बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

Aisa kahin Dekha hai....

“ ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है...”



शॉर्ट इंटरवल में हमारी ऑक्टोबर-लीडर ल्यूस्या भागकर मेरे पास आई और बोली:
 “डेनिस्का, क्या तू कॉन्सर्ट में हिस्सा लेगा? हमने दो छोटे बच्चों को तैयार करने का फ़ैसला किया है, ताकि वे व्यंग्यकार बनें. तैयार है?”
मैंने कहा:
 “मैं सब करना चाहता हूँ! बस, तू इतना समझा दे कि ये व्यंग्यकार मतलब क्या होता है.”
ल्यूस्या ने समझाया:
 “देख, हमारे यहाँ कई सारी ख़ामियाँ हैं...मतलब, मिसाल के तौर पर, ऐसे बच्चे जिन्हें बस ‘दो’ नम्बर मिलते हैं, या कुछ बच्चे आलसी होते हैं - उनकी बुराई करनी है. समझ गया? उनके बारे में कविता पढ़नी है, जिससे सब हँसने लगें, इसका उन पर गहरा असर पड़ता है, वे होश में आ जाते हैं.”
मैंने कहा:
 “वे कोई शराबी थोड़े ही ना हैं, जो उन्हें होश में लाया जाए, वे बस, आलसी हैं”
 “अरे, ऐसा कहते हैं: ‘होश में लाना’ – हँसने लगी ल्यूस्या. “असल में ये बच्चे सोचने लगेंगे, उन्हें अटपटा लगने लगेगा, और वे सुधर जाएँगे. अब समझ में आया? तो, अब, ज़्यादा नख़रे न दिखा : अगर चाहता है – तो हाँ कर दे ; नहीं चाहता – मना कर दे!”
मैंने कहा:
  “ठीक है, चलेगा!”
तब ल्यूस्या ने पूछा:
 “क्या तेरा कोई पार्टनर है?”
 “नहीं.”
ल्यूस्या को बड़ा अचरज हुआ:
 “तू बिना दोस्त के कैसे रहता है?”
 “दोस्त तो मेरा है, मीश्का. मगर पार्टनर नहीं है.”
ल्यूस्या फिर से मुस्कुराई:
 “ये तो एक ही बात है. और क्या वो म्युज़िकल है, तेरा ये मीश्का?”
 “नहीं, साधारण है.”
 “गाना गा सकता है?”
 “बहुत धीमे-धीमे. मगर मैं उसे ज़ोर से गाना सिखाऊँगा, तू परेशान न हो.”
अब ल्यूस्या खुश हो गई.
 “क्लास ख़त्म होने के बाद उसे छोटे हॉल में ले आ, वहाँ प्रैक्टिस होगी!”
और मैं पूरी रफ़्तार से मीश्का को ढूँढ़ने के लिए भागा. वो कैंटीन में खड़ा था और सॉसेज खा रहा था.
 “मीश्का, व्यंग्यकार बनना चाहता है?”
मगर उसने कहा:
 “रुक जा, खाने दे.”
मैं खड़ा होकर देखने लगा कि वो कैसे खाता है. ख़ुद तो इतना छोटा है, और सॉसेज उसकी गर्दन से भी मोटा है. उसने इस सॉसेज को हाथों में पकड़ रखा था और पूरा, बिना काटे, उसे खा रहा था, और जब वह उसे कुतरता तो उसकी पपड़ी चटख़ रही थी और टूट रही थी, और वहाँ से गर्म, ख़ुशबूदार रस उड़ता.
अब तो मुझसे भी रहा न गया और मैंने कात्या आण्टी से कहा:
 “मुझे भी सॉसेज दीजिए, प्लीज़, जल्दी से!”
और कात्या आण्टी ने फ़ौरन मेरी ओर बाउल बढ़ा दिया. मैं बहुत जल्दी-जल्दी खा रहा था, जिससे कि मीश्का मुझसे पहले अपना सॉसेज ख़त्म न कर ले : मुझे अकेले तो वह इतना मज़ेदार नहीं लगता. तो, मैंने भी अपना सॉसेज हाथों में पकड़ा और मैं भी बिना साफ़ किए उसे कुतरने लगा, और उसमें से भी  गर्म-गर्म, ख़ुशबूदार रस निकल रहा था. हम दोनों इस तरह से अपना-अपना भाप निकलता हुआ सॉसेज खा रहे थे, हाथ जला रहे थे, एक दूसरे की ओर देखे जा रहे थे और मुस्कुरा रहे थे.
फिर मैंने उसे बताया कि हम व्यंग्यकार बनेंगे, और वो राज़ी हो गया ; हम बड़ी मुश्किल से क्लासेस ख़त्म होने तक बैठे, फिर छोटे हॉल में प्रैक्टिस के लिए भागे.
वहाँ हमारी लीडर ल्यूस्या पहले से ही बैठी हुई थी, और उसके साथ एक लड़का था, शायद चौथी क्लास का होगा, बेहद बदसूरत, छोटे-छोटे कान और बड़ी-बड़ी आँखों वाला.
ल्यूस्या ने कहा:
 “ये रहे वो दोनों! इससे मिलो, ये है हमारे स्कूल का कवि अन्द्रेइ शेस्ताकोव.”
हमने कहा:
 “ बहुत अच्छे!”
और हम दूसरी ओर देखने लगे जिससे कि वह शान न बघारे.
मगर उस कवि ने ल्यूस्या से कहा:
 “ये क्या गाने वाले बच्चे हैं?”
 “हाँ.”
 उसने कहा:
 “क्या इनसे अच्छे और कोई नहीं मिले?”
ल्यूस्या ने कहा:
” ये बिल्कुल वैसे ही हैं जैसी हमें ज़रूरत है!”
अब वहाँ आए हमारे म्यूज़िक-टीचर बोरिस सेर्गेयेविच. वह सीधे पियानो की ओर गए:
”तो, चलो, शुरू करते हैं! कविता कहाँ है?”
अन्द्रूश्का ने जेब से कोई कागज़ निकाला और कहा:
”ये रही. मैंने मुखड़ा और मात्राएँ ली हैं मार्शाक की कविता ‘किस्सा गधे का, दादा का और पोते का : ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है...’ से.”
बोरिस सेर्गेयेविच ने सिर हिलाया:
 “पढ़ के सुना!”
अन्द्र्यूश्का पढ़ने लगा:

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के,
पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.
ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है,
पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!
मैं और मीश्का अपने आप को रोक न सके और खिलखिलाने लगे. बेशक, बच्चे अक्सर अपने मम्मी-पापा से सवाल हल करने को कहते हैं, और फिर उसे इस तरह टीचर को दिखाते हैं, जैसे वे ख़ुद ही इतने होशियार हैं. मगर यदि उन्हें ब्लैक-बोर्ड पर यही करने के लिए बुलाया जाता है, तो टाँय-टाँय फिस्! – ‘दो’ नम्बर मिलते हैं! ये बात सबको मालूम है. शाबाश अन्द्र्यूश्का, अच्छा पकड़ लिया!
अन्द्र्यूश्का आगे पढ़ता है:

चॉक से बने हैं फर्श पे चौख़ाने
मानेच्का और तानेच्का कूदती हैं वहाँ.
ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है,
‘क्लासों’ में खेलें और क्लास में न जाएँ?!  
फिर से बढ़िया! हमें बहुत अच्छा लगा! ये अन्द्र्यूशा तो वाक़ई में असली जीनियस है, पूश्किन की तरह!
बोरिस सेर्गेयेविच ने कहा:
 “ठीक है, बुरा नहीं है! और म्यूज़िक होगा एकदम सिम्पल, कुछ इस तरह का,” और उन्होंने अन्द्र्यूशा की कविता ली, और हौले-हौले पियानो बजाते हुए, उसे गाकर सुना दिया.
बहुत ही आसान था, हम तालियाँ भी बजाने लगे.
अब बोरिस सेर्गेयेविच ने कहा:
 “गा कौन रहा है?”
और ल्यूस्या ने मेरी और मीशा की ओर इशारा किया.
 “ये रहे! “
 “हुम् ,” बोरिस सेर्गेयेविच ने कहा, “मीश्का अच्छा गाता है...मगर देनिस्का कोई ज़्यादा अच्छा नहीं गाता.”
मैंने कहा, “मगर ज़ोर से गाता हूँ.”
और हमने म्यूज़िक के साथ कविता गानी शुरू कर दी और उसे दुहराते रहे, शायद पचास या फिर हज़ार बार दुहराई होगी, और मैं खूब ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था, सब मुझे शांत कर रहे थे और कुछ-कुछ कह रहे थे:
 “तू घबरा मत! तू थोड़ा धीमी आवाज़ में गा! शांति से! इतनी ज़ोर से गाने की ज़रूरत नहीं है!”
अन्द्र्यूश्का बहुत ज़्यादा परेशान हो रहा था. वो मुझे बहुत परेशान कर रहा था. मगर मैं सिर्फ ज़ोर से ही गाए जा रहा था, मैं धीमी आवाज़ में गाना नहीं चाहता था, क्योंकि असली गाना तो तब होता है जब ज़ोर से गाया जाता है!
...और एक दिन, जब मैं स्कूल पहुँचा, मैंने क्लोक-रूम में नोटिस देखा:
अटेन्शन!
आज बड़े इन्टरवल में
छोटे हॉल में होगा
छोटा सा प्रोग्राम
”पायनियर-व्यंग्यकार’ का!
पेश करेगी - बच्चों की जोड़ी!
सामयिक-समस्या पर!
सब लोग आईये!

मेरे दिल की धड़कन रुक गई. मैं क्लास में भागा. वहाँ मीश्का बैठा था और खिड़की से बाहर देख रहा था.
मैंने कहा:
 “तो, आज हमें गाना है!”
मगर मीश्का अचानक बड़बड़ाया:
 “मेरा दिल नहीं चाह रहा है गाने को...”
मैं तो जैसे गूँगा हो गया. क्या – दिल नहीं चाहता? ये क्या बात हुई? हमने तो प्रैक्टिस की थी? ल्यूस्या और बोरिस सेर्गेयेविच क्या कहेंगे? अन्द्र्यूश्का? और सारे बच्चे, उन्होंने तो नोटिस पढ़ लिया है और वे सब एक साथ भाग कर पहुँच जाएँगे? मैंने कहा:
 “तू, क्या पागल हो गया है? लोगों को बेवकूफ़ बनाएँगे?”
 मगर मीश्का ने बड़ी दयनीयता से कहा:
 “शायद, मेरे पेट में दर्द हो रहा है.”
मैंने कहा:
 “ये डर के मारे है. मेरा पेट भी दुख रहा है, मगर मैं तो इनकार नहीं कर रहा हूँ!”
मगर मीश्का खोया-खोया ही रहा. बड़े इन्टरवल में सारे बच्चे छोटे हॉल की ओर लपके, मगर मैं और मीश्का बड़ी मुश्किल से घिसटते हुए चल रहे थे, क्योंकि मेरी भी गाने की इच्छा ख़तम हो गई थी. मगर तभी ल्यूस्या भागकर हमारे पास आई, उसने कस कर हमारे हाथ पकड़ लिए और खींचते हुए हमें अपने साथ ले चली, मगर मेरे पैर इतने नर्म हो गए थे जैसे किसी गुड़िया के होते हैं, और वे लड़खड़ाने लगे. मुझ पर ये, शायद, मीश्का का असर हो गया था.
हॉल में पियानो के लिए एक जगह बनाई गई थी, और चारों तरफ़ सभी कक्षाओं के बच्चों की, आयाओं की, और टीचर्स की भीड़ जमा थी.
मैं और मीश्का पियानो के पास खड़े हो गए.
बोरिस सेर्गेयेविच पहले ही अपनी जगह पर बैठ चुके थे, और ल्यूस्या ने अनाउन्सर जैसी आवाज़ में घोषणा की:
  “सामयिक विषयों पर “पायनियर-व्यंग्यकार” का प्रोग्राम शुरू करते हैं. स्क्रिप्ट लिखी है अन्द्रेइ शेस्ताकोव ने, और इसे पेश कर रहे हैं जाने-माने व्यंग्यकार मीशा और डेनिस! आइए!”
मैं और मीश्का थोड़ा आगे निकल कर खड़े हो गए. मीशा दीवार की तरह सफ़ेद हो गया था. मगर मैं, ठीक ही था, बस, मेरे गले में ख़राश हो रही थी और वह सूख गया था.
बोरिस सेर्गेयेविच ने बजाना शुरू किया. शुरूआत मीश्का को करनी थी, क्योंकि पहली दो पंक्तियाँ वो ही गाता था, और बाद की दो पंक्तियाँ मुझे गानी होती थीं. तो, बोरिस सेर्गेयेविच  बजा रहे हैं, और मीश्का ने बायाँ हाथ एक ओर को निकाला, जैसा कि उसे ल्यूस्या ने सिखाया था, और अब उसे गाना था, मगर देर हो गई, और जब वो बस गाने ही वाला था, तो इतने में मेरी बारी आ गई, पियानो पर चल रहे म्यूज़िक के अनुसार ऐसा हुआ था. मगर मैंने नहीं गाया, क्योंकि मीशा ने देर कर दी थी. कैसे गाता!
तब मीश्का ने अपना हाथ वापस नीचे कर लिया. और बोरिस सेर्गेयेविच ने फिर से ज़ोर-ज़ोर से और साफ़-साफ़ बजाना शुरू किया.
उन्होंने पियानो की कुंजियों पर तीन बार मारा, जैसा कि उन्हें करना था, और चौथी बार में मीश्का ने फिर से बायाँ हाथ बाहर निकाला और आख़िरकार गाने लगा:
   
वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के,
पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.

मैंने फ़ौरन पकड़ लिया और चिल्लाने लगा:
ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है,
पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!

हॉल में मौजूद सब लोग हँसने लगे, और मुझे इससे कुछ राहत मिली. और बोरिस सेर्गेयेविच आगे बजाने लगे. उन्होंने फिर से तीन बार कुंजियों पर ज़ोर-ज़ोर से मारा, और चौथी बार में मीशा ने सफ़ाई से बायाँ हाथ एक ओर को निकाला और न जाने क्यों फिर से शुरू से गाने लगा:
वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के,
पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.

मैं फ़ौरन समझ गया कि उससे गलती हो गई है! मगर जब बात ये थी तो मैंने भी तय कर लिया कि मैं इसी को आख़ीर तक गाऊँगा, फिर बाद की बाद में देखी जाएगी. मैं लपका और गाने लगा: 

ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है,
पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!

ख़ुदा का शुक्र है कि हॉल में ख़ामोशी थी – ज़ाहिर था, कि सब मीशा की गलती को समझ गए हैं, और सोच रहे थे कि “कोई बात नहीं, होता है; चलो, अब आगे गाने दो.”
और इस बीच म्यूज़िक तो आगे-आगे भागा जा रहा था. मगर मीश्का के चेहरे का रंग कुछ हरा-सा हो गया.
और जब म्यूज़िक उस जगह पर पहुँचा, उसने अपना बायाँ हाथ झटका, और घिस गई रेकॉर्ड की तरह तीसरी बार गाने लगा:
वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के,
पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.

मेरा दिल तो कर रहा था कि उसके सिर पर कोई ज़ोरदार चीज़ दे मारूँ, और मैं भयानक तैश से गरजा:

ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है,
पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!

“मीश्का, देख, तूने तो पूरी गड़बड़ कर दी है! तू ये तीसरी बार भी वही-वही क्या गाए जा रहा है? चल, आगे, लड़कियों के बारे में गा!
मगर मीश्का ने धृष्ठता से कहा:
 “तुझे कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है!” और उसने बड़े अदब से बोरिस सेर्गेयेविच से कहा: “प्लीज़, बोरिस सेर्गेयेविच, आगे बजाइए!”
बोरिस सेर्गेयेविच ने बजाना शुरू किया, और मीश्का में अचानक हिम्मत आ गई, उसने फिर से अपना बायाँ हाथ बाहर निकाला और चौथी बार पर ऐसे गाने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो:

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के,
पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले....

अब तो पूरे हॉल में ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगने लगे, और मैंने भीड़ में देखा कि अन्द्र्यूश्का का चेहरा कितना दुखी हो रहा था, और ये भी देखा कि ल्यूस्या, पूरी तरह लाल और बिफ़री हुई, भीड़ में से हमारी ओर आ रही है. और मीश्का का मुँह खुला ही रह गया है, जैसे वह खुद पर ही अचरज कर रहा है. इस बीच मैंने, समझदारी से काम लेते हुए चिल्लाकर पूरा किया:

ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है,
पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!

अब तो जैसे कोई भयानक बात हो गई. सब इस तरह ठहाके लगा रहे थे, जैसे उन पर दौरा पड़ा हो, और मीश्का का रंग हरे से बैंगनी हो गया. हमारी ल्यूस्या ने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया. वह चिल्लाई:
 “डेनिस्का, तू अकेले ही गा! हमें नीचा ना दिखा!...म्यूज़िक! और!...”
और मैं खड़ा हूँ पियानो के पास और मैंने फ़ैसला कर लिया है कि मैं उसे नीचा नहीं दिखाऊँगा. मुझे महसूस हुआ कि मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है, और, जब म्यूज़िक उस जगह तक आया, तो न जाने क्यों मैंने भी अचानक अपना बायाँ हाथ बाहर को निकाला और एकदम बेसोचेसमझे चिंघाड़ने लगा:

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के,
पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले....
मुझे तो अच्छी तरह याद भी नहीं है कि आगे क्या हुआ, कुछ-कुछ ज़लज़ले की तरह हो रहा था. और मैं सोच रहा था कि अभ्भी मैं ज़मीन में समा जाऊँगा, और चारों ओर सब लोग हँसी के मारे एक दूसरे पर गिरे जा रहे थे – आयाएँ, और टीचर्स, और सब, सब, सब...
मुझे तो अचरज भी होता है कि मैं इस नासपीटे गाने की वजह से मर कैसे नहीं गया.
शायद मर ही जाता, अगर उसी समय घंटी न बजी होती...
अब मैं कभी भी व्यंग्यकार नहीं बनूँगा!

....

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

Adventure

एड़वेन्चर
लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास


पिछले शनिवार और इतवार को मैं दीम्का के घर गया था. मेरे अंकल मीशा और आण्टी गाल्या का बेटा दीम्का, इतना प्यारा है. वो लोग लेनिनग्राद (पेरेस्त्रोयका के बाद – पीटरबुर्ग – अनु.) में रहते हैं. जब मेरे पास समय होगा तो मैं ये भी बताऊँगा कि मैं और दीम्का इस ख़ूबसूरत शहर में कितना घूमे और हमने वहाँ क्या क्या देखा. ये बेहद दिलचस्प और मज़ेदार किस्सा है.

मगर अभी तो मैं आपको सीधा सादा किस्सा सुनाने जा रहा हूँ, कि कैसे मुझे मम्मा के पास मॉस्को फ्लाइट से आना पड़ा. ये भी मज़ेदार है, क्योंकि ये एक एड़वेन्चर था.

वैसे तो मैं हवाई जहाज़ से सफ़र कर चुका हूँ, मगर अकेले, बिना किसी की सहायता के, एक भी बार नहीं गया! अंकल मीशा मुझे हवाई जहाज़ में बिठा देने वाले थे. मैं सही-सलामत मॉस्को पहुंच जाऊँगा, और हवाई अड्डे पर मम्मा और पापा मुझे लेने आने वाले थे. हमने इतनी सीधी सादी और बढ़िया प्लानिंग की थी.

मगर शाम को, जब मैं अंकल मीशा के साथ लेनिनग्राद एअरपोर्ट पहुँचा, तो पता चला कि कहीं कुछ फ्लाइट्स में देरी हो गई थी, और इसके कारण मॉस्को की फ्लाइट्स न पकड़ सकने वाले काफ़ी सारे लोग एअरपोर्ट पर इकट्ठे हो गए थे, और एक ऊँचा, तगड़ा अंकल हमें समझा रहा था कि परिस्थिति ऐसी है: मॉस्को जाने वाले लोग काफ़ी हैं, और हवाई जहाज़ है सिर्फ एक, और इसलिए, जो इस हवाई जहाज़ में घुस जाएगा, वही मॉस्को जा पाएगा. मैंने क़सम खाई कि इसी जहाज़ में घुसूंगा: क्योंकि मॉस्को में मेरे पापा जो आने वाले हैं एअरपोर्ट पे.

ये “ख़ुशख़बर” सुनकर अंकल मीशा ने मुझसे कहा:
 “जैसे ही हवाई जहाज़ में बैठेगा, मेरी ओर देखकर हाथ हिला देना, तब मैं फ़ौरन टेलिफ़ोन की ओर भागूँगा, तुम्हारे पापा को फोन कर दूँगा, कि तुम यहाँ से उड़ चुके हो, वो जागेंगे, कपड़े पहनेंगे और एअरपोर्ट पर तुझे लेने आ जाएँगे. समझ गया?”
मैंने कहा:
 “सब समझ गया!”

और मैं अंकल मीशा के बारे में सोचने लगा : ‘कितने भले और सज्जन हैं अंकल मीशा. कोई और होता तो बस मुझे पहुँचा देता, और बस! मगर ये मेरे मम्मा पापा को फ़ोन भी करने वाले हैं. और मैं रिले-रेस के बेटन की तरह रहूँगा. अंकल फ़ोन करेंगे और पापा मुझे लेने आ जाएँगे, और मैं उनके बिना हवाई जहाज़ में सिर्फ एक घण्टा रहूँगा, और वहाँ भी, मतलब, हवाई जहाज़ में, सब अपने ही हैं. डरने की कोई बात नहीं है!’

मैंने ज़ोर से कहा:
 “आप गुस्सा न करना कि मेरे कारण बस परेशानी ही होती है, मैं जल्दी ही हवाई जहाज़ में अकेले, अपने आप सफ़र करना सीख लूँगा, और आपको इतनी तकलीफ़ नहीं दूँग़ा...”
  “ये आप क्या कह रहे हैं, डियर सर! मैं बहुत ख़ुश हूँ! दीम्का भी तुझसे मिलकर बेहद ख़ुश था! और गाल्या आण्टी! चल, ये पकड़!” उन्होंने मेरी ओर टिकट बढ़ाया और चुप हो गए. मैं भी चुप हो गया.

और, तभी अचानक हवाई जहाज़ में ‘बोर्डिंग’ शुरू हो गई. ये तो भगदड़ ही हो रही थी. सब लोग हवाई जहाज़ की ओर लपके, और सबसे आगे भाग रहा था मैं, मेरे पीछे थे बाकी लोग.

मैं सीढ़ी तक पहुँचा, वहाँ ऊपर दो लड़कियाँ खड़ी थीं. बेहद ख़ूबसूरत. मैं भागते हुए उन तक पहुँचा और अपना टिकट बढ़ा दिया. उन्होंने मुझसे पूछा:
 “क्या तू अकेला है?”

मैंने उन्हें सारी बात बताई और प्लेन के अन्दर गया. मैं खिड़की पास बैठ गया और बिदा करने वालों की भीड़ को देखने लगा. अंकल मीशा पास ही में थे, मैं उनकी तरफ़ देखकर हाथ हिलाने लगा, और मुस्कुराने लगा. उन्होंने इस मुस्कुराहट को पकड़ लिया, मुझे सैल्यूट किया और फ़ौरन पलटकर टेलिफ़ोन की तरफ़ बढ़े, जिससे मेरे पापा को फ़ोन कर सकें. मैंने साँस छोड़ी और इधर उधर देखने लगा. लोग बहुत ज़्यादा थे, और सभी जल्दी-जल्दी बैठने की और उड़ने की कोशिश कर रहे थे. रात हो चली थी. आख़िर में सब बैठ गए, सबने अपना-अपना सामान रख दिया, और मैंने सुना कि इंजिन शुरू हो गया है. वह बड़ी देर तक गूँ-गूँ करता रहा और चिंघाड़ता रहा. मैं उकता गया.       

मैं सीट पर पीछे की ओर टिककर बैठ गया और हौले से आँखें बन्द कर लीं, जिससे कुछ देर ऊँघ लूँ. फिर मैंने सुना, कि हवाई जहाज़ चल पड़ा, और मैंने पूरा मुँह खोल लिया, जिससे दाँतों में दर्द न हो. फिर मेरे पास एअर-होस्टेस आई, मैंने आँखें खोलीं – उसके पास ट्रे में सौ या हज़ार छोटी छोटी खट्टी, और पेपरमिंट की गोलियाँ थीं. मेरी पड़ोसन ने पहले एक गोली उठाई, फिर दूसरी, मगर मैंने एकदम पाँच उठा लीं और तीन, चार, पाँच और ले लीं. गोलियाँ स्वादिष्ट हैं, क्लास के लड़कों को दूँगा. वे ख़ुशी ख़ुशी ले लेंगे, क्योंकि ये गोलियाँ हवाई हैं, हवाई जहाज़ से आई हैं. अगर न चाहो, तो भी ले लेते हो. एअर-होस्टेस खड़े खड़े मुस्कुरा रही थी: जैसे कह रही हो, चाहे जितनी ले लो, हमें कोई अफ़सोस नहीं है! मैं गोली चूसने लगा और अचानक मुझे महसूस हुआ कि हवाई जहाज़ लैण्डिंग कर रहा है. मैं खिड़की से चिपक गया.

मेरी पड़ोसन ने कहा:
 “देख, कितनी जल्दी आ गए!”
अब मैंने देखा कि हमारे सामने कई सारी बत्तियाँ प्रकट हो गई हैं. मैंने पड़ोसन से कहा:
 “ आप देखिए – मॉस्को!”
वो देखने लगी और अचानक मोटी आवाज़ में गाने लगी:
 “मॉस्को मेरा, ख़ूबसूरत...”

मगर तभी परदे के पीछे से एअरहोस्टेस बाहर आई, वही वाली, जो सबको गोलियाँ दे रही थी. मैं ख़ुश हो गया, कि अब वह और गोलियाँ देगी. मगर उसने कहा:
 “कॉम्रेड, पैसेंजर्स, मौसम ख़राब होने की वजह से मॉस्को का हवाई अड्डा बन्द कर दिया गया है. हम वापस लेनिनग्राद आ गए हैं. अगली फ्लाईट सुबह सात बजे जाएगी. रात भर के लिए किसी तरह बन्दोबस्त कर लीजिए.”
मेरी पड़ोसन ने फ़ौरन गाना बन्द कर दिया. चारों तरफ़ लोग ग़ुस्से से शोर मचाने लगे.

लोग सीढ़ी से उतरे और चुपचाप अपने अपने घरों को चल दिए, जिससे सुबह वापस आ जाएँ. मुझे तो याद ही नहीं था कि मीशा अंकल कहाँ रहते हैं. मुझे ये भी मालूम नहीं था कि उनके घर तक कैसे जाना चाहिए. मुझे उन लोगों के साथ रहना पड़ा, जिनके पास रात को रुकने के लिए जगह नहीं थी. ऐसे लोग भी काफ़ी सारे थे, और हम सब रेस्टॉरेंट की ओर चले खाना खाने के लिए. मैं भी उनके पीछे पीछे चला. सब मेज़ों पर बैठ गए. मैं भी बैठ गया.

मैंने एक जगह पकड़ ली. वहाँ पास ही में टेलिफ़ोन-बूथ था, इंटरसिटी. मैंने मॉस्को का नंबर घुमाया. क्या ख़याल है, फ़ोन किसने उठाया होगा? मेरी अपनी मम्मा ने. उसने कहा:
 “हैलो!”
 मैंने कहा:
 “हैलो!”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. आपको कौन चाहिए?”
मैंने कहा:
 “अनास्तासिया वासिल्येव्ना.”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है! क्या मारिया पेत्रोव्ना?”
मैंने कहा:
 “तुम! तुम! तुम! मम्मा, ये तुम्हीं हो ना?”
उसने कहा:
 “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. एक एक अक्षर अलग अलग करके बोलिए.”
मैंने कहा:
 “एम-ए, एम-ए. मम्मा, ये मैं हूँ.”
उसने कहा:
 डेनिस्का, ये तू है?”
मैंने कहा:
 “मेरी फ्लाइट कल सुबह सात बजे की है. हमारा मॉस्को का एअरपोर्ट बन्द है, वैसे सब ठीक ठाक है. पी-ए पी-ए क-ओ म-उ-झ-से मि-ल-ने को कहो!”
उसने कहा:
 “अच्-छा!”
मैंने कहा:
 “तो, अप-ना ख़-या-ल र-ख-ना!”
उसने कहा:
 “इं-त-ज़ा-र करूँगी! पापा तुझे लेने के लिए ठीक सात बजे निकलेंगे!”

मैंने रिसीवर रख दिया, और मेरे दिल में एकदम हल्कापन महसूस हुआ. तब मैं खाना खाने गया. मैंने कटलेट्स और पास्टा का ऑर्डर दिया, एक गिलास चाय भी मंगवाई. खाते खाते, यहाँ की चौड़ी-चौड़ी, आरामदेह कुर्सियाँ देखकर मैंने सोचा: “ओ-ओ, इन कुर्सियों पर आराम से सोया जा सकता है”.
मगर जब तक मैं खाता रहा, बड़े अचरज की बात हुई:  आधे ही मिनट के बाद मैंने देखा कि सब की सब कुर्सियाँ भर गई हैं. और मैंने सोचा: “कोई बात नहीं, मैं कोई सामन्त-वामन्त तो नहीं हूँ, फ़र्श पर भी सो जाऊँगा! कित्ती सारी जगह है!”

फिर एक आश्चर्य! आधे ही सेकण्ड में क्या देखता हूँ – पूरा फ़र्श लोगों से भर गया है: पैसेंजर्स,  शॉपिंग बैग्स, सूटकेसेस, थैलियाँ, बच्चे भी; पैर रखने की भी जगह नहीं थी. मुझे ग़ुस्सा भी आ गया!
फिर मैं बैठे हुए, लेटे हुए, अधलेटे लोगों के बीच से जाने लगा. बस, यूँ ही टर्मिनल पे घूमने निकल पड़ा.

इस सोये हुए शहर में घूमना आसान नहीं था. मैंने घड़ी पर नज़र डाली. साढ़े ग्यारह बज गए थे.
फिर अचानक मैं एक दरवाज़े तक पहुँचा, जिस पर लिखा था: “इंटर-सिटी टेलिफ़ोन”. मैं ख़ुश हो गया! यहाँ आराम से सोया जा सकता है. मैंने हौले से गद्देदार दरवाज़ा खोला.

स्टॉप! अचानक उछल पड़ा: वहाँ पहले से ही दो लोग थे. दो अंकल. फ़ौजी अफ़सर. वे मेरी तरफ़ देख रहे थे, और मैं उनकी तरफ़.   
फिर मैंने कहा:
”आप लोग कौन हैं?”
तब उनमें से एक, मूँछों वाले ने कहा:
 “हम लावारिस हैं!”
मुझे उन पर दया आई, और मैंने बेवकूफ़ी से पूछा:
 “और आपके माँ-बाप कहाँ हैं?”
मूँछों वाले ने रोनी सूरत बनाई और जैसे रोते रोते बोला:
“प्लीज़, मेहेरबानी करो, मेरे पापा को ढूँढ़ दो!”

और दूसरा, जो उससे जवान था, शेर की तरह ठहाके लगाने लगा. तब मुझे समझ में आया कि मूँछों वाला मज़ाक कर रहा है, क्योंकि अब वह भी हँसने लगा था, और उनके साथ मैं भी हँसने लगा. अब हम तीनों ही हँस रहे थे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मेरे लिए जगह बना दी. मुझे गर्माहट महसूस होने लगी, मगर वहाँ तंग भी था और तकलीफ़देह भी, क्योंकि हर समय टेलिफ़ॉन बज रहा था और तेज़ रोशनी का बल्ब जल रहा था.

तब हमने एक अख़बार पे मोटे मोटे अक्षरों से लिखा: “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, और जवान फ़ौजी ने बल्ब निकाल दिया. आवाज़ें बन्द हो गईं, रोशनी भी नहीं है. एक मिनट बाद बड़े दोस्त इस तरह खर्राटे लेने लगे, कि बस – ग़ज़ब! ऐसा लग रहा था जैसे वे बड़े बड़े लट्ठों को बड़ी बड़ी आरियों से काट रहे हैं. सोना तो असंभव था.

मैं लेटे लेटे अपने कारनामे के बारे में सोच रहा था. मज़ाकिया लग रहा था, और मैं पूरे समय अंधेरे में मुस्कुराता रहा.

अचानक एक ज़ोरदार, खनखनाती आवाज़ गूँजी:
 “लेनिनग्राद-मॉस्को फ़्लाइट से जाने वाले मुसाफ़िर ध्यान दें! हवाई जहाज़ “TU- 104” क्रमांक  52-48, पन्द्रह मिनट बाद, चार बजकर पचपन मिनट पर अतिरिक्त उड़ान भरने वाला है. बोर्डिंग के लिए पैसेंजर्स कृपया अपने टिकट दिखाकर दो नंबर के गेट से प्रस्थान करें!”

मैं फ़ौरन उछला, जैसे मुझे शॉक लगा हो, और अपने पड़ोसियों को जगाने लगा. मैंने धीमी आवाज़ में, मगर साफ़ साफ़ उनसे कहा:
 “ख़तरा! ख़तरा! उठो, ये ऑर्डर है!”

वे फ़ौरन उछल पड़े, और मुच्छड़ ने टटोल कर बल्ब वापस लगा दिया.

मैंने उन्हें समझाया कि बात क्या है. मुच्छड़ ने फ़ौरन कहा:
 “शाबाश, बच्चे!”
अब मैं तेरे साथ किसी भी मिशन पर जाऊँगा.
मतलब, अपने लावारिसों को तूने छोड़ा नहीं?”
मैंने कहा:
 “क्या कह रहे हैं, ऐसा कैसे हो सकता है!”
हम गेट नम्बर 2 की ओर भागे और हवाई जहाज़ में चढ़ गए.
यहाँ ख़ूबसूरत एयरहोस्टेस नहीं थीं, मगर हमें कोई फ़रक नहीं पड़ता था. और जब हम हवा में ऊपर उठे, तो छोटा वाला फ़ौजी अचानक ठहाका मार कर हँस पड़ा.
 “तू क्या कर रहा है?” मूँछों वाले ने उससे पूछा.
 “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, उसने जवाब दिया. “ हा-हा-हा!” “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”!...”
 “हम वो कागज़ निकालना भूल गए,” मूँछों वाले ने जवाब दिया.

क़रीब चालीस मिनट बाद हम सही सलामत मॉस्को में उतर गए, और जब बाहर निकले, तो पता चला कि हमें लेने कोई भी नहीं आया है.

मैंने अपने पापा को ढूँढ़ा. वो नहीं आए थे...कहीं भी नहीं दिखे.

मैं समझ नहीं पा रहा था कि घर कैसे पहुंचूं. मैं निराश हो गया. रोने रोने को हो गया. और मैं, शायद रो ही पड़ता, मगर अचानक मेरे पास रात वाले दोस्त आए, मूँछों वाला और छोटा वाला.
मूँछों वाले ने कहा:
 “क्या, पापा नहीं आए?”
मैंने कहा:
 “नहीं मिले.”
जवान फ़ौजी ने पूछा:
 “तूने उन्हें कितने बजे आने के लिए कहा था?”
मैंने कहा:
 “मैंने उनसे कहा था कि जो फ़्लाइट सुबह सात बजे निकलती है, उस पे आ जाना.”
जवान फ़ौजी बोला:
 “समझ गया! यहाँ ग़लतफ़हमी हुई है. क्योंकि हम तो पाँच बजे की फ़्लाइट से निकले थे!”
मूँछों वाला हमारी बातचीत में शामिल हो गया:
 “मिलेंगे, कहीं नहीं जाएँगे! और, क्या तू कभी ‘कज़्लिक’ में गया है?”
मैंने कहा:
 “पहली बार सुन रहा हूँ! ये ‘कज़्लिक’ क्या चीज़ है?”
उसने जवाब दिया:
 “अभी देख.”
और उन्होंने अपने हाथ हिलाए.

एअरपोर्ट के प्रवेशद्वार पे एक छोटी सी कार आई, बेहद गन्दी और धब्बों वाली. फ़ौजी ड्राइवर का चेहरा मुस्कुरा रहा था.
मेरे फ़ौजी दोस्त कार में बैठ गए.

जब वे उसमें बैठ गए, तो मुझे उदासी ने घेर लिया. मैं खड़ा था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ. बहुत दुखी था. मैं, बस, खड़ा था. मूँछों वाले ने खिड़की से सिर निकालकर पूछा:
 “तू कहाँ रहता है?”
मैंने जवाब दे दिया.
उसने ड्राइवर से कहा:
 “अलीयेव! एहसान का बदला चुकाना चाहिए?”
वह कार से बोला:
 “करेक्ट!”
मूँछों वाला मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया:
“आ जा, डेनिस्का, ड्राइवर की बगल में बैठ जा. तुझे पता चलेगा कि फ़ौजी कैसे मदद करते हैं.”
ड्राइवर दोस्ताना अंदाज़ में मुस्कुराया. मुझे लगा, कि वो अंकल मीशा जैसा है.
 “बैठ जा, बैठ जा. हवा की स्पीड से ले चलूँगा!” उसने भर्राई आवाज़ में कहा.
मैं फ़ौरन उसकी बगल में बैठ गया. मुझे ख़ुशी हो रही थी. ऐसे होते हैं फ़ौजी! उनके साथ रहो, तो ज़रा भी नहीं भटकोगे.”
मैंने ज़ोर से कहा:
 “करेत्नी र्‍याद स्ट्रीट!”
ड्राइवर ने चाभी घुमाई. हम चल पड़े.
मैं चिल्लाया:
 “हुर्रे!”



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