गंध आ रही थी. उसने मेरे हाथों को स्टीयरिंग पे रख दिया, और बगल में अपने हाथ रखे, और मैंने देखा कि उसकी कैसी मोटी-मोटी ऊँगलियाँ हैं, काली किनार वाले चौड़े-चौड़े नाखूनों वाली.

उसने पैडल दबाया, लीवर्स को खटखट किया, और हम तीनों उस डरावनी जगह से दूर चल पड़े.

चारों ओर हरियाली थी – घास, और पतले-पतले बर्च के पेड़, - और हवा से हरियाली की ख़ुशबू आ रही थी, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो. हम चुपचाप जा रहे थे, और, हालाँकि मैं हाथों से स्टीयरिंग पकड़े था, मैं कुछ भी नहीं खेल रहा था. मेरा दिल ही नहीं चाह रहा था. और नीले चेहरे वाले अंकल ने अचानक अपनी असिस्टेंट से कहा;
 ‘तू देख, फ़ीर्का, कैसे पापा हैं इस शैतान के! हर कोई ऐसी रिस्क नहीं लेगा...मतलब, अनजान बच्ची की ज़िन्दगी नहीं छीनना चाहते थे. गाड़ी तोड़ दी! हालाँकि, गाड़ी तो लोहे की है, उसका तो ये होता ही रहता है, वो दुरुस्त हो जाएगी. मगर बच्ची को कुचलना नहीं चाहते थे, ये सबसे महत्वपूर्ण बात है...नहीं चाहते थे, बिल्कुल नहीं. अपने ख़ुद के बेटे को ख़तरे में डाल दिया. मतलब, आदमी की रूह बहादुर है, दमकती हुई है....मतलब, महान रूह है. ऐसे लोगों की तो, फीर्का, युद्ध के मोर्चे पर बेहद इज़्ज़त करते थे...

उसने मेरी नाक पकड़ कर दबाई, जैसे होर्न हो....
 “ज़्ज़्ज़्ज़ीन्....”

मेरे पापा के लिए उसने इतनी अच्छी बातें कही थीं, कि मैंने उसकी मोटी ऊँगली पकड़ ली और रो पड़ा.

*****

मंगलवार, 1 मार्च 2016

Sadovaya...

       सादोवाया स्ट्रीट पर बेहद ट्रैफ़िक है


लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


वान्का दीखोव के पास एक साइकिल थी. बहुत पुरानी थी, मगर ठीक ही थी. पहले ये वान्का के पापा की साइकिल थी, मगर, जब साइकिल टूट गई, तो वान्का के पापा ने कहा:
 “वान्का, पूरे दिन क्यों रेस लगाता रहे, ये ले तेरे लिए गाड़ी, इसे दुरुस्त कर ले, और तेरे पास तेरी अपनी साइकिल होगी. ये, अभी तक ठीक ही है. मैंने इसे कभीS कबाड़ी की दुकान से खरीदा था, लगभग नई ही थी.

साइकिल पाकर वान्का इतना ख़ुश हो गया कि बताना मुश्किल है.

वह उसे कम्पाऊण्ड के दूसरे छोर पे ले गया और उसने रेस लगाना पूरी तरह बन्द कर दिया – उल्टे वो पूरे-पूरे दिन अपनी साइकिल पे लगा रहता, ठोंकता, पीटता, स्क्रू खोलता और स्क्रू लगाता. गाड़ियों के तेल से हमारा वान्का पूरा गन्दा हो गया, उसकी ऊँगलियों पर भी खरोंचें आ गईं थीं, क्योंकि जब वो काम करता, तो उसका निशाना अक्सर चूक जाता और हथौड़ा उसकी ऊँगलियों पर ही पड़ता. मगर उसका काम बढ़िया हो गया, क्योंकि पाँचवीं क्लास में उन्हें ‘फिटर’ का काम सिखाया जाता है, और वान्का तो मेहनत के काम में हमेशा ‘ए’ ग्रेड लाता था. गाड़ी रिपेयर करने में मैं भी वान्का की मदद कर रहा था, और वो हर दिन मुझसे कहता:
 “थोड़ा ठहर जा, डेनिस्का, जब हम इसे रिपेयर कर लेंगे, तो मैं तुझे इस पर घुमाऊँगा. तू पीछे कैरियर पे बैठेगा, और हम दोनों पूरा मॉस्को घूमेंगे!”

और, इसलिए कि वो मुझसे इतनी दोस्ती रखता है, हालाँकि मैं सिर्फ दूसरी क्लास में हूँ, मैं उसकी और ज़्यादा मदद करने लगा. मैं, ख़ासकर, ये कोशिश करता कि कैरियर ख़ूबसूरत बन जाए. मैंने उसे चार बार काले पेंट से रंगा, क्योंकि वो मेरा अपना कैरियर था. और वो कैरियर इतना चमकने लगा, जैसे नई-नई ‘वोल्गा’ कार चमकती है. मैं ये सोचकर ख़ुश होता कि मैं उस पे बैठा करूँगा, वान्का की बेल्ट पकड़े रहूँगा, और हम पूरी दुनिया घूमेंगे.

और एक दिन वान्का ने अपनी साइकिल ज़मीन से उठाई, पहियों में हवा भरी, उसे कपड़े पोंछा, ख़ुद ड्रम से पानी लेकर नहाया और पतलून में नीचे की ओर क्लिप्स लगाईं. मैं समझ गया कि अब हमारा फ़ेस्टिवल नज़दीक आ रहा है.            

वान्का गाड़ी पे बैठा और चल पड़ा. पहले उसने बिना जल्दबाज़ी किए कम्पाऊण्ड का चक्कर लगाया, गाड़ी स्मूथ-स्मूथ चल रही थी, और सुनाई दे रहा था, कि ज़मीन से घिसते हुए टायर कितनी मीठी-मीठी आवाज़ कर रहे हैं. फिर वान्का ने स्पीड बढ़ाई, और कमानियाँ चमकने लगीं, और वान्का करतब दिखाने लगा, वो लूप बनाने लगा, आठ का अंक बनाने लगा, और पूरी ताक़त से गाड़ी चलाने लगा, और अचानक ज़ोर से ब्रेक लगा दिया, और उसके नीचे गाड़ी ऐसे खड़ी हो गई, जैसे ज़मीन में गड़ गई हो. उसने हर तरह से गाड़ी की जाँच कर ली, जैसे कोई ट्रेनी-पाइलट करता है, और मैं खड़ा था और देख रहा था, उस मेकैनिक जैसा, जो नीचे खड़े होकर अपने पाइलट के करतब देखता है. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, कि वान्का इतनी अच्छी तरह चला रहा है, हालाँकि मैं उससे भी अच्छा चला सकता हूँ, कम से कम उससे बुरा तो चला ही नहीं सकता. मगर साइकिल मेरी नहीं थी, साइकिल वान्का की थी, और इस बारे में ज़्यादा बात करने की ज़रूरत नहीं थी, अपनी साइकिल पे वो जो चाहे वो करे. ये देखकर भी अच्छा लग रहा था कि गाड़ी पेंट के कारण बढ़िया चमक रही है, और ये सोचना भी नामुमकिन था कि वो पुरानी है. वो किसी भी नई गाड़ी से बेहतर थी. ख़ासकर कैरियर. बहुत ही प्यारा लग रहा था उसकी तरफ़ देखने से दिल ख़ुश हो रहा था.

इस गाड़ी पे वान्का क़रीब आधे घण्टे घूमता रहा, और मैं तो डरने भी लगा कि वो मेरे बारे में बिल्कुल भूल गया है. मगर नहीं, मैं वान्का के बारे में बेकार ही ऐसा सोच रहा था. वो मेरे पास आया, पैर को फ़ेन्सिंग पे टिकाया और बोला:
 “चल, चढ़ जा.”
मैंने चढ़ते-चढ़ते पूछा:
 “कहाँ जाएँगे?”
वान्का ने कहा:
 “कहीं भी? पूरी दुनिया में!”

और मेरा मूड एकदम ऐसा हो गया, जैसे हमारी पूरी दुनिया में सिर्फ प्रसन्न लोग ही रहते हैं और वो सिर्फ इसी बात का इंतज़ार करते हैं कि कब मैं और वान्का उनके घर जाएँगे. और जब जाएँगे – वान्का हैण्डल पे, और मैं कैरियर पे, - तो फ़ौरन एक बड़ा समारोह शुरू हो जाएगा, और झण्डे फ़हराने लगेंगे, और गुब्बारे उड़ने लगेंगे, और गाने, और डंडी पे एस्किमो आइस्क्रीम, ऑर्केस्ट्रा गरजने लगेगा, और जोकर्स सिर के बल चलने लगेंगे.

इतना अचरजभरा मूड था मेरा, और मैं अपने करियर पे जम गया और वान्का के बेल्ट को पकड़ लिया. वान्का ने पैडल्स घुमाए, और...बाय-बाय पापा! बाय-बाय मम्मा! बाय-बाय पुराने कम्पाऊण्ड, और कबूतरों, फिर मिलेंगे! हम दुनिया की सैर पे जा रहे हैं!

वान्का कम्पाऊण्ड से बाहर निकला, फिर नुक्कड़ के पार, और हम अलग-अलग गलियों में गए, जहाँ पहले मैं सिर्फ पैदल जाता था. अब हर चीज़ बिल्कुल अलग थी, कुछ अनजानी-सी, वान्का हर पल घण्टी बजा रहा था, जिससे कि किसी को साइकिल के नीचे दबा न दे: ज़्ज़्ज़! ज़्ज़्ज़! ज़्ज़्ज़!....

पैदल चलने वाले उछलकर दूर हट रहे थे, जैसे मुर्गियाँ उछलती हैं, और हम अभूतपूर्व रफ़्तार से जा रहे थे, मुझे खूब ख़ुशी हो रही थी, दिल में आज़ादी का अनुभव हो रहा था, और कुछ बदहवास सी आवाज़ निकालने को जी चाह रहा था. मैंने निकाला ‘आ’. इस तरह से: आआआआआआआआआआआआ! जब वान्का एक पुरानी गली में घुसा, जिसमें रस्ता कच्चा था, जैसे सम्राट ‘दाल’ (रूसी लोककथाओं का एक पात्र – अनु.)  के ज़माने का हो, तब तो बहुत मज़ा आया. गाड़ी हिचकोले खाने लगी, और मेरी ‘आ-गरज’ बीच बीच में टूटने लगी, जैसे उसके मुँह से बाहर उड़ते ही किसी ने उसे तेज़ कैंची से काट दिया हो और हवा में फेंक दिया हो. अब मुँह से निकल रहा था: आ! आ! आ! आ! आ!

हम और भी बड़ी देर तक गलियों में घूमते रहे और आख़िरकार थक गए. वान्का रुक गया, और मैं अपने कैरियर से कूद गया. वान्का ने कहा:
 “तो?”
 “फ़न्टास्टिक!” मैंने कहा.
 “तू आराम से तो बैठा था?”
 “वॉव, जैसे दीवान पे बैठा था,” मैंने कहा, “उससे भी ज़्यादा आराम से. क्या गाड़ी है! एकदम एक्स्ट्रा-क्लास!”

वह हँसने लगा और उसने अपने बिखरे बालों को ठीक किया. उसका चेहरा गन्दा, धूल भरा हो गया था, सिर्फ आँखें ही चमक रही थीं – नीली आँखें, किचन की दीवार पे टंगे कप्स के समान. और दाँत तो ख़ूब चमक रहे थे.

तभी हमारे पास ये लड़का आया. वो बहुत लम्बा था और उसका एक दाँत सुनहरा था. उसने लम्बी आस्तीनों की धारियों वाली कमीज़ पहनी थी, और उसके हाथों में कई तरह की तस्वीरें, पोर्ट्रेट्स और लैण्डस्केप्स थे. उसके पीछे इतना झबरा कुत्ता डोल रहा था, तरह तरह के ऊनों से बनाया हुआ.  काले ऊन के टुकड़े थे, सफ़ेद, भूरे और एक हरा टुकड़ा भी दिखाई दे रहा था...उसकी पूँछ गाँठ वाले नमकीन बिस्कुट जैसी थी, एक पैर दबा हुआ था. इस लड़के ने पूछा:
 “तुम कहाँ से आए हो, लड़कों?”
हमने जवाब दिया:
 “त्र्योखप्रूद्नी से.”
उसने कहा:
 “वॉव! शाबाश! कहाँ से चला के लाए हो? क्या ये तेरी गाड़ी है?”
वान्का ने कहा:
 “मेरी. पहले पापा की थी, अब मेरी है. मैंने ख़ुद उसे रिपेयर किया है. और ये”, वान्का ने मेरी तरफ़ इशारा किया, “इसने, मेरी मदद की है.”
इस लड़के ने कहा:
 “हाँ...देखो. ऐसे साधारण बच्चे हैं, और ठेठ चेमिकल-मेकैनिकल इंजीनियर.”
मैंने पूछा:
 “क्या ये कुत्ता आपका है?”
लड़के ने सिर हिला दिया:
 “हँ. मेरा. ये बहुत कीमती कुत्ता है. ऊँची नस्ल का है. स्पेनिश बैसेट (कम ऊँचाई का लम्बा कुत्ता – अनु.).
वान्का ने कहा:
 “क्या कह रहे हैं! ये कहाँ से बैसेट होने लगा? बैसेट पतले और लम्बे होते हैं.”
 “जब जानते नहीं हो, तो चुप बैठो!” इस लड़के ने कहा. “मॉस्को या र्‍य़ाज़ान का बैसेट – लम्बा होता है, क्योंकि वो पूरे टाईम अलमारी के नीचे बैठा रहता है और इसलिए लम्बाई में बढ़ता है, मगर ये दूसरी टाइप का कुत्ता है, कीमती वाला. ये वफ़ादार दोस्त है. नाम है – बदमाश.”

वो कुछ देर चुप रहा, फिर उसने तीन बार गहरी साँस ली और कहा:
 “फ़ायदा क्या है? हालाँकि वफ़ादार कुत्ता है, फिर भी, है तो कुत्ता. मुसीबत में मेरी मदद नहीं कर सकता...”
उसकी आँखों में आँसू आ गए. मेरा दिल बैठ गया. उसे क्या हुआ है?
वान्का ने डरते हुए पूछा:
 “क्या मुसीबत आई है आप पे?”
 “दादी मर रही है,” उसने कहा और बार-बार होठों से हवा लेते हुए हिचकियाँ लेने लगा. “मर रही है, प्यारी दादी...उसे डबल अपेंडिसाइटिस है...” उसने कनखियों से हमारी तरफ़ देखा और आगे बोला: “डबल अपेंडिसाइटिस, और मीज़ल्स भी...”
अब वो बिसूरने लगा और मुट्ठी से आँसू पोंछने लगा. मेरा दिल ज़ोर से धक्-धक् करने लगा. लड़का दीवार से टिककर आराम से खड़ा हो गया और खूब ज़ोर से चिल्लाने लगा. उसका कुत्ता भी, उसकी ओर देखते हुए, चिल्लाने लगा, ये सब बहुत दुख भरा था. इस चीख से वान्का का चेहरा अपनी धूल के नीचे ही सफ़ेद पड़ गया. उसने इस लड़के के कंधे पे हाथ रखा और कांपती हुई आवाज़ में बोला:
 “चिल्लाइए नहीं, प्लीज़! आप ऐसे क्यों चिल्ला रहे हैं?”
 “कैसे ना चिल्लाऊँ,” इस लड़के ने कहा और सिर हिलाने लगा, “कैसे ना चिल्लाऊँ, जब कि मेरे पास दवा की दुकान तक जाने की भी ताक़त नहीं है! तीन दिनों से खाया नहीं है!...आय-उय-उय-युय!...”
और, वो और भी बुरी तरह से चिल्लाने लगा. कीमती कुत्ता बैसेट भी और ज़ोर से चिल्लाने लगा. आस- पास कोई भी नहीं था. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करना चाहिए.
मगर वान्का ज़रा भी परेशान नहीं हुआ.
 “क्या आपके पास प्रेस्क्रिप्शन है?” वो चिल्लाया. “अगर है, तो फ़ौरन दीजिए, मैं अभी गाड़ी पे उड़ता हुआ मेडिकल शॉप जाता हूँ और दवा ले आता हूँ. मैं फ़ुर्ती से उडूँगा!”
मैं ख़ुशी से बस उछलने ही वाला था. शाबाश, वान्का! ऐसे दोस्त के साथ तुम्हें कोई ख़तरा नहीं है, वो हमेशा जानता है कि क्या करना चाहिए.
हम दोनों इस लड़के के लिए दवाई लाएँगे और उसकी दादी को मरने से बचाएँगे. मैं चीख़ा;
 “प्रेस्क्रिप्शन दीजिए! एक मिनट भी नहीं खोना चाहिए!”
मगर ये लड़का तो और भी बुरी तरह से हिचकियाँ लेने लगा, हमारी तरफ़ देखकर हाथ हिलाए, चिल्लाना बन्द कर दिया और गरजा:
 “नहीं! कहाँ जाओगे! तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है? मैं दो छोटे बच्चों को सादोवाया पे कैसे जाने दे सकता हूँ? आँ? वो भी साइकिल पे? तुम लोग कह क्या रहे हो? क्या तुम्हें मालूम है कि सादोवाया पे कैसी ट्रैफ़िक होती है? आ? आधे सेकण्ड में ही तुम्हारे चीथड़े हो जाएँगे...हाथ कहाँ, पैर कहाँ, सिर अलग-थलग!...वहाँ होती हैं लॉरियाँ- पाँच टन वाली! येS बड़ी-बड़ी क्रेन्स चलती हैं!... तुम्हारा क्या, तुम तो दब जाओगे, मगर मुझे तुम्हारे लिए जवाब देना पड़ेगा! मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा, चाहे मुझे मार ही क्यों न डालो! इससे अच्छा तो दादी को मर ही जाने दो, बेचारी मेरी फ़ेव्रोन्या पलिकार्पोव्ना!...”

और अपनी मोटी आवाज़ में वो फिर से रोने लगा. कीमती कुत्ता बैसेट तो बिना रुके रोता ही जा रहा था. मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ – कि ये इतना अच्छा लड़का है और अपनी दादी की जान भी जोखिम में डालने के लिए तैयार है – सिर्फ इसलिए कि कहीं हमारे साथ कुछ न हो जाए. इस सबसे मेरे होंठ विभिन्न दिशाओं में टेढ़े होने लगे, और मैं समझ गया कि बस कुछ ही देर में मैं भी कीमती कुत्ते जैसा ही बिसूरने लगूँगा. वान्का की आँखें भी नम हो गईं थीं, और वो भी नाक से सुड़सुड़ कर रहा था:
 “हमें क्या करना चाहिए?”
 “बिल्कुल आसान बात है,” इस लड़के ने कामकाजी भाव से कहा. “सिर्फ एक ही रास्ता है. तुम्हारी साइकिल दो, मैं उस पर जाऊँगा. फ़ौरन लौट आऊँगा. माँ कसम!...” और उसने अपने गले पे हाथ रखा.
ये, शायद, उसने सबसे भयानक क़सम खाई थी. उसने गाड़ी की तरफ़ हाथ बढ़ाया. मगर वान्का ने उसे कस के पकड़ रखा था. इस लड़के ने उसे खींचा, फिर छोड़ दिया और फिर से हिचकियाँ लेने लगा:
 “ओय-ओय-ओय! मेरी दादी मर रही है, तम्बाकू की वजह से नहीं, दस-बीस रूबल्स की वजह से नहीं...ओय-ऊयूयू....”
और, वो अपने सिर के बाल नोचने लगा. बालों को कस के पकड़ लिया और दोनों हाथों से उखाड़ने लगा. ऐसा ख़ौफ़नाक नज़ारा मैं बर्दाश्त नहीं कर सका. मैं रो पड़ा और वान्का से बोला:
 “उसे साइकिल दे दे, उसकी दादी मर रही है! अगर तेरे साथ ऐसा होता तो?”
मगर वान्का साइकिल पकड़े खड़ा है और हिचकियाँ लेते हुए कहता है:
 “बेहतर है, कि मैं ख़ुद ही जाऊँ...”
अब उस लड़के ने पगलाई आँख़ों से वान्का की ओर देखा और पागल की तरह भर्राने लगा:
 “ मुझ पर भरोसा नहीं है, हाँ? भरोसा नहीं है? एक मिनट के लिए अपनी कबाड़ा गाड़ी देने में अफ़सोस हो रहा है? बुढ़िया चाहे मर ही क्यों न जाए? हाँ? बेचारी बुढ़िया, सफ़ेद स्कार्फ़ पहने, चाहे मीज़ल्स से मर जाए? मरने दो, हाँ? मगर इस लाल-टाई वाले पायनियर को अपने कबाड़े का अफ़सोस हो रहा है? ऐह, तुम भी! इन्सानों के हत्यारे! स्वार्थी!...”
उसने कमीज़ से बटन खींच कर निकाल ली और उसे पैरों से मसलने लगा. हम हिले तक नहीं. मैं और वान्का उसके ताने सुनते रहे. तब इस लड़के ने अचानक बे बात के अपने कीमती कुत्ते बैसेट को उठाया और उसे कभी मेरे, तो कभी वान्का के हाथों में ठूँसने लगा:
 “चल! अपने दोस्त को तुम्हारे पास बंधक रखता हूँ! वफ़ादार दोस्त को दे रहा हूँ! अब तो विश्वास करोगे? विश्वास करते हो या नहीं?! कीमती कुत्ता बंधक रख रहा हूँ, कीमती कुत्ता बैसेट!”
और उसने वान्का के हाथों में उस कुत्ते को घुसेड़ ही दिया, और तभी मेरी समझ में आ गया.
मैंने कहा:
 “वान्का, वो तो कुत्ते को हमारे पास गिरवी रख रहा है. अब वो कोई चाल नहीं चल सकता, ये तो उसका दोस्त है, और ऊपर से कीमती भी है. गाड़ी दे दे, डर मत.”
अब वान्का ने इस लड़के के हाथ में हैण्डिल दे दिया और पूछा:
 “क्या पन्द्रह मिनट काफ़ी हैं?”
 “ओय, बहुत ज़्यादा,” लड़का बोला, “इतने थोड़ी लगेंगे! सब मिलाकर सिर्फ पाँच! मेरा यहीं पे इंतज़ार करना. जगह से हिलना नहीं!”
और वह फुर्ती से उछल के गाड़ी पे बैठ गया, सफ़ाई से बैठा और सीधे सादोवाया की तरफ़ मुड़ गया. जैसे ही वो नुक्कड़ पे मुड़ा, कीमती कुत्ता बैसेट अचानक वान्का के हाथों से उछला और बिजली की तरह उसके पीछे लपका.
वान्का ने चिल्लाकर मुझसे कहा:
 “पकड़!”   
 मगर मैंने कहा:
 “कहाँ से, उसे पकड़ना मुश्किल है. वो अपने मालिक के पीछे भाग गया, उसके बगैर उसे अच्छा नहीं लगेगा! ऐसा होता है वफ़ादार दोस्त. मुझे भी ऐसा...”
मगर वान्का ने दबी ज़ुबान से सवाल किया:
 “मगर वो तो बंधक है, ना?”
 “कोई बात नहीं,” मैंने कहा, “वो जल्दी ही वापस आ जाएँगे.”
और हमने पाँच मिनट उनका इंतज़ार किया.
 “ये आ क्यों नहीं रहा है.” वान्का ने कहा.
 “शायद लम्बा क्यू लगा हो,” मैंने कहा.
इसके बाद और दो घण्टे बीत गए. वो लड़का आया ही नहीं. और कीमती कुत्ता भी नहीं आया. जब अंधेरा होने लगा, तो वान्का ने मेरा हाथ पकड़ा.
 “सब समझ में आ गया,” उसने कहा. “चल, घर चलें...”
 “क्या समझ में आ गया, वान्का?” मैंने पूछा.
 “बेवकूफ़ हूँ मैं, बेवकूफ़,” वान्का ने कहा. “वो कभी नहीं लौटेगा, ये टाइप, और साइकिल भी नहीं आएगी. और कीमती कुत्ता बैसेट भी!”
इसके बाद वान्का ने एक भी शब्द नहीं कहा. वो, शायद, नहीं चाहता था, कि मैं डरावनी बातों के बारे में सोचूँ. मगर मैं इसी के बारे में सोचता रहा.
आख़िर, सादोवाया पे बेहद ट्रैफ़िक है...


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