बुधवार, 8 जून 2022

डेनिस की कहानियाँ

 





डॆनिस की कहानियाँ




लेखक

विक्टर द्रागून्स्की




डेनिस की सभी कहानियों का रूसी से अनुवाद


आ. चारुमति रामदास 

अनुक्रमणिका

प्रस्तावना 

डेनिस की कहानियाँ

लेखक का परिचय

अनुवादिका का परिचय 

1. इवान कज़्लोव्स्की की शोहरत 

2. जूतों वाली बिल्ली 

3. बचपन का दोस्त 

4. दीम्का और अंतोन 

5. प्रोफ़ेसर शेख़ीमार 

6. कुछ भी नहीं बदलेगा

7. मुझे क्या अच्छा लगता है और क्या अच्छा नहीं लगता

8. वो ज़िंदा है और चमक रहा है...

9. मज़ाक का माद्दा होना चाहिये 

10. जादुई अक्षर 

11. एक बूंद घोड़े को मार डालती है

12. पावेल अंकल 

13. ऊपर-नीचे, आड़े-तिरछे!

14. “ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है...”

15. नीला चाकू 

16. दीवार पर मोटरसाइकल रेस 

17. बटरफ्लाई स्टाइल में तीसरा नंबर

18. ना पिफ़्, ना पाफ्

19. चालाक तरीका 

20. …अगर 

21. हाथी और रेडियो 

22. मीश्का को क्या पसन्द है 

23. एक्ज़ेक्ट 25 किलो

24. हम भी!...

25. प्रमुख नदियाँ 

26. जासूस गाद्यूकिन की मौत 

27. ग्रैण्डमास्टर की हैट 

28. ज़ू-कॉर्नर 

29. कुत्ता चोर 

30. कलहँस की गर्दन 

31. सूरमा 

32. वंडरफुक आइडिया 

33. क्सेनिया – मेरी बहना!

34. झूठ खुल ही जाता है

35. मेरा दोस्त भालू 

36. एडवेन्चर 

37. फ़ैंटोमस 

38. ख़ुशबू आसमान की और तमाकू की 

39. बीस साल पलंग के नीचे 

40. गेंद वाली लड़की 

41. एक आश्चर्यजनक दिन 

42. नीले आसमान में लाल गुब्बारा 

43. नदी के किनारे 

44. बूढ़ा नाविक 

45. अंग्रेज़ पाव्ल्या 

46. मुझे सिंगापुर के बारे में बताइये! 

47. हरे तेंदुए 

48. चिकन सूप 

49. तरबूज़ों वाली गली 

50. सर्कस वालों, मैं भी कम नहीं हूँ

51. सादोवाया स्ट्रीट पर बेहद ट्रैफ़िक है 

52. नीले चेहरे वाला आदमी 

53. गाते हैं पहिये – त्रा-त्ता-त्ता 

54. युक्रेन की शांत रात 

55. मज़दूर तोड़ते पत्थर 

56. आऊट हाऊस में आग, या हिम पर कारनामा 

57. जब मैं अंकल मीशा के घर गया 

58. व्हाइट फ़िंचेज़ 

59. दूरबीन 

60. चिकी-ब्रीक   

डेनिस की कहानियाँ : मूल रूसी संग्रह – देनिस्किनी रस्काज़ी – लेखक: विक्तर द्रागून्स्की 

हिंदी अनुवाद @ आ. चारुमति रामदास 

पेपरबैक आवृत्ति(तीन खण्डों में) आनंद फ़ाटक, पायनियर प्रकाशन

आवरण चित्र एवम् रेखाचित्र: लक्ष्मी बेहरे

भीतर के अन्य चित्र:  nukadeti.ru, litmir.me, vini-puh.ru के सौजन्य से. 











प्रस्तावना


एक समय था, जब रूसी किताबों के अनुवाद ढेरों में उपलब्ध रहते थे. रूसी बाल-साहित्य का विश्व की अनेक भाषाओं में अनुवाद किया जाता था. भारत में भी रूसी लेखकों द्वारा बच्चों के लिए लिखी गई कहानियाँ खूब लोकप्रिय थीं. आज भी शायद किसी किसी घर में वे पुरानी कहानियाँ मिल जाएँ.

मगर जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो परिस्थिति एकदम बदल गई. साहित्य का, ख़ासकर बाल-साहित्य का अनुवाद कार्य जैसे थम गया, किताबें लुप्त हो गईं. मगर हमारी पीढ़ी के लोग अचरज करते हैं कि वे किताबें आख़िर हैं कहाँ?

बच्चों के जीवन को इतने रोचक और सकारात्मक ढंग से दिखाने वाली, उन्हें एक अच्छा नागरिक, अच्छा इन्सान बनने की प्रेरणा देने वाली कहानियों की कमी महसूस की जा रही थी.

इसी उद्देश्य को सामने रखकर, बच्चों को एक बढ़िया, शिक्षाप्रद साहित्य देने की दिशा में “डेनिस की कहानियाँ” पहला कदम है, ये कहना अनुचित नहीं होगा.

बच्चों के लिए साहित्य नए लेखकों द्वारा लिखा तो जा रहा है, मगर उसमें वैसी गहराई, वैसी निश्छलता देखने को नहीं मिलती, ऐसा काफ़ी लोगों का मत है.

डेनिस की कहानियों का हिंदी अनुवाद आपके सामने प्रस्तुत करते हुए मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है.

मैं पायोनियर प्रकाशन के श्री आनंद फ़ाटक की अत्यंत आभारी हूँ, जिन्होंने “डेनिस की कहानियाँ” के हिंदी एवम् मराठी अनुवाद को एक साथ प्रकाशित करने का बीड़ा उठाया.

अब “डेनिस की कहानियों” को ई-बुक के रूप में प्रस्तुत करते हुए काफ़ी प्रसन्नता हो है. ज़माने के साथ-साथ आगे बढ़ने की दिशा में यह अत्यंत सराहनीय कदम है. जब आपके क्लास-रूम ही डिजिटल होने जा रहे हैं, तो आप अवश्य ही कहानियाँ भी डिजिटल रूप में ही पढ़ना चाहेंगे, है ना?

इन कहानियों, और बच्चों के लिए ढेरों अन्य रूसी कहानियों का अनुवाद करने की प्रेरणा मुझे तब हुई जब हमारे परिवार में मेरे पोते, श्रेयस का आगमन हुआ. मैंने श्रेयस और उसके सभी नन्हे-मुन्ने, बड़े मित्रों के लिए, अन्य सभी बच्चों के लिए कहानियों का अनुवाद करने का काम आरंभ कर दिया. थैन्क्यू, श्रेयस!

मैं अपने पति डा. रामदास आकेल्ला, पुत्र अभिजित आकेल्ला एवम् पुत्रवधू वंदना आकेल्ला की आभारी हूँ. कई वर्षों से चल रहे इस काम में उन्होंने न केवल दिलचस्पी दिखाई, बल्कि कहानियों को प्रकाशित करके बच्चों तक पहुँचाने की प्रेरणा भी दी.

उम्मीद है कि आपको डेनिस, मीशा, अन्यूता, उसकी कक्षा के और स्कूल के अन्य छात्र पसंद आयेंगे। उसकी छोटी सी दुनिया, उसके मम्मी-पापा, उसकी बहन आपको अपने ही लगेंगे.

आ. चारुमति रामदास

हैदराबाद













डेनिस की कहानियाँ


लगभग साठ साल से लोकप्रिय कहानी-संग्रह “डेनिस की कहानियाँ” – जो बच्चों और बड़ों के बीच भी समान रूप से लोकप्रिय हैं – एक हँसमुख, थोड़े से नासमझ, बेहद साधारण बालक डेनिस कराब्ल्योव, उसके पक्के दोस्त मीशा और अन्यूता के बारे में हैं.

ये बच्चे एक ‘गेटेड कम्युनिटी’ में रहते हैं. मीशा और डेनिस एक ही कक्षा में पढ़ते हैं. मीशा बेहद पढ़ाकू और बुद्धिमान है, जबकि डेनिस सीधासादा और इन्सानी गुणों से भरपूर बालक है. वह ग़लतियाँ भी करता है, उसे गुस्सा भी आता है, वह अपमानित भी महसूस करता है, मगर बेहद ईमानदार है, अपनी ग़लती समझ जाता है, उसे सुधारने की कोशिश भी करता है.

डेनिस को अपने मम्मा-पापा से बहुत प्यार है. कभी कभी वह मम्मा की बात नहीं सुनता, उससे झूठ भी बोलता है, मगर जब उसका झूठ पकड़ा जाता है, तो वह तौबा कर लेता है.

डेनिस एक ऐसा बालक है, जो ज़िंदगी को जीता है, उसे अपनी नज़रों से देखता है, उसे समझने की कोशिश करता है...

छोटी-छोटी ख़ुशियाँ, छोटे-छोटे अपमान... डेनिस हर चीज़ को महसूस करता है, मगर जब पापा समझाते हैं तो बात उसकी समझ में भी आ जाती है.

डेनिस का परिवार एक बहुत प्यारा परिवार है, परिवार के सभी लोग – डेनिस, मम्मा और पापा – एक दूसरे से बेहद प्यार करते हैं; पापा तो डेनिस के पक्के दोस्त हैं. पापा डेनिस की हर सनक को, उसके हर आविष्कार को ध्यान से देखते हैं, उसके ‘मन’ को समझते हैं, उसे सही तरह से समझाने की कोशिश करते हैं, और इस तरह डेनिस एक अच्छा इन्सान बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. क्सेनिया का जन्म तब होता है, जब डेनिस करीब आठ साल का हो चुका है. कैसे डेनिस को अपनी बहन से प्यार हो जाता है, कैसे नन्ही क्सेनिया भाई के सहारे के प्रति आश्वस्त है, यह बात वाकई में देखने और समझने लायक है. सचमुच के डेनिस द्रागून्स्की और क्सेनिया द्रागून्स्काया का प्यार और एक दूसरे के प्रति विश्वास आज भी कायम है. वे दोनों मॉस्को में रहते हैं, डेनिस को अपने मित्रों के बारे में आज भी पूरी जानकारी है. उसे पता है कि मीशा कहाँ है और क्या कर रहा है; अन्यूता कहाँ है...

स्कूल में डेनिस के कारनामे देखकर आप हँसते-हँसते लोटपोट हो जाएँगे. एक शरारती, मगर साथ ही ईमानदार बच्चा डेनिस आपको ज़रूर पसंद आएगा.

भारतीय बच्चों के लिए “डेनिस की कहानियाँ” पुस्तक रूप में प्रस्तुत करते हुए बेहद ख़ुशी हो रही है.


















लेखक का परिचय


विक्टर द्रागून्स्की का जन्म 1 दिसम्बर 1913 को न्यूयॉर्क में हुआ था. सन् 1914 में परिवार रूस लौट आया. सन् 1918 में पिता की मृत्यु हो गई, एक के बाद एक दो सौतेले पिता भी भगवान को प्यारे हो गए. परिवार को अत्यंत कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, और नन्हे विक्टर को जल्दी ही रोज़ी रोटी कमाने के लिए कई तरह के काम करने पड़े.

सन् 1925 में परिवार मॉस्को आ गया और सन् 1930 में काम के साथ-साथ विक्टर द्रागून्स्की साहित्य-थियेटर वर्कशॉप्स में जाने लगे.

वे थियेटर में छोटे-मोटे काम करते रहे, मज़ाकिया नाटक भी लिखते रहे.

सन् 1959 में उन्होंने बच्चों के लिए कहानियाँ लिखना शुरू कर दिया. ये कहानियाँ एक हँसमुख बालक डेनिस कराब्ल्योव  और उसके दोस्त मीशा के बारे में थीं. “डेनिस की कहानियाँ” नाम से ये कहानियाँ अत्यंत लोकप्रिय हूईं. आज तक “डेनिस की कहानियाँ” बेहद लोकप्रिय हैं, हर साल हज़ारों की संख्या में ये कहानियाँ लोग पढ़ते हैं. सन् 1959 से आज तक कितने ही लोग, कितनी ही पीढ़ियाँ डेनिस के साथ बड़ी हुई हैं, उनके जैसा बाल-लेखक कोई दूसरा अब तक नहीं हुआ है, ऐसा विशेषज्ञों का मानना है.

डेनिस की कहानियों पर अनेक फ़िल्में भी बनी हैं. ये फ़िल्में भी उतनी ही लोकप्रिय हैं.

सन् 1972 में विक्टर द्रागून्स्की का देहांत हो गया. अपने पीछे वे एक पुत्र – डेनिस द्रागून्स्की और एक पुत्री क्सेनिया द्रागून्स्काया छोड़ गए हैं. क्सेनिया द्रागून्स्काया नाटक और कहानियाँ लिखती हैं, और डेनिस द्रागून्स्की एक पत्रकार एवम् लेखक हैं. ये सचमुच के डेनिस ही असल में “डेनिस की कहानियाँ” के नायक हैं.




अनुवादिका का परिचय


आकेल्ला चारुमति रामदास अंग्रेज़ी तथा विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग से निवृत्त हुई हैं। उन्होंने बीस वर्षों तक रूसी साहित्य का अध्यापन किया है.

डा. चारुमति रामदास ने अनेक रूसी उपन्यासों का सीधे रूसी से हिंदी में अनुवाद किया है. उनके द्वारा अनुवादित रचनाओं में प्रमुख हैं मिखाइल बुल्गाकोव का उपन्यास “मास्टर और मार्गारीटा”, मिखाइल बुल्गाकोव की “चुनी हुई रचनाएँ”, अलेक्सांद्र पूश्किन की “प्रेम कहानियाँ”, अलेक्सांद्र पूश्किन की “प्रतिनिधि कहानियाँ”, चिंगिज़ आइत्मातोव द्वारा रचित “कसांद्रा दाग़”, इवान बूनिन की “चुनी हुई रचनाएँ”, अलेक्सांद्र कूप्रिन की “द्वंद्व-युद्ध”, रमान सेन्चिन की “एल्तिशेव परिवार की कहानी”, राजगुरू दत्तात्रेय आगरकर के मराठी उपन्यास “वड़वानल” का उसी शीर्षक से हिंदी अनुवाद, यह उपन्यास स्वतंत्रता से पूर्व भारतीय नौसैनिकों के विद्रोह पर आधारित है, विक्टर श्क्लोव्स्की द्वारा रचित “ज़ू या (अ)प्रेम-पत्र, वेरा पनोवा द्वारा रचित “सिर्योझा” आदि. अन्य कई अनुवादित कहानियाँ एवम् उपन्यास प्रकाशन की राह देख रहे हैं.  







डेनिस की कहानियाँ


1

इवान कज़्लोव्स्की की शोहरत


मेरी मार्कशीट में सारे ‘ए’ ग्रेड्स ही हैं. बस, सिर्फ शुद्धलेखन में ‘बी’ है. धब्बों की वजह से. समझ में नहीं आता कि क्या करूँ! मेरे पेन से हमेशा धब्बे गिरते ही रहते हैं. मैं स्याही में पेन की निब का बस सिरा ही डुबाता हूँ, मगर फिर भी धब्बे गिर ही जाते हैं. जैसे कोई अजूबा हों! एक बार तो मैंने पूरा पेज बिल्कुल साफ़-साफ़ लिखा, बड़ा प्यारा और अच्छा लग रहा था उसे देखना – अस्सल ‘ए’ ग्रेड वाला पेज था. सुबह उसे रईसा इवानव्ना  को दिखाया, वहाँ तो बिल्कुल बीचोंबीच धब्बा पड़ा था! वो कहाँ से आया? कल तो नहीं था! हो सकता है वह किसी और पेज से छनकर आ गया हो? मालूम नहीं...

 तो, वैसे मेरी हमेशा ‘ए’ ग्रेड ही आती है. बस, म्युज़िक में आया ‘सी’. वो ऐसे हुआ. हमारी म्युज़िक की क्लास थी. पहले तो हम सबने मिलकर कोरस गाया “नन्ही बिर्योज़्का खड़ी खेत में”. बहुत बढ़िया गाया, मगर बरीस सिर्गेयेविच  पूरे टाइम त्योरियाँ चढ़ाए चिल्लाए जा रहे थे:  “मात्राएँ खींचो, दोस्तों, मात्राएँ खींचे!...” तब हम मात्राएँ खींच-खींच कर गाने लगे, मगर बरीस सिर्गेयेविच  ने ताली बजाई और कहा:  “बिल्कुल बिल्लियों की कॉन्सर्ट है! चलो, हर-एक-से अलग-अलग प्रैक्टिस करवाते हैं.” इसका मतलब हुआ हर कोई अलग-अलग गाएगा.  और बरीस सिर्गेयेविच  ने मीश्का को बुलाया. मीश्का पियानो के पास गया और उसने फुसफुसाकर बरीस सिर्गेयेविच  से कुछ कहा. तब बरीस सिर्गेयेविच  पियानो बजाने लगे, और मीश्का ने धीमी आवाज़ में गाना शुरू किया :

 झिलमिल करती कड़ी बर्फ पर गिरा बर्फ का नन्हा टुकड़ा... 

बड़े मज़ाकिया तरीके से चीं-चीं कर रहा था मीश्का! बिल्कुल, जैसे हमारी बिल्ली का बच्चा मूर्ज़िक चिचियाता है. क्या कोई ऐसे गाता है! कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा है. मैं अपने आप को बिल्कुल रोक न सका और हँस पड़ा.


 

तब बरीस सिर्गेयेविच  ने मीश्का को ‘ए’ दिया और मेरी ओर देखा. उन्होंने कहा:  “तो-, ठहाका मास्टर, आओ!”

मैं लपक कर पियानो की ओर भागा.  “ओके, तुम क्या गाओगे?” – बरीस सिर्गेयेविच  ने बड़ी शराफ़त से पूछा.

मैंने कहा:  “गृह-युद्ध का गीत “ले चलो, बूदेन्नी, निडर हैं हम युद्ध में.” बरीस सिर्गेयेविच  ने सिर को झटका दिया और बजाना शुरू किया, मगर मैंने उन्हें फ़ौरन रोक दिया : ”प्लीज़, ज़ोर-ज़ोर से बजाइए!” मैंने कहा. बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा:  “तुम्हारी आवाज़ सुनाई नहीं देगी.” मगर मैंने कहा: ”देगी. ऐसी भी क्या बात है!”  बरीस सिर्गेयेविच  ने बजाना शुरू किया , और मैंने खूब गहरी साँस लेकर गाना शुरू किया: 

साफ़ ऊँचे आसमान में लहराता है झंडा लाल... 

ये गाना मुझे बहुत अच्छा लगता है. आँखों के सामने तैर जाता है नीला-नीला आसमान, गर्मी, घोड़ों की टापों की खटखट, उनकी ख़ूबसूरत बैंगनी आँखें, और आसमान में लहराता है लाल झंडा. अब तो जोश से मैंने आँखें भी सिकोड़ लीं और पूरी ताक़त से चीख़ने लगा: 

घोड़ों पर सरपट हम जाते

जहाँ दिखाई देता दुश्मन!

और सम्मोहित करते युद्ध में...


मैं बहुत अच्छा गा रहा था, दूसरी सड़क पर भी सुनाई दे रहा था. 

तेज़ फिसलती हिम चट्टानों से!

 आगे जाते हम सरपट!...हुर्रे!... लाल फ़ौज विजयी है हमेशा! 

हटो पीछे, ऐ दुश्मन! 

डालो हथियार!!!

 

मैंने हथेलियों से अपना पेट दबाया, गाना और भी ज़ोर से निकला, मैं बस गिरते-गिरते बचा: 

हम घुस गए क्रीमिया में! 

यहाँ मैं रुक गया, क्योंकि मैं पसीने से तरबतर हो गया था और मेरे घुटने भी काँप रहे थे. और बरीस सिर्गेयेविच  हालाँकि बजा रहे थे, मगर पियानो पर दुहरे हुए जा रहे थे, और उनके भी कन्धे थरथरा रहे थे... मैंने कहा:  “तो, कैसा लगा?”  “ग़ज़ब का!’ – बरीस सिर्गेयेविच  ने तारीफ़ की.  “अच्छा गाना है, है ना?” मैंने पूछा.

  “अच्छा है,” बरीस सिर्गेयेविच ने कहा और रुमाल से आँखें ढाँक लीं.  “मगर, अफ़सोस की बात है कि आपने बहुत धीरे से बजाया, बरीस सिर्गेयेविच ,” मैंने कहा, “और भी ज़ोर से बजाना चाहिए था.”  “ठीक है, मैं ध्यान रखूँगा,” बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा. “और क्या तुमने इस पर ध्यान नहीं दिया कि मैं एक धुन बजा रहा था और तुम थोड़ी अलग ही धुन में गा रहे थे!”  “नहीं,” मैंने कहा, “इस बात पर मैंने ध्यान ही नहीं दिया! हाँ, मगर वो इतनी ख़ास बात नहीं है.  बस आपको और ज़ोर से बजाना चाहिए था.  “ओ.के,” बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा, “चूँकि तुमने किसी बात पर ध्यान नहीं दिया इसलिए फिलहाल तुम्हें ‘सी’ ग्रेड देते हैं. तुम्हारी कोशिश के लिए.”

क्या –‘सी’? मुझे बड़ा शॉक लगा. ऐसा कैसे हो सकता है? ‘सी’ – ये तो बहुत कम है! मीश्का ने इतना धीरे गाया और उसे ‘ए’ मिला...मैंने कहा:  “ बरीस सिर्गेयेविच , जब मैं थोड़ा-सा आराम कर लूँगा, तो मैं और भी ज़ोर से गा सकूँगा, आप कुछ न सोचिए. वो तो आज मैंने ठीक से नाश्ता नहीं किया. वर्ना तो मैं ऐसे गा सकता हूँ, कि सबके कान बहरे हो जाएँगे. मुझे एक और गाना आता है. जब मैं घर में उसे गाता हूँ तो सारे पड़ोसी भागकर आ जाते हैं और पूछने लगते हैं कि क्या हुआ है.  “आख़िर कौन सा है वो गाना?” बरीस सिर्गेयेविच  ने पूछा.  “बड़ा दर्द भरा है,” मैंने कहा और गाने लगा: 

  मैंने चाहा तुम्हें... चाहत की आग अब भी शायद...

मगर बरीस सिर्गेयेविच  ने फ़ौरन कहा:  “ठीक है, ठीक है, इस सब के बारे में अगली बार बात करेंगे.”

और तब घण्टी बज गई. मम्मी मुझे क्लोकरूम में मिली. जब हम निकलने ही वाले थे, तो बरीस सिर्गेयेविच  हमारे पास आए.   “ तो,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “हो सकता है कि आपका बच्चा लोबाचेव्स्की बन जाए, हो सकता है मेंडेलेव बन जाए. वह सूरिकव या कल्त्सोव भी बन सकता है. मुझे अचरज नहीं होगा अगर वह पूरे देश में कॉम्रेड निकालाय ममाय या किसी बॉक्सर जैसा प्रसिद्ध हो जाए, मगर एक बात के बारे में आपको पक्का यक़ीन दिला सकता हूँ, कि वह इवान कज़्लोव्स्की जैसी शोहरत नहीं पा सकेगा. कभी नहीं!” 

मम्मी एकदम खूब लाल हो गई और बोली:  “अच्छा, देखा जाएगा!’ और जब हम घर जा रहे थे तो मैं सोचता जा रहा था:  “क्या सचमुच ये कज़्लोव्स्की मुझसे भी ज़्यादा ज़ोर से गाता है?”


*********    






2

 जूतों वाली बिल्ली


“बच्चों!” रईसा इवानव्ना ने कहा. “तुम लोगों ने ये सेमेस्टर अच्छी तरह पूरा कर लिया है. मुबारक हो. अब तुम लोग आराम कर सकते हो. छुट्टियों में हम एंटरटेनमेन्ट शो और कार्निवाल का आयोजन करेंगे. हर कोई अपनी मनपसन्द फैन्सी ड्रेस पहनेगा, और सबसे बढ़िया फैन्सी ड्रेस को इनाम दिया जाएगा, तो तैयारी शुरू कर दो.” और रईसा इवानव्ना  ने अपनी कॉपियाँ उठाईं, हमसे बिदा ली और चली गई.

और जब हम घर जा रहे थे तो मीश्का ने कहा, “मैं तो कार्निवाल में बौना बनूँगा. मेरे लिए कल रेनकोट और टोप खरीदा है. मैं बस चेहरे पर कोई मास्क लगा लूँगा, और बस, बौना तैयार ! तू क्या बनेगा?”  “देखा जाएगा.” और मैं इस बारे में भूल गया. क्योंकि घर पे मम्मी ने कहा कि वह दस दिन के लिए हेल्थ-रिसॉर्ट जा रही हैं और मैं अच्छी तरह से रहूँ और पापा का ख़याल रखूँ. और वह दूसरे दिन चली भी गईं, और मैं पापा के साथ बस पूरी तरह परेशान हो गया. कभी कुछ, तो कभी कुछ, और बाहर बर्फ भी गिर रही थी, मैं बस पूरे टाइम यही सोचता रहा कि मम्मी कब लौटेंगी. अपने कैलेण्डर में मैं तारीखों के ख़ानों पर क्रॉस लगाता रहा. और अचानक मीश्का दौड़ता हुआ आया और दरवाज़े से ही चिल्लाया: ”तू आ रहा है या नहीं?” मैंने पूछा :  “कहाँ?”   

मीश्का चीख़ा :

 “क्या – कहाँ? स्कूल में! आज तो एंटरटेनमेन्ट शो है ना, सब लोग फैन्सी ड्रेस में होंगे! तू, क्या देख नहीं रहा है कि मैं बौना बन गया हूँ?” सही है, वह टोप वाले लबादे में था.

मैंने कहा: ” मेरे पास कोई ड्रेस नहीं है! हमारे यहाँ मम्मी चली गई हैं.” मीश्का ने कहा :  “चल, ख़ुद ही कुछ सोचते हैं! क्या तुम्हारे घर में कोई अजीब सी चीज़ है? तू वो ही पहन लेना, वही ड्रेस हो जाएगी कार्निवाल के लिए.” 

 



मैंने कहा,  “हमारे पास कुछ भी नहीं है. बस पापा की फिशिंग वाली ‘बाखिली’ हैं.”

‘बाखिली’- मतलब रबड़ के ऐसे sss ऊँचे-ऊँचे जूते होते हैं. अगर बारिश या कीचड़ हो – तो सबसे पहले ज़रूरत होती है ‘बाखिली’ की. पैर ज़रा भी गन्दे नहीं होते, न गीले होते हैं. मीश्का ने कहा: 

“अच्छा, पहन तो सही, देखेंगे, कैसे दिखता है!” मैं अपने जूतों समेत पापा के ऊँचे वाले बूट्स में घुस गया. पता चला कि ‘बाखिली’ तो मेरी बगल तक पहुँच रहे थे. मैंने उन्हें पहन कर चलने की कोशिश की. कोई बात नहीं, बहुत मुश्किल हो रही थी. मगर वे ख़ूब चमक रहे थे. मीश्का को बहुत पसन्द आ गया. उसने पूछा : “और हैट कौन सी है?” मैं बोला:  “शायद, मम्मी को स्ट्रा-हैट होगी, जो धूप से बचाती है?” ”जल्दी ला!” मैंने हैट ढूँढ़ी, उसे पहन लिया. पता चला कि वह काफ़ी बड़ी है, नाक तक आती है, मगर, फिर भी, उस पर फूल बने हैं. मीश्का ने देखा और कहने लगा: ”ड्रेस अच्छी है. बस, मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि इसका मतलब क्या है?” मैंने कहा:  “शायद, इसका मतलब हो -  ज़हरीला कुकुरमुत्ता?” मीश्का हँस पड़ा:  “तू भी न, ज़हरीले कुकुरमुत्ते की टोपी पूरी लाल होती है! तेरी ड्रेस “बूढ़े मछुआरे ” से बहुत मिलती जुलती है!” मैंने  मीश्का को झिड़क दिया: “क्या कहता है! ‘बूढ़ा मछुआरा’ !... और दाढ़ी कहाँ है?” अब मीश्का सोचने लगा, और मैं कोरीडोर में निकल आया, और वहाँ खड़ी थी हमारी पड़ोसन वेरा सिर्गेयेव्ना. जब उसने मुझे देखा तो हाथ नचाते हुए कहने लगी:  “ओय! बिल्कुल सचमुच की जूतों वाली बिल्ली!” मैं फ़ौरन समझ गया कि मेरी ड्रेस का क्या मतलब है! मैं –“जूतों वाली बिल्ली” हूँ! बस, अफ़सोस की बात ये है कि मेरी पूँछ नहीं है! मैं पूछता हूँ:  “”वेरा सिर्गेयेव्ना, क्या आपके पास पूँछ है?” वेरा सिर्गेयेव्ना बोली:  “क्या मैं शैतान जैसी दिखती हूँ?”  “नहीं, बहुत नहीं,” मैंने कहा, “मगर बात ये नहीं है. अभी आपने कहा कि इस ड्रेस का मतलब है “जूतों वाली बिल्ली”, मगर बगैर पूँछ के बिल्ली कैसे हो सकती है? कोई-न-कोई पूँछ तो चाहिए ही होगी ना ! वेरा सिर्गेयेव्ना, आप हेल्प करेंगी, प्लीज़?”     

तब वेरा सिगेयेव्ना ने कहा:  “एक मिनट...” और उसने मुझे खूब गन्दी भूरी पूँछ लाकर दी जिस पर काले-काले धब्बे थे.  “ये,” उसने कहा, “ पुरानी मफ़लर का टुकड़ा है. आजकल मैं इससे केरोसीन-स्टोव साफ़ करती हूँ, मगर, मेरा ख़याल है कि तुम्हारे काम के लिए ये बढ़िया है.”

मैंने कहा, “बहुत बहुत शुक्रिया” और पूँछ लेकर मीश्का के पास आया.

जैसे ही मीश्का ने उसे देखा, बोला: ”फ़ौरन सुई-धागा ला, मैं इसे तुझ पर सी देता हूँ. यह बड़ी लाजवाब पूँछ है.”

 और मीश्का पीछे से मुझ पर पूँछ सीने लगा. वह बडी आसानी से सी रहा था, मगर फिर अचानक न जाने कैसे मुझे सुई गड़ा दी!

मैं चिल्लाया:  “आराम से, तू बहादुर टेलर-मास्टर! क्या तू समझ नहीं रहा है कि सीधे ज़िन्दा आदमी के ऊपर सी रह है? तू मुझे गड़ा रहा है!”  “वो, मेरा अन्दाज़ थोड़ा गलत हो गया!” और उसने फिर सुई गड़ा दी!  “मीश्का, ध्यान से कर, वर्ना मैं तेरी चटनी बना दूँगा!” और वह बोला: ”मैं ज़िन्दगी में पहली बार तो सी रहा हूँ!” और फिर – चुभा दी!... मैं गला फ़ाड़ कर चीख़ा:  “ क्या तू समझ नहीं रहा है कि इसके बाद मैं पूरी तरह अपाहिज हो जाऊँगा और बैठने के लायक भी नहीं रहूँगा?”  मगर तभी मीश्का ने कहा: ”हुर्रे! हो गया! और क्या पूँछ है! हर बिल्ली की ऐसी नहीं होती!” फिर मैंने काला रंग लिया और ब्रश से अपनी मूँछें बना लीं, दोनों तरफ तीन-तीन मूँछें – लम्बी-लम्बी, बिल्कुल कानों तक!     और हम स्कूल के लिए चल पड़े.

वहाँ इत्ते-सारे लोग थे, और सभी फैन्सी ड्रेस में थे. बौने ही क़रीब पचास थे. और बहुत सारे बर्फ़ के ‘सफ़ेद’ फ़ाहे थे. ये ऐसी ड्रेस होती है जिसमें चारों ओर से ढेर सारी सफ़ेद झालर लगी होती है, और बीच में से छोटी-सी लड़की झाँकती है. 

हम सब खुश हो रहे थे, डांस कर रहे थे.

मैं भी डान्स कर रहा था, मगर पूरे समय लड़खड़ा रहा था और बड़े-बड़े जूतों के कारण गिरने-गिरने को हो रहा था, और हैट भी, जैसे जानबूझ कर लगातार ठोढ़ी तक फिसल रही थी. और फिर हमारी लीडर ल्यूस्या स्टेज पर आई और खनखनाती आवाज़ में बोली: ”जूतों वाली बिल्ली” से निवेदन है कि स्टेज पर आए और सबसे बेस्ट ड्रेस के लिए पहला इनाम ले.!” और मैं स्टेज की ओर जाने लगा, मगर लास्ट वाली सीढ़ी पर लड़खड़ा गया और फिर गिरते-गिरते बचा. सब ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे, और ल्यूस्या ने मुझसे हाथ मिलाया और मुझे दो किताबें दीं: “अंकल स्त्योपा” और “कहानियाँ-पहेलियाँ”. अब बरीस सिर्गेयेविच  ने एक  तेज़ धुन बजाना शुरू कर दिया और मैं स्टेज से नीचे उतरने लगा, और जब मैं उतर रहा था, तो फिर से लड़खड़ा गया और गिरते-गिरते बचा, सब लोग  फिर से हँस पड़े. जब हम घर जा रहे थे तो मीश्का ने कहा: ” बेशक, बौने बहुत सारे थे, मगर तू एक ही था!”  “हँ,” मैंने कहा, “मगर सारे बौने अलग-अलग थे, और तू भी बड़ा मज़ेदार लग रहा था, इसलिए तुझे भी किताब मिलनी चाहिए. मेरी एक ले ले.”

मीश्का ने कहा:  “कोई ज़रूरत नहीं है, तू कर क्या रहा है!” मैंने पूछा:  “कौन सी चाहिए?”

 “अंकल स्त्योपा”.

और मैंने उसे “अंकल स्त्योपा”  दे दी.

घर आकर मैंने अपनी भारी भरकम ‘बाखिली’ उतार दीं, कैलेण्डर के पास भागा, और आज की तारीख़ वाले ख़ाने पर क्रॉस बना दिया. फिर कल की तारीख पर भी क्रॉस बना दिया. देखा – आह, मम्मी के लौटने में अभी तीन दिन बचे हैं! 

                                ******



3.

बचपन का दोस्त 


जब मैं छह या साढ़े छह साल का था, तो बिल्कुल नहीं जानता था कि इस दुनिया में मैं आख़िर क्या बनूँगा. मुझे अपने चारों ओर के सब लोग अच्छे लगते थे और सारे काम भी अच्छे लगते थे. तब मेरे दिमाग़ में बड़ी भयानक उलझन थी, मैं काफ़ी परेशान था और तय नहीं कर पा रहा था कि मुझे क्या करना चाहिए. कभी मैं एस्ट्रोनॉमर बनने की सोचता, जिससे कि रात को सोना न पड़े और मैं रात भर टेलिस्कोप में दूर-दराज़ के तारे देख सकूँ; या फिर दूर की यात्रा करने वाले जहाज़ का कप्तान बनने का सपना देखता, जिससे कप्तान के ब्रिज पर पैर फैलाए खड़ा रहूँ और दूर-दूर वाले सिंगापुर की सैर कर सकूँ और वहाँ एक अच्छा–सा दिलचस्प बन्दर ख़रीद सकूँ. कभी-कभी मेरा दिल बुरी तरह चाहता कि मेट्रो-ड्राइवर या स्टेशन-मास्टर बन जाऊँ, लाल कैप पहनूँ और मोटी आवाज़ में चिल्लाऊँ:  “रे-ए-डी!”

कभी मैं ऐसा आर्टिस्ट बनने का ख़्वाब देखता जो सड़क पर आने-जाने वाली मोटर गाड़ियों के लिए सफ़ेद पट्टे बनाता है. या फिर मुझे ऐसा लगता कि एलेन बोम्बार जैसा बहादुर यात्री बनना – छोटी-सी बोट पर सारे महासागर तैर जाना, वो भी सिर्फ मछली खाकर – ये भी बुरी बात नहीं है. ये सच है कि अपनी समुद्री यात्रा के बाद बोम्बार का वज़न पच्चीस किलो कम हो गया था, और मेरा तो कुल वज़न ही सिर्फ छब्बीस किलो है, तो इसका मतलब ये हुआ कि अगर मैं भी बोट में जाऊँ, उसकी तरह, तो मैं तो इतना दुबला हो ही नहीं सकता; सफ़र ख़तम होने पर मेरा वज़न रह जाएगा सिर्फ एक किलो. और, अगर अचानक, मान लो कभी एकाध-दूसरी मछली भी न पकड़ पाऊँ और इससे भी ज़्यादा दुबला हो जाऊँ तो? तब तो मैं बस हवा में पिघल ही जाऊँगा धुँए की तरह, फिर तो बस हो गई छुट्टी.

जब मैंने इन सारी बातों पर गौर किया तो तय किया कि मैं ये जोख़िम नहीं उठाऊँगा; मगर दूसरे ही दिन मेरा दिल बॉक्सर बनने के लिए मचलने लगा, क्योंकि  मैंने टी.वी. पर बॉक्सिंग की यूरोपियन चैम्पियनशिप का ड्रा-मैच देखा. हा! कैसे वे एक दूसरे को धुन रहे थे – बहुत डरावना था! और फिर उनकी ट्रेनिंग कैसे होती है ये दिखाया गया, यहाँ वे मुक्के बरसाए जा रहे थे एक बड़ी भारी चमड़े की “नाशपाती” पर – ये ऐसी लम्बी, भारी-भरकम गेंद होती है; उस पर पूरी ताक़त से मुक्के बरसाए जा सकते हैं, उसका कचूमर बनाया जा सकता है, जिससे कि आपके भीतर इस मार का फोर्स बढ़ता जाए. मैं ये सब देखते-देखते इतना मगन हो गया, कि मैंने अपने कम्पाउण्ड में सबसे ज़्यादा ताक़तवर इन्सान बनने का फ़ैसला कर लिया, जिससे कि ज़रूरत पड़ने पर मैं सबको मार सकूँ. मैंने पापा से कहा:  “पापा, मेरे लिए नाशपाती ख़रीद दो.”  “अभी जनवरी का महीना है, नाशपातियाँ नहीं मिलतीं. फ़िलहाल तुम गाजर खा लो.” 

मैं हँसने लगा:  “नहीं, पापा, वो वाली नहीं! खाने वाली नाशपाती नहीं! तुम, प्लीज़ मुझे ऑर्डिनरी वाली, चमड़े की,  बॉक्सरों वाली नाशपाती खरीद दो.”          

 “वो तुझे किसलिए चाहिए?” पापा ने कहा.  “ट्रेनिंग के लिए,” मैंने कहा. “क्योंकि मैं बॉक्सर बनूँगा और सबको मारा करूँगा. खरीदोगे ना, हाँ?  “कितने की आती है वो नाशपाती?” पापा ने दिलचस्पी से पूछा.  “बहुत कम में,” मैंने कहा, “यही कोई दस या पचास रुबल की होगी.”  “तू पागल हो गया है, मेरे भाई,” पापा ने कहा , “बिना नाशपाती के ही किसी तरह मैनेज करो. तुम्हें कुछ नहीं होगा.”  और वो कपड़े पहन कर काम पे चले गए. और मैं उनके ऊपर इसलिए गुस्सा हो गया कि उन्होंने हँसकर मुझे टाल दिया. मगर मम्मी फ़ौरन ताड़ गईं कि मैं गुस्सा हो गया हूँ, वो फ़ौरन बोलीं:  “ठहर ज़रा, मेरे दिमाग़ में शायद कोई ख़याल आया है. क्या-है, क्या-है, सबर-कर एक मिनट.”

वह झुकी और दीवान के नीचे से एक बड़ी बुनी हुई बास्केट निकाली; उसमें पुराने खिलौने रखे हुए थे जिनसे मैं अब नहीं खेलता था. क्योंकि मैं अब बड़ा हो गया था और पतझड़ में मेरे लिए स्कूल यूनिफॉर्म और शानदार कैप खरीदी जाने वाली थी.

मम्मी बास्केट में कुछ ढूँढ़ने लगी, और, जब तक वह ढूँढ़ रही थी, मैंने अपनी पुरानी ट्रामगाड़ी देखी – बिना पहियों के, रस्सी से बँधी हुई, प्लैस्टिक की बाँसुरी देखी, धारियों वाला लट्टू देखा, एक तीर रेक्ज़ीन के टुकड़े में लिपटा हुआ; नाव के पाल का टुकड़ा, बहुत सारे झुनझुने, और भी बहुत कुछ टूटे-फूटे खिलौने देखे. और अचानक मम्मी ने बास्केट की तली से तन्दुरुस्त, मोटे-ताज़े, रोएँदार मीश्का (टैडी बेअर) को निकाला.

 

 उसने उसे मेरी ओर दीवान पर फेंका और बोलीं:  “ये देख. ये वही है जो तुझे मीला आंटी ने दिया था. तू तब दो साल का हुआ था. अच्छा मीश्का है, बढ़िया. देख, कैसा टाइट है! पेट कितना मोटा है! ओफ़, कितना खेलता था तू इससे! क्या ये नाशपाती जैसा नहीं है? उससे भी बढ़िया है! और खरीदने की भी ज़रूरत नहीं है! जी भर के इस पर प्रैक्टिस कर! शुरू हो जा!”

मगर तभी उसे टेलिफोन सुनने कोरीडोर में जाना पड़ा. मैं बहुत ख़ुश हो गया, कि मम्मी ने इतनी बढ़िया बात सोची. मैंने मीश्का को दीवान पर अच्छी तरह से बैठा दिया, जिससे मैं उस पर प्रैक्टिस कर सकूँ और मार की ताकत बढ़ा सकूँ. वो मेरे सामने बैठा था - ऐसे बढ़िया चॉकलेट-कलर का, मगर उसका रंग काफ़ी उड़ चुका था; और उसकी आँखें भी अलग-अलग तरह की थीं: एक, जो उसकी ख़ुद की थी – पीली काँच की, और दूसरी बड़ी, सफ़ेद – तकिए के गिलाफ़ से बनी बटन की; मुझे तो ये भी याद नहीं कि वो कब आया था. मगर ये ज़रूरी नहीं था, क्यों कि मीश्का अपनी अलग-अलग तरह की आँखों से मेरी ओर इतनी ख़ुशी से देख रहा था, और उसने अपने पैर फ़ैलाए हुए थे, मुझसे मिलने के लिए अपने पेट को बाहर निकाल लिया था, और दोनों हाथ ऊपर उठा लिए थे, जैसे मज़ाक कर रहा हो कि वो पहले ही हार मान रहा है....

मैं उसकी ओर देखता रहा और अचानक मुझे याद आया कि कैसे मैं इस मीशा से एक मिनट को भी अलग नहीं होता था, हर जगह उसे अपने साथ घसीट कर ले जाता था, उसे गोद में खिलाता, उसके लाड करता, और खाना खाते समय उसे अपनी बगल में मेज़ पर बिठाता, उसे चम्मच से नूडल्स खिलाता, और जब मैं उसके चेहरे पर कुछ पोत देता - चाहे वही नूडल्स या पॉरिज हो - तो उसका चेहरा इतना मज़ेदार और प्यारा हो जाता, जैसे बिल्कुल ज़िन्दा हो! मैं उसे अपने साथ सुलाता, उसे अपनी गोद में झुलाता मानो वो मेरा छोटा भाई हो; उसके मखमली, मज़बूत कानों में कहानियाँ फुसफुसाता; तब मैं उसे प्यार करता था, अपनी पूरी आत्मा से प्यार करता था, उसके लिए उस समय मैं अपनी जान भी दे देता. और इस समय वो बैठा है दीवान पर – मेरा पुराना, सबसे बढ़िया दोस्त, बचपन का सच्चा दोस्त. वो बैठा है, अपनी अलग-अलग तरह की आँखों से मुस्कुरा रहा है, और मैं हूँ कि उस पर मार की ताक़त आज़माना चाहता हूँ...  “तू क्या,” मम्मी ने कहा, वह कॉरिडोर से वापस आ गई थी, “क्या हुआ है तुझे?”

मगर मैं नहीं जानता था कि मुझे क्या हुआ है, मैं बड़ी देर तक ख़ामोश रहा और फिर मैंने मुँह फेर लिया, जिससे कि वह मेरे होठों से और मेरी आवाज़ से कोई अन्दाज़ न लगा सकें कि मुझे क्या हुआ है, और मैंने झटके से सिर छत की ओर उठा दिया जिससे आँसू वापस लौट जाएँ, और फिर जब मैंने अपने आप पर थोड़ा काबू पा लिया तो मैंने कहा:   “किस बारे में पूछ रही हो, मम्मी? मुझे कुछ भी नहीं हुआ...बस मैंने अपना इरादा बदल दिया है. बस, मैं कभी भी बॉक्सर नहीं बनूँगा. 

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4.


दीम्का और अन्तोन 


पिछली गर्मियों में मैं अपने वोलोद्या चाचा के फार्म-हाऊस गया था. उनका घर बेहद ख़ूबसूरत है, रेल्वे स्टेशन जैसा, मगर उससे थोड़ा छोटा. मैं वहाँ पूरे हफ़्ते रहा, और जंगल में घूमा, अलाव जलाए, और तैराकी भी की.

मगर ख़ास बात ये है कि वहाँ मेरी कुत्तों से दोस्ती हुई. वहाँ ख़ूब सारे कुत्ते थे, और सब उन्हें नाम और उपनाम से पुकारते थे. जैसे, झूच्का ब्रेद्नेव, या तूज़िक मुराशोव्स्की, या बार्बोस ईसाएन्को. इस तरह ये जानना आसान हो जाता है कि किसे किस कुत्ते ने काटा है. 

हमारे घर में रहता था कुत्ता दीम्का. उसकी पूँछ मुड़ी हुई और झबरीली थी, और पैरों में ऊनी पतलून थी. जब मैं दीम्का की ओर देखता तो मुझे बड़ा आश्चर्य होता कि उसकी कितनी ख़ूबसूरत आँखें हैं. पीली-पीली और बेहद समझदार. मैं दीम्का को शक्कर देता, और वह हमेशा मेरी ओर देखकर पूँछ हिलाता. और, बस दो ही घर छोड़कर रहता था कुत्ता अन्तोन. वह वान्का का था. वान्का का उपनाम था दीखव, तो अंतोन को सब लोग अन्तोन दीखव कहते थे. इस अन्तोन के बस तीन ही टाँगें थीं, शायद चौथी टाँग को पंजा नहीं था. उसने उसे कहीं खो दिया था. मगर फिर भी वह खूब तेज़ भागता था और हर जगह पहुँच जाता था. वह घुमक्कड़ था, कभी-कभी तीन-तीन दिनों तक गायब हो जाता, मगर हमेशा वान्का के पास लौटकर आ जाता था. अन्तोन को जो भी सामने आ जाए, वो चुराना अच्छा लगता था, मगर वह चालाक नहीं था. एक बार का किस्सा सुनाता हूँ. 

 


मेरी मम्मी ने दीम्का को एक बड़ी हड्डी दी. दीम्का ने उसे ले लिया, अपने सामने रखा, पंजों में पकड़ लिया, आँखें सिकोड़ीं और उसे कुतरने ही वाला था कि अचानक उसे हमारी बिल्ली मूर्ज़िक दिखाई दी. वह किसी को छेड़ नहीं रही थी, चुपचाप घर जा रही थी, मगर दीम्का उछला और उसके पीछे पड़ गया! मूर्ज़िक दौड़ने लगी और दीम्का बड़ी देर तक उसे खदेड़ता रहा, जब तक कि उसे सराय के पीछे न भगा दिया. 

मगर ख़ास बात ये थी कि अन्तोन कबसे हमारे आँगन में था, और जैसे ही दीम्का मूर्ज़िक के पीछे भागा, अन्तोन ने बड़े आराम से उसकी हड्डी उठाई और उसे लेकर भाग गया! हड्डी उसने कहाँ छुपाई, मालूम नहीं, मगर एक ही सेकण्ड बाद वापस आकर बैठ गया, इधर उधर देखने लगा, जैसे कह रहा हो, “लड़कों, मुझे कुछ भी मालूम नहीं है.”

अब दीम्का वापस आया तो देखता क्या है कि हड्डी नहीं है, और बस अन्तोन बैठा है. उसने उसकी ओर देखा, मानो पूछ रहा हो, “तूने ली है?” मगर जवाब में ये बदमाश उसे देखकर हँसने लगा! फिर उकतायेपन से मुड़ गया. तब दीम्का भागकर उसके आगे गया और सीधे उसकी आँखों में देखने लगा. मगर अन्तोन ने पलक तक नहीं झपकाई. दीम्का काफ़ी देर तक उसे देखता रह मगर फिर समझ गया कि उसका कोई ईमान नहीं है, और वहाँ से हट गया. 

अन्तोन जैसे उसके साथ खेलना चाह रहा था, मगर दीम्का ने उससे बात करना बन्द कर दिया. 

मैंने कहा, “ अन्तोन! आ-आ-आ!”

वह मेरे पास आया, और मैंने उससे कहा, “मैंने सब देखा है. अगर तुम फ़ौरन हड्डी नहीं लाए तो मैं सबसे कह दूँगा.     

वह बुरी तरह लाल हो गया. मतलब, बेशक, वो, हो सकता है, लाल हुआ भी न हो, मगर उसकी शक्ल बता रही थी कि वह बहुत शर्मिन्दा है, और वह सही में लाल हो गया. 

ओह, कितना होशियार! अपनी तीन टाँगों से उछलता हुआ वह कहीं गया, और वापस आया तो उसने दाँतों में हड्डी दबाई हुई थी. और हौले से, शराफ़त से, उसे दीम्का की सामने रख दिया. मगर दीम्का उसे खा ही नहीं रहा था. उसने अपनी पीली आँखों से कनखियों से देखा और मुस्कुराया – मतलब, माफ़ कर दिया!

और वे खेलने लगे, भाग-दौड़ करने लगे, और फिर, जब थक गए तो नदी की ओर भागे एक दूसरे से बिल्कुल सटे-सटे. 

मानो हाथ में हाथ लिए चल रहे हों. 

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5


प्रोफेसर शेखीमार 


जब मैं पेपर पढ़ते समय पापा को तंग करता हूँ तो उन्हें अच्छा नहीं लगता. मगर मैं हमेशा इस बारे में भूल जाता हूँ, क्योंकि उनसे बात करने को मेरा जी बहुत चाहता है. आख़िर, वो मेरे इकलौते पापा हैं! मैं  हमेशा उनके साथ बातें करना चाहता हूँ. 


 

एक बार वो बैठे हुए पेपर पढ़ रहे थे, और मम्मी मेरे जैकेट पर टोप सी रही थीं. 

मैंने कहा:  “पापा, तुम्हें मालूम है कि बायकाल लेक में कितने अज़ोव सागर समा सकते हैं?” उन्होंने कहा:  “डिस्टर्ब मत करो...”  “92! अच्छा है ना?”  “अच्छा है. डिस्टर्ब मत करो, ठीक है?”  और वो फिर से पढ़ने लगे.

मैंने कहा:  “क्या तुम आर्टिस्ट एल ग्रेको को जानते हो?” उन्होंने सिर हिला दिया. मैंने कहा:  “उसका असली नाम है दोमेनिको तियोतोकोपूली! क्योंकि वह क्रीत द्वीप का रहने वाला ग्रीक है. इसी आर्टिस्ट को स्पैनिश लोग कहते थे एल ग्रेको!... बड़ी दिलचस्प बातें हैं. व्हेल, मिसाल के तौर पर,पापा, पाँच किलोमीटर दूर तक सुन सकती है.” पापा ने कहा:  “थोड़ी देर तो चुप हो जा...कम से कम पाँच मिनट...” मगर मेरे पास तो पापा को सुनाने के लिए इत्ती सारी ख़बरें थीं कि मैं अपने आप को रोक नहीं पा रहा  था. मेरे अन्दर से ख़बरें बिखर रही थीं, एक के बाद एक उछलती हुई बाहर आ रही थीं. क्योंकि वे थीं भी तो ढेर सारी. अगर वे कुछ कम होतीं, तो हो सकता कि बर्दाश्त करना मेरे लिए आसान होता, तब मैं चुप हो जाता, मगर वे तो ख़ूब सारी थीं, और इसीलिए मैं मजबूर था. मैंने कहा:  “पापा! सबसे ख़ास ख़बर तो तुम्हें मालूम ही नहीं है: ग्रेट ज़ोन्द आइलैंड्स में छोटी-छोटी भैंसे रहती हैं. पापा, वे बौनी होती हैं. उन्हें केन्टूस कहते हैं. ऐसे केन्टूस को सूटकेस में बन्द करके ला सकते हैं!”  “ओह, अच्छा?” पापा ने कहा , “बड़े अचरज की बात है! अब तू मुझे आराम से पेपर पढ़ने दे, ठीक है?”  

“पढ़ो, पढ़ो,” मैंने कहा, “प्लीज़, पढ़ लो! पापा, समझ रहे हो, ऐसा लगता है कि हमारे कॉरीडोर में ऐसी भैंसों का पूरा झुण्ड चर सकता है!... हुर्रे?”  “हुर्रे,” पापा ने कहा. “चुप रहेगा, या नहीं?”  “और सूरज आसमान के बीचोंबीच थोड़ी ना होता है,” मैंने कहा, “बल्कि किनारे पर होता है!”  “ऐसा हो ही नहीं सकता,” पापा ने कहा.  “शर्त लगाता हूँ,” मैंने कहा, “वो किनारे पे होता है! एकदम किनारे पे.”

पापा ने धुँधलाई आँखों से मेरी ओर देखा. फिर उनकी आँखें साफ़ हो गईं, और उन्होंने मम्मी से कहा:  “उसे ये सब कैसे पता चला? कहाँ से? कब?”  मम्मी मुस्कुराईं:  “वो मॉडर्न बच्चा है. वह पढ़ता है, रेडिओ सुनता है. टीवी. लेक्चर्स. और तुम्हें क्या लगा?”  “वंडरफुल,” पापा ने कहा, “कितनी जल्दी सब कुछ पता चल जाता है.” उन्होंने फिर से अख़बार के पीछे अपने आपको छुपा लिया, और मम्मी ने उनसे पूछा:  “इतनी दिलचस्पी से तुम क्या पढ़ रहे हो?”

 “अफ्रीका,” पापा ने कहा. “ खौल रहा है! उपनिवेशवाद का अंत!”  “अभी अंत नहीं हुआ है!” मैंने कहा.  “क्या?” मैं अख़बार के नीचे से रेंग कर उनके सामने खड़ा हो गया.  “अभी भी कई सारे गुलाम देश हैं,” मैंने कहा. “कई सारे गुलाम देश हैं.” उन्होंने कहा, “तू बच्चा नहीं है. नहीं. तू तो प्रोफ़ेसर है! असली प्रोफ़ेसर...शेखीमार!”

और वो हँसने लगे, और मम्मी भी उनके साथ हँसने लगीं.

 “ठीक है, डेनिस, जा थोड़ी देर घूम के आ,” उसने मेरी ओर जैकेट बढ़ाया और मुझे धकेलते हुए बोली,  “जा! जा!” मैं जाने लगा, जाते-जाते मैंने मम्मी से कॉरीडोर में पूछा :  “मम्मी, ये प्रोफ़ेसर शेखीमार क्या होता है? पहली बार ऐसी बात सुन रहा हूँ! क्या उन्होंने मज़ाक में मुझे ‘शेखीमार’ कहा? क्या यह अपमानजनक है?”  मगर मम्मी बोली:  “क्या कहता है! ये बिल्कुल अपमानजनक नहीं है. क्या पापा तेरा अपमान कर सकते हैं? बल्कि उन्होंने तो, उल्टे, तेरी तारीफ़ की थी!”

जब उन्होंने मेरी तारीफ़ की थी, तो मुझे फ़ौरन इत्मीनान हो गया, और मैं शांत होकर घूमने चल पड़ा.

मगर सीढ़ियों पर मुझे याद आया कि मुझे अल्योन्का को देखना है, सब कह रहे हैं कि वह बीमार है और कुछ भी नहीं खा रही है. मैं अल्योन्का के घर पहुँचा. उनके यहाँ कोई अंकल बैठे थे, नीले सूट में, हाथ गोरे-गोरे. वे मेज़ के पास बैठकर अल्योन्का की मम्मी से बातें कर रहे थे. अल्योन्का दीवान पर लेटी थी और घोड़े का पैर चिपका रही थी. जब अल्योन्का ने मुझे देखा, वह फ़ौरन चिल्लाई:  “डेनिस्का आया है! ओहो –हो!”  मैंने शराफ़त से कहा:  “हैलो! पागल की तरह चिल्ला क्यों रही है?” और मैं दीवान पर उसके क़रीब बैठ गया. 

 गोरे- गोरे हाथों वाले अंकल उठे और बोले:  “मतलब, सब कुछ नॉर्मल है. हवा, हवा और हवा. ये तो पूरी तरह से नॉर्मल बच्ची है!” और मैं फ़ौरन समझ गया कि ये डॉक्टर है. अल्योन्का की मम्मी ने कहा:  “बहुत, बहुत धन्यवाद, प्रोफेसर! बहुत, बहुत धन्यवाद, प्रोफेसर!” और उसने उनसे हाथ मिलाया. ज़ाहिर है कि ये इतना अच्छा डॉक्टर था कि उसे सब कुछ मालूम था, और इसलिए उसे ‘प्रोफेसर’ कहते   थे. वह अल्योन्का के पास गया और बोला:  “बाय, बाय, अल्योन्का, जल्दी से अच्छी हो जाओ.” वह लाल हो गई, उसने ज़ुबान बाहर निकाली, दीवार की ओर पलट गई और वहाँ से फुसफुसाई:  “बाय-बाय...”

उसने उसके सिर पर हाथ फेरा और मेरी ओर मुड़ा:  “और आपका क्या नाम है, यंग मैन?”

ओह, कितना अच्छा है ये: मुझे “आप” कहा! 

 “ मैं डेनिस कराब्ल्योव हूं! और आपका क्या नाम है?”

उसने मेरा हाथ अपने गोरे-गोरे, बड़े, नरम हाथ में लिया. मुझे अचरज भी हुआ कि वह कितना नरम है. बिल्कुल रेशम! और उसके पूरे बदन से इतनी साफ़, और प्यारी ख़ुशबू आ रही थी. उसने मेरा हाथ हिलाते हुए कहा:  “ और मेरा नाम है वासिली वासिल्येविच सिर्गेयेव. प्रोफेसर.” मैंने कहा:  “शेखीमार? प्रोफेसर शेखीमार?” अल्योन्का की मम्मी  हाथ नचाने लगी. और प्रोफेसर लाल हो गया और खाँसने लगा. और वे दोनों कमरे से बाहर निकल गए. और मुझे ऐसा लगा जैसे वे नॉर्मल तरीके से नहीं निकले. जैसे भाग कर निकल गए. मुझे ये भी लगा कि मैंने कुछ गलत बोल दिया है. मालूम नहीं, क्या बात थी. या , हो सकता है कि “शेखीमार” – वाक़ई में अपमानजनक है, हाँ?


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6


कुछ भी नहीं बदलेगा


मैं बहुत पहले ही समझ गया हूँ कि बड़े लोग छोटों से बेहद बेवकूफ़ी भरे सवाल पूछते हैं. जैसे कि उन्होंने आपस में सलाह कर ली हो. नतीजा ये निकलता है, मानो उन सबने एक ही तरह के सवाल याद कर लिए हैं और सभी बच्चों से वे एक के बाद एक यही सवाल पूछते हैं. मुझे तो इस बात की इतनी आदत हो गई है कि मुझे पहले से पता होता है कि अगर किसी बड़े इन्सान से मेरा परिचय होगा तो आगे क्या क्या होगा. ये इस तरह से होगा. घंटी बजेगी, मम्मा दरवाज़ा खोलेगी , कोई इन्सान देर तक बुदबुदाकर समझ में न आने वाली बातें कहेगा, फिर कमरे में नया बड़ा आदमी आएगा. वो हाथ मलेगा. फिर कान, फिर चश्मा. जब वह उसे  फिर से पहन लेगा तो मुझे देखेगा, और हालाँकि उसे काफ़ी पहले से ही मालूम है कि मैं इस दुनिया में रहता हूँ, और ये भी बड़ी अच्छी तरह जानता है कि मेरा नाम क्या है, फिर भी वह मुझे कंधों से पकड़ेगा, उन्हें काफ़ी ज़ोर से दबाएगा, मुझे अपनी ओर खींचेगा और कहेगा: ”हैलो, डेनिस, तेरा नाम क्या है?”

 


 बेशक, अगर मैं बदतमीज़ इंसान होता तो उससे कहता:

“आप ख़ुद ही जानते तो हैं! अभी अभी आपने मुझे मेरे नाम से ही तो पुकारा, फिर ये बेहूदापन क्यों कर रहे हैं?” मगर मैं एक शरीफ़ लड़का हूँ. इसलिए मैं ऐसा दिखाता हूँ कि मैंने ऐसी कोई बात सुनी नहीं, मैं बस मुँह टेढ़ा करके मुस्कुराता हूँ, नज़रें एक ओर को घुमाते हुए जवाब देता हूँ:  “डेनिस.” वह आगे पूछेगा:  “कितने साल का है तू?”

जैसे कि उसे ये दिखाई ही नहीं दे रहा है कि मैं न तो तीस साल का हूँ, और न चालीस का! देख तो रहा है कि मैं कितना ऊँचा हूँ, और, मतलब, उसे मालूम होना चाहिए कि मैं ज़्यादा से ज़्यादा सात साल का हूँ, हद से हद आठ का – फिर क्यों पूछना है? मगर उसके अपने बड़े विचार हैं, बड़ी आदतें हैं, और वह ज़ोर दिए जाता है:  “आँ? कितने साल का है तू? आँ?” मैं उससे कहता हूँ:  “साढ़े सात.”

अब वह अपनी आँखें फाड़ेगा और सिर पकड़ लेगा, मानो मैंने उससे ये कह दिया हो कि कल ही मेरे एक सौ इकसठ साल पूरे हुए हैं. वो एकदम कराहने लगेगा, जैसे कि उसके तीन दाँतों में दर्द हो रहा हो:  “ओय-ओय-ओय! साढ़े सात! ओय-ओय-ओय!” मैं कहीं उस पर तरस खाकर रोने न लगूँ और समझ जाऊँ कि ये मज़ाक है, वो कराहना बन्द कर देगा. अब वो दो उँगलियाँ मेरे पेट में ज़ोर से गड़ाएगा और जोश में चहकेगा:  “जल्दी ही फ़ौज में जाएगा! आँ?”  और फिर वह वापस इस खेल की शुरुआत पर जाएगा और मम्मा से, पापा से सिर हिलाते हुए कहेगा:  “क्या हो रहा है, क्या हो रहा है! साढ़े सात! हो चुके!” और फिर मेरी ओर मुड़ कर कहेगा: “और मैंने तुझे इत्ता सा देखा था!” वह हवा में क़रीब बीस सेंटीमीटर दिखाता है. वो भी तब, जब मुझे अच्छी तरह से मालूम है कि मेरी लम्बाई इक्यावन सेंटीमीटर थी. मम्मा के पास तो ऐसा सर्टिफिकेट भी है. सरकारी. मगर मैं इस बड़े आदमी की बात का बुरा नहीं मानता. वे सब एक जैसे ही होते हैं. मुझे पक्का मालूम है कि अब वह सोच में पड़ जाएगा. और वह सोचने लगेगा. गहरी सोच. वह अपना सिर सीने पर लटका लेगा, जैसे सो गया हो. मैं हौले से उसके हाथों से छूटने की कोशिश करूँगा. मगर वैसा नहीं होता. बड़ा आदमी सिर्फ ये याद करेगा कि उसकी जेब में और कौन कौन से सवाल पड़े हैं, वह उन्हें याद करेगा और आख़िरकार ख़ुशी से मुस्कुराते हुए पूछेगा:  “ओह, हाँ! और तू क्या बनेगा? आँ? क्या बनना चाहता है?”  सच कहूँ तो, मैं तो गुफ़ा विज्ञान पढ़ना चाहता हूँ, मगर मैं यह भी जानता हूँ कि नये बड़े आदमी को ये बोरिंग लगेगा, समझ में नहीं आएगा, अजीब सा लगेगा, और इसलिए उसे उसकी लाइन से न हटाने के लिए मैं कहूँगा:  “मैं आईस्क्रीम बेचने वाला बनना चाहता हूँ. उसके पास हमेशा जितनी चाहो उतनी आईस्क्रीम होती है”. 

नए बड़े आदमी का चेहरा फ़ौरन चमकने लगेगा. सब कुछ ठीक है, सब वैसे ही हो रहा है जैसे वह चाहता  है, बिना लीक से हटे. इसलिए वह मेरी पीठ थपथपाएगा (खूब दर्द होता है) और मेहेरबानी से कहेगा:  “करेक्ट! लगे रहो! शाबाश!” मैं अपनी मासूमियत में सोचता हूँ कि सब हो गया, किस्सा ख़तम, और थोड़ी हिम्मत से उससे दूर हटने की कोशिश करूँगा, क्योंकि मेरे पास टाइम नहीं है, अभी मेरा होम वर्क नहीं हुआ है और दूसरे हज़ारों काम पड़े हैं, मगर वह मेरी इस आज़ाद होने की कोशिश को भाँप लेगा और उसे जड़ से ही ख़त्म कर देगा, वो मुझे अपने पैरों के बीच मुझे दबोचेगा, और उँगलियाँ गड़ाएगा, मतलब, साफ़ साफ़ कहूँ तो वह ताक़त आज़माएगा, और जब मैं थक जाऊँगा और छटपटाना छोड़ दूँगा, तो वह मुझसे सबसे ख़ास सवाल पूछेगा:  “मुझे ये बताओ, मेरे दोस्त....” वह कहेगा, और उसकी आवाज़ में साँप जैसा ज़हर रेंगने लगेगा, “बताओ, तुम किसे ज़्यादा प्यार करते हो? पापा को या मम्मा को?” बेहूदा सवाल. ऊपर से वह मेरे मम्मा और पापा के सामने पूछा गया है. होशियारी दिखानी होगी.

 “मिखाइल ताल को,” मैं कहूँगा. 

वह ठहाका मार कर हँसेगा. उसे न जाने क्यों ऐसे बेवकूफ़ी भरे जवाब ख़ुश कर देंगे. वह सौ बार दुहराएगा:  “मिखाइल ताल को! हा-हा-हा-हा-हा-हा! क्या बात है? तो? ख़ुशनसीब पेरेंट्स, इस पर आप क्या कहेंगे?”

और वह आधे घंटे तक हँसता रहेगा, और मम्मा और पापा भी हँसेंगे. मुझे उन पर और अपने आप पर शरम आएगी. मैं अपने आप को वचन दूँगा कि बाद में, जब यह ख़ौफ़नाक ड्रामा ख़त्म हो जाएगा, मैं किसी तरह, पापा की नज़र बचा कर मम्मा को किस करूँगा, मम्मा की नज़र बचा कर पापा को किस करूँगा. क्योंकि मैं उन दोनों से एक सा प्यार करता हूँ, ए-क-सा---!! अपने सफ़ेद भालू की क़सम! ये इतना आसान है. मगर, बड़ों को न जाने क्यों, इत्मीनान नहीं होता. मैंने कई बार ईमानदारी से इस सवाल का जवाब देने की कोशिश की है, और हमेशा देखा कि बड़े लोग इस जवाब से ख़ुश नहीं होते, उन पर निराशा छा जाती है, शायद. उन सबकी आँखों में जैसे एक ही बात दिखाई देती है, कुछ ऐसी: ऊ-ऊ-ऊ...कितना मामूली जवाब है! वो मम्मा और पापा से एक सा प्यार करता है! कितना बोरिंग है बच्चा. 

इसीलिए मैं मिखाईल ताल के बारे में गप मार देता हूँ, हँसने दो उन्हें, तब तक मैं फिर से अपने नए परिचित की फ़ौलादी गिरफ़्त से छूटने की कोशिश करूँगा! मगर कहाँ की कोशिश, ज़ाहिर है कि वह यूरी व्लासव से ज़्यादा ताक़तवर है. और अब वो मुझसे एक और सवाल पूछेगा. मगर उसके अन्दाज़ से मैं समझ जाता हूँ कि मामला ख़तम होने को है. ये सबसे ज़्यादा बेवकूफ़ी भरा सवाल होगा, जैसे ख़ाने के बाद वाली स्वीट डिश. अब उसके चेहरे पर एक कृत्रिम डर दिखाई देता है.  “और तूने आज हाथ-मुँह क्यों नहीं धोए?” बेशक, मैंने धोए थे, मगर मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि वो किस तरफ़ जा रहा है.

और उसे ये पुराना, दकियानूसी खेल बोर क्यों नहीं करता. बात को और लम्बा न तानने की गरज़ से, मैं अपने चेहरे पर हाथ फेरता हूँ.

 “कहाँ?!” मैं चीखूँगा. “क्या लगा है?! कहाँ?!”

करेक्ट! सीधा हमला! बड़ा आदमी अपनी पुराने फ़ैशन का राग अलापता है:  “और आँखें?” वह शरारत से कहेगा. “आखें इतनी काली क्यों हैं? उन्हें धोना चाहिए! जा, फ़ौरन बाथरूम में जा!” और आख़िर में वो मुझे छोड़ ही देगा! अब मैं आज़ाद हूँ और अपना काम कर सकता हूँ.

ओह, ये नये परिचय कितनी मुश्किलें खड़ी करते हैं मेरे लिए!  मगर कर क्या सकते हो? सभी बच्चे इस दौर से गुज़रते हैं! न तो मैं पहला हूँ, और न ही आख़री... इसमें किसी भी तरह की तबदीली करना नामुमकिन है.

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7

मुझे क्या अच्छा लगता है...और क्या अच्छा नहीं लगता 


मुझे पापा के घुटने पे पेट के बल लेटना बहुत अच्छा लगता है, हाथ और पैर नीचे छोड़कर घुटने पर यूँ लटकते रहना जैसे फेंसिंग पर कोई कपड़ा सूख रहा हो. मुझे ड्राफ्ट्स, शतरंज और दोमिनो खेलना अच्छा लगता है, सिर्फ़ इस शर्त पर कि मैं बस, जीतता रहूँ. अगर जीतता नहीं हूँ, तो नहीं खेलता.

डिब्बे में बन्द भुनगे की लगातार खुरखुर करने की आवाज़ सुनना मुझे अच्छा लगता है. और छुट्टी वाले दिन सुबह पापा के बिस्तर में दुबकना अच्छा लगता है जिससे मैं पापा के साथ कुत्ते के बारे में बातें कर सकूँ: कैसे हम एक बड़े घर में रहने जाएँगे, और कुत्ता खरीदेंगे, और उसकी देखभाल करेंगे, और उसे खाना खिलाएँगे, और वह कितना शांत और अक्लमन्द होगा, और वह कैसे शुगर क्यूब्स चुराएगा, और कैसे मैं ख़ुद उसके पीछे पीछे गंदा पानी पोंछता रहूँगा, और वह मेरे पीछे पीछे चलता रहेगा, एक वफ़ादार कुत्ते की तरह. 

 मुझे टी.वी. देखना भी अच्छा लगता है : चाहे कुछ भी दिखा रहे हों, चाहे सिर्फ़ कोई टेबल्स ही क्यों न हों. 

मुझे मम्मा के कान में नाक से साँस छोड़ना अच्छा लगता है. गाना मुझे ख़ासकर अच्छा लगता है और मैं हमेशा ख़ूब ज़ोर से गाता हूँ.

लाल घुड़सवारों के बारे में कहानियाँ सुनना मुझे बेहद अच्छा लगता है, और यह भी अच्छा लगता है कि वे हमेशा जीतते रहें. 


 

आईने के सामने खड़ा होना और तरह तरह से मुँह बनाना मुझे अच्छा लगता है, जैसे मैं डॉल्स-थियेटर का पेत्रूश्का होऊँ. मछली का अचार भी मुझे बहुत अच्छा लगता है. 

कांचिल के बारे में कहानियाँ पढ़ना मुझे पसन्द है. ये एक छोटा सा, होशियार और शरारती हिरन है. उसकी हँसती हुई आँखें हैं, और छोटे छोटे सींग हैं, और गुलाबी खुर हैं. जब हम बड़े घर में रहने जाएंगे तो हम अपने लिए एक कांचिल खरीदेंगे, वो बाथ-हाऊस में रहा करेगा. मुझे उस जगह तैरना भी पसन्द है जो उथली हो, जिससे बालू वाले तल को हाथों से पकड़ सकूँ.   

मुझे जुलूसों में लाल झंडा हिलाना और पाइप से  ‘तुत्-तुत् ! ’ करना अच्छा लगता है. 

टेलिफ़ोन पे बात करना तो ख़ूब ही अच्छा लगता है. 

मुझे लकड़ी को समतल करना, बुरादा बनाना अच्छा लगता है, मैं प्राचीन योद्धाओं के और भैंसों के सिर बना सकता हूँ, और मैंने मिट्टी से तीतर और सम्राट-तोप बनाई है. ये सब गिफ़्ट में देना मुझे अच्छा लगता है. जब मैं पढ़ता हूँ तो उस समय टोस्ट या कोई और चीज़ खाते रहना मुझे अच्छा लगता है. 

मुझे मेहमान अच्छे लगते हैं. 

और, मुझे घास के साँप, छिपकलियाँ और मेंढक अच्छे लगते हैं. वो इतने फुर्तीले होते हैं. मैं उन्हें अपनी जेबों में रखता हूँ. मुझे अच्छा लगता है, जब मैं खाना खा रहा होता हूँ, और घास का साँप मेज़ पर पड़ा हो. अच्छा लगता है, जब दादी मेंढक को देखकर चिल्लाती है, “हटाओ इस गन्दगी को!” – और कमरे से भाग जाती है. 

मुझे हँसना अच्छा लगता है...कभी कभी मेरा दिल बिल्कुल हँसने को नहीं करता, मगर मैं अपने आप को मजबूर करता हूँ, ज़बर्दस्ती हँसी निकालता हूँ – और देखता हूँ कि सचमुच में हँसी आ जाती है. 

जब मैं अच्छे मूड में होता हूँ तो मेरा दिल उछलने-कूदने को करने लगता है. एक बार मैं पापा के साथ ज़ू-पार्क गया, और मैं रास्ते पर उसके चारों ओर उछलता-कूदता रहा, और उन्होंने पूछा:  “ये तू उछल क्यों रहा है?” और मैंने कहा: “मैं इसलिए उछल रहा हूँ, क्योंकि तुम मेरे पापा हो!” वो समझ गए. मुझे ज़ू-पार्क जाना अच्छा लगता है! वहाँ ग़ज़ब के हाथी हैं. और एक हाथी का बच्चा भी है. जब हम बड़े घर में रहने लगेंगे, तो हम एक हाथी का बच्चा खरीदेंगे. मैं उसके लिए एक गैरेज बनाऊँगा.

मुझे कार के पीछे खड़ा होना बहुत अच्छा लगता है, जब वह घर्र –घर्र करती है, और पेट्रोल सूंघना पसन्द है.   मुझे कैफ़े में जाना अच्छा लगता है – आईस्क्रीम खाना और उसके ऊपर मिनरल वाटर पीना. उससे नाक में चुभन होती है और आँखों में आँसू आ जाते हैं.

 जब मैं कॉरीडोर में दौड़ता हूँ, तो पूरी ताक़त से पैर पटकना अच्छा लगता है.

मुझे घोड़े बहुत पसन्द हैं, उनके चेहरे इतने सुन्दर और भले होते हैं. 

मुझे बहुत कुछ अच्छा लगता है!   

...और क्या अच्छा नहीं लगता

क्या अच्छा नहीं लगता, तो वो है दाँतों का इलाज करवाना. दाँत वाली कुर्सी देखते ही, फ़ौरन दुनिया के दूसरे छोर पे भाग जाने को जी करता है. ये भी अच्छा नहीं लगता, कि जब मेहमान आते हैं, तो कुर्सी पर खड़े होकर कविताएँ सुनाना पड़ता है. जब पापा मम्मा को लेकर थियेटर जाते हैं, तो अच्छा नहीं लगता.

सॉफ्ट-बॉइल्ड अण्डे तो मैं बर्दाश्त ही नहीं कर पाता, जब उन्हें ग्लास में हिलाते हैं, उसमें ब्रेड मिलाते हैं, और ज़बर्दस्ती खिलाते हैं.... मुझे ये भी अच्छा नहीं लगता, कि जब मम्मा मेरे साथ घूमने निकलती है, और अचानक रोज़ा आण्टी मिल जाती है!

तब वे सिर्फ एक दूसरे से ही बातें करती रहती हैं, और मैं समझ ही नहीं पाता कि क्या करूँ. नई ड्रेस में घूमना अच्छा नहीं लगता – उसमें मैं लकड़ी जैसा लगता हूँ. जब हम ‘रेड और व्हाईट’ का खेल खेलते हैं, तो मुझे ‘व्हाईट’ होना अच्छा नहीं लगता. तब मैं खेल से बाहर हो जाता हूँ, और बस! और जब मैं ‘रेड’ बनता हूँ, तो मुझे क़ैद होना अच्छा नहीं लगता. तब भी मैं भाग जाता हूँ. जब मुझे हराते हैं, तो अच्छा नहीं लगता. मुझे जन्म दिन पर “कारवाँ” खेलना अच्छा नहीं लगता: मैं छोटा नहीं हूँ.

मुझे अच्छा नहीं लगता, जब लड़के शान बघारते हैं. और, ये तो बिल्कुल ही अच्छा नहीं लगता, जब मेरी ऊँगली कट जाती है, और ऊपर से उस पर आयडीन लगाना पड़ता है. मुझे ये अच्छा नहीं लगता कि हमारा कॉरीडोर बेहद तंग है और बड़े लोग हर पल कुछ न कुछ लिए इधर से उधर घूमते ही रहते हैं – कोई बर्तन ले जा रहा होता है, तो कोई चाय की केतली और चिल्लाते हैं: ”बच्चों, पैरों के बीच में न कड़मड़ाओ! होशियार, मेरे हाथों में गरम बर्तन है!” और, जब मैं सोने लगता हूँ, तो मुझे अच्छा नहीं लगता कि पड़ोस के कमरे में बच्चे कोरस गाते हैं... जब रेडियो पर बच्चे बूढ़ों की आवाज़ में बातें करते हैं, तो मुझे ज़रा भी अच्छा नहीं लगता!...

    





8


“वो ज़िन्दा है और चमक रहा है...”



एक बार शाम को मैं आँगन में बैठा था, बालू के पास, और मम्मा का इंतज़ार कर रहा था. वह, शायद इंस्टिट्यूट में, या दुकान में अटक गई थी, या, हो सकता है कि उसे काफ़ी देर तक बस स्टॉप पर खडे रहना पड़ा हो. मालूम नहीं. सिर्फ हमारे आँगन में सभी के मम्मा-पापा आ चुके थे, और बच्चे उनके साथ अपने-अपने घर चले गए थे और, हो सकता है ब्रेड-रिंग्स और चीज़ के साथ चाय भी पी रहे हों, मगर मेरी मम्मा अभी तक नहीं आई थी... 

अब तो खिड़कियों में रोशनी भी होने लगी, और रेडिओ से म्यूज़िक सुनाई देने लगा, और आसमान में काले बादल चलने लगे – वे दाढ़ी वाले बूढ़ों जैसे लग रहे थे... 

मुझे भूख भी लग रही थी, मगर मम्मा का तो पता ही नहीं था, और मैं सोच रहा था कि अगर मुझे ये मालूम होता कि मेरी मम्मा को भूख लगी है और वह दुनिया के किसी कोने में मेरा इंतज़ार कर रही है, तो मैं फ़ौरन दौड़ता हुआ उसके पास आ जाता, बिल्कुल देर नहीं करता और उसे बालू पर बैठकर इंतज़ार करने और ‘बोर’ होने पर मजबूर न करता.    


इसी समय मीश्का आँगन में निकला. उसने कहा:  “हैलो!” और मैंने भी जवाब दिया:  “हैलो!” मीश्का मेरी बगल में बैठ गया और डम्प-ट्रक लेकर देखने लगा.


  

 

“ओ हो!” मीश्का ने कहा. “कहाँ से लिया? और क्या ये ख़ुद बालू इकट्ठा करता है? ख़ुद नहीं करता? और ख़ुद गिराता है? हाँ? और हैण्डल? ये किसलिए? इसे घुमा सकते हैं? हाँ? ओ हो! मुझे घर ले जाने देगा?” मैंने  कहा : “नहीं, नहीं दूँगा. गिफ्ट है. पापा ने जाने से पहले मुझे दिया था.”


मीश्का ने मुँह फुला लिया और मुझसे दूर हट गया. आँगन में अंधेरा और गहरा हो गया. 

मैं गेट की तरफ़ ही देख रहा था जिससे कि मम्मा के आने का मुझे फ़ौरन पता चल जाए. मगर वह आ ही नहीं रही थी. ज़ाहिर है कि उसे रोज़ा आंटी मिल गई हो, और वे दोनों खड़े होकर बातें कर रही हों, और मेरे बारे में सोच भी नहीं रही हों. मैं बालू पर लेट गया. 


मीश्का ने कहा: ”डम्प-ट्रक नहीं देगा?”  “छोड़ ना, मीश्का.” तब मीश्का ने  कहा: ”इसके बदले मैं तुझे एक ग्वाटेमाला और दो बार्बादोस दूँगा!” मैंने कहा: “ले, कर ले मुकाबला डम्प-ट्रक का बार्बादोस से...” और मीश्का बोला:  “अच्छा, मैं तुझे स्विमिंग-रिंग दूँ?” मैंने कहा:  “तेरी रिंग तो फूटी हुई है.” मीश्का पीछे हटने को तैयार नहीं था:  “तू उसे चिपका लेना!” मुझे गुस्सा भी आ गया.  “और तैरूँगा कहाँ? बाथरूम में? हर मंगलवार को? ” 

मीश्का ने फिर से मुँह फुला लिया. मगर फिर बोला:  “चल, जो चाहे सो हो! तू भी क्या याद करेगा! ले!” और उसने मेरी ओर माचिस की डिबिया बढ़ाई. मैंने उसे ले लिया.  “तू इसे खोलकर देख,” मीश्का ने कहा, “तब पता चलेगा!” मैंने डिबिया खोली. शुरू में तो मुझे कुछ भी नज़र नहीं आया, मगर फिर देखी हल्की-हरी रोशनी, जैसे कि दूर, मुझसे बहुत दूर एक नन्हा-सा तारा चमक रहा है, और साथ ही मैं उसे अपने हाथों में पकड़े हुए हूँ.

 “ये क्या है, मीश्का,” मैंने फुसफुसाकर कहा, “ये क्या चीज़ है?”  “ये जुगनू है,” मीश्का ने कहा. “ क्यों, अच्छा है ना? ये ज़िन्दा है, फिकर न कर.”  “मीश्का,” मैंने कहा, “मेरा डम्प-ट्रक ले ले, लेना है? हमेशा के लिए ले ले, हमेशा के लिए! मगर मुझे ये नन्हा सितारा दे दे, मैं इसे घर ले जाऊँगा...”

 मीश्का ने लपक कर मेरा डम्प-ट्रक ले लिया और घर भाग गया. मैं अपने जुगनू के साथ रह गया, उसकी ओर देखता रहा, देर तक देखता रहा, मगर जी ही नहीं भर रहा था: कैसा हरा-हरा है ये, जैसे किसी फेयरी-टेल में हो, और कैसे ये, हाँलाकि पास ही है, हथेली पर, मगर चमक इस तरह से रहा है, जैसे बहुत दूर हो...मैं ठीक से साँस नहीं ले पा रहा था, और मैं सुन रहा था कि मेरा दिल कैसे धड़क रहा है, और कोई चीज़ हौले-हौले नाक में चुभ रही थी, जैसे मैं बस रोने ही वाला हूँ.

 मैं बड़ी देर तक इसी तरह बैठा रहा, खू-ऊ-ऊ-ऊ-ब देर तक. चारों ओर कोई भी नहीं था. मैं दुनिया की हर चीज़ के बारे में भूल गया था. 

मगर तभी मम्मा आ गई मैं बहुत ख़ुश हो गया और हम घर की ओर चले. और जब हम ब्रेड-रिंग्ज़ और चीज़ के साथ चाय पीने लगे, तो मम्मा ने पूछा:  “तो, क्या कहता है तेरा डम्प-ट्रक?” और मैंने कहा:  “मम्मा, मैंने उसे बदल लिया.” मम्मा ने कहा: ”बहुत अच्छे! किस चीज़ से बदल लिया?” मैंने जवाब दिया:

 “जुगनू से! ये रहा वो, डिबिया में रहता है. लाइट बन्द करो ना!” और मम्मा ने लाइट बन्द कर दी, कमरे में अंधेरा हो गया, और हम दोनों मिलकर हल्के-हरे सितारे की ओर देखने लगे. फिर मम्मा ने लाइट जला दी.  “हाँ,” उसने कहा, “ये जादू है! मगर तूने अपनी इतनी कीमती चीज़ – डम्प-ट्रक, इस कीड़े से कैसे बदल ली?”  “मैं इतनी देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था,” मैंने कहा, “मुझे इतना बुरा लग रहा था, और ये जुगनू, मुझे दुनिया के हर डम्प-ट्रक से ज़्यादा अच्छा लगा.” मामा ने एकटक मेरी ओर देखा और पूछा:  “ये ज़्यादा अच्छा क्यों लगा?” मैंने  जवाब दिया: ”तुम समझ क्यों नहीं रही हो, मम्मा?! ये ज़िन्दा है! और चमक रहा है!...” 


**********
















9.


 मज़ाक का माद्दा होना चाहिए



एक बार मैं और मीश्का होमवर्क कर रहे थे. हमने अपने सामने नोट-बुक्स रख लीं और किताब में से लिखने लगे. साथ ही साथ मैं मीश्का को लंगूरों के बारे में भी बता रहा था, कि उनकी बड़ी-बड़ी आँखें होती हैं, जैसे कंचे, और ये कि मैंने लंगूर की तस्वीर भी देखी है, कैसे उसने बॉल-पेन पकड़ रखा था, खुद तो बहुत छोटा-छोटा था और बड़ा प्यारा था.


 

फिर मीशा ने कहा:  “लिख लिया?” मैंने कहा:

“कब का.” ”तू मेरी नोट-बुक जाँच ले,” मीश्का ने कहा, “और मैं – तेरी.” और हमने नोट-बुक्स बदल लीं. और जैसे ही मैंने देख कि मीश्का ने क्या लिखा है, तो एकदम हँसने लगा. देखता क्या हूँ – मीश्का भी हँस-हँस के लोटपोट हुआ जा रहा है, हँसते-हँसते वह नीला पड़ गया.  “ मीश्का, ये तू लोट-पोट क्यों हो रहा है?” और वह बोला:  “मैं इसलिए लोट-पोट हो रहा हूँ, क्योंकि तूने गलत-सलत लिख लिया है! और तू क्यों हँस रहा है?” मैंने जवाब दिया:  “मैं भी इसीलिए, बस, तेरे बारे में. देख, तूने लिखा है : “बफ गिरने लगी”. ये - “बफ” कौन है?”  मीश्का लाल हो गया:  “बफ – शायद , बर्फ है. और देख, तूने लिखा है: ‘सर्दियाँ आ पची.’ ये क्या है?”

 “हाँ,” मैंने कहा, “ – ‘पची’ नहीं, बल्कि ’पहुँची’. कुछ नहीं कर सकते, फिर से लिखना पड़ेगा. ये सब लंगूरों की वजह से हुआ.”

 और हम दुबारा लिखने लगे. और जब पूरा लिख लिया तो मैंने कहा:   “चल सवाल पूछते हैं!”  “चल,” मीश्का ने कहा. इसी समय पापा आए. उन्होंने कहा :  “हैलो, कॉम्रेड स्टुडेंट्स...” और वो मेज़ के पास बैठ गए. 

मैंने कहा:  “लो, सुनो, पापा, मैं मीश्का से कैसा सवाल पूछता हूँ : मान ले, मेरे पास दो एपल्स हैं, और हम तीन लोग हैं, तो उन्हें तीनों में बराबर-बराबर कैसे बाँटना चाहिए?”

मीश्का ने फ़ौरन गाल फुला लिए और सोचने लगा. पापा ने गाल नहीं फुलाए, मगर वो भी सोचने लगे. वे बड़ी देर तक सोचते रहे. फिर मैंने कहा:  “हार गया, मीश्का?” मीश्का ने कहा:  “हार गया!” मैंने कहा:  “ हम तीनों को बराबर-बराबर हिस्सा मिले इसलिए इन एपल्स का स्ट्यू बनाना चाहिए.” और मैं ठहाके लगाने लगा : “ये मुझे मीला बुआ ने सिखाया था!...” मीश्का ने और भी गाल फुला लिए. तब पापा ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और कहा:  “डेनिस, अगर तू इतना चालाक है, तो चल, मैं तुझसे सवाल पूछूँगा.”  “पूछो, पूछो!” मैंने कहा. पापा कमरे में घूमने लगे.

 “तो, सुन,” पापा ने कहा, “एक लड़का क्लास पहली ‘बी’ में पढ़ता है. उसके परिवार में पाँच लोग हैं. मम्मा सात बजे उठती है और कपड़े पहनने में दस मिनट खर्च करती है. फिर पाँच मिनट पापा ब्रश करते हैं. दादी दुकान जाकर आने में उतना समय लगाती है जितना मम्मा कपड़े पहनने में प्लस पापा ब्रश करने में लगाते हैं. और दादा जी अख़बार पढ़ते हैं – उतनी देर, जितनी देर दादी दुकान में लगाती है, मायनस, जितने बजे मम्मा उठती है.         

जब वे सब इकट्ठे होते हैं तो वे इस पहली ‘बी’ क्लास के लड़के को उठाना शुरू करते हैं. इस पर उतना समय लगता है जितने में दादा जी अख़बार पढ़ते हैं , प्लस दादी दुकान जाकर आती है. 

जब पहली ‘बी’ क्लास का लड़का उठता है, तो वह उतनी देर अलसाता रहता है, जितने में मम्मा कपड़े पहनती है प्लस पापा ब्रश करते हैं. और वह नहाता उतनी देर है जितनी देर दादा जी अख़बार पढ़ते  हैं डिवाइडेड बाइ दादी दुकान जाकर आती है. स्कूल में वह इतना लेट पहुँचता है, जितना समय अलसाने में लेता है प्लस नहाता है माइनस मम्मा का उठना मल्टिप्लाईड बाय पापा का ब्रश करना.


सवाल ये है: ये पहली ’बी’ क्लास का लड़का कौन है और अगर उसका काम इसी तरह चलता रहा तो उसे किस बात का ख़तरा है? बस!” 

यहाँ पापा कमरे के बीच में खड़े हो गए और मेरी ओर देखने लगे. और मीश्का ज़ोर से ठहाका मारते हुए हँसने लगा और वह भी मेरी ओर देखने लगा. वे दोनों मेरी ओर देख रहे थे और ठहाके लगा रहे थे. 

मैंने कहा:  “ये सवाल मैं एकदम से नहीं हल कर सकता, क्योंकि हमने अभी तक ऐसे सवाल किए नहीं हैं.”

 इसके अलावा मैंने एक भी लब्ज़ नहीं कहा और कमरे से निकल गया, क्योंकि मुझे फ़ौरन इस बात का अन्दाज़ा हो गया था कि इस सवाल के जवाब में निकलता है एक आलसी लड़का और उसे जल्दी ही स्कूल से भगा दिया जाएगा. मैं कमरे से निकल कर कॉरीडोर में आया और हैंगर के पीछे चला गया और सोचने लगा कि अगर ये सवाल मेरे बारे में है, तो ये सही नहीं है, क्योंकि मैं हमेशा फ़ौरन उठ जाता हूँ और बस थोड़ी ही देर अलसाता हूँ, बस उतना ही, जितना ज़रूरी है. और मैंने ये भी सोचा कि अगर पापा को मेरे बारे में इस तरह कहानियाँ बनानी हैं, तो, ठीक है, मैं घर से चला जाऊँगा – सीधे बंजर धरती पर. वहाँ हमेशा काम मिल जाता है, वहाँ लोगों की ज़रूरत रहती है, ख़ासकर नौजवानों की. मैं वहाँ प्रकृति को सँवारूंगा., और पापा अपने डेलिगेशन के साथ अल्ताय प्रदेश में आएँगे, मुझे देखेंगे, और मैं एक मिनट रुक कर कहूँगा:  “नमस्ते, पापा,” और आगे चल पडूँगा ज़मीन सँवारने. और वो कहेंगे:  “मम्मा तुझे प्यार भेजती है...” और मैं कहूँगा:  “थैंक्यू... कैसी है मम्मा?”   

और वो कहेंगे:  “ठीक है.” और मैं कहूँगा:  “शायद वह अपने इकलौते बेटे को भूल गई है?” और वो कहेंगे:  “क्या बात करता है, उसका वज़न सैंतीस किलो कम हो गया है! इतना याद करती है!”


और आगे मैं उनसे क्या कहूँगा, मैं सोच नहीं पाया, क्योंकि मुझ पर एक ओवरकोट गिरा और पापा अचानक हैंगर के पीछे घुसे. उन्होंने मुझे देखा और बोले:  “आह, तो तू यहाँ है! ये तेरी आँखों को क्या हुआ है? कहीं तूने इस सवाल को अपने ऊपर तो नहीं ले लिया?” उन्होंने कोट उठाकर जगह पर टाँग दिया और आगे कहा:

“ये सब तो मैंने बस सोचा था. ऐसा बच्चा तो इस पूरी दुनिया में है ही नहीं, तेरी क्लास की तो बात ही नहीं है!” और पापा ने हाथ पकड़ कर मुझे हैंगर्स के पीछे से बाहर निकाला. फिर उन्होंने एक बार और एकटक मेरी ओर देखा और मुस्कुराए:  “इन्सान में मज़ाक का माद्दा होना चाहिए,” उन्होंने मुझसे कहा और उनकी आँखों में प्यारी-प्यारी मुस्कुराहट तैर गई. “ मगर, था ये मज़ाहिया सवाल, है ना? तो! अब हँस भी दे!” और मैं हँस पड़ा. और वो भी. और हम कमरे में गए.....



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10

जादुई अक्षर



कुछ दिन पहले हम कम्पाऊण्ड में घूम रहे थे : अल्योन्का, मीश्का और मैं.. अचानक कम्पाऊण्ड में एक ट्रक आया. और उसमें पड़ी है क्रिसमस-ट्री. हम ट्रक के पीछे भागे. वो केयर-टेकर के पास गया, रुक गया, और हमारे चौकीदार के साथ ड्राइवर क्रिसमस ट्री को उतारने लगे. वे एक दूसरे पर चिल्ला रहे थे.:  “धीरे! उठा! उठा! दाएँ! बाएँ! उसे आधार पे रख! आराम से, वर्ना पूरा सिरा तोड़ देगा.” और जब उसे उतार लिया गया, तो ड्राइवर ने कहा:  “अब इस क्रिसमस ट्री को सजाना चाहिए,” और चला गया. 

और हम क्रिसमस ट्री के पास रुक गए. 

वह ज़मीन पर पड़ा था, – बहुत बड़ा, खुरदुरा, और उसमें से बर्फ की इतनी प्यारी ख़ुशबू आ रही थी, कि हम बेवकूफ़ों के समान खड़े रहे और मुस्कुराते रहे. फिर अल्क्योन्का ने एक टहनी पकड़ी और कहा:


 “देखो, क्रिसमस ट्री पर ‘सीस्की’*  लटक रही हैं.”


 



“सीस्की!” ये उसने गलत बोला था! मैं और मीश्का ज़ोर से हँस पड़े. हम दोनों एक जैसा हँस रहे थे, मगर फिर मीश्का और भी ज़ोर से हँसने लगा, जिससे कि मुझे हरा सके. तो, मैंने भी ज़ोर-ज़ोर से हँसना शुरू किया, जिससे कि वो ये न समझे कि मैं हार मान गया हूँ. मीश्का ने हाथों से पेट पकड़ लिया, जैसे उसे बहुत दर्द हो रहा हो, और चिल्लाया:  “ओय, ओय, हँसी के मारे मर जाऊँगा! ‘सीस्की’ !”  और मैंने भी जोश में आकर कहा:  “पाँच साल की हो गई है लड़की, और कहती है “सीस्की”...हा-हा-हा! फिर मीशा हँसते हँसते अपने होश खो बैठा और कराहते हुए बोला:  “आह, मेरी तबियत बिगड़ रही है! सीस्की...” और वो हिचकियाँ लेने लगा:

 “ईक्!...सीस्की. ईक्! ईक्! मर जाऊँगा हँसी के मारे! ईक्!”

तब मैंने बर्फ का एक गोला उठाया और उसे अपने माथे पर रखने लगा, मानो मेरा दिमाग़ सुलग रहा हो और मैं पागल हो गया हूँ. मैं गरजा:  “लड़की पाँच साल की है, जल्दी ही उसकी शादी करनी पड़ेगी! और वो कहती है – ‘सीस्की’ !” अल्योन्का का निचला होंठ इस तरह से मुड़ा कि वह कान के पीछे चला गया.  “मैंने ठीक ही बोला था! वो तो मेरा दाँत टूट गया है और उसमें से हवा निकल जाती है. मैं कहना चाहती हूँ ‘सीस्की’ , और मेरे मुँह से सीटी की तरह निकलता है ‘सीस्की’...”  मीश्का ने कहा:  “ऐख़, ऐसा कहीं होता है! उसका दाँत गिर गया है! मेरे तो पूरे तीन गिर गए हैं, और दो हिल रहे हैं, मगर मैं फिर भी सही-सही बोलता हूँ! सुन” “ख़ीख़्की!” क्या? सही में, ज़ोर से बोल – ख़ीख़ख़- कीई! देख, मेरा कैसा बढ़िया निकलता है : ख़ीख़्की! “ मगर अल्योन्का ज़ोर से चीख़ती है. वह अकेली हम दोनों से ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाती है:  “गलत! गलत! हुर्रे! तू कह रहा है ख़ीख़्की, और कहना चाहिए सीस्की!” और मीश्का अपनी ही बात पर अड़ा है:  “सही में, सीस्की नहीं, बल्कि ख़ीख्की कहना चाहिए.” और वो दोनों बस चिल्लाए जा रहे हैं.  ‘सीस्की! – ‘ख़ीख्की!’ – ‘सीस्की!’ बस इतना ही सुनाई दे रहा है.  उनकी ओर देखते हुए मैं इतने ठहाके लगा रहा था, कि मुझे भूख भी लग आई. मैं घर की ओर चलने लगा और पूरे समय मैं सोच रहा था : ‘वे इतनी बहस क्यों कर रहे थे, जबकि वे दोनों ही गलत बोल रहे हैं? ये तो बड़ा आसान शब्द है. मैं रुक गया और ज़ोर से बोला:  “कोई सीस्की नहीं है. कोई ख़ीख्की भी नहीं है, बल्कि छोटा सा, साफ़ ‘फ़ीफ़्की!’ है. 

बस, यही फ़ाइनल है!


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असल में सही शब्द है ‘शीश्की’ जिसका मतलब है – छोटे छोटे फल. ये तीनों बच्चे 5-8 वर्ष की आयु के हैं, तीनों के दूध के दाँत टूट गए हैं इसलिए वे ‘श’ का उच्चारण नहीं कर पाते . उसी शब्द को सीस्की, ख़ीख्की और फ़ीफ़्की कहते हैं. तो ‘श’ जादुई अक्षर हुआ जो हरेक को अलग अलग प्रतीत होता है. – अनु.      











11


एक बूंद घोड़े को मार डालती है



जब पापा बीमार पड़े तो डॉक्टर आए और बोले:

 “डरने की कोई बात नहीं है, सिर्फ़ थोड़ा ज़ुकाम है. मगर मैं आपको सलाह दूँगा की सिगरेट पीना छोड़ दीजिए, आपके सीने में हल्की सी घरघराहट है.”

और जब वो चले गए तो मम्मा ने कहा:

 “इन नासपीटी सिगरेटों की वजह से अपनी तबियत को इस हद तक ख़राब करना – कितनी बेवकूफ़ी की बात है! अभी तो तुम इतने जवान हो, और अभी से सीने में घरघराहट और साँय-साँय होने लगी.”  “ओह,” पापा ने कहा, “तुम तो बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कह रही हो! ऐसी कोई ख़ास घरघराहट नहीं है, साँय-साँय तो बिल्कुल भी नहीं है. बस एक मामूली सी घरघराहट है. इसकी कोई गिनती नहीं है.”

 “नहीं – गिनती है!” वो चहकी, “तुम्हें मामूली घरघराहट की नहीं, बल्कि और ज़्यादा चरमराहट, झनझनाहट, और किटकिटाहट की ज़रूरत है, मैं तुम्हें अच्छी तरह जानती हूँ...”  “जो भी हो, मगर मुझे आरी की आवाज़ की ज़रूरत नहीं है,” पापा ने उसकी बात काटी.  “मैं तुम पर आरी नहीं चला रही हूँ,” मम्मा का चेहरा लाल हो गया, “मगर तुम समझ लो कि ये वाक़ई में ख़तरनाक है. तुम्हें तो मालूम है कि सिगरेट के ज़हर की एक बूंद तन्दुरुस्त घोड़े को भी मार डालती है!”


 


तो ये बात है! मैंने पापा की ओर देखा. वो हट्टे-कट्टे हैं, इसमें कोई शक नहीं, मगर घोड़े के मुक़ाबले में कम ही हैं. वो बस मुझसे या फिर मम्मा से बड़े हैं, मगर, चाहे कितना ही घुमा फिरा कर क्यों न कहो, घोड़े से कम ही हैं और सबसे मरियल गाय से भी कम ही हैं. गाय तो हमारे दीवान पर आ ही नहीं सकती थी, मगर पापा आराम से उसमें समा जाते हैं. मैं बहुत डर गया. मैं किसी हालत में नहीं चाहता था कि उन्हें ऐसे ज़हर की बूँद मार डाले. नहीं चाहता था मैं ये, कभी नहीं और किसी कीमत पर नहीं. इन विचारों के कारण मैं बड़ी देर तक सो न सका, इतनी देर, कि पता ही नहीं चला कि आख़िर कब आँख लग गई.      

शनिवार को पापा अच्छे हो गए, और हमारे घर मेहमान आए. अंकल यूरा आए, कात्या आण्टी के साथ, बरीस मिखाइलविच और तमारा आण्टी आए. सब आए और बडी शराफ़त से पेश आए, और तमारा आण्टी तो जैसे ही आई, बस, गिरगिर-गिरगिर घूमती ही रही, खुड़बुड़- खुड़बुड़ करती रही, और वह पापा की बगल में चाय पीने बैठ गई. मेज़ पर वह पापा की ओर ध्यान देती रही, उनकी फ़िकर करती रही, पूछती रही कि वे आराम से तो बैठे हैं, खिड़की से हवा तो नहीं ना आ रही है, और आख़िरकार उसने पापा की इतनी ज़्यादा फ़िकर कर डाली और उनका इतना ज़्यादा ध्यान रख डाला कि उनकी चाय में तीन चम्मच शक्कर डाल दी. पापा ने शक्कर मिलाई, चाय चखी और त्यौरियाँ चढ़ा लीं. 

 “मैंने पहले ही इस गिलास में एक बार शक्कर डाली थी,” मम्मा ने कहा, और उसकी आँखें हरी-हरी हो गईं, गूज़बेरी जैसी.         मगर तमारा आण्टी ठहाका मारकर हँस पड़ी. वह इस तरह ठहाके लगा रही थी जैसे मेज़ के नीचे कोई उसके पंजों पे गुदगुदी कर रहा हो. और पापा ने वो बेहद मीठी चाय एक कोने में सरका दी. फिर तमारा आण्टी ने अपने पर्स से एक पतला-सा सिगरेट-केस निकाला और पापा को प्रेज़ेंट किया. 

 “लो, ये बरबाद हुई चाय के बदले तुम्हें दे रही हूँ,” उसने कहा. “हर बार, सिगरेट पीते समय, तुम इस वाक़ये को याद करोगे और इसके क़ुसूरवार को भी.” इस बात के लिए मैं तो उस पर ख़ूब गुस्सा हो गया. वो पापा को सिगरेट की याद क्यों दिला रही है, जबकि बीमारी के दौरान उनकी आदत क़रीब-क़रीब छूट चुकी है? जबकि सिगरेट के ज़हर की बस एक ही बूंद घोड़े की जान ले लेती है, और ये है कि याद दिला रही है. मैंने कहा :  “ आप बेवकूफ़ हो, तमारा आण्टी! ये क्या लगा रखा है! फ़ौरन मेरे घर से निकल जाइए. आपके मोटे –मोटे पैर इस घर में न नज़र आएँ.”आप 

ये मैंने अपने आप से ही कहा, ख़यालों में, इसलिए कोई भी कुछ भी समझ नहीं सका.

पापा ने सिगरेट-केस हाथ में लिया और उसे घुमाकर देखने लगे.  “थैंक्यू, तमारा सिर्गेयेव्ना,” पापा ने कहा, “आपने मेरे दिल को छू लिया. मगर इसमें तो मेरी एक भी सिगरेट नहीं आएगी, सिगरेट-केस इतना छोटा हि, और मैं ‘कज़्बेक’ पीता हूँ. ऊपर से...” अब पापा ने मेरी ओर देखा.  “अच्छा, तो डेनिस,” उन्होंने कहा, “रात के वक़्त चाय की तीसरी प्याली पीने के बदले तू मेरी राइटिंग टेबल के पास जा, वहाँ ‘कज़्बेक’ का पैकेट ले और इन सिगरेट्स को इस तरह से छोटा कर दे कि वे इस सिगरेट-केस में आ जाएँ. कैंची बीच वाली दराज़ में है!” मैं टेबल के पास आया, सिगरेट का पैकेट और कैंची ढूँढ़ी , सिगरेट-केस की नाप ली और सब कुछ वैसा ही किया जैसा उन्होंने कहा था. फिर मैंने भरा हुआ सिगरेट-केस लाकर पापा को दे दिया. पापा ने सिगरेट-केस खोला, मेरी कारीगरी को देखा, फिर मुझे देखा और ज़ोर से हँसने लगे: 

 “मुलाहिज़ा फ़रमाइए, देखिये, मेरे होशियार बेटे ने क्या किया है!” अब सारे मेहमान एक दूसरे से सिगरेट-केस ले लेकर देखने लगे और कानों को बहरा कर देने वाले ठहाके लगाने लगे. तमारा आण्टी तो ख़ास तौर से खूब ज़ोर से ठहाके लगा रही थी. जब उसकी हँसी रुकी तो उसने अपना हाथ मोड़ा और उँगलियों की हड्डियों से मेरे सिर पर ठकठक करने लगी.  “ये तुमने सोचा कैसे, नीचे वाला माउथ-पीस साबुत रख कर ऊपर की क़रीब-क़रीब पूरी तंबाकू काट कर फेंक दी? कश तो तंबाकू का लगाते हैं ना, और तूने उसी को काट कर फेंक दिया! तेरे दिमाग़ में क्या भरा है – मिट्टी या भूसा?”  “तेरे ही दिमाग में भूसा भरा है, तमारीश्चे सातमनवाली!”

बेशक, ये मैंने ख़यालों में ही, अपने आप से कहा. वर्ना मम्मा डाँट लगाती. वैसे भी वो मेरी ओर एकटक बड़ी गहरी नज़र से देख रही थी.

 “अच्छा, इधर आ,” मम्मा ने मेरी ठोढ़ी पकड़ते हुए कहा, “मेरी आँखों में देख!” मैं मम्मा की आँखों में देखने लगा और मुझे महसूस हो रहा था कि मेरे गाल लाल-लाल, बिल्कुल झण्डे जैसे लाल हो गए हैं.  “ये तूने जानबूझकर किया है?” मम्मा ने पूछा. मैं उसे धोखा नहीं दे सका.  “हाँ,” मैंने कहा, “ये मैंने जानबूझकर किया है.”  “तब कमरे से निकल जा,” पापा ने कहा, “वर्ना मेरे हाथों में खुजली हो रही है.” ज़ाहिर है कि पापा कुछ भी समझ नहीं पाए. मगर मैंने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की और कमरे से बाहर निकल गया. क्या कोई मज़ाक की बात है – तंबाकू के ज़हर की एक बूंद घोड़े को मार डालती है!



                                                             ********  

















12

पावेल अंकल



 




जब मरीया  पित्रोव्ना हमारे कमरे में भागती हुई आई, तो वह पहचानी नहीं जा रही थी. वह पूरी लाल हो रही थी, बिल्कुल मिस्टर टमाटर की तरह. वह तेज़-तेज़ साँस ले रही थी. उसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वह पूरी उबल रही हो, बर्तन में उबलते सूप की तरह. जैसे ही वह तीर की तरह हमारे घर में घुसी, फ़ौरन चीख़ी:  “लो, हो गई छुट्टी!” और दीवान पर ढेर हो गई. मैंने कहा, “नमस्ते, मरीया  पित्रोव्ना!” उसने जवाब दिया, “हाँ, हाँ.”  “क्या हुआ है?” मम्मा ने पूछा, “चेहरा कैसा तो हो रहा है!”

 “आप सोच सकती हैं? मरम्मत!” मरीया  पित्रोव्ना फूट पड़ी और मम्मा की ओर देखने लगी. वो बिल्कुल रोने-रोने को हो रही थी. 

मम्मा मरीया  पित्रोव्ना की ओर देख रही थी, मरीया  पित्रोव्ना मम्मा की ओर, और मैं उन दोनों की ओर देख रहा था. आख़िर में मम्मा ने बड़ी सावधानी से पूछा, “मरम्मत....कहाँ?”  “हमारे यहाँ! मरीया  पित्रोव्ना ने कहा. “पूरे घर की मरम्मत कर रहे हैं! आप समझ रही हैं, उनकी छतें टपक रही हैं, बस, वो उन्हीं की मरम्मत कर रहे हैं.”  “बड़ी अच्छी बात है,” मम्मा ने कहा, “ये तो बहुत बढ़िया बात है!”  “पूरे घर में बस, मचान ही मचान,” बदहवासी से मरीया  पित्रोव्ना बोली. पूरा घर मचानों से भरा है, और मेरी बाल्कनी भी मचानों से अटी पड़ी है. उसे बन्द कर दिया है! दरवाज़े को कीलें ठोंककर बन्द कर दिया! और ये कोई एक दिन की बात नहीं है, न ही दो दिनों की बात है, ये तीन महीने से कम की बात नहीं है. पूरी तरह पागल कर दिया है! भयानक!”  “ भयानक किसलिए?” मम्मा ने कहा. “ज़ाहिर है कि ऐसा ही होना चाहिए!”  “अच्छा?” मरीया  पित्रोव्ना फिर चीख़ी. “आपके हिसाब से ऐसा ही होना चाहिए? तो फिर, मुलाहिज़ा फ़रमाइए, मेरा मोप्स्या कहाँ घूमेगा? हाँ? मेरे मोप्स्या पूरे पाँच साल से बाल्कनी में टहलता है. उसे बाल्कनी में घूमने की आदत हो गई है!”  “बर्दाश्त कर लेगा आपका मोप्स्या,” ज़िन्दादिली से मम्मा ने कहा, “यहाँ इन्सानों की ख़ातिर मरम्मत कर रहे हैं, उनकी छतें सूखी रहेंगी, क्या आपके कुत्ते की वजह से सदियों तक छतें गीली ही रहें?”  “ये मेरा सिरदर्द नहीं है!” मरीया  पित्रोव्ना ने बात काटते हुए कहा. “रहें गीली, अगर हमारी हाउसिंग कमिटी ही ऐसी है...” वो शांत ही नहीं हो रही थी और ज़्यादा-ज़्यादा उबल रही थी, ऐसा लग रहा था कि वो ख़ूब ज़्यादा उबल जाएगी, जिससे ढक्कन उछलने लगेगा, और बर्तन का सूप किनारों से बाहर उफ़न जाएगा.

 “कुत्ते की वजह से!” उसने दुहराया, “हाँ, मेरा मोप्स्या किसी भी इन्सान के मुक़ाबले में ज़्यादा होशियार और बढ़िया है! वो पिछले पंजों पर चल सकता है, वो तेज़ रफ़्तार से पोलिश डान्स कर सकता है, मैं उसे प्लेट में खिलाती हूँ. आप समझ रही हैं कि इसका क्या मतलब है?”  “इन्सानों की भलाई दुनिया में हर चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!” मम्मा ने शांति से कहा. मगर मरीया  पित्रोव्ना ने मम्मा पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया.  “मैं उनको सीधा कर दूँगी,” उसने धमकी दे डाली, “मैं मॉस-सोवियत में शिकायत करूँगी!” मम्मा ख़ामोश हो गई. वो, शायद, मरीया  पित्रोव्ना  से झगड़ा करना नहीं चाहती थी, उसे मरीया  पित्रोव्ना की कर्कश आवाज़ से तकलीफ़ हो रही थी. मम्मा के जवाब का इंतज़ार किए बग़ैर ही मरीया  पित्रोव्ना थोड़ी शांत हो गई और अपने भारी-भरकम पर्स में कुछ ढूँढ़ने लगी. 

 “क्या आपने ‘आर्तेक’ सूजी ख़रीद ली है?” उसने व्यस्तता के अन्दाज़ में पूछा.

  “नहीं,” मम्मा ने कहा. 

 “बेकार में,” मरीया  पित्रोव्ना ने ताना दिया. “ ‘आर्तेक’ सूजी से बहुत फ़ायदेमन्द पॉरिज बनाते हैं. आपके डेनिस्का को, मिसाल के तौर पर, थोड़ा तन्दुरुस्त होना बुरा नहीं होगा. मैंने तो तीन-तीन पैकेट ख़रीद लिए!”  “आपको इतने पैकेट्स किसलिए चाहिए,” मम्मा ने पूछा, “आपके घर में तो बच्चे ही नहीं हैं ना?” मरीया  पित्रोव्ना ने अचरज से आँखें फाड़ीं. उसने मम्मा की ओर इस तरह देखा, जैसे मम्मा ने कोई भयानक बेवकूफ़ी भरी बात कह दी हो, क्योंकि वो कुछ समझ ही नहीं पा रही है, साधारण सी बात भी!   “और मोप्स्या?” थरथराते हुए मरीया  पित्रोव्ना चीख़ी. “और मेरा मोप्स्या? उसके लिए तो ‘आर्तेक’ बहुत फ़ायदेमन्द है, ख़ासकर जब उसे खुजली हो जाती है. वह हर रोज़ लंच के समय दो प्लेटें खा जाता है, और फिर भी उसे कुछ और चाहिए होता है!”  “वो इसलिए आपसे मांगता है,” मैंने कहा, “क्योंकि उसकी चर्बी बढ़ रही है.”

 “बड़े लोगों की बातों में नाक मत घुसेड़,” कटुता से मरीया  पित्रोव्ना ने कहा. “बस इसी बात की कमी थी! जा, जाकर सो जा!”

 “बिल्कुल नहीं,” मैंने कहा, “ ’सोने-वोने’ का अभी सव्वाल ही नहीं है. इतनी जल्दी तो कोई सो ही नहीं सकता!”

 “देखो,” मरीया  पित्रोव्ना ने कहा और अपना मोर्चा मम्मा की ओर मोड़ दिया, “देखिए! मुलाहिज़ा फ़रमाइए, कैसे होते हैं बच्चे! वो बहस भी करता है! उसे तो चुपचाप बात माननी चाहिए! जब कहा है, ‘सो जा’ – मतलब ‘सो जाना’ चाहिए. मैं तो जैसे ही अपने मोप्स्या से कहती हूँ :’सो जा!’ वो फ़ौरन कुर्सी के नीचे रेंग जाता है और एक ही सेकंड में खर् र् र्...ख र् र् र्... बस, सो जाता है! मगर बच्चा! वो, देख रही हैं ना, बहस भी करता है!” मम्मा अचानक लाल-लाल हो गई : उसे, ज़ाहिर है, मरीया  पित्रोव्ना पर बड़ा गुस्सा आ रहा था, मगर वो मेहमान के साथ झगड़ा नहीं करना चाह्ती थी. मम्मा तो शराफ़त के मारे कोई भी बेवकूफ़ी बर्दाश्त कर सकती है, मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता. मुझे मरीया  पित्रोव्ना  पर बेहद गुस्सा आया, कि वो मेरा मुक़ाबला अपने मोप्स्या से कर रही है. मैं उससे कहना चाहता था, कि वो बेवकूफ़ औरत है, मगर मैंने अपने आप पर क़ाबू कर लिया, जिससे कि बात और न बढ़ जाए. मैंने अपना ओवरकोट उठाया, कैप ली और कम्पाउण्ड में भागा. वहाँ कोई भी नहीं था. सिर्फ हवा चल रही थी. तब मैं बॉयलर-रूम में भागा. वहाँ हमारा पावेल अंकल रहता है और काम करता है, वह बड़ा ख़ुशमिजाज़ है, उसके दांत एकदम सफ़ेद, और बाल घुंघराले हैं. मुझे वो अच्छा लगता है. मुझे अच्छा लगता है जब वो मेरी तरफ़ झुकता है, एकदम मेरे चेहरे तक, और मेरा छोटा सा हाथ अपने बड़े और गर्माहट भरे हाथ में लेता है, और मुस्कुराता है, और अपनी भारी आवाज़ में प्यार से कहता है:  “नमस्ते, इन्सान!” 


********** 
















13


ऊपर-नीचे, आड़े-तिरछे! 



उस साल गर्मियों में, जब मैं अभी स्कूल नहीं जाता था, हमारे कम्पाउण्ड  में मरम्मत का काम चल रहा था. चारों ओर ईंटें और लकड़ी के फ़ट्टे पड़े हुए थे और कम्पाउण्ड के बीचोंबीच रेत का एक बड़ा ढेर लगा था. और इस ढेर पर हम ‘मॉस्को के निकट फ़ासिस्टों की हार’ नामक खेल खेलते थे, या किले बनाते या यूँ ही कुछ-कुछ खेलते.


 




हमें बहुत अच्छा लगता था, और हमने मज़दूरों से दोस्ती भी कर ली थी, हम मरम्मत के काम में उनकी मदद भी करते थे : एक बार मैं प्लम्बर-अंकल ग्रीशा के लिए उबले हुए पानी की केतली लाया, और दूसरी बार अल्योन्का ने इलेक्ट्रिशियन्स को बताया कि हमारा चोर-दरवाज़ा कहाँ है. हम और भी बहुत सारी मदद करते थे, बस अब इस समय मुझे हर चीज़ याद नहीं है. और फिर पता ही नहीं चला कि मरम्मत का काम कब पूरा हो चला, एक के बाद एक मज़दूर जाने लगे, अंकल ग्रीशा ने हाथ पकड़कर हमसे बिदा ली, उसने मुझे लोहे का एक भारी टुकड़ा गिफ्ट में दिया और वो भी चला गया.     


और अंकल ग्रीशा की जगह कम्पाउण्ड में आईं तीन लड़कियाँ. उन सबने बड़े बढ़िया कपड़े पहने थे : आदमियों जैसी लम्बी-लम्बी पतलूनें पहनी थीं, जिन पर अलग-अलग तरह के रंग लगे थे और वे एकदम कड़क थीं. जब ये लड़कियाँ चलतीं से तो उनकी पतलूनें ऐसी गरजतीं जैसे छत पर पड़ी लोहे की चादर गरजती है. इन लड़कियों ने सिर पे अख़बारों की टोपियाँ पहनी थीं. ये लड़कियाँ पेंटर थीं और उन्हें कहते थे ब्रिगेड. वे बड़ी ख़ुशमिजाज़ और फुर्तीली थीं, उन्हें हँसना अच्छा लगता था और वे हमेशा ‘वादी के फूल, वादी के फूल’ गाती रहती थीं. मगर मुझे ये गाना अच्छा नहीं लगता. और अल्योन्का को भी. और मीश्का को भी ये पसन्द नहीं है. मगर हम सबको ये देखना अच्छा लगता था कि ये पेंटर-लड़कियाँ कैसे काम करती हैं और कैसे उनका हर काम एकदम सही और साफ़-सुथरा होता है. हमें पूरी ब्रिगेड के नाम मालूम थे. उनके नाम थे सान्का, राएच्का और नेल्ली. 

और एक दिन जब हम उनके पास पहुँचे तो सान्या आंटी ने कहा, “बच्चों, भाग कर जाओ, और कहीं से पता करो कि कितने बजे हैं.” मैं भाग कर गया, पता कर के आया और कहा, “बारह बजने में पाँच मिनट हैं, सान्या आंटी...” उसने कहा, “शाबाश, बच्चों! मैं – डाइनिंग हॉल चली!” - और वह कम्पाउण्ड से चली गई. उसके पीछे-पीछे राएच्का आंटी और नेल्ली आंटी भी लंच करने चली गईं.

और रंग वाली छोटी बैरल वहीं छोड़ गईं. और रबर का होज़-पाइप भी. हम फ़ौरन नज़दीक गए और बिल्डिंग के उस हिस्से को देखने लगे जहाँ पर उन्होंने अभी-अभी रंग लगाया था. बहुत बढ़िया था : एक-सा और भूरा, थोड़ी सी लाली लिए. मीश्का ने देखा, देखा और फिर कहने लगा, “  “मज़ेदार है, और अगर मैं पम्प मारूँ, तो क्या रंग निकलेगा?” अल्योन्का ने कहा, “शर्त लगाते हैं, नहीं निकलेगा!” तब मैंने कहा, “और हम शर्त लगाते हैं कि निकलेगा!” अब मीश्का ने कहा, “बहस करने की ज़रूरत नहीं है. मैं अभ्भी कोशिश करता हूँ. पकड़, डेनिस्का, ये होज़-पाइप, और मैं पम्प मारता हूँ.” और वो लगा पम्प मारने. एक बार – दो बार - तीन बार मारा, और अचानक पाइप में से रंग बाहर भागने लगा! वो फुसफुसा रहा था, साँप की तरह, क्योंकि पाइप के सिरे पर सुराखों वाली टोपी थी, जैसे पौधों को पानी देने वाले फुहारे में होती है. सिर्फ यहाँ सुराख़ बहुत ही छोटे-छोटे थे, और रंग इस तरह निकल रहा था, जैसे हेयर कटिंग सेलून में यूडीकोलोन निकल रहा हो, बस वो थोड़ा सा दिखाई दे रहा था.

मीश्का ख़ुश हो गया और चीख़ा, “पेंट कर जल्दी! जल्दी से कुछ पेंट कर!” मैंने फ़ौरन पाइप को साफ़ दीवार की ओर घुमा दिया. रंग की फुहार निकलने लगी, और वहाँ फ़ौरन हल्का-भूरा दाग बन गया – मकड़ी जैसा.  

 “हुर्रे!” अल्योन्का चिल्लाई. “चल गया! चल गया! – दौड़ने लगा!” और उसने अपना पैर रंग के नीचे रख दिया. 

 मैंने फ़ौरन घुटने से उँगलियों तक उसका पैर रंग दिया. फ़ौरन, हमारी ही आँखों के सामने, पैर से खरोंचों के निशान और नील गायब हो गए! उल्टे, अल्योन्का का पैर इतना चिकना, भूरा-भूरा, चमकदार हो गया, जैसा नया, चमचमाता गेंदों वाले खेल का डंडा. 

मीश्का चिल्लाया, “बढ़िया हो रहा है! दूसरा पैर भी रख, जल्दी!” 

और अल्योन्का ने ज़िन्दादिली से दूसरा पैर भी रख दिया, और मैंने पल भर में उसे ऊपर से नीचे तक दो बार रंग दिया.   


 





तब मीश्का ने कहा, “भले इन्सानों, कितना ख़ूबसूरत है! पैर तो ऐसे हो रहे हैं जैसे सचमुच के रेड-इंडियन के हों! रंग दे उसे, जल्दी!”  “पूरी? पूरी की पूरी रंग दूँ? सिर से पैर तक?” और अल्योन्का भी जोश में चीख़ी, “चलो, भले इन्सानों! रंग दो सिर से पैर तक! मैं सचमुच की रेड-इंडियन बन जाऊँगी.” तब मीश्का पम्प पर पिल पड़ा और पूरी ताक़त और जोश से चलाने लगा, और मैं अल्योन्का पर रंग की बौछार करने लगा. मैंने बड़ी ख़ूबसूरती से उसे रंग डाला : उसकी पीठ, और उसके पैर, और हाथ, और कंधे, और पेट, और उसके शॉर्ट्स भी. और वो पूरी भूरी हो गई, सिर्फ बाल सफ़ेद-सफ़ेद  रह गए थे.  मैंने पूछा, “मीश्का, क्या ख़याल है, बाल भी रंग दूँ?” मीश्का ने जवाब दिया, “बेशक! रंग, ज---ल्दी! फ़ौरन रंग डाल!” और अल्योन्का भी जल्दी मचाने लगी, “चल-चल! बाल भी रंग दे! और कान भी!”

मैंने जल्दी-जल्दी उसका रंग पूरा किया और कहा, “जा, अल्योन्का, सूरज में सुखा ले! ऐख़, अब और क्या रंगा जाए?” और मीश्का बोला, “वो, देख रहा है, हमारे कपड़े सूख रहे हैं? रंग उन्हें भी फ़ौ--रन!”

मगर ये काम मैंने फ़ौरन पूरा कर लिया! दो तौलिए और मीश्का की कमीज़ मैंने सिर्फ एक ही मिनट में ऐसे रंग दी कि देखने में भी बहुत प्यारा लग रहा था! और मीश्का पर तो मानो भूत चढ़ गया, वह इस तरह से पम्प मारने लगा जैसे कारख़ाने का मज़दूर हो. और सिर्फ चिल्लाए ही जा रहा था, “ चल, रंग! जल्दी से! ये नया दरवाज़ा है, देख, हमारा फ्रंट-डोअर, चल, चल, जल्दी से रंग दे!” और मैं दरवाज़े पर आया. ऊपर से नीचे! नीचे से ऊपर! ऊपर से नीचे, आड़े-तिरछे! 

मगर तभी अचानक दरवाज़ा खुला, और उसमें से हमारा केयर-टेकर अलेक्सेइ अकीमिच सफ़ेद सूट में निकला.

वह तो बस बुत बन गया. और मैं भी. हम दोनों पर मानो किसी ने जादू कर दिया हो. ख़ास बात ये थी कि मैं उस पर रंग डाले जा रहा था और डर के मारे होज़-पाइप दूर हटाने की बात भी समझ नहीं सका, बस उसे घुमाए जा रहा था: ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर. और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, मगर उसके भी दिमाग में नहीं आया कि कम से कम एक कदम ही दाएँ या बाएँ हट जाए... और मीश्का है कि पम्प मारे जा रहा है और अपना ही राग अलापे जा रहा है, “रंग, और जल्दी! चल, रंग दे!” और अल्योका बाज़ू से नाचते हुए बाहर आई:  “मैं रेड-इंडियन! मैं रेड-इंडियन!” भयानक! .... हाँ, जम के ली गई थी हमारी ख़बर. मीश्का पूरे दो हफ़्ते तक कपड़े धोता रहा. और अल्योन्का को न जाने कितनी बार टरपेंटाइन से घिस-घिस के नहलाया गया...

अलेक्सेइ अकीमिच को नया सूट ख़रीद कर दिया गया. और मम्मा तो मुझे बिल्कुल कम्पाउण्ड में जाने ही नहीं देना चाहती थी, मगर मैं किसी तरह निकल ही गया. सान्या आंटी, राएच्का आंटी और नेल्ली आंटी ने मुझसे कहा, “ बड़ा हो जा, डेनिस, जल्दी से बड़ा हो जा, हम तुझे अपनी ब्रिगेड में ले लेंगे. पेंटर     बनेगा!” और तब से मैं जल्दी-जल्दी बड़ा होने की कोशिश कर रहा हूँ. 


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14


“ ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है...”



शॉर्ट इंटरवल में हमारी ऑक्टोबर-लीडर ल्यूस्या भागकर मेरे पास आई और बोली:  “डेनिस्का, क्या तू कॉन्सर्ट में हिस्सा लेगा? हमने दो छोटे बच्चों को तैयार करने का फ़ैसला किया है, ताकि वे व्यंग्यकार बनें. तैयार है?”

मैंने कहा:  “मैं सब करना चाहता हूँ! बस, तू इतना समझा दे कि ये व्यंग्यकार मतलब क्या होता है.”

ल्यूस्या ने समझाया:  “देख, हमारे यहाँ कई सारी ख़ामियाँ हैं...मतलब, मिसाल के तौर पर, ऐसे बच्चे जिन्हें बस ‘दो’ नम्बर मिलते हैं, या कुछ बच्चे आलसी होते हैं - उनकी बुराई करनी है. समझ गया? उनके बारे में कविता पढ़नी है, जिससे सब हँसने लगें, इसका उन पर गहरा असर पड़ता है, वे होश में आ जाते हैं.”


मैंने कहा:  “वे कोई शराबी थोड़े ही ना हैं, जो उन्हें होश में लाया जाए, वे बस, आलसी हैं”  “अरे, ऐसा कहते हैं: ‘होश में लाना’ – हँसने लगी ल्यूस्या. “असल में ये बच्चे सोचने लगेंगे, उन्हें अटपटा लगने लगेगा, और वे सुधर जाएँगे. अब समझ में आया? तो, अब, ज़्यादा नख़रे न दिखा : अगर चाहता है – तो हाँ कर दे ; नहीं चाहता – मना कर दे!” मैंने कहा:   “ठीक है, चलेगा!” तब ल्यूस्या ने पूछा:  “क्या तेरा कोई पार्टनर है?”  “नहीं.” ल्यूस्या को बड़ा अचरज हुआ:  “तू बिना दोस्त के कैसे रहता है?”  “दोस्त तो मेरा है, मीश्का. मगर पार्टनर नहीं है.” ल्यूस्या फिर से मुस्कुराई:  “ये तो एक ही बात है. और क्या वो म्युज़िकल है, तेरा ये मीश्का?”

 “नहीं, साधारण है.”  “गाना गा सकता है?”  “बहुत धीमे-धीमे. मगर मैं उसे ज़ोर से गाना सिखाऊँगा, तू परेशान न हो.” अब ल्यूस्या खुश हो गई.

 “क्लास ख़त्म होने के बाद उसे छोटे हॉल में ले आ, वहाँ प्रैक्टिस होगी!”

और मैं पूरी रफ़्तार से मीश्का को ढूँढ़ने के लिए भागा. वो कैंटीन में खड़ा था और सॉसेज खा रहा था.  “मीश्का, व्यंग्यकार बनना चाहता है?” मगर उसने कहा:  “रुक जा, खाने दे.” मैं खड़ा होकर देखने लगा कि वो कैसे खाता है. ख़ुद तो इतना छोटा है, और सॉसेज उसकी गर्दन से भी मोटा है. उसने इस सॉसेज को हाथों में पकड़ रखा था और पूरा, बिना काटे, उसे खा रहा था, और जब वह उसे कुतरता तो उसकी पपड़ी चटख़ रही थी और टूट रही थी, और वहाँ से गर्म, ख़ुशबूदार रस उड़ता.

अब तो मुझसे भी रहा न गया और मैंने कात्या आण्टी से कहा:  “मुझे भी सॉसेज दीजिए, प्लीज़, जल्दी से!” और कात्या आण्टी ने फ़ौरन मेरी ओर बाउल बढ़ा दिया. मैं बहुत जल्दी-जल्दी खा रहा था, जिससे कि मीश्का मुझसे पहले अपना सॉसेज ख़त्म न कर ले : मुझे अकेले तो वह इतना मज़ेदार नहीं लगता. तो, मैंने भी अपना सॉसेज हाथों में पकड़ा और मैं भी बिना साफ़ किए उसे कुतरने लगा, और उसमें से भी  गर्म-गर्म, ख़ुशबूदार रस निकल रहा था. हम दोनों इस तरह से अपना-अपना भाप निकलता हुआ सॉसेज खा रहे थे, हाथ जला रहे थे, एक दूसरे की ओर देखे जा रहे थे और मुस्कुरा रहे थे.

 फिर मैंने उसे बताया कि हम व्यंग्यकार बनेंगे, और वो राज़ी हो गया ; हम बड़ी मुश्किल से क्लासेस ख़त्म होने तक बैठे, फिर छोटे हॉल में प्रैक्टिस के लिए भागे. 

 





वहाँ हमारी लीडर ल्यूस्या पहले से ही बैठी हुई थी, और उसके साथ एक लड़का था, शायद चौथी क्लास का होगा, बेहद बदसूरत, छोटे-छोटे कान और बड़ी-बड़ी आँखों वाला. ल्यूस्या ने कहा:  “ये रहे वो दोनों! इससे मिलो, ये है हमारे स्कूल का कवि अन्द्रेइ शेस्ताकोव.” हमने कहा:  “ बहुत अच्छे!”

और हम दूसरी ओर देखने लगे जिससे कि वह शान न बघारे. 

मगर उस कवि ने ल्यूस्या से कहा:  “ये क्या गाने वाले बच्चे हैं?”  “हाँ.”  उसने कहा:  “क्या इनसे अच्छे और कोई नहीं मिले?” 

ल्यूस्या ने कहा: ” ये बिल्कुल वैसे ही हैं जैसी हमें ज़रूरत है!”

अब वहाँ आए हमारे म्यूज़िक-टीचर बरीस सिर्गेयेविच . वह सीधे पियानो की ओर गए: ”तो, चलो, शुरू करते हैं! कविता कहाँ है?” अन्द्रूश्का ने जेब से कोई कागज़ निकाला और कहा: ”ये रही. मैंने मुखड़ा और मात्राएँ ली हैं मार्शाक की कविता ‘किस्सा गधे का, दादा का और पोते का : ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है...’ से.”

बरीस सिर्गेयेविच  ने सिर हिलाया: 

 “पढ़ के सुना!” अन्द्र्यूश्का पढ़ने लगा:  

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के, पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.

ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है, पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!

मैं और मीश्का अपने आप को रोक न सके और खिलखिलाने लगे. बेशक, बच्चे अक्सर अपने मम्मी-पापा से सवाल हल करने को कहते हैं, और फिर उसे इस तरह टीचर को दिखाते हैं, जैसे वे ख़ुद ही इतने होशियार हैं. मगर यदि उन्हें ब्लैक-बोर्ड पर यही करने के लिए बुलाया जाता है, तो टाँय-टाँय फिस्! – ‘दो’ नम्बर मिलते हैं! ये बात सबको मालूम है. शाबाश अन्द्र्यूश्का, अच्छा पकड़ लिया! 

अन्द्र्यूश्का आगे पढ़ता है: 


चॉक से बने हैं फर्श पे चौख़ाने मानेच्का और तानेच्का कूदती हैं वहाँ. ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है, ‘क्लासों’ में खेलें और क्लास में न जाएँ?!    

फिर से बढ़िया! हमें बहुत अच्छा लगा! ये अन्द्र्यूशा तो वाक़ई में असली जीनियस है, पूश्किन की तरह! 

बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा:  “ठीक है, बुरा नहीं है! और म्यूज़िक होगा एकदम सिम्पल, कुछ इस तरह का,” और उन्होंने अन्द्र्यूशा की कविता ली, और हौले-हौले पियानो बजाते हुए, उसे गाकर सुना दिया. बहुत ही आसान था, हम तालियाँ भी बजाने लगे.

अब बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा:  “गा कौन रहा है?” और ल्यूस्या ने मेरी और मीशा की ओर इशारा किया.  “ये रहे! “  “हुम् ,” बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा, “मीश्का अच्छा गाता है...मगर देनिस्का कोई ज़्यादा अच्छा नहीं गाता.” मैंने कहा, “मगर ज़ोर से गाता हूँ.” और हमने म्यूज़िक के साथ कविता गानी शुरू कर दी और उसे दुहराते रहे, शायद पचास या फिर हज़ार बार दुहराई होगी, और मैं खूब ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहा था, सब मुझे शांत कर रहे थे और कुछ-कुछ कह रहे थे:  “तू घबरा मत! तू थोड़ा धीमी आवाज़ में गा! शांति से! इतनी ज़ोर से गाने की ज़रूरत नहीं है!” 

अन्द्र्यूश्का बहुत ज़्यादा परेशान हो रहा था. वो मुझे बहुत परेशान कर रहा था. मगर मैं सिर्फ ज़ोर से ही गाए जा रहा था, मैं धीमी आवाज़ में गाना नहीं चाहता था, क्योंकि असली गाना तो तब होता है जब ज़ोर से गाया जाता है! ...और एक दिन, जब मैं स्कूल पहुँचा, मैंने क्लोक-रूम में नोटिस देखा: 

अटेन्शन! आज बड़े इन्टरवल में छोटे हॉल में होगा  छोटा सा प्रोग्राम ”पायनियर-व्यंग्यकार’ का! पेश करेगी - बच्चों की जोड़ी! सामयिक-समस्या पर!

सब लोग आईये! 


मेरे दिल की धड़कन रुक गई. मैं क्लास में भागा. वहाँ मीश्का बैठा था और खिड़की से बाहर देख रहा था. मैंने कहा:  “तो, आज हमें गाना है!” मगर मीश्का अचानक बड़बड़ाया:  “मेरा दिल नहीं चाह रहा है गाने को...” मैं तो जैसे गूँगा हो गया. क्या – दिल नहीं चाहता? ये क्या बात हुई? हमने तो प्रैक्टिस की थी? ल्यूस्या और बरीस सिर्गेयेविच क्या कहेंगे? अन्द्र्यूश्का? और सारे बच्चे, उन्होंने तो नोटिस पढ़ लिया है और वे सब एक साथ भाग कर पहुँच जाएँगे? मैंने कहा:  “तू, क्या पागल हो गया है? लोगों को बेवकूफ़ बनाएँगे?”  मगर मीश्का ने बड़ी दयनीयता से कहा:  “शायद, मेरे पेट में दर्द हो रहा है.” मैंने कहा:  “ये डर के मारे है. मेरा पेट भी दुख रहा है, मगर मैं तो इनकार नहीं कर रहा हूँ!” 

मगर मीश्का खोया-खोया ही रहा. बड़े इन्टरवल में सारे बच्चे छोटे हॉल की ओर लपके, मगर मैं और मीश्का बड़ी मुश्किल से घिसटते हुए चल रहे थे, क्योंकि मेरी भी गाने की इच्छा ख़तम हो गई थी. मगर तभी ल्यूस्या भागकर हमारे पास आई, उसने कस कर हमारे हाथ पकड़ लिए और खींचते हुए हमें अपने साथ ले चली, मगर मेरे पैर इतने नर्म हो गए थे जैसे किसी गुड़िया के होते हैं, और वे लड़खड़ाने लगे. मुझ पर ये, शायद, मीश्का का असर हो गया था.

हॉल में पियानो के लिए एक जगह बनाई गई थी, और चारों तरफ़ सभी कक्षाओं के बच्चों की, आयाओं की, और टीचर्स की भीड़ जमा थी. 

मैं और मीश्का पियानो के पास खड़े हो गए. 

बरीस सिर्गेयेविच पहले ही अपनी जगह पर बैठ चुके थे, और ल्यूस्या ने अनाउन्सर जैसी आवाज़ में घोषणा की:

  “सामयिक विषयों पर “पायनियर-व्यंग्यकार” का प्रोग्राम शुरू करते हैं. स्क्रिप्ट लिखी है अन्द्रेइ शेस्ताकोव ने, और इसे पेश कर रहे हैं जाने-माने व्यंग्यकार मीशा और डेनिस! आइए!” 

मैं और मीश्का थोड़ा आगे निकल कर खड़े हो गए. मीशा दीवार की तरह सफ़ेद हो गया था. मगर मैं, ठीक ही था, बस, मेरे गले में ख़राश हो रही थी और वह सूख गया था. 

बरीस सिर्गेयेविच  ने बजाना शुरू किया. शुरूआत मीश्का को करनी थी, क्योंकि पहली दो पंक्तियाँ वो ही गाता था, और बाद की दो पंक्तियाँ मुझे गानी होती थीं. तो, बरीस सिर्गेयेविच बजा रहे हैं, और मीश्का ने बायाँ हाथ एक ओर को निकाला, जैसा कि उसे ल्यूस्या ने सिखाया था, और अब उसे गाना था, मगर देर हो गई, और जब वो बस गाने ही वाला था, तो इतने में मेरी बारी आ गई, पियानो पर चल रहे म्यूज़िक के अनुसार ऐसा हुआ था. मगर मैंने नहीं गाया, क्योंकि मीशा ने देर कर दी थी. कैसे गाता!

तब मीश्का ने अपना हाथ वापस नीचे कर लिया. और बरीस सिर्गेयेविच  ने फिर से ज़ोर-ज़ोर से और साफ़-साफ़ बजाना शुरू किया. उन्होंने पियानो की कुंजियों पर तीन बार मारा, जैसा कि उन्हें करना था, और चौथी बार में मीश्का ने फिर से बायाँ हाथ बाहर निकाला और आख़िरकार गाने लगा:     

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के, पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.


मैंने फ़ौरन पकड़ लिया और चिल्लाने लगा: 

ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है, पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!


हॉल में मौजूद सब लोग हँसने लगे, और मुझे इससे कुछ राहत मिली. और बरीस सिर्गेयेविच आगे बजाने लगे. उन्होंने फिर से तीन बार कुंजियों पर ज़ोर-ज़ोर से मारा, और चौथी बार में मीशा ने सफ़ाई से बायाँ हाथ एक ओर को निकाला और न जाने क्यों फिर से शुरू से गाने लगा: 

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के, पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.


मैं फ़ौरन समझ गया कि उससे गलती हो गई है! मगर जब बात ये थी तो मैंने भी तय कर लिया कि मैं इसी को आख़ीर तक गाऊँगा, फिर बाद की बाद में देखी जाएगी. मैं लपका और गाने लगा:  


ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है, पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!


ख़ुदा का शुक्र है कि हॉल में ख़ामोशी थी – ज़ाहिर था, कि सब मीशा की गलती को समझ गए हैं, और सोच रहे थे कि “कोई बात नहीं, होता है; चलो, अब आगे गाने दो.”

और इस बीच म्यूज़िक तो आगे-आगे भागा जा रहा था. मगर मीश्का के चेहरे का रंग कुछ हरा-सा हो गया. और जब म्यूज़िक उस जगह पर पहुँचा, उसने अपना बायाँ हाथ झटका, और घिस गई रेकॉर्ड की तरह तीसरी बार गाने लगा: 

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के, पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.


मेरा दिल तो कर रहा था कि उसके सिर पर कोई ज़ोरदार चीज़ दे मारूँ, और मैं भयानक तैश से गरजा:


ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है, पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!


“मीश्का, देख, तूने तो पूरी गड़बड़ कर दी है! तू ये तीसरी बार भी वही-वही क्या गाए जा रहा है? चल, आगे, लड़कियों के बारे में गा! मगर मीश्का ने धृष्ठता से कहा:  “तुझे कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है!” और उसने बड़े अदब से बरीस सिर्गेयेविच  से कहा: “प्लीज़, बरीस सिर्गेयेविच, आगे बजाइए!” बरीस सिर्गेयेविच ने बजाना शुरू किया, और मीश्का में अचानक हिम्मत आ गई, उसने फिर से अपना बायाँ हाथ बाहर निकाला और चौथी बार ऐसे गाने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो:  

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के, पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.... 


अब तो पूरे हॉल में ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगने लगे, और मैंने भीड़ में देखा कि अन्द्र्यूश्का का चेहरा कितना दुखी हो रहा था, और ये भी देखा कि ल्यूस्या, पूरी तरह लाल और बिफ़री हुई, भीड़ में से हमारी ओर आ रही है. और मीश्का का मुँह खुला ही रह गया है, जैसे वह खुद पर ही अचरज कर रहा है. इस बीच मैंने, समझदारी से काम लेते हुए चिल्लाकर पूरा किया:


ऐसा कहीं देखा है, ऐसा कहीं सुना है, पापा करें सवाल और वास्या हो ‘पास’?!


अब तो जैसे कोई भयानक बात हो गई. सब इस तरह ठहाके लगा रहे थे, जैसे उन पर दौरा पड़ा हो, और मीश्का का रंग हरे से बैंगनी हो गया. हमारी ल्यूस्या ने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी ओर खींच लिया. वह चिल्लाई:  “डेनिस्का, तू अकेले ही गा! हमें नीचा ना दिखा!...म्यूज़िक! और!...” 

और मैं खड़ा हूँ पियानो के पास और मैंने फ़ैसला कर लिया है कि मैं उसे नीचा नहीं दिखाऊँगा. मुझे महसूस हुआ कि मेरे लिए ये कोई बड़ी बात नहीं है, और, जब म्यूज़िक उस जगह तक आया, तो न जाने क्यों मैंने भी अचानक अपना बायाँ हाथ बाहर को निकाला और एकदम बेसोचेसमझे चिंघाड़ने लगा:  

वास्या के पापा मैथ्स में हैं पक्के, पापा पढ़ें पूरे साल वास्या के बदले.... 

मुझे तो अच्छी तरह याद भी नहीं है कि आगे क्या हुआ, कुछ-कुछ ज़लज़ले की तरह हो रहा था. और मैं सोच रहा था कि अभ्भी मैं ज़मीन में समा जाऊँगा, और चारों ओर सब लोग हँसी के मारे एक दूसरे पर गिरे जा रहे थे – आयाएँ, और टीचर्स, और सब, सब, सब... मुझे तो अचरज भी होता है कि मैं इस नासपीटे गाने की वजह से मर कैसे नहीं गया. 

शायद मर ही जाता, अगर उसी समय घंटी न बजी होती... 

अब मैं कभी भी व्यंग्यकार नहीं बनूँगा! 



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15.


नीला चाकू



बात यूँ हुई. 



 




हमारी क्लास चल रही थी – सृजनात्मक कार्य की. रईसा इवानव्ना  ने कहा कि हममें से हर कोई अपनी मर्जी से एक-एक टेबल-कैलेंडर बनाएगा. मैंने एक गत्ते का टुकड़ा डिब्बा लिया, उस पर हरा कागज़ चिपकाया, बीच में एक झिरी काटी, उसमें माचिस की डिब्बी फिट की, और डिब्बी पर सफ़ेद कागज़ों की गड्डी रख दी, उन्हें ठीक से एडजस्ट किया, चिपकाया, एक से साइज़ का बनाया और पहले पन्ने पर लिखा: “पहली मई की शुभकामनाएँ!” 

बड़ा ख़ूबसूरत कैलेंडर बना – छोटे बच्चों के लिए. अगर, मान लो, किसीके पास गुडिया हैं, तो इन गुड़ियों के लिए. मतलब, खिलौने वाला कैलेंडर. और रईसा इवानव्ना  ने मुझे ‘5’ अंक दिए. वह बोलीं:  “ मुझे अच्छा लगा.”

 और मैं अपनी जगह पर आकर बैठ गया. इसी समय लेव्का बूरिन भी अपना कैलेंडर देने के लिए उठा, मगर रईसा इवानव्ना  ने उसके कैलेंडर को देखकर कहा:  “अच्छा नहीं है.” और उन्होंने लेव्का को ‘3’ अंक दिए.


जब शॉर्ट-इन्टर्वल हुआ तो लेव्का अपनी जगह पर ही बैठा रहा, उसके चेहरे पर अप्रसन्नता थी. और मैं, इत्तेफ़ाक से, इस समय धब्बा सुखा रहा था, और, जब मैंने देखा कि लेव्का इतना उदास है, तो सीधे हाथ में ब्लॉटिंग-पैड लिए लेव्का के पास चला गया. मैं उसे हँसाना चाहता था, क्योंकि वो मेरा दोस्त है और उसने एक बार मुझे छेद वाला सिक्का दिया था. और उसने वादा किया है कि वो मुझे इस्तेमाल किया हुआ शिकारी-कारतूस का केस भी लाकर देगा, ताकि मैं उससे एटॉमिक टेलिस्कोप बना सकूँ. 

मैं लेव्का के पास गया और बोला:  “ऐख, तू, रोतला!” और मैंने भेंगी आँखों से उसकी ओर देखा.

मगर लेव्का ने बिना किसी वजह के मेरे सिर पर पेंसिल-बॉक्स दे मारा. तभी मैं समझा कि आँखों के सामने तारे कैसे कौंधने लगते हैं. मुझे लेव्का पर बेहद गुस्सा आया और मैं पूरी ताक़त से उसके कंधे पर ब्लॉटिंग-पैड से वार करने लगा. मगर , ज़ाहिर है, उसे कुछ महसूस ही नहीं हुआ, बल्कि उसने अपना बैग उठाया और घर चला गया. मगर लेव्का ने मुझे इतनी ज़ोर से मारा था कि मेरी आँखों से आँसू बहने लगे – आँसू सीधे टप-टप ब्लॉटिंग-पैड पर गिरने लगे और उस पर बदरंग धब्बों की तरह फ़ैलते रहे... 

और तब मैंने तय कर लिया कि लेव्का को मार डालूँगा. स्कूल के बाद मैं पूरे दिन घर पे बैठा रहा और हथियार तैयार करता रहा. मैंने पापा की लिखने की मेज़ से उनका कागज़ काटने वाला नीला, प्लास्टिक का चाकू लिया और दिन भर उसे स्लैब पर तेज़ करता रहा. मैं उसे लगातार, बड़े धीरज से करता रहा. वह बड़े धीरे-धीरे तेज़ हो रहा था, मगर मैं उसे तेज़ करता रहा और सोच रहा था, कि कैसे मैं कल क्लास में आऊँगा और मेरा भरोसेमन्द चाकू लेव्का की आँखों के सामने चमकेगा, मैं उसे लेव्का के सिर के ऊपर ले जाऊँगा, और लेव्का घुटनों पर गिरकर मुझसे ज़िन्दगी की भीख माँगेगा, और मैं कहूँगा:

 “माफ़ी माँग!” और वो कहेगा:  “माफ़ कर दे!” और मैं गरजते हुए ठहाका लगाऊँगा: ”हा-हा-हा-हा!” और ये भयानक हँसी काफ़ी देर तक गूँजती रहेगी. और लड़कियाँ डर के मारे डेस्कों के नीचे छुप जाएँगी.

 जब मैं  सोने के लिए लेटा, तो बस, इधर से उधर करवटें ही लेता रहा, गहरी-गहरी साँसें लेता रहा, क्योंकि मुझे लेव्का पर दया आ रही थी – अच्छा इन्सान है वो, मगर जब उसने पेन्सिल-बॉक्स से मेरे सिर पर हमला किया था, तो अब - जैसा किया था वैसा भुगते. नीला चाकू मेरे तकिए के नीचे पड़ा था, और मैं उसकी मूठ दबाए क़रीब-क़रीब कराह रहा था, इसलिए मम्मा ने पूछा:  “ तू ये कराह क्यों रहा है?” मैंने कहा:  “कुछ नहीं.” मम्मा ने कहा:  “क्या पेट दुख रहा है?” मगर मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया, सिर्फ मैं दीवार की ओर मुँह करके लेट गया और इस तरह सांस लेने लगा, जैसे मैं बड़ी देर से सो रहा हूँ.

 सुबह मैं कुछ भी न खा सका. बस, ब्रेड-बटर, आलू और सॉसेज के साथ दो कप चाय पी गया. फिर स्कूल चला गया. 

नीला चाकू मैंने बैग में सबसे ऊपर ही रखा, जिससे कि निकालने में आसानी हो.

क्लास में जाने से पहले मैं बड़ी देर तक दरवाज़े के पास खड़ा रहा और भीतर न जा सका - दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था! मगर फिर भी अपने आप पर काबू पाते हुए मैंने दरवाज़े को धक्का दिया और अन्दर गया. क्लास में सब कुछ हमेशा की तरह ही था, और लेव्का वालेरिक के साथ खिड़की के पास खड़ा था. जैसे ही मैंने उसे देखा मैं अपनी बैग खोलने लगा, जिससे कि चाकू निकाल सकूँ. मगर इसी समय लेव्का भागकर मेरे पास आया... मैंने सोचा कि वह फिर मुझे मारेगा पेन्सिल-बॉक्स से या किसी और चीज़ से, और मैं और भी ज़्यादा तेज़ी से अपनी बैग खोलने लगा, मगर लेव्का अचानक रुक गया और वहीं खड़े-खड़े पैर पटकने लगा, फिर अचानक मेरी ओर झुका...नीचे-नीचे और बोला:  “ले!” और उसने मेरी ओर सुनहरी इस्तेमाल की हुई कारतूस बढ़ा दी. और उसकी आँखें ऐसी हो गईं, जैसे वो कुछ और भी कहना चाह रहा हो, मगर शर्मा रहा हो. मैं भी तो नहीं चाहता था कि वह कुछ और कहे, मैं तो बस पूरी तरह भूल गया कि मैं उसे मार डालना चाहता था, जैसे कि मैं ऐसा कभी भी नहीं चाहता था, बल्कि मुझे आश्चर्य भी हुआ.  मैंने कहा:  “बढ़िया है कारतूस.”  मैंने कारतूस ले लिया और अपनी जगह पे चला गया. 



   

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16

  दीवार पर मोटरसाइकल-रेस


जब मैं छोटा था तभी मुझे तीन पहियों वाली साइकल गिफ़्ट में दी गई थी. और मैं उस पर एकदम साइकल चलाना सीख गया. फ़ौरन बैठ गया और चल पड़ा, ज़रा भी नहीं डरा, जैसे कि मैं बिल्कुल ज़िन्दगी भर साइकिलों पर घूमता रहा हूँ. 

मम्मा ने कहा: ”देखो, स्पोर्ट्स में कितना होशियार है.” मगर पापा ने कहा: “बिल्कुल बन्दर की तरह बैठा है...”


 



अब मैं बहुत बढ़िया साइकिल चलाना सीख गया और काफ़ी जल्दी साइकिल पर अलग-अलग तरह के करतब भी करना सीख गया जैसे सर्कस के आर्टिस्ट करते हैं. मिसाल के तौर पर, मैं मुँह पीछे करके बैठता और आगे की ओर साइकिल चलाता, या सीट पर पेट के बल लेट जाता और किसी भी हाथ से पैडल घुमा लेता – चाहे सीधे हाथ से, चाहे उल्टे; पैर फ़ैलाकर तिरछे बैठ जाता और साइकिल चलाता; हैंडिल पर बैठ कर या तो आँखें बन्द कर लेता या फिर बिना हाथों के चलाता; हाथ में पानी का गिलास पकड़े चलाता. मतलब, हर करतब में माहिर हो गया था. फिर अंकल झेन्या ने मेरी साइकिल का एक पहिया मोड़ दिया, और वो दो पहियों वाली हो गई, मगर मैं बड़ी जल्दी फिर से सब कुछ सीख गया. कम्पाउण्ड के बच्चे मुझे “चैम्पियन ऑफ़ वर्ल्ड और हिज़ लोकेलिटी” कहने लगे. 

और मैं अपनी साइकिल पर तब तक घूमता रहा जब तक कि साइकिल चलाते हुए मेरे घुटने हैण्डिल से ऊपर नहीं उठने लगे. तब मैंने अन्दाज़ लगाया कि अब इस साइकिल के लिए मैं बड़ा हो गया हूँ, और सोचने लगा कि न जाने कब पापा मेरे लिये असली साइकिल “स्कूलबॉय” खरीदेंगे.

और लीजिए, एक दिन हमारे कम्पाउण्ड में एक साइकिल आती है, और वो अंकल, जो उस पे बैठा है, पैर नहीं चला रहा है, मगर उसके नीचे साइकिल ड्रैगन-फ्लाइ की तरह फ़ट्-फ़ट् कर रही है, और अपने आप चल रही है. मुझे ख़ूब अचरज हुआ. मैंने तो ऐसा कभी देखा ही नहीं था कि साइकिल अपने आप चल रही हो. मोटरसाइकिल – और बात है, कार भी – और बात है, रॉकेट- समझ में आता है, मगर साइकिल? अपने आप? मुझे अपनी आँखों पे विश्वास ही नहीं हुआ. और वो अंकल, जो साइकिल पे आया था, मीश्का के प्रवेश-द्वार की ओर आया और रुक गया. और वो वाक़ई में अंकल था ही नहीं, बल्कि एक नौजवान लड़का था. फिर उसने साइकिल पाइप के पास रखी और चला गया. मैं अपना मुँह खोले वहीं रह गया. अचानक मीश्का बाहर निकला.

वो बोला:  “क्या हुआ? ऐसे क्या खड़ा है?” मैंने कहा:  “ख़ुद-ब-ख़ुद चलती है, समझा?” मीश्का ने कहा:  “ये हमारे भतीजे फ़ेद्का की गाड़ी है. मोटर वाली साइकिल. फ़ेद्का हमारे यहाँ काम से आया है – चाय पीने.”  

मैंने पूछा:  “क्या ऐसी मशीन वाली साइकिल चलाना मुश्किल है?”  “ बकवास,” मीश्का ने कहा. “ये तो आधी ही किक में शुरू हो जाती है. एक बार पैडल दबाओ, और बस, तैयार – जा सकते हो. और इसमें सौ किलोमीटर्स तक के लिए पेट्रोल आ सकता है. और इसकी स्पीड है – आधे घण्टे में बीस किलोमीटर. 

 “ओहो! ये हुई न बात!” मैंने कहा. “ये है मोटर वाली साइकिल! काश, इस पे घूम सकता!” इस पर मीश्का ने सिर हिलाया:  “पड़ेगी! फ़ेद्का मार डालेगा. सिर काट देगा!”   “हाँ. ख़तरा है,” मैंने कहा. मगर मीश्का ने इधर उधर देखा और अचानक बोला:  “कम्पाउण्ड में कोई नहीं है, और तू वैसे भी “चैम्पियन ऑफ़ वर्ल्ड” है. बैठ! मैं गाड़ी को धक्का देने में मदद करूँगा, और तू बस एक बार पैडल को धक्का मार, बाकी सब कुछ बड़े आराम से हो जाएगा. गार्डन के चारों ओर दो-तीन चक्कर लगा ले, और हम चुपके से गाड़ी वापस जगह पे रख देंगे. हमारा फ़ेद्का बड़ी देर तक चाय पीता है. तीन गिलास गटक जाता है. चल!”

 “चल!” मैंने कहा. मीश्का साइकिल पकड़ने लगा, और मैं उस पर विराजमान हो गया. एक पैर का मोज़ा तो वाक़ई में पैडल के किनारे को छू रहा था, मगर दूसरा पैर हवा में लटक रहा था, मैकरोनी की तरह. इस मैकरोनी से मैंने पाइप को धक्का दिया, और मीश्का मेरी बगल में दौड़ता हुआ चिल्लाया:  “पैडल दबा, चल, दबा!” मैंने कोशिश की, तिरछा होकर सीट से कुछ नीचे को सरका जिससे पैडल दबा सकूँ. मीश्का ने हैण्डिल में कोई चीज़ हिलाई...और अचानक गाड़ी फट्-फट् करने लगी, और मैं चल पड़ा! मैं जा रहा था! अपने आप! पैडल नहीं दबा रहा – वहाँ तक पहुँचता ही नहीं, बस, चला जा रहा हूँ, बैलेन्स बनाए हुए हूँ!

ये बड़ा अद्भुत था! हवा मेरे कानों में सन्-सन् कर रही थी, चारों ओर की हर चीज़ जल्दी-जल्दी एक गोल बनाते हुए फिसलती जा रही थी: छोटा सा खम्भा, गेट, बेंच, बरसाती कुकुरमुत्ते, बालू-रेत, झूले, हाउसिंग कमिटी ; और फिर से छोटा सा खम्भा, गेट, बेंच, बरसाती कुकुरमुत्ते, बालू-रेत, झूले, हाउसिंग कमिटी, ; और फिर से खम्भा और शुरू से वही सब कुछ, और मैं घूमे जा रहा था, हैण्डिल से चिपके, और मीश्का मेरे पीछे भागे जा रहा है, मगर तीसरे चक्कर में वह चीख़ा:  “मैं थक गया!” और वह खम्भे पर झुक गया. और मैं अकेला घूमे जा रहा था, मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था, मैं घूम ही रहा था और कल्पना कर रहा था, कि दीवार पर मोटर साइकल चलाने की रेस में हिस्सा ले रहा हूँ. मैंने देखा था कि सांस्कृतिक- पार्क  में बहादुर आर्टिस्ट कैसे रेस लगा रही थी...

और खम्भा, और मीश्का, और झूले, और हाउसिंग कमिटी – सब कुछ मेरी आँखों के सामने बड़ी देर तक घूमता रहा, सब कुछ बड़ा अच्छा था, सिर्फ़ मेरा पैर जो मैकरोनी की तरह लटक रहा था... उस पर जैसे थोड़ी-थोड़ी चीटियाँ रेंगने लगी थीं...और अचानक ऐसे लगा कि मैं अपने आप में नहीं था, हथेलियाँ फ़ौरन गीली हो गईं, और रुक जाने का मन करने लगा. मैं मीश्का के क़रीब गया और चिल्लाया:  “बस हो गया! रोक इसे!” मीश्का मेरे पीछे भागा और चिल्लाया:  “क्या? ज़ोर से बोल!” मैं चिल्लाया:  “तू क्या बहरा हो गया है?” मगर मीश्का कब का पीछे रह गया था. तब मैं एक चक्कर और घूमा और चीखा:  “गाड़ी को रोक, मीश्का!” तब उसने हैण्डिल पकड़ लिया, गाड़ी उछली, वो गिर गया, और मैं फिर से आगे बढ़ गया. देखा कि वो फिर से खम्भे के पास मुझे मिला और दहाड़ा:  “ब्रेक! ब्रेक!”

मैं उसके क़रीब से गुज़र गया और ब्रेक ढूँढ़ने लगा. मगर, ज़ाहिर है, मुझे तो मालूम ही नहीं था कि वह कहाँ होता है! मैं अलग-अलग तरह के स्क्रू घुमाने लगा और हैंडिल में कुछ-कुछ दबाने लगा. मगर कहाँ! कोई फ़ायदा नहीं हुआ. गाड़ी तो ऐसे फट्-फट् कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही न हो, मगर मेरे मैकरोनी जैसे पैर में तो हज़ारों सुईयाँ चुभ रही थीं!

मैं चीख़ा:  “मीश्का, ये ब्रेक कहाँ है?” और वो :  “मैं भूल गया!”  और मैं:  “याद कर!”  “ठीक है, याद करता हूँ, तब तक तू और घूम ले!”  “तू जल्दी से याद कर, मीश्का!” मैं फिर से चीखा. और मैं और आगे घूमता रहा, मुझे महसूस हो रहा था कि मैं बिल्कुल ठीक नहीं हूँ, जी मिचला रहा था. मगर अगले चक्कर में मीश्का फिर से चिल्लाया:  “याद नहीं आ रहा हि! तू कूदने की कोशिश कर!” मैंने उससे कहा:  “मेरा जी मिचला रहा है!” अगर मैं जानता कि ये सब कुछ होगा, तो कभी भी इस गाड़ी पर नहीं घूमता, बेहतर है पैदल चलना, क़सम से!  “आगे से मीश्का फिर से चिल्लाया:  “एक गद्दा लाना पड़ेगा जिस पे सोते हैं! जिससे कि तू उसमे घुस जाए और रुक जाए! तू काय पे सोता है?”  “फोल्डिंग कॉट पे!”

और मीश्का:  “तो फिर घूमता रह, जब तक पेट्रोल नहीं ख़तम हो जाता!”

मैं इस बात के लिए उस पर गाड़ी चढ़ाने ही वाला था. “जब तक पेट्रोल नहीं ख़तम हो जाता”... हो सकता है, मुझे दो हफ़्तों तक इसी तरह पार्क का चक्कर लगाते रहना पड़े, और हमारे पास तो मंगलवार को कठपुतलियों वाले थियेटर के टिकट हैं. और पैर में सुईयाँ चुभ रही हैं! मैं इस बेवकूफ़ पर चिल्लाया:  “जा, अपने फ़ेद्का के पास भाग!”  “वो चाय पी रहा है!” मीश्का चिल्लाया.  “बाद में पी लेगा!” मैं दहाड़ा.

मगर उसने पूरी बात नहीं सुनी और मुझसे सहमत हो गया:  “मार डालेगा! ज़रूर मार डालेगा!”

और सब कुछ फिर से मेरे सामने घूमने लगा: खम्भा, गेट, बेंच, बरसाती कुकुरमुत्ते, बालू-रेत, झूले, हाउसिंग कमिटी. फिर इसका उलटा: हाउसिंग कमिटी, झूले, बेंच, खम्भा, मगर फिर सब गड्ड्-मड्ड् हो गया: हाउम्भा, खम्कमिटी, कुकुरेंच...और मैं समझ गया कि हालत बुरी है. मगर इसी समय किसीने पूरी ताक़त से गाड़ी को पकड़ लिया, उसने फट्-फट् करना बन्द कर दिया, और मेरे सिर पर ज़ोर से झापड़ मारा. मैंने अन्दाज़ लगाया कि मीश्का के फ़ेद्का ने आख़िरकार अपनी चाय ख़त्म कर ली है. मैं फ़ौरन भागने लगा, मगर भाग नहीं सका, क्योंकि मैकरोनी वाला पैर मुझे चुभ रहा था, खंजर की तरह. मगर फिर भी मैं बदहवास नहीं हुआ और एक ही पैर पर उछलते-उछलते फ़ेद्का के हाथ से छूट गया. उसने भी मेरा पीछा नहीं किया. मैं भी सिर पर मारने के कारण उस पर गुस्सा नहीं हुआ. क्योंकि बिना उसके तो, शायद मैं अब तक कम्पाउण्ड में गोल-गोल घूमता ही रहता.

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17


बटरफ्लाई स्टाइल में तीसरा नंबर       


जब मैं स्विमिंग पूल से वापस घर लौट रहा था, तो मेरा मूड़ बहुत अच्छा था. मुझे सारी ट्रॉलीबसें अच्छी लग रही थीं, क्योंकि वो इतनी पारदर्शी हैं, जिससे साफ़-साफ़ दिखाई देता है कि उनमें कौन जा रहा है; और आइस्क्रीम बेचने वाली लड़कियाँ अच्छी लग रही थीं, क्योंकि वे हमेशा मुस्कुराती रहती हैं; और ये भी अच्छा लग रहा था कि रास्ते पे गर्मी नहीं थी और हवा का झोंका मेरे गीले सिर को ठंडक पहुँचा रहा है. मगर सबसे ज़्यादा अच्छी बात मुझे ये लग रही थी कि मेरा बटरफ्लाइ स्टाइल में तीसरा नंबर आया था और अब मैं पापा को इसके बारे में बताने वाला हूँ – वो कब से चाह रहे थे कि मैं तैरना सीख लूँ. वो कहते हैं कि सब लोगों को तैरना आना चाहिए, ख़ास तौर से लड़कों को तो आना ही चाहिए, क्योंकि वे मर्द होते हैं. और वो मर्द ही क्या, जो जहाज़ की दुर्घटना में समन्दर में डूब जाए या फिर, अपने तालाब ‘चीस्तिए प्रूदी’ में, नाव उलटने पर डूब जाए?

और आज मेरा तीसरा नम्बर आया है और अब मैं पापा को इस बारे में बताने वाला हूँ. मैं बड़ी जल्दी-जल्दी घर जा रहा था, और, जब मैं कमरे में घुसा, तो मम्मा ने फ़ौरन पूछ लिया:  “ ये तू इतना चमक क्यों रहा है?” मैंने कहा:  “आज हमारी कॉम्पिटीशन थी.” पापा ने कहा:  “कैसी कॉम्पिटीशन?” ”बटरफ्लाइ स्टाइल में पच्चीस मीटर तैर कर...” पापा ने पूछा:  “तो, कैसी रही?”  “तीसरा नम्बर!” मैंने कहा. पापा का चेहरा खिल गया.

 “अच्छा?” उन्होंने कहा. “ये हुई न बात! शाबाश!” उन्होंने अख़बार एक ओर को रख दिया. “वेल डन!”


 


 मुझे मालूम ही था कि वो ख़ुश होंगे. मेरा मूड़ और भी अच्छा हो गया.  “और पहला नम्बर किसका आया?” पापा ने पूछा. मैंने जवाब दिया:  “पहला नम्बर, पापा, वोव्का का आया. उसे तो कब से तैरना आता है. उसके लिए तो ये ज़रा भी मुश्किल नहीं था...”  “हाँ, हाँ, वोव्का!” पापा ने कहा. “और, दूसरा नम्बर किसका आया?”  “और दूसरा,” मैंने कहा, “एक लाल बालों वाले लड़के का आया, मालूम नहीं उसका नाम क्या है. वो छोटे-से मेंढक के जैसा दिखता है, ख़ास तौर से पानी के अन्दर...”  “और तू, मतलब, तीसरे नम्बर पे रहा?” पापा मुस्कुराए, मुझे बड़ी ख़ुशी हो रही थी. “कोई बात नहीं,” उन्होंने कहा, “कुछ भी कहो, तीसरा नम्बर भी तो इनाम का हक़दार होता है, कांस्य पदक! और, चौथे नम्बर पे कौन आया? याद नहीं है? किसका आया चौथा नम्बर?” मैंने कहा:  “चौथा नम्बर किसी का भी नहीं आया, पापा!” उन्हें बड़ा अचरज हुआ.  “ऐसा कैसे हो सकता है?” मैंने कहा:  “हम सबका तीसरा नम्बर आया: मेरा, और मीश्का का, और तोल्का का, और कीम्का का, सबका, सबका... वोव्का – पहले नम्बर पे, लाल बालों वाला मेंढक – दूसरे पे, और हम – बाकी के अठारह लोग, हम सबका तीसरा नम्बर आया. इन्स्ट्रक्टर ने ऐसा कहा!” पापा ने कहा, “ आह, ये बात है...सब समझ में आ गया!...” और वो फिर से अख़बार में दुबक गए.  और न जाने क्यों मेरा मूड़ एकदम बिगड़ गया.


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18

ना पिफ़्, ना पाफ़्      



जब मैं स्कूल नहीं जाता था, तब मैं बहुत ही नर्म दिल वाला था. मैं किसी भी दर्द भरी बात के बारे में बिल्कुल नहीं सुन सकता था. और अगर किसी ने किसी को खा लिया, या फिर आग में फेंक दिया, या घुप् अंधेरे कमरे में बंद कर दिया – तो मैं फ़ौरन रोने लगता था. जैसे कि, मान लीजिए, भेड़ियों ने बकरी के छौने को खा लिया और इसके बाद बस उसका मुँह और उसकी टाँगें ही रह गईं. मैं तो बस बिसूरने लगता था. या फिर, जैसे कि, जादूगरनी ने राजकुमार और राजकुमारी को ड्रम में बिठाकर इस ड्रम को समन्दर में फेंक दिया. मैं फिर से बिसूरने लगता. और वो भी कैसे! मेरी आँखों से आँसुओं की मोटी मोटी धारें निकल कर फर्श पर बहने लगतीं और उनके डबरे भी बन जाते.


 




ख़ास बात ये थी कि जब मैं कहानी सुनता था, तो मैं पहले से ही, उस भयानक घटना के शुरू होने से पहले ही, रोने के लिए तैयार हो जाता. मेरे होंठ टेढ़े-मेढ़े हो जाते और मेरी आवाज़ कँपकँपाने लगती, जैसे कि किसी ने गर्दन से पकड़कर झकझोर दिया हो. और मम्मा समझ ही नहीं पाती थी कि उसे क्या करना चाहिए, क्योंकि मैं हमेशा उससे कहानियाँ पढ़ने के लिए या सुनाने के लिए कहता, और जैसे ही कहानी डरावनी बात तक पहुँचती, मैं फ़ौरन समझ जाता और बीच ही में मम्मा से कहानी को छोटा करने के लिए कहता. दुर्घटना होने के क़रीब दो-तीन सेकण्ड पहले ही मैं कँपकँपाती आवाज़ में उसे मनाता : “इस जगह को छोड़ दो, मम्मा!” मम्मा, बेशक, वो जगह छोड़ देती, पाँचवें से दसवें पृष्ठ पर कूद जाती, और मैं आगे सुनने लगता, मगर बस थोड़ी ही देर, क्योंकि कहानियों में तो हर मिनट कुछ-न-कुछ होता ही रहता है, और जैसे ही मुझे समझ में आता कि अब कोई दुर्घटना होने वाली है, मैं फिर से बिसूरने लगता और मम्मा से कहता: “ये भी छोड़ दो!” मम्मा फिर से कोई ख़ून-ख़राबे वाली बात छोड़ देती और मैं कुछ देर के लिए शांत हो जाता. और इस तरह परेशानियों से, रुक-रुक कर चलते-चलते, और कहानी को दनादन् छोटा-छोटा करते-करते हम आख़िरकार एक सुखी अंत तक पहुँच ही जाते. बेशक, मुझे यह महसूस होता कि इस सबके कारण कहानियाँ उतनी दिलचस्प नहीं रह जातीं : पहली बात, वे बेहद छोटी हो जातीं, और दूसरी बात ये कि उनमें कोई भी साहसी कारनामे बाकी न बचते. मगर, मैं उन्हें आराम से तो सुन सकता था, सुनते-सुनते आँसुओं से नहा तो नहीं जाता, और फिर ऐसी कहानियों के बाद रात को चैन से तो सो सकता था, खुली आँखों से बिस्तर पर पड़ा तो नहीं रहता और सुबह तक डरता तो नहीं रहता. और इसीलिए इस तरह की संक्षिप्त कहानियाँ मुझे बहुत अच्छी लगतीं. वे इतनी शांत-शांत हो जातीं. जैसे कि ठण्डी, मीठी चाय. मिसाल के तौर पे, एक कहानी है – लाल हैट वाली. मैंने और मम्मा ने उसमें इत्ता सारा छोड़ दिया है कि वो दुनिया की सबसे छोटी कहानी बन गई है. मम्मा उसे इस तरह सुनातीं:  ‘ लाल हैट वाली एक लड़की थी. एक बार उसने समोसे बनाए और चल पड़ी अपनी दादी से मिलने. और फिर वे दोनों सुख से रहने लगीं.’   मैं बहुत ख़ुश हो गया कि उनके साथ सब कुछ अच्छा हो गया. मगर, अफ़सोस, बस यही एक परेशानी तो नहीं थी. एक और कहानी से, ख़रगोश वाली कहानी से, मुझे ख़ास तौर से बहुत दुख होता. ये एक छोटी सी कहानी है, किसी ‘राइम’ की तरह, दुनिया के सारे बच्चे उसे जानते हैं: 

“एक, दो, तीन, चार, पाँच, निकला ख़रगोश घूमने आज, एक शिकारी फ़ौरन भागा... 


बस, अब तो मेरी नाक में सुरसुराहट होने लगती और होंठ अलग-अलग दिशाओं में चले जाते, ऊपर वाला दाएँ, नीचे वाला बाएँ, और इस बीच कहानी चलती रहती...शिकारी, मतलब, अचानक भागते हुए आता और... 

और ख़रगोश को मार गिराया!


यहाँ तो मेरे दिल की धड़कन ही रुक जाती. मैं समझ ही नहीं पाता कि ऐसा कैसे होता है. ये बदहवास शिकारी सीधे ख़रगोश पर गोली क्यों चलाता है? ख़रगोश ने उसका क्या बिगाड़ा था? पहले शुरूआत क्या उसने की थी? बिल्कुल नहीं! उसने उसे चिढ़ाया भी नहीं था. वो तो बस घूमने निकला था! और ये तो बिना बात के:


पिफ़्-पाफ़् 

अपनी भारी भरकम दुनाली बन्दूक से! और मेरी आँखों से आँसू ऐसे बहने लगते, मानो नल से बह रहे हों. क्योंकि गोली ख़रगोश के पेट में लगी थी और वह बुरी तरह से ज़ख़्मी होकर चिल्ला रहा था:  

ओय-ओय-ओय!


वह चिल्लाया:  

    “ओय-ओय-ओय! अलबिदा, साथियों! अलबिदा, मेरे छौनों ! अलबिदा, मेरी ख़रगोशनी! अलबिदा, मेरी हँसती-खेलती ज़िन्दगी! अलबिदा, लाल-लाल गाजर और कुरकुरी गोभी! हमेशा के लिए अलबिदा मेरी चरागाह, और फूलों, और ओस की बूँदों, और पूरे जंगल, जहाँ हर झाड़ी के नीचे मेरे लिए घर और खाना तैयार था!” मैं जैसे अपनी आँखों के सामने देख रहा था कि कैसे भूरा ख़रगोश पतले बर्च के नीचे पड़ा है और मर रहा है... मगर एक बार रात को, जब सब सोने चले गए, मैं बड़ी देर अपनी कॉट पर पड़ा-पड़ा बेचारे ख़रगोश को याद करता रहा और सोचता रहा कि कितना अच्छा होता अगर उसके साथ ये सब न हुआ होता. वाक़ई में कितना अच्छा होता, अगर ये सब न हुआ होता. और मैंने इतनी देर तक इसके बारे में सोचा कि अनजाने ही इस कहानी को दुबारा से बना डाला:   

“एक, दो, तीन, चार, पाँच, निकला ख़रगोश घूमने आज, एक शिकारी फ़ौरन भागा... और ख़रगोश को... नहीं मारा!!!

ना पिफ़्! ना पाफ़्!

ना ही ओय-ओय-ओय!

नहीं मरा ख़रगोश मेरा!!!


ये हुई न बात! मैं हँसने भी लगा! कैसे सब कुछ अच्छा हो गया! ये तो वाक़ई में चमत्कार हो गया. ना पिफ़्! ना पाफ़्! मैंने बस एक छोटा-सा ‘ना’ लगा दिया, और शिकारी तो, जैसे कुछ हुआ ही न हो, अपने एड़ियों वाले फ़ेल्ट के जूतों को खटखटाते हुए ख़रगोश के क़रीब से निकल गया. और वो ज़िन्दा बच गया! वो फिर से सबेरे-सबेरे दूब से ढँके खेत में खेला करेगा, उछलेगा और कूदेगा और अपने पंजों से पुराने, सड़े हुए पेड़ के ठूँठ को खुरचेगा. कैसा मज़ेदार, बढ़िया ड्रम जैसा है वो ठूठ !

और मैं अँधेरे में लेटा-लेटा मुस्कुरा रहा था और मम्मा को इस आश्चर्य के बारे में बताना चाह रहा था, मगर उसे जगाने से डर रहा था. आख़िर में मेरी आँख लग गई. जब मैं उठा, तो मुझे हमेशा के लिए पता चल गया था कि अब मैं दुख भरी कहानियाँ को सुनकर कभी भी नहीं रोऊँगा, क्योंकि अब मैं इन भयानक अन्यायपूर्ण बातों में किसी भी समय दखल दे सकता था, दखल दे सकता था और हर चीज़ अपनी मर्ज़ी के मुताबिक बदल सकता था, और सब कुछ अच्छा हो जाएगा. बस, सिर्फ सही समय पर कहने की ज़रूरत है: 


“ना पिफ़्, ना पाफ़्!”

 


*********














19

चालाक तरीका 

 “तो,” मम्मा ने कहा, “ज़रा ग़ौर फ़रमाइए! छुट्टी कैसे बीत जाती है? बर्तन, बर्तन, बर्तन, दिन में तीन-तीन बार बर्तन! सुबह कप-प्लेट्स धोओ, और दिन में प्लेटों का पूरा पहाड़. बस, मुसीबत ही मुसीबत!”  “हाँ,” पापा ने कहा,” वाक़ई में ये बड़ी भयानक बात है! कितने दुख की बात है कि इस बारे में किसीने कुछ सोचा भी नहीं है. ये इंजीनियर लोग क्या करते हैं? हाँ, हाँ...बेचारी औरतें...” पापा ने गहरी साँस ली और दीवान पर बैठ गए.

 


मम्मा ने देखा कि वो कितने आराम से बैठ गए हैं और बोली:  “”यहाँ बैठ कर घिनौने तरीक़े से आहें भरने की ज़रूरत नहीं है! इंजीनियरों के ऊपर भी सारा दोष मढ़ने की ज़रूरत नहीं है! मैं तुम दोनों को समय देती हूँ. लंच तक तुम दोनों को कुछ न कुछ सोचना है और मेरा ये नासपीटा बर्तन-धुलाई का काम हल्का करना है! जो नहीं सोचेगा, उसे मैं खाना नहीं दूँगी. बैठा रहे भूखा. डेनिस्का! ये तेरे बारे में भी है. तैयार हो जा कुछ सोचने के लिए!” 

मैं फौरन विन्डो-सिल पर बैठ गया और सोचने लगा, कि इस बारे में क्या किया जाए.  

पहली बात तो ये थी कि मैं डर गया था कि मम्मा सचमुच में मुझे खाना नहीं देगी और मैं भूख से मर जाऊँगा; और दूसरी बात: मुझे इस बारे में सोचना बड़ा अच्छा लग रहा था, क्योंकि इंजीनियर्स कुछ कर नहीं पाए थे. और मैं बैठा था, सोच रहा था और कनखियों से पापा की ओर देख लेता था, कि उनका  क्या हाल है. मगर पापा ने तो सोचने के बारे में सोचा ही नहीं. उन्होंने दाढ़ी बनाई, फिर साफ कमीज़ पहनी, फिर दस अख़बारों की गड्डी पढ़ ली, और उसके बाद आराम से रेडियो लगा दिया और पिछले हफ़्ते की कुछ ख़बरें सुनने लगे. तब मैंने और जल्दी सोचना शुरू कर दिया. पहले मैं किसी इलेक्ट्रिक मशीन के बारे में सोचने लगा जो ख़ुद-ब-ख़ुद बर्तन धो ले और उन्हें पोंछ भी ले. इसके लिए मैंने हमारी फ़र्श धोने वाली मशीन और पापा के इलेक्ट्रिक शेवर ‘खारकव’ के स्क्रू खोल दिए. मगर मैं उसमें तौलिया अटकाने के लिए कोई जगह नहीं ढूँढ पाया. 

पता चला कि मशीन चालू करने पर शेवर तौलिए के हज़ारों टुकड़े कर देगा. तब मैंने सारी चीज़ें फिर से जोड़ दीं और कुछ और सोचने लगा. और दो घण्टे बाद मुझे याद आया कि मैंने अख़बार में कन्वेयर के बारे में पढ़ा था, और इसके कारण मैंने अचानक बड़ी मज़ेदार चीज़ सोची. और जब लंच का टाइम हो गया और मम्मा ने मेज़ पर सब कुछ सजा दिया, और हम सब बैठ गए, तो मैंने कहा:  “तो, पापा? तुमने सोच लिया?”  “किस बारे में?” पापा ने कहा.  “वही, बर्तन धोने के बारे में,” मैंने कहा. “वर्ना मम्मा हम दोनों का खाना बन्द कर देगी.”   “वो तो उसने मज़ाक किया था,” पापा ने कहा. “वो अपने ख़ुद के बेटे को और बेहद प्यारे पति को कैसे नहीं खिलाएगी?” और वो ज़ोर से हँसने लगे. मगर मम्मा ने कहा:  “मैंने कोई मज़ाक-वज़ाक नहीं किया है, अभी पता चलेगा! शर्म कैसे नहीं आती! मैं सौंवी बार कह रही हूँ – बर्तन धोते-धोते मेरा दम निकल जाता है! ये ज़रा भी कॉम्रेडों जैसा बर्ताव नहीं है : ख़ुद खिड़की की सिल पर बैठे रहना, और दाढ़ी बनाते रहना, और रेडियो सुनना, जब कि मैं अधमरी हो रही होती हूँ, बिना रुके आप लोगों के कप और प्लेटें धोती रहती हूँ.”  “ठीक है,” पापा ने कहा, कोई तरक़ीब सोचते हैं! तब तक खाना तो खा लें! ओह, छोटी-छोटी बातों के पीछे ये नाटक!”  “आह, छोटी-छोटी बातों के पीछे?” मम्मा ने कहा और वह एकदम भड़क गई. “क्या कहने, बहुत ख़ूब! और अगर मैं सचमुच ही खाना न दूँ तो फिर तुम लोग ऐसी बकवास नहीं करोगे!” और उसने ऊँगलियों से अपनी कनपटियाँ दबाईं और मेज़ से उठ गई. और मेज़ के पास खड़े-खड़े बड़ी देर तक पापा को देखती रही. और पापा ने सीने पर हाथ रख लिए और कुर्सी पर झूलने लगे और वो भी मम्मा की ओर देखते रहे. और वो दोनों ख़ामोश थे. और कोई खाना-वाना भी नहीं था. मगर मुझे तो ज़ोर की भूख लगी थी. मैंने कहा:  “मम्मा! ये, बस, अकेले पापा ने ही तो कुछ नहीं सोचा है. मगर मैंने तो सोच लिया है! सब ठीक है, तुम परेशान न होना. चलो, खाना खाएँगे.” मम्मा ने कहा:  “तूने आख़िर क्या सोच लिया?” मैंने कहा:  “मम्मा, मैंने एक चालाक तरीक़ा सोचा है!”

उसने कहा:  “चल, चल, बता दे...” मैंने पूछा:  “तुम हर बार खाने के बाद खाने के कितने सेट्स धोती हो? हाँ, मम्मा?”   उसने जवाब दिया:  “तीन.”  “तब कहो ‘हुर्रे’,” मैंने कहा, “अब से तुम बस एक ही सेट धोया करोगी! मैंने एक चालाक तरीका सोच लिया है!”  “चल, बता भी दे,” पापा ने कहा.  “चलो, पहले खाना खा लेते हैं,” मैंने कहा. “खाना खाते-खाते मैं बताऊँगा, मुझे तो बड़े ज़ोर की भूख लगी है.”  “चलो, ठीक है,” मम्मा ने गहरी साँस ली, “चलो, खा लेते हैं.” और हम खाना खाने लगे.  “तो?” पापा ने कहा.  “बड़ा आसान है,” मैंने कहा. “तुम बस सुनती रहना, मम्मा, देख लेना सब कुछ कितना बढ़िया हो जाएगा! देखो: जैसे, ये खाना तैयार है. तुम बस एक ही सेट मेज़ पर रखती हो. रखती हो, तुम, याने कि, बस एक ही सेट, गहरी प्लेट में सूप डालती हो, मेज़ के पास बैठती हो, सूप खाने लगती हो और पापा से कहती हो, “खाना तैयार है!” पापा, बेशक, हाथ धोने जाते हैं, और, जब तक वो हाथ धोते हैं, तुम, मम्मा, अपना सूप ख़तम कर चुकी होती हो, और पापा को अपनी ही प्लेट में नया सूप डालकर देती हो.” और ये, पापा कमरे में लौटते हैं और फ़ौरन मुझसे कहते हैं:   “डेनिस्का, खाना तैयार है! जा, हाथ धो ले!”

मैं जाता हूँ. तुम, इस समय उथली प्लेट से कटलेट्स खा रही होती हो. और पापा सूप खाते रहते हैं. और मैं हाथ धोता रहता हूँ. और जब मैं उन्हें धो लेता हूँ, मैं आप लोगों के पास आता हूँ, और यहाँ, पापा ने सूप ख़त्म कर लिया है, और तुमने कटलेट्स खा लिए हैं. और जब मैं अन्दर आया तो पापा ने अपनी ख़ाली प्लेट में नया सूप डाला, तुमने पापा को अपनी ख़ाली प्लेट में कटलेट्स दिए. मैं सूप खा रहा हूँ, पापा कटलेट्स खा रहे हैं, और तुम आराम से ग्लास में फलों का स्ट्यू पी रही हो. 

जब पापा कटलेट्स ख़तम कर चुके होते हैं, तभी मैं भी अपना सूप ख़त्म कर चुका हूँ. तब वो अपनी उथली प्लेट में कटलेट्स डालते हैं, और इस समय तुम स्ट्यू ख़त्म कर चुकती हो और पापा को उसी गिलास में स्ट्यू डाल कर देती हो. मैं सूप वाली ख़ाली प्लेट सरका देता हूँ, कटलेट्स वाली प्लेट लेता हूँ, पापा स्ट्यू पीने लगते हैं, और तुम, शायद, खाना ख़त्म कर चुकी हो, इसलिए तुम सूप वाली गहरी प्लेट उठाती हो और उसे धोने के लिए किचन में जाती हो! जब तक तुम वो प्लेट धोती हो, मैं कटलेट्स खा चुका  होता हूँ, और पापा – स्ट्यू. अब वो मेरे लिए गिलास में स्ट्यू डालते हैं और उथली वाली प्लेट तुम्हारे पास ले जाते हैं, मैं एक ही घूँट में स्ट्यू गटक जाता हूँ और ख़ुद वो खाली गिलास किचन में ले जाता हूँ! सब कुछ कितना आसान है! और तुम्हें तीन सेट्स के बदले बस एक ही सेट धोना पड़ता है. हुर्रे!”  “हुर्रे!” मम्मा ने कहा. “हुर्रे तो हुर्रे, मगर ये बहुत अनहाइजीनिक है!”  “बकवास!” मैंने कहा, “आख़िर सब अपने ही तो हैं. मुझे, मिसाल के तौर पर, पापा के बाद खाने में कोई ऐतराज़ नहीं है. मैं उनसे प्यार करता हूँ. तो, फिर बात क्या है...मैं तुमसे भी प्यार करता हूँ.”  “”वाक़ई में, बड़ा चालाक तरीका है,” पापा ने कहा. “मगर. चाहे कुछ भी कहो, तीन किश्तों में खाने के मुक़ाबले में, सबके एक साथ बैठकर खाने का मज़ा ही कुछ और है.”  “हाँ,” मैंने कहा, “मगर, मम्मा के लिए ये आसान है! बर्तन तो एक तिहाई रह जाते हैं ना.”

 “जानते हो,” पापा ने सोच में डूबे-डूबे कहा, “मुझे लगता है कि मैंने भी एक तरीका सोच लिया है. हाँ ये सच है कि वो इतना चालाक नहीं है, मगर फिर भी...”

 “बताओ,” मैंने कहा.  पापा उठे, आस्तीनें चढ़ाईं और मेज़ से सारे बर्तन इकट्ठे कर लिए.

 “मेरे पीछे आ जा,” उन्होंने कहा, “मैं तुझे अपना ना-चालाक तरीका दिखाता हूँ. वो ये है कि अब से हम और तुम मिलकर सारे बर्तन साफ़ किया करेंगे!” और वो चल पड़े. मैं उनके पीछे भागा. और हमने सारे बर्तन धो डाले. हाँ, बस केवल दो सेट्स. क्योंकि तीसरा तो मैंने तोड़ दिया. ये, बस, मेरे हाथ से हो गया, मैं पूरे समय यही सोच रहा था कि पापा ने कितना सीधा-सादा तरीका सोचा है. और मेरे दिमाग़ में ये क्यों नहीं आया?...


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20

...अगर


एक बार मैं बैठा था, बैठा था और अचानक मेरे दिमाग़ में ऐसा ख़याल आया कि मैं ख़ुद भी चौंक गया. मैंने सोचा, कि कितना अच्छा होता अगर दुनिया की सारी चीज़ें उलटी-पुलटी हो जातीं. जैसे कि, मिसाल के तौर पर, बच्चे हर चीज़ में महत्वपूर्ण होते और बड़ों को उनकी हर बात माननी पड़ती. मतलब, बच्चे बड़ों जैसे होते और बड़े बच्चों जैसे होते. ये होती कमाल की बात, कितना मज़ा आता!

 



सबसे पहले, मैं कल्पना करता हूँ कि मम्मा को ये बात कितनी ‘अच्छी’ लगती, कि मैं घूम रहा हूँ और उस पर अपनी मर्ज़ी से हुकुम चला रहा हूँ, और पापा को भी कितना ‘अच्छा’ लगता, और दादी के बारे में तो कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं है. मैं सबसे गिन गिनकर बदला लेता! मिसाल के तौर पर, मम्मा खाना खाने बैठी है, और मैं उससे कहता: ”ये बगैर ब्रेड के खाने का क्या फ़ैशन सीख लिया है तूने? और देख! ज़रा आईने में अपनी शकल देख, किसके जैसी दिखाई दे रही है? खूसट बुड्ढी! फ़ौरन खा, तुझसे कह रहे हैं!” – और वो सिर झुकाकर खाने लगती, और मैं बस हुकुम चलाता: “जल्दी! गाल पे हाथ मत रख! फिर सोचने लगी? सारी दुनिया की प्रॉब्लेम्स तुझे ही तो सुलझानी हैं ना? खा, जैसी तेरी मर्ज़ी! और कुर्सी पर झूला न झूल!”

और तभी पापा काम से लौटते, और वह कपड़े भी न उतारते कि मैं चिल्लाना शुरू करता:  “आहा, आ गया! हमेशा, बस, तेरी राह ही देखते रहो! फ़ौरन हाथ धो! कैसे धो रहा है, कैसे धो रहा है, गन्दगी फैलाने की ज़रूरत नहीं है. तेरे हाथ पोंछने के बाद तौलिए की ओर देखा नहीं जाता. ब्रश से घिस और खूब साबुन लगा. चल, नाखून दिखा! ओह, कितने डरावने हैं, ये नाखून हैं? ये तो किसी जानवर के तीखे नाखून हैं! कैंची कहाँ है? खींच मत! मैं कोई ऊँगली का माँस नहीं खींच रहा हूँ, बल्कि बड़ी सावधानी से काट रहा हूँ. नाक न सुड़क, तू कोई लड़की नहीं है...ये, हो गया. अब मेज़ पे बैठ जा.” वो बैठ जाते और हौले से मम्मा से कहते:  “कैसी है तू?” और वो भी धीरे से जवाब देती:  “ठीक हूँ, थैन्क्यू!”

मैं फ़ौरन कहता: 

 “मेज़ पे बात नहीं! जब मैं खाना खा रहा होता हूँ तो गूँगे और बहरे बन जाओ! ये बात ज़िन्दगी भर याद रखना. सुनहरा नियम! पापा! वो अख़बार रख दो, सज़ा हो तुम मेरे लिए!” और वे चुपचाप बैठे रहते, और जब दादी आती, तो मैं आँखें बारीक कर लेता, हाथ नचाता और ज़ोर से कहता:  “पापा! मम्मा! ज़रा देखो हमारी दादी जान को! क्या शकल बना रखी है! सीना खुला हुआ, हैट सिर से खिसकी जा रही है! गाल लाल, सारी गर्दन गीली! बढ़िया, क्या कहने! मान ले कि फिर से हॉकी खेलने गई थी! और ये गन्दी लकड़ी कैसी है? तू इसे घर क्यों घसीट लाई? क्या? ये आईस-हॉकी वाली स्टिक है! फ़ौरन मेरी आँखों के सामने से दूर कर – पिछले दरवाज़े से!” अब मैं कमरे में टहलता और उन तीनों से कहता: ”खाना खाने के बाद सब होम वर्क करने बैठो, और मैं फिल्म देखने जाऊँगा!” बेशक, वे फ़ौरन बिसूरने लगते और ठिनकने लगते:

 “हम भी तुम्हारे साथ जाएँगे! हमें भी फिल्म देखना है!” मैं उनसे कहता:  “किसी हालत में नहीं, किसी हालत में नहीं! कल बर्थ-डे पार्टी में गए थे, इतवार को मैं तुम्हें सर्कस ले गया था! छिः! हर रोज़ घूमने-फिरने की आदत पड़ गई है. घर में बैठो! चलो, ये तुम्हॆ तीस कोपेक देता हूँ आईस्क्रीम के लिए, बस!” तब दादी विनती करती:  “कम से कम मुझे तो ले चल! हर बच्चा अपने साथ किसी बड़े को मुफ़्त में तो ले जा सकता है!”  मगर मैं उसकी बात काट देता, मैं कहता:  “मगर इस फिल्म में सत्तर साल से बड़े लोगों को नहीं आने दिया जाता. घर में बैठ, घुमक्कड़ कहीं की!”        और मैं जानबूझ कर ज़ोर ज़ोर से एड़ियाँ खटखटाते हुए उनके सामने से निकल जाता, जैसे कि मैं देख ही नहीं रहा हूँ कि उन सब की आँखें गीली हैं, और मैं कपड़े पहनने लगता, बड़ी देर तक आईने के सामने घूम घूम कर देखता रहता, और गाना गाने लगता, और वे इससे और भी ज़्यादा दुखी होते, मैं सीढ़ियों का दरवाज़ा थोड़ा सा खोलता और कहता: मगर मैं सोच ही नहीं पाया, कि मैं क्या कहता, क्योंकि इसी समय मम्मा आ गई, असली, सचमुच की मम्मा और बोली:  “तू अभी तक बैठा ही है. खा फ़ौरन, देख तो किसके जैसा दिख रहा है? बिल्कुल खूसट बुड्ढा!” 


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21

हाथी और रेडियो   



दुनिया में ऐसे छोटे-छोटे रेडियो होते हैं, वे सचमुच के रेडियो से छोटे होते हैं, सिगरेट के डिब्बे जितने बड़े. और उनका अन्टेना घूमता है. ओह, क्या ज़ोर से बजते हैं, पूरी कॉलोनी में सुनाई देता है! ग़ज़ब की चीज़ है! ये चीज़ मेरे पापा को उनके दोस्त ने प्रेज़ेंट की थी. इस रेडियो का नाम है ट्रान्सिस्टर. उस शाम, जब हमें वह दिया गया था, हम पूरे समय प्रोग्राम सुनते रहे. मैंने उसे अच्छी तरह से चलाना सीख लिया और अन्टेना को मैं कभी निकाल देता, कभी बाहर कर लेता, और सारे बटन घुमाता, और म्यूज़िक लगातार और ज़ोर से बजता रहता, क्योंकि मैं तो इस काम में इतना एक्सपर्ट हूँ कि पूछिए मत.

इतवार को सुबह मौसम एकदम साफ़ था, सूरज पूरे जोश से चमक रहा था, और पापा ने सुबह-सुबह कहा:  “चल, जल्दी से तैयार हो जा, और फिर हम दोनों ज़ू-पार्क जाएँगे. काफ़ी दिनों से गए नहीं हैं, एकदम ‘बोर’ हो गए हैं.” 

 


ये सुनकर मैं भी बहुत ख़ुश हो गया, और मैं जल्दी से तैयार हो गया. आह, मुझे ज़ू-पार्क में घूमना अच्छा लगता है, छोटी सी लामोच्का (दक्षिण अमेरिका में पाया जाने वाला ऊँट की जाति का जीव, जो बोझा ढ़ोने के काम आता है.) को देखना और यह कल्पना करना अच्छा लगता है कि उसे हाथों में लेकर सहलाया जा सकता है! और उसका दिल पागल की तरह धड़क रहा है, और वह अपने सुंदर, फुर्तीले पैरों से चढ़ रही है. और ऐसा लगता है कि अभी ज़ोर से टकरा जाएगी. मगर, कोई बात नहीं, सब ठीक हो जाता है.               

या फिर छोटा सा टाइगर. उसे भी हाथों में लेना कितना अच्छा होता! और वो तुम्हारी ओर डरी-डरी आँखों से देख रहा है. रूह एकदम पंजों में समा गई है. डरता है, बेवकूफ़, शायद सोचता है : शायद, मेरी मौत की घड़ी आ गई. 

जंगली भैंसे की चारदीवारी के सामने खड़े होना और उसके बारे में सोचना भी अच्छा लगता है कि ये ज़िंदा पहाड़, जिस पर मानो सोच में डूबे बूढ़े का चेहरा लगा है, और तुम इस पहाड़ के सामने खड़े हो और तुम्हारा वज़न है सिर्फ पच्चीस किलो, और ऊँचाई 97 से.मी. जब तक हम चल रहे थे, मैं पूरे रास्ते ज़ू-पार्क की अलग अलग विभिन्नताओं के बारे में सोचता रहा और मैं बड़े सुकून से चल रहा था, उछल-कूद नहीं कर रहा था, क्योंकि मेरे हाथों में ट्रान्सिस्टर था, जिसमें म्यूज़िक गुनगुना रहा था. मैं उसमें एक स्टेशन से दूसरा स्टेशन बदल रहा था, और मेरा मूड बेहद अच्छा था. और जब हम पहुँच गए, तो पापा ने कहा : “ हाथी के पास,” क्योंकि ज़ू-पार्क में पापा को सबसे ज़्यादा हाथी पसन्द था. पापा सबसे पहले उसीके पास जाते, जैसे किसी बादशाह के पास जाते हैं. वो हाथी का हालचाल पूछते हैं, और बाद में जहाँ सींग समाए, वहीं चल पड़ते हैं. इस बार भी हमने ऐसा ही किया. हाथी, जैसे ही घुसते हो, सीधे हाथ पे खड़ा है, एक अलग कोने में, छोटे से टीले पे; दूर से ही उसका विशालकाय शरीर दिखाई देता है, जो चार खम्भों पर खड़े किसी अफ्रीकन झोंपड़ें जैसा होता है. 

उसकी फेन्सिंग के पास लोगों का एक बहुत बड़ा झुण्ड खड़ा था, जो उसे देखकर ख़ुश हो रहा था. उसका प्यारा-सा, मुस्कुराता-सा चेहरा दिखाई दे रहा था, वह तिकोने होंठ से कुछ बुदबुदा रहा था. मैं फ़ौरन भीड़ में से रास्ता बनाता हुआ हमारे शैंगो के पास पहुँचा (उसका नाम शैंगो था, वो इण्डियन हाथी महमूद का बेटा था – ऐसा उसकी फेन्सिंग के पास लगे ख़ास बोर्ड पर लिखा था.)

पापा भीड़ में से रास्ता बनाते हुए आगे आए और चिल्लाए:  “गुड मॉर्निंग, शैंगो महमूदोविच!” और हाथी ने देखा और ख़ुशी से सिर हिलाया. जैसे कि कह रहा हो, “ओह, नमस्ते, नमस्ते, आप कहाँ थे इतने दिन?” और आसपास के लोगों ने मुस्कुराकर और कुछ ईर्ष्या से पापा की ओर देखा. और मुझे भी, सच कहूँ तो, बड़ी जलन हुए, कि हाथी ने पापा की बात का जवाब दिया. और मेरा भी दिल करने लगा कि शैंगो मेरी तरफ़ भी ध्यान दे, और मैं ज़ोर से चिल्लाया:  “शैंगो महमूदोविच, नमस्ते! देखिए, मेरे पास क्या है.” और मैंने पापा का ट्रान्सिस्टर अपने सिर के ऊपर उठा लिया. ट्रान्सिस्टर से म्यूज़िक आ रहा था, वह कई सारे सोवियत गाने बजा रहा था. शैंगो महमूदोविच मुड़ा और म्यूज़िक सुनने लगा. अचानक उसने अपनी सूँड ऊपर उठाई, उसे मेरी ओर बढ़ाया और अचानक हौले से मेरे हाथों से इस नासपीटे ट्रान्सिस्टर को छीन लिया.

मैं तो एकदम बुत बन गया, हाँ, और पापा भी. और पूरी भीड़ भी बुत बन गई. शायद, सब सोच रहे थे कि अब आगे क्या होता है : वापस दे देगा? ज़मीन पर पटक देगा? पैरों से कुचल देगा? मगर शैंगो महमूदोविच, शायद सिर्फ म्यूज़िक सुनना चाहता था. उसने न तो ट्रान्सिस्टर को तोड़ा, ना ही उसे वापस दिया. वह ट्रान्सिस्टर पकड़े था – और बस! वह म्यूज़िक सुन रहा था. और तभी, बदकिस्मती से, म्यूज़िक रुक गया, शायद, उनके पास कोई ‘ब्रेक’ था, मालूम नहीं. मगर शैंगो महमूदोविच सुनता रहा. उसके भाव ऐसे थे कि वो इंतज़ार कर रहा है कि कब ट्रान्सिस्टर बजना शुरू होगा. मगर, शायद लम्बा इंतज़ार करना था, क्योंकि ट्रान्सिस्टर ख़ामोश था. और तब, शायद, शैंगो महमूदोविच ने सोचा : ये बेकार की चीज़ मैं क्यों अपनी सूँड में उठाए हूँ? ये बज क्यों नहीं रहा है? देखूँ तो, इसका स्वाद कैसा है? 

और, ज़्यादा सोच-विचार किए बिना, इस बिन्दास हाथी ने सीधे अपनी सूँड के नीचे, अपने नमदे जैसे बड़े मुँह में मेरे शानदार ट्रान्सिस्टर को घुसा दिया, हाँ, उसने उसे चबाया नहीं, बस, सिर्फ़ ऐसे रख लिया जैसे किसी सन्दूक में रख रहा हो, और, मुलाहिज़ा फ़रमाईये, गटक लिया.      

भीड़ दोस्ताना अंदाज़ में ‘आह! आह!’ कर उठी और सकते में आ गई. और हाथी ने एक धृष्ठ मुस्कान से इस अचंभित भीड़ की ओर देखा और दबी-दबी आवाज़ में कहा: 

“अब हम सामूहिक एक्सरसाईज़ शुरू करते हैं! और!...” और उसके भीतर से कोई जोश भरा संगीत गूंजने लगा. अब तो सब लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो गए, उनके पेट, बस फटने ही वाले थे, वे हँसी के मारे कराह रहे थे : इस जंगली शोर में और कोई आवाज़ें सुनाई नहीं दे रही थीं. हाथी एकदम शांति से खड़ा था. सिर्फ आँखों से बदमाशी झाँक रही थी. और जब सब धीरे-धीरे शांत होने लगे, तो हाथी के मुँह से कुछ दबी-दबी मगर स्पष्ट आवाज़ सुनाई दी: 

 “अपनी जगह पर तेज़ कूद, एक-दो, तीन-चार...” और भीड़ में, संयोग से, बहुत सारे लड़के और लड़कियाँ थे, और जब उन्होंने ‘तेज़-कूद’ के बारे में सुना, तो ख़ुशी से किलकारियाँ मारने लगे. और फ़ौरन इस काम में शामिल हो गए:  एक-दो-तीन-चार...वे मज़े से कूद रहे थे. और किलकारियाँ मार रहे थे, और दहाड़ रहे थे, और अलग-अलग करतब कर रहे थे. क्या बात है! हाथी की कमाण्ड में कूदना किसे अच्छा नहीं लगता? ऐसे में तो हर कोई कूदने लगेगा. मैं भी फ़ौरन कूदने लगा. जबकि मैं अच्छी तरह समझ रहा था कि चाहे और लोग कूदें या न कूदें, मुझे तो सबसे कम कूदना और ख़ुश होना चाहिए. असल में तो मुझे रोना चाहिए था. मगर इसके बदले, जानते हैं, मैं गेंद की तरह उछल रहा था : एक-दो-तीन-चार! और ऐसा लग रहा था कि मेरा ट्रान्सिस्टर छीन लिया गया है और इससे मुझे खुशी हो रही है. इस बीच एक्सरसाईज़ चलती रही. अब हाथी अगली एक्सरसाईज़ की ओर बढ़ा.

 “हाथों की मुट्ठियाँ बांधो, मुक्के हिलाने की और धक्का देने की एक्सरसाईज़. एक-दो-तीन!” बेशक, अब तो हंगामा होने लगा. बस, समझ लीजिए कि यूरोपियन बॉक्सिंग चैम्पियनशिप हो रही है. कुछ लड़के और लड़कियाँ तो पूरी संजीदगी से यह एक्सरसाईज़ कर रहे थे और एक दूसरे को ऐसे धुनक रहे थे, कि अंजर-पंजर ढीले हो गए. वहाँ से गुज़रती हुई एक दादी-माँ ने किसी बूढ़े आदमी से पूछा:  “यहाँ ये क्या हो रहा है? कैसी मारपीट है?” और उसने उसे मज़ाक में जवाब दिया:  “आम बात है. हाथी पब्लिक से फिज़िकल एक्सरसाईज़ करवा रहा है.”

दादी माँ का मुँह खुला रह गया. मगर शैंगो महमूदोविच अचानक चुप हो गया, और मैं समझ गया कि मेरा रेडिओ उसके पेट में टूट ही गया है. बेशक किसी आँत-वाँत में घुस गया होगा और – हमेशा के लिए खो गया. इसी समय हाथी ने मेरी ओर देखा और, दुख से सिर हिलाते हुए, मगर काफ़ी उलाहने के साथ गा उठा:  “क्या तुझे अभी भी याद है, कैसे सुख की घड़ी थी वो?”

मैं दुख के मारे रोने-रोने को हो गया. क्या मुझे याद है? ये भी क्या बात हुई! अगर एक पल और बीतता तो मैं मुक्कों से उस पर पिल पड़ता. मगर तभी उसके पास नीले एप्रन में एक आदमी आया. उसके हाथों में हरी-हरी टहनियाँ थीं, क़रीब पचास या शायद और भी ज़्यादा, और उसने हाथी से कहा:  “ठीक है, ठीक है, दिखा, दिखा, तेरे भीतर ये क्या बज रहा है? मगर हौले से, हौले से, देख मैं तेरे लिये टहनियाँ लाया हूँ, अच्छा, अच्छा, खा ले.” 

और उसने टहनियाँ हाथी के सामने रख दीं.  शैंगो महमूदोविच ने बेहद सावधानी से उस आदमी के पैरों के पास मेरा ट्रान्सिस्टर रख दिया. मैं चिल्लाया:  “हुर्रे!”  बाकी के लोग भी चिल्लाए:  “वन्स मोर!” और, हाथी मुड़ गया और टहनियाँ चबाने लगा. उस कर्मचारी ने चुपचाप मुझे मेरा ट्रान्सिस्टर दे दिया, - वह गरम था और उस पर लार चिपकी थी. मैंने और पापा ने घर आकर उसे शेल्फ पर रखा और अब हम हर शाम उसे चलाते हैं. क्या बजता है! बिल्कुल अफ़लातून! सुनने के लिए आईये! 

                                                                 ****
















22.

मीश्का को क्या पसन्द है


एक बार मैं और मीश्का उस हॉल में गए जहाँ म्यूज़िक की क्लास लगती है. बरीस सिर्गेयेविच  अपने पियानो पर बैठे थे और हौले-हौले कुछ बजा रहे थे. मैं और मीश्का खिड़की की सिल पर बैठ गए और हमने उन्हें ज़रा भी डिस्टर्ब नहीं किया; उन्होंने भी हमें नहीं देखा और बस, अपना बजाते रहे, उनकी उँगलियों के नीचे से अलग अलग तरह की आवाज़ें उछल-उछल कर बाहर आ रही थीं. वे चारों ओर फैल रही थीं, और कोई बहुत प्यारी सी, ख़ुशनुमा सी चीज़ पैदा हो रही थी. मुझे बहुत अच्छा लगा, मैं काफ़ी देर तक इस तरह बैठ कर सुन सकता था, मगर बरीस सिर्गेयेविच  ने जल्दी ही बजाना बन्द कर दिया. उन्होंने पियानो का ढक्कन बन्द किया, और प्रसन्नता से बोले:  “ओह! ये कौन लोग हैं! बिल्कुल डाल पर दो चिड़ियों की तरह बैठे हैं! तो, बोलो, क्या हाल है?” मैंने पूछा:  “ये आप क्या बजा रहे थे, बरीस सिर्गेयेविच ?” उन्होंने जवाब दिया:  “ये शोपेन था. मुझे वह बहुत पसन्द है.” मैंने कहा:  “बेशक, जब आप म्यूज़िक-टीचर हैं, तो आप अलग–अलग तरह के गाने पसन्द करेंगे ही.” उन्होंने कहा:  “ये गाना नहीं है. हाँलाकि गाने मुझे अच्छे लगते हैं, मगर ये गाना नहीं था. जो मैं बजा रहा था, उसका एक बहुत बड़ा नाम है, न कि सिर्फ ‘गाना’.”

मैंने कहा:  “क्या? क्या नाम है?”

उन्होंने बड़ी संजीदगी से, बड़ी अच्छी तरह समझाया:  “म्यू-ज़ि-क. शोपेन – महान संगीतकार थे. उन्होंने म्यूज़िक की बड़ी शानदार रचनाएँ कीं. और मुझे दुनिया में सबसे ज़्यादा म्यूज़िक पसन्द है.” अब उन्होंने ग़ौर से मेरी तरफ़ देखा और बोले:  “अच्छा, तुझे क्या अच्छा लगता है? दुनिया में सबसे ज़्यादा?” मैंने जवाब दिया:  “मुझे कई सारी चीज़ें अच्छी लगती हैं.” और मैंने उन्हें बताया कि मुझे क्या क्या पसन्द है. कुत्ते के बारे में बताया, लकड़ी छीलने के बारे में बताया, छोटे से हाथी के बारे में, लाल घुड़सवारों के बारे में, लाल खुरों वाले छोटे से हिरन के बारे में, और प्राचीन योद्धाओं के बारे में, ठण्डे सितारों के बारे में, और घोड़ों के थोबड़ों के बारे में, सब, सब, सब बताया... वे बड़े ध्यान से मेरी बात सुन रहे थे, जब वह सुन रहे थे तब उनके चेहरा सोच में डूबा था, और फिर उन्होंने कहा:  “ग्रेट! और मुझे मालूम ही नहीं था. ईमानदारी से कहूँ, तू अभी इतना छोटा है, तू बुरा मत मानना, मगर देख-तो- इत्ती सारी चीज़ें पसन्द करता है! पूरी दुनिया.”

 


 अब मीश्का भी बातचीत में शामिल हो गया. वह गाल फुलाकर कहने लगा:  “और मैं तो डेनिस्का से भी ज़्यादा अलग-अलग तरह की बहुत सारी चीज़ें पसन्द करता हूँ! ज़रा सोचिए!!”

बरीस सिर्गेयेविच हँस पड़े:  “बड़ी दिलचस्प बात है! तो, चल, अपने दिल का राज़ खोल दे. अब तेरी बारी है, उठा टॉर्च! तो, हो जा शुरू! तुझे क्या पसन्द है?” मीश्का खिड़की की सिल पर थोड़ा कुलबुलाया, फिर वह थोड़ा खाँसा और बोला:  “मुझे रोल, बन, ब्रेड-लोफ़, और प्लम-केक पसन्द है! मुझे ब्रेड, और केक, और पेस्ट्री, और जिंजर-ब्रेड, चाहे तूला की हो, या शहद वाली, या आईसिंग वाली हो, पसन्द है.

 रिंग जैसे क्रैक्नेल भी अच्छे लगते हैं, और कुकीज़, और मीट, जैम, कैबेज और चावल भरी पेस्ट्रीज़ भी. 

 मुझे समोसे बेहद हैं , ख़ासकर केक भरे, अगर वे ताज़े हैं; मगर बासे हों तो भी कोई बात नहीं. ओटमील्स और वैनिला बिस्किट्स भी चलते हैं.  और, मछलियों में, मुझे स्प्रैट, साइरा, नमक लगी पेर्च, गोबि टमाटर सॉस के साथ, उथले पानी की मछली उसी के रस में, कैवियर चटनी के साथ, सब्ज़ियों के स्लाईस और फ्राइड पोटॅटो अच्छे लगते हैं.           

 उबला हुआ सॉसेज बेहद पसन्द है, अगर ‘डॉक्टर्स्काया’ ब्रॅण्ड हो तो पूरा एक किलो खा जाऊँगा! ‘स्तलोवाया’ भी पसन्द है. ये चीज़ें मुझे सबसे ज़्यादा पसन्द हैं. 

 मक्खन के साथ मैकरोनी बहुत पसन्द है, वेर्मिसेली – मक्खन के साथ, चीज़...  जैम बहुत अच्छा लगता है, जैम और दही, दही और नमक, मीठा दही, खट्टा दही; ऍपल्स पसन्द हैं, शक्कर में लिपटे हुए, वैसे सिर्फ ऍपल्स भी अच्छे लगते हैं, और अगर ऍपल्स साफ़ किए हुए हों, तो पहले ऍपल्स खाकर बाद ही में कुछ और खाता हूँ. 

 बिस्किट्स, कटलेट्स, सूप, हैरिंग, हरी सब्ज़ियों का सूप, हरी मटर,  बॉइल्ड मीट, स्क्रैम्बल्ड-एग्स, शक्कर, चाय, मिनरल वाटर, ब्रेड-बटर....

 हलवे के बारे में तो मैं कुछ कहूँगा ही नहीं – किस बेवकूफ़ को हलवा अच्छा नहीं लगता? आह, हाँ! आईस्क्रीम तो बेहद पसन्द है. सात कोपेक वाली, तेरह, पन्द्रह, उन्नीस, बाईस और अठ्ठाईस कोपेक वाली...सभी पसन्द है.” मीश्का गोल-गोल आँखें घुमाते हुए छत की ओर देखे जा रहा था और गहरी—गहरी साँस ले रहा था. ज़ाहिर था कि वह खूब थक गया है. मगर बरीस सिर्गेयेविच  उसकी ओर ध्यान से देखे जा रहे थे, और वह बोलता रहा. 

आख़िरकार वह एक गहरी साँस लेकर ख़ामोश हो गया. उसकी आँखों से पता चल रहा था कि अब वह इंतज़ार कर रहा है कि कैसे बरीस सिर्गेयेविच  उसकी तारीफ़ करेंगे. मगर उन्होंने कुछ अप्रसन्नता से और कुछ सख़्ती से मीश्का की ओर देखा. जैसे कि वो भी मीश्का से कुछ और सुनना चाहते थे : क्या मीश्का को कुछ और बताना है. मगर मीश्का चुप था. ऐसा लग रहा था कि उन दोनों को ही एक दूसरे से किसी बात की उम्मीद थी, और इस उम्मीद में वे ख़ामोश थे. ख़ामोशी को तोड़ा बरीस सिर्गेयेविच  ने.  “तो, मीश्का,” उन्होंने कहा, “तुझे बहुत सारी चीज़ें पसन्द हैं, बहस की कोई बात ही नहीं है, मगर वो सब कुछ एक जैसा है, बस खाने-पीने की चीज़ें ही हैं. ऐसा लगता है कि तुझे बस ‘फूड-वर्ल्ड’ ही पसन्द है. और बस, इतना ही...और लोग? तुम किसे प्यार करते हो? या फिर कोई जानवर?” अब मीश्का थरथरा गया और लाल हो गया.  “ओय,”  उसने झेंपते हुए कहा, “देखिए, मैं तो भूल ही गया था! और मुझे पसन्द हैं – बिल्ली के पिल्ले! और दादी!”       

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23

एक्ज़ेक्ट 25 किलो             

हुर्रे! मुझे और मीश्का को ‘मेटलिस्ट’ क्लब में ‘चिल्ड्रेंस फेस्टिवल’ का इन्विटेशन-कार्ड मिला. दूस्या आण्टी ने इसके लिए कोशिश की थी: वह इस क्लब में सफ़ाई-विभाग की प्रमुख है. कार्ड तो उसने हमें एक ही दिया, मगर उस पर लिखा था: ‘दो व्यक्तियों के लिए’! मतलब – मेरे लिए और मीश्का के लिए. हम बहुत ख़ुश हो गए, ऊपर से ये क्लब हमारे घर के पास ही, बस, मोड़ पर ही था. मम्मा ने कहा: “तुम लोग, बस, वहाँ पे शरारत मत करना.” और उसने हम दोनों को पन्द्रह-पन्द्रह कोपेक दिए. मैं और मीश्का निकल पड़े. वहाँ, क्लोक-रूम में खूब धक्का-मुक्की हो रही थी और खूब लम्बी लाईन लगी थी. मैं और मीश्का लाईन के आख़िर में खड़े हो गए. लाईन बड़े धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी. मगर, अचानक ऊपर से म्यूज़िक बजने लगा, और मैं और मीश्का एक ओर से दूसरी ओर भागने लगे, जिससे कि जल्दी से अपने कोट उतार सकें, और बहुत सारे दूसरे बच्चे भी इस म्यूज़िक को सुनते ही, इधर-उधर भागने लगे, जैसे किसी ने उन पर गोली चला दी हो, और वे चीख़ने भी लगे, कि वे सबसे दिलचस्प प्रोग्राम के लिए ‘लेट’ हो रहे हैं. मगर तभी अचानक न जाने कहाँ से दूस्या आण्टी टपक पड़ी:  “डेनिस, मीश्का के साथ! तुम लोग यहाँ क्यों परेशान हो रहे हो? मेरे साथ आओ!” और हम उसके पीछे भागे, उसके पास सीढ़ियों के नीचे एक अलग कमरा है, वहाँ बहुत सारे ब्रश खड़े हैं और बाल्टियाँ भी हैं. दूस्या आण्टी ने हमारी चीज़ें ले लीं और कहा: ”वापस यहीं आकर अपने-अपने कोट पहन लेना, शैतानों!” मीश्का और मैं भीड़ के साथ सीढ़ियों से ऊपर धकेले गए. मगर, वहाँ वाक़ई में इतना ख़ूबसूरत था! बताना मुश्किल है! सभी छतों को रंगबिरंगे कागज़ की रिबन्स से और लैम्पों से सजाया गया था, चारों ओर शीशों के टुकड़ों से बनाए गए ख़ूबसूरत लैम्प जल रहे थे, म्यूज़िक बज रहा था, और भीड़ में सजे-धजे आर्टिस्ट्स घूम रहे थे: एक बिगुल बजा रहा था, दूसरा – ड्रम. एक आण्टी ने घोड़े जैसी ड्रेस पहनी थी, और खरगोश भी थे, और टेढ़े-मेढ़े आईने थे, और पेत्रूश्का था. 

हॉल के अंत में एक और दरवाज़ा था, और उस पर लिखा था: “मनोरंजन-कक्ष”. मैंने पूछा:

“ये क्या है?” “ये अलग-अलग तरह के मनोरंजक खेल हैं.”

और, सही में, वहाँ मनोरंजन के कई सारे खेल थे. मिसाल के तौर पर, वहाँ डोरी से बंधा हुआ एक ऍपल था, और पीठ के पीछे हाथ रखना था, और इस तरह, हाथों के बिना इस ऍपल को कुतरना था. मगर वो तो डोरी पर लगातार घूम रहा था और किसी भी तरह पकड़ में नहीं आ रहा था. ये बड़ा मुश्किल काम था, और अपमानजनक भी. मैंने दो बार इस ऍपल को हाथों से पकड़ लिया और कुतरने लगा. मगर मुझे उसे खाने नहीं दिया गया, बल्कि बस, हँसकर हाथ से छुड़ा लिया. वहाँ पर तीर-कमान भी था, और  तीर के सिरे पर नोक नहीं थी, बल्कि रबर का छोटा सा स्टिकर था, जो कस के चिपक जाता था. जिसका निशाना बोर्ड पर, केन्द्र पर, लगेगा, जहाँ एक बन्दर बना हुआ था, उसे प्राईज़ मिलने वाला था – एक सीक्रेट पटाखा.

मीश्का ने पहले निशाना लगाया, वह बड़ी देर तक निशाना साधता रहा, मगर जब उसने तीर चलाया, तो दूर के एक लैम्प को तोड़ दिया, मगर बन्दर तक नहीं पहुँचा...

मैंने कहा:  “ऐख तू, तीरंदाज़!”  “ये तो मैं अभी रेंज तक गया ही नहीं! अगर पाँच तीर दिए जाते, तो मैं बन्दर को मार देता. मगर उन्होंने एक ही दिया – निशाना कैसे लगता!” मैंने फिर से कहा:  “चल, चल, रहने दे! देख लेना, मैं अभ्भी बन्दर पर पहुँचता हूँ!” और उस अंकल ने जो ये सब इंतज़ाम कर रहा था, मुझे एक तीर दिया और कहा:  “तो, चला तीर, शार्प-शूटर!” और वह ख़ुद बन्दर को ठीक करने के लिए गया, क्योंकि वह कुछ टेढ़ा हो गया था. मैंने निशाना साध लिया था और बस, इंतज़ार कर रहा था कि वह कब बन्दर को सही करता है, मगर कमान बहुत टाईट थी, और मैं पूरे समय अपने आप से कहे जा रहा था: ‘अब मैं इस बन्दर को मार गिराऊँगा’, - और अचानक तीर छूट गया और खप्! अंकल के कंधे के नीचे जा लगा. और वहाँ, कंधे के नीचे चिपक कर फड़फड़ाने लगा. 

चारों ओर खड़े सब लोगों ने तालियाँ बजाईं और हँसने लगे, मगर अंकल ऐसे मुड़े जैसे उन्हें डंक लगा हो और चिल्लाने लगे:  “इसमें हँसने की क्या बात है? समझ में नहीं आता! भाग जा, शैतान, तुझे अब और तीर नहीं मिलेगा!” मैंने कहा:  “मैंने जानबूझ कर नहीं किया!” और वहाँ से चला गया. ताज्जुब की बात है कि हमसे कुछ भी नहीं हो पा रहा था, और मैं बहुत गुस्सा हो गया, और, बेशक, मीश्का भी. और, अचानक हम देखते हैं – तराज़ू. उसके पास छोटी सी, प्रसन्न-सी लाईन, जो बड़ी जल्दी-जल्दी आगे बढ़ रही थी, और वहाँ सब लोग मज़ाक कर रहे थे और ठहाके लगा रहे थे. तराज़ू के पास था एक जोकर.

 


मैंने पूछा:  “ये कैसी तराज़ू है?” उन्होंने मुझे बताया: 

 “खड़ा हो जा, अपना वज़न करवा. अगर तेरा वज़न पच्चीस किलो है, तो तू भाग्यशाली होगा. इनाम मिलेगा: साल भर के लिए मैगज़ीन ‘मूर्ज़िल्का’ फ्री में मिलेगी.” मैंने कहा:  “मीश्का, चल, कोशिश करेंगे?”

देखता क्या हूँ कि वहाँ मीश्का नहीं है. कहाँ चला गया, मालूम नहीं. मैंने तय कर लिया कि अकेला ही कोशिश करूँगा. हो सकता है, मेरा वज़न बिल्कुल पच्चीस किलो ही हो? तब मिलेगी सफ़लता!... लाईन आगे बढ़ती ही जा रही थी, और टोपी वाला जोकर इतनी सफ़ाई से लीवर खट्-खट् कर रहा था और मज़ाक पे मज़ाक किए जा रहा था:  “आपका वज़न सात किलो ज़्यादा है – आलू की चीज़ें कम खाईये!- खट्-खट्! – और आप, आदरणीय कॉम्रेड, अभी आपने बहुत कम पॉरिज खाया है, इसलिए मुश्किल से उन्नीस किलो तक पहुँच रहे हैं! साल भर बाद आईये. – खट्-खट्!”    और इसी तरह की बातचीत हो रही थी, और सब हँस रहे थे, और दूर हटते जा रहे थे, लाईन आगे बढ़ती जा रही थी, और किसी का वज़न एक्ज़ेक्ट पच्चीस किलो नहीं आ रहा था, और तभी मेरी बारी आ गई. मैं तराज़ू पर चढ़ा – लीवर की खट्-खट्, और जोकर ने कहा:

 “ओहो! धूप-छाँव का खेल मालूम है?” मैंने कहा:  “वो कौन नहीं जानता!”  “तेरा मामला काफ़ी गरम है. तेरा वज़न चौबीस किलो पाँच सौ ग्राम है, बस आधा किलो की कमी है. अफ़सोस. तन्दुरुस्त रहो!” ज़रा सोचो, सिर्फ आधा किलो की कमी है! मेरा मूड बहुत ख़राब हो गया. कैसा मनहूस दिन निकला है आज! और तभी मीश्का प्रकट हुआ. मैंने कहा:  “आप की सवारी कहाँ ग़ायब हो जाती है?” मीश्का ने कहा:  “सिट्रो पी रहा था.” मैंने कहा:  “बहुत अच्छे, क्या कहने! यहाँ मैं कोशिश किए जा रहा हूँ कि “मूर्ज़िल्का” जीत जाऊँ, और वो सिट्रो पी रहा है. और मैंने उसे सारी बात बताई. मीश्का ने कहा:  “ओह, ये-बात-है!” और जोकर ने लीवर से खट्-खट् किया और ठहाके लगाने लगा:  “थोड़ी सी गड़बड़ है! पच्चीस किलो पाँच सौ ग्राम. आपको थोड़ा दुबला होना पड़ेगा. आगे! मीश्का तराज़ू से उतरा और बोला:  “ऐख़! मैंने बेकार ही में सिट्रो पिया...” मैंने कहा:  “यहाँ सिट्रो क्यों आ गया?” और मीश्का बोला:  “मैंने पूरी बोतल पी ली! समझ रहा है?” मैंने कहा:  “तो फिर?” अब मीश्का ने फुसफुसाते हुए साफ़-साफ़ कहा:  “अरे आधा लिटर पानी – ये ही तो हुआ ना आधा किलो. पाँच सौ ग्राम! अगर मैं न पीता, तो मेरा वज़न एक्ज़ेक्ट पच्चीस किलो निकलता!” मैंने कहा: ”ओह, तो?” मीश्का ने कहा:  “बस, यही तो बात है!” और तभी मेरे दिमाग में बिजली कौंध गई.”  “मीश्का,” मैंने कहा, “ओ, मीश्का! “मूर्ज़िल्का” हमारी हुई!” मीश्का ने पूछा:

“कैसे?”

 “वो ऐसे. मेरा भी सिट्रो पीने सा टाईम आ गया है. मेरे बस पाँच सौ ग्राम ही तो कम हैं!” मीश्का उछल पड़ा:  “समझ गया, चल बुफे भागते हैं!” और हमने जल्दी से पानी की बोतल खरीदी, सेल्सगर्ल ने उसका कॉर्क खोला, और मीश्का ने पूछा:  “आण्टी, क्या बोतल में हमेशा एक्ज़ेक्ट आधा-लीटर रहता है, कम तो नहीं होता?”

सेल्सगर्ल लाल हो गई.  “ऐसी बेवकूफ़ी भरी बातें मुझसे कहने के लिए तू अभी छोटा है!” मैंने बोतल ली, मेज़ पर बैठ गया, और लगा पीने. मीश्का बगल में खड़ा होकर देखे जा रहा था. पानी बेहद ठण्डा था. मगर मैंने एक ही दम में पूरा गिलास पी लिया. मीश्का ने फ़ौरन दूसरा गिलास भी भर दिया, मगर उसके बाद भी बोतल में काफ़ी पानी बचा था, और मेरा दिल तो और पानी पीने को नहीं चाह रहा था. मीश्का ने कहा:  “चल, देर मत कर.” मैंने कहा:  “बहुत ही ठण्डा है. कहीं फ्लू ना हो जाए.” मीश्का ने कहा:  “तू ज़्यादा नखरे मत कर. बोल, डर गया है, हाँ?” मैंने कहा:  “तू ही डर गया होगा.” और मैं दूसरा गिलास पीने लगा. वह बड़ी मुश्किल से पिया जा रहा था. जैसे ही मैंने इस दूसरे गिलास का तीन-चौथाई भाग पिया, तो समझ गया कि मेरा पेट पूरा भर गया है. बिल्कुल ऊपर तक.” मैंने कहा:  “स्टॉप, मीश्का! अब और अन्दर नहीं जाएगा!”  “जाएगा, जाएगा. तुझे सिर्फ ऐसा लग रहा है! पी!”  “मैंने कोशिश की. नहीं जा रहा है.” मीश्का ने कहा: ”ये तू बैठा क्या है राजा की तरह! तू उठ, तब जाएगा!”

मैं उठ कर खड़ा हो गया. और सच में, आश्चर्यजनक ढंग से गिलास में बचा हुआ पानी पी गया. मगर मीश्का ने फ़ौरन बोतल में बचा हुआ पूरा पानी गिलास में डाल दिया. आधे गिलास से भी कुछ ज़्यादा ही था. मैंने कहा: ”मेरा पेट फूट जाएगा.” मीश्का ने कहा: ”तो फिर मेरा पेट कैसे नहीं फूटा? मैं भी सोच रहा था कि फूट जाएगा. चल, गटक ले.”  “मीश्का. अगर. पेट फूट गया. तू. होगा. ज़िम्मेदार.” वो बोला: “अच्छा-अच्छा. चल, पी ले.” और मैं फिर से पीने लगा. और पूरा पी गया. बड़े ताज्जुब की बात हो गई! बस, मैं बोल नहीं पा रहा था. क्योंकि पानी मेरे गले के ऊपर तक भर गया था और मुँह में डब्-डब् कर रहा था. और थोड़ा-थोड़ा नाक से भी निकल रहा था. और मैं तराज़ू की ओर भागा. जोकर ने मुझे नहीं पहचाना. उसने खट्-खट् किया और अचानक ज़ोर से चिल्लाया:  “हुर्रे! है! एक्ज़ेक्ट!!! पॉइंट-टू-पॉइंट. “मूर्ज़िल्का” की एक साल की मेम्बरशिप जीत ली गई है. वो मिलती है इस बच्चे को, जिसका वज़न एक्ज़ेक्टली पच्चीस किलोग्राम है. ये रहा फॉर्म, अभ्भी मैं उसे भरता हूँ. तालियाँ!” उसने मेरा दायाँ हाथ पकड़कर ऊपर उठाया, और सब लोग तालियाँ बजाने लगे, और जोकर विजय-गीत गाने लगा! फिर उसने बॉल-पेन लिया और कहा: “तो, तेरा नाम क्या है? नाम और सरनेम? जवाब दे!” 

मगर मैं चुप ही था. मैं पानी से लबालब भरा था और बोल नहीं पा रहा था. अब मीश्का चीख़ा:  “उसका नाम है डेनिस. सरनेम है कराब्ल्योव लिखिए, मैं उसे जानता हूँ!” जोकर ने भरा हुआ फॉर्म मेरी तरफ़ बढ़ा दिया और कहा:  “कम से कम थैन्क्स तो कहो!” मैंने सिर हिला दिया, और मीश्का फिर से चिल्लाया:  “ये वो ‘थैन्क्स’ कह रहा है. मैं उसे जानता हूँ!”

और जोकर ने कहा:  “क्या बच्चा है! ‘मूर्ज़िल्का’ जीत लिया और ख़ुद ऐसे चुप है जैसे उसके मुँह में पानी भरा हो!” और मीश्का ने कहा:  “ध्यान मत दीजिए, वो बड़ा शर्मीला है, मैं उसे जानता हूँ!” और उसने मेरा हाथ पकड़ा और खींचते हुए मुझे नीचे ले गया. बाहर आकर मैंने थोड़ी साँस ली. मैंने कहा:  “मीश्का, न जाने क्यों मुझे ये मेम्बरशिप घर ले जाना अच्छा नहीं लग रहा है, जब मेरा वज़न सिर्फ साढ़े चौबीस किलो है.” मगर मीश्का ने कहा: ”तो मुझे दे दे. मेरा तो एक्ज़ेक्ट पच्चीस किलो है ना. अगर मैं सिट्रो न पीता, तो ये फ़ौरन मुझे ही मिलता. ला, इधर दे.” “तो मैं क्या बेकार ही में तकलीफ़ सहता रहा? नहीं, चल, ये हमारी दोनों की रही – आधी-आधी!” तब मीश्का ने कहा:  “सही है!”        

                               *********
















24

हम भी!...       

 


हमें जैसे ही पता चला कि हमारे अभूतपूर्व हीरो अंतरिक्ष में एक दूसरे को सोकल और बेर्कूत (बाज़ और उकाब – हम इन्हीं नामों का इस्तेमाल करेंगे जिससे कि आपको दो रूसी शब्दों का ज्ञान हो जाए! – अनु.) के नाम से पुकारते हैं, तो हमने फ़ौरन फ़ैसला कर लिया कि अब मैं बनूँगा बेर्कूत(उकाब), और मीश्का – सोकल(बाज़). चूँकि हमें भी अंतरिक्षयात्रियों के बारे में पढ़ना ही था, और सोकल और बेर्कूत कितने प्यारे नाम हैं! और, मैंने और मीश्का ने यह भी तय कर लिया कि जब तक हमें अंतरिक्ष स्कूल में प्रवेश मिलेगा, हम दोनों धीरे धीरे अपने आप को फ़ौलाद की तरह मज़बूत बनाते रहेंगे. और जैसे ही हमने ये तय कर लिया, मैं घर चला गया और अपने आप को मज़बूत बनाने में लग गया. 

मैं शॉवर के नीचे खड़ा हो गया और पहले गुनगुने पानी का फ़व्वारा छोड़ा, और इसके बाद, इसका उलटा, यानी, ठण्डे पानी वाला फ़व्वारा चला दिया. मैं बड़े आराम से उसे बर्दाश्त करता रहा. तब मैंने सोचा कि जब ये सब इतना बढ़िया चल रहा है, तो, फिर ज़्यादा अच्छी तरह से ही मज़बूत होना चाहिए, और मैंने बर्फीले पानी का फ़व्वारा चालू कर दिया. ओहो-हो! मेरा पेट एकदम सिकुड़ गया, और पूरे बदन पे रोंगटे खड़े हो गए.  

तो, इस तरह मैं क़रीब आधे घण्टे या पाँच मिनट खड़ा रहा और अच्छे से फ़ौलाद की तरह मज़बूत हो गया! और फिर, इसके बाद, जब मैं कपड़े पहन रहा था, तो मुझे याद आ गया कि कैसे दादी ने एक लड़के के बारे में कविता पढ़ी थी, जो ठण्ड से नीला पड़ गया था और थरथर काँप रहा था.

खाने के बाद मेरी नाक बहने लगी और मैं दनादन छींकने लगा. मम्मा ने कहा: ”एस्प्रो ले लो, कल बिल्कुल ठीक हो जाओगे. सो-जाओ! अब आज के लिए बस हो गया!”.

मेरा तो एकदम मूड ख़राब हो गया. मैं बस बिसूरने ही वाला था, मगर तभी खिड़की के नीचे से चीख़ सुनाई दी:  “बे-एर्कूत!... ओ बेर्कूत!...अरे, बेर्कूत रे!...” मैं खिड़की की ओर भागा, सिर बाहर निकाल कर देखा, और वहाँ था मीश्का!” मैंने कहा:  “तुझे क्या चाहिए, सोकल?” और वह बोला:  “चल, ऑर्बिट में निकल!” इसका मतलब था: कम्पाऊण्ड में. मगर मैंने उससे कहा:  “मम्मा नहीं जाने देगी. मुझे ज़ुकाम हो गया है!”

 मम्मा ने टाँग पकड़ कर मुझे खींचा और कहा:  “इतना आगे सिर ना निकाल! गिर जाएगा! ये तू किससे बात कर रहा है?” मैंने कहा:  “मेरा दोस्त आया है. आसमानी भाई. जुड़वाँ भाई! और तुम डिस्टर्ब कर रही हो!” मगर मम्मा ने कड़ी आवाज़ में कहा:  “सिर बाहर मत निकाल!” मैंने मीश्का से कहा:  “मम्मा मुझे सिर बाहर निकालने की इजाज़त नहीं देती...”

मीश्का ने थोड़ी देर सोचा, और फिर ख़ुश होकर बोला:  “सिर बाहर निकालने की इजाज़त नहीं देती, ठीक ही तो है. ये तेरी ट्रेनिंग होगी बा-ह-र-नि-क-ल-ही-नता की!”

तब मैंने सिर थोड़ा सा बाहर निकाल ही लिया और शांति से उससे बोला:  “ऐह, मेरे अच्छे सोकल, सोकल प्यारे! शायद मुझे चौबीस घण्टे घर में ही रहना पड़े!”   

मगर मीश्का ने इस बात को भी अपने ढंग से तोड़-मरोड़ दिया: “ये तो बहुत अच्छी बात हैं! बढ़िया ट्रेनिंग! आँखें बन्द कर और ऐसे लेट जा, जैसे कि तू क्वारेंटीन में हो!”      

मैंने कहा:  “शाम को मैं तेरे साथ टेलिफोनिक कॉन्टेक्ट स्थापित करूँगा.”  “ठीक है,” मीश्का ने कहा, “तू मुझसे स्थापित कर, और मैं – तुझसे.” और वो चला गया. मैं पापा के दीवान पर लेट गया और आँखें बन्द कर लीं और चुप रहने की प्रैक्टिस करने लगा. फिर मैं उठा और एक्सरसाईज़ कर ली. फिर इल्युमिनेटर से (यहाँ खिड़की से तात्पर्य है – अनु.) अनजान दुनिया को देखता रहा, और फिर पापा आ गए, और मैंने खाने में सिर्फ प्राकृतिक पदार्थ ही लिए. मेरा मूड बहुत अच्छा था. मैंने अपनी कॉट लाकर बिछा दी. पापा ने कहा: ”इतनी जल्दी क्यों?” और मैंने अर्थपूर्ण अंदाज़ में कहा: ”आप जैसा चाहें कीजिए, मगर मैं सोऊँगा.” मम्मा ने मेरे माथे पर हाथ रखा और कहा:  “बच्चा बीमार हो गया!” मगर मैंने उससे कुछ नहीं कहा. अगर वे नहीं समझते हैं कि ये सब अंतरिक्ष-यात्री बनने की ट्रेनिंग है, तो मैं ही क्यों समझाऊँ? कोई फ़ायदा नहीं. बाद में ख़ुद ही जान जाएँगे, अख़बारों से, जब उन्हें इस बात के लिए धन्यवाद दिया जाएगा, कि उन्होंने मेरे जैसे बेटे का लालन-पालन किया!

जब तक मैं ये सब सोचता रहा, काफ़ी समय गुज़र गया, और मुझे याद आया कि मीश्का से टेलिफोन पर संपर्क स्थापित करना है. मैं कॉरीडोर में गया और उसका नम्बर घुमाया. मीश्का फ़ौरन फोन के पास आया, मगर न जाने क्यों उसकी आवाज़ बेहद मोटी आ रही थी:  “हुँ-हुँ! बोलिए!” मैंने कहा:  “सोकल, क्या ये तुम हो?”

और वह बोला:  “क्या-क्या?”  मैंने फिर से कहा:  “सोकल ये तू ही है या नहीं है? ये बेर्कूत बोल रहा है! क्या हाल है?” वह हँसने लगा, नकियाया और बोला:  “वेरी इंटेलिजेन्ट! तो, बहुत हो गया मज़ाक. सोनेच्का, ये तुम हो ना?” मैंने कहा: ”ये सोनेच्का कहाँ से आ गई, मैं बेर्कूत हूँ! तू क्या, पगला गया है?” मगर उसने कहा:  “ये कौन है? ये कैसी बातें कर रहा है? गुण्डागर्दी! कौन बोल रहा है?” मैंने कहा:  “ये कोई नहीं बोल रहा है.” मैंने रिसीवर लटका दिया. शायद मैंने गलत नम्बर डायल कर दिया था. इतने में पापा ने मुझे बुलाया, और मैं कमरे में वापस आ गया, कपड़े उतार दिए और लेट गया. मैं बस ऊँघने ही लगा था कि अचानक: ”ज़् ज़् ज़् ज़् ज़् ! फोन! पापा उछले और कॉरीडोर में भागे, और, जब तक मैं पैरों से अपने स्लीपर्स ढूँढ रहा था, मैंने उनकी गंभीर आवाज़ सुनी:  “बेर्कूत को? कौन से बेर्कूत को? यहाँ ऐसा कोई नहीं है! ध्यान से नम्बर घुमाईये!” मैं फ़ौरन समझ गया, कि ये मीश्का है! ये है टेलिफोनिक-कनेक्शन! मैं वैसे ही, सिर्फ कच्छे में, कॉरीडोर की ओर भागा.  “ये मेरे लिए है! मैं हूँ बेर्कूत!” पापा ने फ़ौरन रिसीवर मुझे दे दिया, और मैं चिल्लाया:  “ये सोकल है? मैं बेर्कूत! सुन रहा हूँ!” और मीश्का बोला: “रिपोर्ट दो, कि क्या कर रहे हो!”

मैंने कहा:  “मैं सो रहा हूँ!” और मीश्का:  “मैं भी! मैं तो बिल्कुल सो ही गया था, मगर एक महत्वपूर्ण बात याद आ गई! बेर्कूत, सुनो! सोने से पहले गाना चाहिए! दोनों को मिलकर! युगल गीत! जिससे कि हमारा अंतरिक्ष-गीत बन जाए!” मैं सीधे उछल पड़ा:  “शाबाश! सोकल! चल, अपना पसन्दीदा अंतरिक्ष-गीत गाएँ! मेरे साथ-साथ गा!” और मैं पूरी ताक़त से गाने लगा. मैं अच्छा गाता हूँ, ख़ूब ज़ोर से! मुझसे ज़्यादा ज़ोर से कोई और नहीं गा सकता. ज़ोर से गाने में मैं हमारे कोरस-ग्रुप  में अव्वल हूँ. मगर जैसे ही मैंने गाना शुरू किया, फ़ौरन  सारे पड़ोसी अपने-अपने दरवाज़ों से बाहर निकलने लगे, वो चिल्ला रहे थे: “ये क्या बेहूदगी है...क्या हो गया...इतनी देर हो गई है...पगला गए हैं...ये कम्युनिटी फ्लैट है...मैंने सोचा कि सुअर को काट रहे हैं...”, मगर पापा ने उनसे कहा:  “ये अंतरिक्षी-जुडवाँ भाई हैं, सोकल और बेर्कूत, सोने से पहले गा रहे हैं!” तब सब लोग चुप हो गए.

और मैंने और मीश्का ने आख़िर तक गाया: 

...दूर के ग्रहों की धूल-भरी पगडंडियों पर रह जाएँगे पैरों के हमारे निशान!


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25

प्रमुख नदियाँ 


हालाँकि ये मेरा नौवाँ साल चल रहा है, मगर मुझे सिर्फ कल ही इस बात का एहसास हुआ कि होम-वर्क करना ज़रूरी है. चाहे तुम्हें पसन्द हो या ना हो, तुम्हारा मन हो या ना हो, चाहे आलस आ रहा हो या ना आ रहा हो, मगर होम-वर्क तो करना ही पड़ेगा. ये नियम है. वर्ना तो तुम्हारा वो हाल होगा कि अपनों को भी न पहचान पाओगे. मैं, मिसाल के तौर पर, कल होम-वर्क नहीं कर पाया. हमें निक्रासव की कविता का एक पद मुँह-ज़ुबानी याद करना था और अमेरिका की प्रमुख नदियों के बारे में याद करना था. मगर मैं, पढ़ाई करने के बदले, कम्पाऊण्ड से पतंग को अंतरिक्ष में भेजने लगा. ख़ैर, वो तो अंतरिक्ष पहुँची ही नहीं, क्योंकि उसकी पूँछ बेहद हल्की थी, और इसकी वजह से वह गोता खा रही थी, भौंरे की तरह. ये हुई पहली बात. और दूसरी बात ये, कि मेरे पास बहुत कम माँजा था, मैंने पूरा घर छान मारा और जितने भी मिले उतने सारे डोरे इकट्ठे कर लिए; मम्मा की सिलाई मशीन तक से निकाल लिया, मगर वो भी कम ही पड़ा. पतंग स्टोर-रूम की छत तक गई और वहीं अटक गई, अंतरिक्ष तो अभी काफ़ी दूर था. 

 


और, मैं इस पतंग और अंतरिक्ष में इतना खो गया कि दुनिया की हर चीज़ के बारे में बिल्कुल भूल गया. मुझे खेलने में इतना मज़ा आ रहा था कि मैंने होम-वर्क के बारे में सोचना भी बन्द कर दिया. दिमाग़ से बिल्कुल उतर गया. मगर ऐसा लगा कि अपने काम के बारे में भूलना नहीं चाहिए था, क्योंकि मुझे बड़ी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी. सुबह मैं देर से उठा, और, जब मैं उछल कर बिस्तर से बाहर आया, तो समय बहुत कम बचा था... मगर मैंने पढ़ रखा था कि आग बुझाने वाले लोग कितने फटा-फट् कपड़े पहनते हैं – एक भी बेकार की हरकत वे नहीं करते, और ये मुझे इतना अच्छा लगा कि आधी-गर्मियाँ मैं फटा-फट् कपड़े पहनने की प्रैक्टिस करता रहा. और आज, जैसे ही मैं उछलकर उठा और घड़ी पर नज़र डाली, तो फ़ौरन समझ गया कि आग बुझाने वालों की तरह फटा-फट् तैयार होना है. और मैं एक मिनट अडतालीस सेकण्ड में पूरी तरह तैयार हो गया, बस जूतों की लेस दो-दो छेदों के बाद डाल दी. मतलब, स्कूल में मैं बिल्कुल समय पर पहुँच गया और अपनी क्लास में भी रईसा इवानव्ना  से एक सेकण्ड पहले पहुँच गया. मतलब, वो आराम से कॉरीडोर में चलती हुई जा रही थीं, और मैं क्लोक-रूम से भागा (लड़के वहाँ थे ही नहीं). जब मैंने दूर से रईसा इवानव्ना  को देखा, तो मैं पूरी रफ़्तार से दौड़ पड़ा, और क्लास से पाँच कदम की दूरी पर मैंने रईसा इवानव्ना को पीछे छोड़ दिया और कूद कर क्लास में घुस गया. मतलब, मैंने उन्हें क़रीब डेढ़ सेकण्ड से हरा दिया, और, जब वो अन्दर आईं, मेरी किताबें डेस्क पर थीं, और मैं मीश्का के साथ ऐसे बैठा था जैसे कुछ हुआ ही ना हो. रईसा इवानव्ना  अन्दर आईं, हम खड़े हो गए और उन्हें ‘नमस्ते’ कहा, और सबसे ज़्यादा ज़ोर से मैंने ‘नमस्ते’ किया, जिससे कि वो देख लें कि मैं कितना शरीफ़ हूँ. मगर उन्होंने इस बात पर कोई ध्यान नहीं दिया और फ़ौरन कहा:  “कराब्ल्यो, ब्लैक-बोर्ड पे आओ!” मेरा तो मूड ही ख़राब हो गया, क्योंकि मुझे याद आ गया कि मैं होम-वर्क करना भूल गया था. मेरा अपने प्यारे डेस्क से बाहर निकलने का ज़रा भी मन नहीं था. जैसे मैं उससे चिपक गया था. मगर रईसा इवानव्ना जल्दी मचाने लगीं:  “कराब्ल्योव ! क्या कर रहा है? सुना नहीं, मैं तुझे बुला रही हूँ?” और मैं ब्लैक-बोर्ड के पास पहुँचा. रईसा इवानव्ना  ने कहा:  “कविता!” मतलब, मैं वो कविता सुनाऊँ, जो होम-वर्क में मिली थी. मगर मुझे तो वो आती ही नहीं थी. मुझे ये भी अच्छी तरह से मालूम नहीं था कि कौन सी कविता याद करने के लिए दी गई थी.  इसलिए, एक पल को मैंने सोचा कि हो सकता है, रईसा इवानव्ना भी भूल गई हों, कि होम-वर्क में क्या दिया था, और इस बात पर ध्यान नहीं देंगी कि मैं क्या पढ़ रहा हूँ. और मैंने बड़ी हिम्मत से शुरू कर दिया: 

सर्दियाँ!...ख़ुशी-ख़ुशी जाता किसान,  गाड़ी में बनाता नई राह:

बर्फ सूँघते, घोड़ा उसका, 

चले मगर अलसाई चाल...

 “ये पूश्किन है,” रईसा इवानव्ना  ने कहा.  “हाँ,” मैंने कहा,” ये पूश्किन है. अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच.”  “और मैंने क्या दिया था?” उन्होंने कहा.  “हाँ!” मैंने कहा.  “क्या ‘हाँ’? मैंने क्या दिया था, मैं तुझसे पूछ रही हूँ? कराब्ल्योव !”  “क्या?” मैंने कहा.  “क्या ‘क्या’? मैं तुझसे पूछ रही हूँ : मैंने क्या दिया था?” अब मीश्का ने मासूम चेहरा बनाते हुए कहा: ”वो क्या, नहीं जानता क्या, कि आपने निक्रासव दिया था? ये तो वो आपका सवाल नहीं समझ पाया, रईसा इवानव्ना .” ये होता है सच्चा दोस्त. मीश्का ने चालाकी से प्रॉम्प्ट करके मुझे बता दिया कि होम-वर्क में क्या मिला था. मगर अब रईसा इवानव्ना को गुस्सा आ गया था:  “स्लनोव! प्रॉम्प्ट करने की हिम्मत न करना!”  “हाँ!” मैंने कहा. “तू, मीश्का, बीच में क्यों नाक घुसेड़ता है? क्या तेरे बिना मैं नहीं जानता कि रईसा इवानव्ना ने निक्रासव  दिया था! वो तो मैं कुछ और सोचने लगा था, और तू है कि घुसे चला आता है, कन्फ्यूज़ कर देता है.” मीश्का लाल हो गया और उसने मुँह फेर लिया. मैं फिर से अकेला रह गया रईसा इवानव्ना का सामना करने के लिए.  “तो?” उन्होंने कहा.  “क्या?” मैंने कहा.  “ये हर घड़ी ‘क्या-क्या’ करना बन्द कर!” मैंने देखा कि अब उन्हें वाक़ई में गुस्सा आ गया था.

 “सुना. मुँह ज़ुबानी!”  “क्या?”  “बेशक, कविता!” उन्होंने कहा.  “आहा, समझ गया. कविता, मतलब, सुनानी है?” मैंने कहा. “अभी सुनाता हूँ.” और मैंने ज़ोर से शुरूआत की: “ निक्रासव  की कविता. कवि की. महान कवि की.”  “आगे!” रईसा इवानव्ना ने कहा.  “क्या?” मैंने कहा.  “सुना, फ़ौरन!” रईसा इवानव्ना चिल्ला पड़ी. “फ़ौरन सुना, तुझसे ही कह रही हूँ! शीर्षक!” जब तक वो चिल्ला रही थीं, मीश्का ने प्रॉम्प्ट करके मुझे पहला शब्द बता दिया. वह फुसफुसाया, बिना मुँह खोले. मगर मैं उसे अच्छी तरह समझ गया. इसलिए मैंने बहादुरी से एक पैर आगे किया और ऐलान कर दिया:  “छोटा-सा किसान!”

सब ख़ामोश हो गए, और रईसा इवानव्ना भी. उन्होंने ग़ौर से मेरी ओर देखा, मगर मैं इससे भी ज़्यादा ग़ौर से मीश्का की ओर देख रहा था. मीश्का ने अपने अँगूठे की ओर इशारा किया और न जाने क्यों उसके नाखून पर टक्-टक् करने लगा. 

मुझे फ़ौरन शीर्षक याद आ गया और मैंने कहा:  “नाखून वाला!” और मैंने पूरा शीर्षक फिर से दुहरा दिया:  “छोटा-सा किसान नाखून वाला!” (असल में कविता का शीर्षक है – नाखून जितना किसान –अनु.)

सब हँसने लगे. रईसा इवानव्ना ने कहा:  “बस हो गया, कराब्ल्योव !...कोशिश मत कर, तुझसे नहीं होगा. अगर जानता नहीं है, तो शर्मिन्दगी तो ना उठा.” फिर उन्होंने कहा: “और जनरल नॉलेज का क्या हाल है? याद है, कल हमारी क्लास ने ये तय किया था कि कोर्स के अलावा हम दूसरी दिलचस्प किताबें भी पढ़ेंगे? कल हमने तय किया था कि अमेरिका की सभी नदियों के नाम याद करेंगे. तूने याद किए?” बेशक, मैंने याद नहीं किए थे. ये पतंग, इसने गड़बड़ कर दी, मेरी पूरी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी. मैंने सोचा कि रईसा इवानव्ना के सामने सब कुछ स्वीकार कर लूँगा, मगर इसके बदले अचानक मेरे मुँह से निकला:  “बिल्कुल, याद किए हैं. कैसे नहीं करता?”

“ठीक है, निक्रासव की कविता सुनाकर तूने जैसा डरावना प्रभाव डाला था, उसे अब दूर कर दे. अमेरिका की सबसे बड़ी नदी का नाम बता दे, और मैं तुझे छोड़ दूँगी. अब तो मेरी हालत ख़राब हो गई. मेरा पेट भी दुखने लगा, क़सम से. क्लास में ग़ज़ब की ख़ामोशी थी. और मैं छत की ओर देखने लगा. और मैं सोच रहा था कि अब, शायद, मैं मर जाऊँगा. अलबिदा, सबको! और तभी मैंने देखा कि बाईं ओर की आख़िरी लाईन में पेत्का गोर्बूश्किन मुझे अख़बार की लम्बी रिबन दिखा रहा है, और उस पर स्याही से कुछ लिखा है, शायद, उसने ऊँगली से लिखा था. मैं इन अक्षरों को देखने लगा और आख़िरकार मैंने पहला अक्षर पढ़ ही लिया. रईसा इवानव्ना ने फिर से कहा:  “तो, कराब्ल्योव ? अमेरिका की प्रमुख नदी कौन सी है?” मेरा आत्मविश्वास फ़ौरन जाग उठा, और मैंने कहा:  “मिसी-पिसी.” आगे मैं नहीं बताऊँगा. बस हो गया. और हालाँकि रईसा इवानव्ना की आँखों में हँसते-हँसते आँसू आ गए, मगर उन्होंने ‘दो’ नम्बर दे ही दिए. 

अब मैंने क़सम खा ली है, कि हमेशा होम-वर्क पूरा करूँगा. बुढ़ापे तक.


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26


जासूस गद्यूकिन की मौत

  


ऐसा लगता है कि जब तक मैं बीमार रहा, बाहर मौसम काफ़ी गरम हो गया और हमारी बसंत की छुट्टियों में बस दो-तीन दिन ही बचे थे. जब मैं स्कूल आया, तो सब लोग चिल्ला उठे:  “डेनिस्का आ गया, हुर्रे!” मैं भी बहुत ख़ुश था कि वापस आ गया हूँ, और सारे लड़के अपनी अपनी जगह पे बैठे हैं – कात्या तचीलिना, और मीश्का, और वालेर्का, - फ्लॉवरपॉट्स में फूल हैं, और ब्लैक-बोर्ड भी वैसा ही चमचमाता हुआ है, और रईसा इवानव्ना वैसी ही हँसमुख है, और हर चीज़, हर चीज़ वैसी ही है जैसी हमेशा होती है. इन्टरवल में मैं लड़कों के साथ घूमता रहा, हँसता रहा, मगर फिर मीश्का ने बड़ी अकड़ दिखाते हुए कहा:  “अपनी बसंत की कॉन्सर्ट होने वाली है!”

मैंने कहा:  “अच्छा?” मीश्का ने कहा:  “सही में! हम स्टेज पर प्रोग्राम पेश करेंगे. और चौथी क्लास के लड़के हमें अपना ’शो’ दिखाएँगे. उन्होंने ख़ुद ही लिखा है. बड़ा मज़ेदार है!...” मैंने कहा:  “मीश्का, क्या तू कुछ कर रहा है?”  “थोड़ा बड़ा हो जा – सब पता चल जाएगा.” मैं बड़ी बेसब्री से कॉन्सर्ट का इंतज़ार करने लगा. घर पे मैंने मम्मा को ये सब बताया, और फिर कहा:  “मैं भी कुछ करना चाहता हूँ...” मम्मा मुस्कुराई और बोली:  “तू क्या कर सकता है?” मैंने कहा: “क्या, मम्मा! क्या तुम्हें मालूम नहीं है? मैं ज़ोर से गा सकता हूँ, मैं गाता तो अच्छा ही हूँ ना? तुम ये मत देखो कि मुझे म्यूज़िक में ‘तीन’ नम्बर मिले हैं. मगर, फिर भी, मैं अच्छा ही गाता हूँ.” मम्मा ने अलमारी खोली और वहाँ से, कहीं ‘ड्रेसों’ के पीछे से कहा:  “तू अगली बार गा लेना. अभी तो बीमारी से उठा है ना...इस बार तू सिर्फ दर्शक बनना.” वो अलमारी के पीछे से बाहर आई, “कितना अच्छा लगता है – दर्शक बनना. बैठे हो, देख रहे हो कि आर्टिस्ट कैसे अपना-अपना ‘रोल’ करते हैं...बहुत अच्छा होता है! और अगली बार तू ‘आर्टिस्ट’ बनना, और वो जो पहले ही कार्यक्रम पेश कर चुके हैं, वो बनेंगे दर्शक. ठीक है?”

मैंने कहा:  “ठीक है. तो मैं दर्शक बनूँगा.” और दूसरे दिन मैं कॉन्सर्ट देखने गया. मम्मा मेरे साथ नहीं आ सकी क्योंकि उसकी इन्स्टीट्यूट में ड्यूटी लगी थी, - पापा युराल की किसी फैक्टरी में गए हुए थे, और मैं अकेला ही कॉन्सर्ट देखने गया.

 


हमारे बड़े हॉल में खूब सारी कुर्सियाँ लगी हुई थीं और एक स्टेज भी बनाया गया था, और उस पर परदा लटक रहा था. और नीचे पियानो के पीछे बैठे थे बरीस सिर्गेयेविच. हम सब बैठ गए और बगल वाली साईड पर हमारी क्लास की दादियाँ-नानियाँ खड़ी हो गईं. इस बीच मैं ऍपल खाता रहा. अचानक परदा खुला और हमारी लीडर ल्यूस्या प्रकट हुई. उसने ऊँची आवाज़ में कहा, मानो रेडियो पर कह रही हो:  “तो, हमारी बसंत-कॉन्सर्ट की शुरूआत करते हैं! अब आपके सामने पहली क्लास के ‘सी’ सेक्शन का विद्यार्थी मीशा स्लनोव  अपनी ख़ुद की कविता पेश करेगा! बुलाते हैं मीशा स्लनोव  को!” अब सब लोग तालियाँ बजाने लगे और मीश्का स्टेज पर आया. वो बड़ी बहादुरी से निकला, स्टेज के बीचोंबीच आया और रुक गया. वहाँ वो कुछ देर खड़ा रहा और अपने हाथ पीठ के पीछे कर लिए. फिर कुछ देर खड़ा रहा. फिर उसने बायाँ पैर आगे किया. सारे लड़के ख़ामोश बैठे थे और मीश्का को देख रहे थे. मगर, अब उसने बायाँ पैर हटा लिया और दायाँ पैर आगे कर दिया. फिर वह अचानक कुछ खाँसने लगा:  “अखँ! अखँ! ... ख्म...!!”

मैंने कहा:  “ये क्या, मीश्का, क्या गले में कुछ अटक गया क्या?” उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे अजनबी की ओर देख रहा हो. फिर उसने छत की ओर आँखें उठाईं और कहा:  “कविता.   

गुज़र जाएँगे साल, आ जाएगा बुढ़ापा!  छा जाएँगी चेहरे पर झुर्रियाँ! देता हूँ शुभ कामनाएँ! कि आगे भी करें सब खूब तरक्कियाँ!”

...बस!” और मीश्का ने झुक कर अभिवादन किया और स्टेज से उतर गया. सबने उसके लिए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं, क्योंकि, पहली बात तो ये थी कि कविता बहुत अच्छी थी, और दूसरी बात ये कि, ज़रा सोचिए: मीश्का ने ख़ुद लिखी थी! शाबाश!

अब फिर से ल्यूस्या बाहर आई और बोली:  “अब आपके सामने आते हैं पहली ‘सी’ के विद्यार्थी वालेरी तगीलव!”  सबने और ज़्यादा ज़ोर से तालियाँ बजाईं, और ल्यूस्या ने बिल्कुल बीचोंबीच में एक कुर्सी रख दी. अब बाहर निकला हमारा वालेर्का अपने छोटे से एकॉर्डियन के साथ और कुर्सी पर बैठ गया, और ऍकॉर्डियन का खोल अपने पैरों के नीचे रख लिया जिससे कि वे हवा में न लटकते रहें. वो बैठ गया और वाल्ट्ज़ - ‘अमूर की लहरें’ बजाने लगा. सब सुन रहे थे, मैं भी सुन रहा था और पूरे समय सोच रहा था: ‘ये वालेर्का इतनी तेज़ी से ऊँगलियाँ कैसे चला रहा है?’ मैं भी हवा में उतनी ही तेज़ी से अपनी ऊँगलियाँ चलाने लगा, मगर वालेर्का के साथ-साथ नहीं चला पा रहा था. और बगल में, किनारे वाली दीवार के पास वालेर्का की दादी खड़ी थी, और जब वालेर्का बजा रहा था तो वो थोड़ा-थोड़ा डाइरेक्शन करती जा रही थी. वो बहुत अच्छा बजा रहा था, ज़ोर से, मुझे बहुत अच्छा लगा. मगर अचानक एक जगह पे वो चूक गया. उसकी ऊँगलियाँ ठहर गईं. वालेर्का थोड़ा-सा लाल हो गया, मगर उसने फिर से ऊँगलियाँ हिलाईं, जैसे कि उन्हें भागने दे रहा हो, मगर ऊँगलियाँ किसी एक जगह पर आकर फिर से ठहर गईं, जैसे लड़खड़ा गईं हों. वालेर्का पूरा लाल हो गया और फिर से ऊँगलियाँ चलाने लगा, मगर अब ऊँगलियाँ डर-डर के चल रही थीं, जैसे उन्हें मालूम था कि वे फिर से लड़खड़ा जाएँगी, और मैं दुष्टता के मारे ठहाका लगाने ही वाला था, मगर तभी, उसी जगह पे, जहाँ वालेर्का दो बार लड़खड़ाया था, उसकी दादी ने अचानक गर्दन बाहर निकाली, पूरी आगे को झुकी और गाने लगी: 

...चमचमाती हैं लहरें, चमचमाती हैं लहरें... 

और वालेर्का ने एकदम पकड़ ले ली, और उसकी ऊँगलियाँ मानो किसी बुरी सीढ़ी से कूद कर आगे की ओर भागने लगीं, आगे, आगे, तेज़ी से, सफ़ाई से, बिल्कुल अंत तक. उसके लिए तालियाँ बजती रहीं, बजती रहीं! इसके बाद स्टेज पर उछलते हुए आए पहली “ए” की छह लड़कियाँ और पहली “बी” के छह लड़के. लड़कियों के बालों में थे रंगबिरंगे फीते, लड़कों के बालों में कुछ भी नहीं था. वे युक्रेन का डान्स करने लगे. फिर बरीस सिर्गेयेविच  ने ज़ोर से पियानो की पट्टियों पर मारा और बजाना ख़त्म किया. 

मगर लड़के और लड़कियाँ अपने आप स्टेज पर पैर पटकते रहे, बिना म्यूज़िक के, जो जैसे चाहे वैसे, और यह बहुत अच्छा लग रहा था, मैं तो बस स्टेज पर कूद कर उनके पास जाने को तैयार था, मगर वे अचानक भाग गए. ल्यूस्या बाहर निकली और बोली:  “अब पन्द्रह मिनट का इन्टरवल है. इन्टरवल के बाद चौथी क्लास के विद्यार्थी एक नाटक पेश करेंगे, जिसे उनकी क्लास ने ख़ुद लिखा है, नाटक का शीर्षक है -‘ ‘कुत्ते को – कुत्ते की मौत’ ”.    

सब लोग कुर्सियाँ खिसका-खिसकाकर कहीं-कहीं चले गए, और मैंने जेब से अपना ऍपल निकाला और उसे खाने लगा. हमारी ऑक्टोबर-ग्रुप की लीडर ल्यूस्या वहीं, पास ही में खड़ी थी. 

अचानक उसके पास एक काफ़ी ऊँची, लाल बालों वाली लड़की भागते हुए आई और बोली:  “ल्यूस्या, क्या तुम यक़ीन कर सकती हो - ईगरव नहीं आया!”

ल्यूस्या हाथ नचाते हुए बोली:  “ये नहीं हो सकता! अब क्या करेंगे? अब कौन घण्टी बजाएगा और फ़ायर करेगा?” लड़की ने कहा: ”फ़ौरन किसी होशियार लड़के को ढूँढ़ना पड़ेगा, हम उसे सिखा देंगे, और क्या कर सकते हैं.” तब ल्यूस्या इधर-उधर देखने लगी और उसने मुझे ऍपल खाते हुए देख लिया. वो एकदम ख़ुश हो गई.  “लो,” उसने कहा. “डेनिस्का! इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है! वो हमारी मदद करेगा! डेनिस्का, यहाँ आ!” मैं उनके पास गया. लाल बालों वाली लड़की ने मेरी ओर देखा और कहा:  “क्या ये वाक़ई में होशियार है?” ल्यूस्या ने कहा:  “मेरे ख़याल से तो - है!”

मगर लाल बालों वाली लड़की बोली:  “वैसे, पहली नज़र में, कह नहीं सकते.” मैंने कहा:  “तुम इत्मीनान रखो! मैं होशियार हूँ.” अब वो और ल्यूस्या हँसने लगीं, और लाल बालों लड़की मुझे खींचकर स्टेज के पीछे ले गई. वहाँ चौथी क्लास का एक लड़का खड़ा था. उसने काला सूट पहना था, उसके बालों पर चॉक बिखरा था, जैसे उसके बाल सफ़ेद हों; उसके हाथों में पिस्तौल थी, और पास ही में दूसरा लड़का खड़ा था, वो भी चौथी क्लास का ही था. 

इस लड़के को दाढ़ी चिपकाई गई थी, उसकी नाक पर नीला-नीला चश्मा था, और वह रबड़ के रेनकोट में था जिसकी कॉलर ऊपर उठी हुई थी.

वहीं पर कुछ और लड़के और लड़कियाँ भी थे, किसी के हाथों में बैग थी, किसी के हाथों में कुछ और, और एक लड़की सिर पर रूमाल बांधे थी, उसने गाऊन पहना था और हाथ में झाडू पकड़ा था.

जैसे ही मैंने काले सूट वाले लड़के के हाथों में पिस्तौल देखा, फ़ौरन उससे पूछ लिया:  “क्या ये सचमुच का है?”  मगर लाल बालों वाली लड़की मेरी बात काट दी.  “सुन, डेनिस्का!” उसने कहा, “तू हमारी मदद करेगा. वहाँ कॉर्नर में खड़ा हो जा और स्टेज पर देखता रह. जब ये लड़का बोलेगा: ‘ये आप मुझसे ना पा सकेंगे, नागरिक गद्यूकिन!’ तू फ़ौरन ये घण्टी बजा देना. समझ गया? और उसने मेरी ओर साइकिल की घण्टी बढ़ा दी. मैंने उसे ले लिया. लड़की ने कहा:  “तू घण्टी बजाएगा, मानो वो टेलिफ़ोन हो, और ये लड़का रिसीवर उठाएगा, टेलिफ़ोन पर बात करेगा और स्टेज से चला जाएगा. मगर तू खड़ा रहेगा और ख़ामोश रहेगा. समझ गया? मैंने कहा:  “समझ गया, समझ गया....इसमें समझ में ना आने वाली कौन सी बात है? मगर क्या उसकी पिस्तौल सचमुच की है? क्या ऑटोमैटिक है?”  “तू अपने पिस्तौल के बारे में ज़रा इंतज़ार कर ले...वो सचमुच की नहीं है! सुन: फ़ायर तू यहाँ करेगा, स्टेज के पीछे. जब ये, दाढ़ी वाला, अकेला रह जाएगा, वो मेज़ से फ़ाईल उठा लेगा और खिड़की की ओर लपकेगा, मगर ये लड़का, काले सूट वाला, उस पर निशाना लगाएगा, तब तू ये बोर्ड लेना और पूरी ताक़त से कुर्सी पर मार देना. बस इतना ही, मगर ख़ूब ताक़त से मारना!” और लाल बालों वाली लड़की ने कुर्सी पर बोर्ड दे मारा. बहुत बढ़िया आवाज़ आई, जैसे सचमुच की गोली चली हो. मुझे अच्छा लगा.  “बढ़िया!” मैंने कहा. “और फिर?”  “बस, इतना ही,” लड़की ने कहा. “अगर समझ गया है, तो ज़रा दुहरा दे!” मैंने सब कुछ दुहरा दिया. एक-एक शब्द. उसने कहा:  “देख, शर्मिन्दा ना करना!”  “इत्मीनान रखो. शर्मिन्दा नहीं करूँगा.” तभी हमारी स्कूल वाली घण्टी बजी, जैसे कि ‘क्लास’ के वक़्त बजती है. मैंने साइकिल की घण्टी ‘हीटिंग पाईप्स’ पर रख दी, बोर्ड को कुर्सी से टिकाकर रख दिया, और ख़ुद परदे की झिरी से देखने लगा. मैंने देखा कि कैसे रईसा इवानव्ना  और ल्यूस्या आईं, लड़के कैसे बैठ गए, और कैसे दादियाँ और नानियाँ फिर से छोटी वाली दीवारों के पास खड़ी हो गईं, और पीछे से न जाने किसके पापा स्टूल पर चढ़ गए और स्टेज पर कैमेरा लगाने लगे. यहाँ से वहाँ देखना ज़्यादा दिलचस्प लग रहा था, बजाय वहाँ से यहाँ देखने के. धीरे-धीरे सब शांत हो गए, और वो लड़की जो मुझे यहाँ लाई थी, स्टेज के दूसरी ओर भागी और रस्सी खींचने लगी. और परदा खुल गया, और ये लड़की हॉल में कूद गई. स्टेज पर रखी थी एक मेज़, और उसके पीछे बैठा था काले सूट वाला लड़का, और मैं जानता था कि उसकी जेब में पिस्तौल है. इस लड़के के सामने टहल रहा था दाढ़ी वाला लड़का. पहले उसने बताया कि वो काफ़ी समय तक विदेश में रह चुका है, और अब वापस आ गया है, और फिर बड़ी ‘बोरिंग’ आवाज़ में काले सूट वाले लड़के से ज़िद करने लगा कि वो उसे हवाई अड्डे का प्लान दिखाए. मगर उसने कहा:  “ये आप मुझसे हासिल नहीं कर पाएँगे, नागरिक गद्यूकिन!” यहाँ मुझे अचानक घण्टी की याद आई और मैंने अपना हाथ बढ़ाया. मगर घण्टी वहाँ नहीं थी. मैंने सोचा कि वो फर्श पर गिर गई है, और मैं झुक कर देखने लगा. मगर वो तो फर्श पर भी नहीं थी. मैं तो पूरी तरह सुन्न हो गया. फिर मैंने स्टेज पर नज़र दौड़ाई. वहाँ ख़ामोशी थी. मगर, फिर काले सूट वाले लड़के ने कुछ देर सोचा और कहा: “ये आप मुझसे हासिल नहीं कर पाएँगे, नागरिक गद्यूकिन!” 

मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि करूँ तो क्या करूँ. घण्टी आख़िर है कहाँ? अभी तो यहीं थी! अपने आप तो वह मेंढक की तरह उछल कर भाग नहीं सकती थी! हो सकता है, वो लुढ़ककर बैटरी के पीछे चली गई हो. घण्टी वहाँ भी नहीं थी! नहीं!...भले आदमियों, अब मैं क्या करूँ?!”

और स्टेज पर दाढ़ी वाला लड़का अपनी ऊँगलियाँ चटख़ाने लगा और चिल्लाने लगा:  “मैं पाँचवी बार आपसे प्रार्थना कर रहा हूँ! मुझे हवाई अड्डे का प्लान दिखाईये!” और काले सूट वाला लड़का मेरी ओर मुँह फेर कर भयानक आवाज़ में चीखा: “ये आप मुझसे हासिल नहीं कर पाएँगे, नागरिक गद्यूकिन!”

और वो मुक्का दिखाकर मुझे धमकाने लगा. और दाढ़ीवाला भी मुझे मुक्का दिखाकर धमकाने लगा. वे दोनों मुझे धमका रहे थे! मैंने सोचा कि वो मुझे मार ही डालेंगे. मगर मैं क्या करता, घण्टी जो नहीं थी! घण्टी ही नहीं थी! वो तो खो गई थी!

तब काले सूट वाले लड़के ने अपने बाल खींचना शुरू कर दिया और चेहरे पर विनती के भाव लाकर मेरी तरफ़ देखते हुए कहा:  ”अब, शायद, टेलिफोन बजेगा! आप देखना, अब टेलिफोन बजेगा! अभ्भी बजेगा!” मेरे दिमाग का बल्ब एकदम जल गया. मैंने अपना मुँह स्टेज पर निकाला और फ़ौरन कहा: ”ट्रिंग-ट्रिंग-ट्रिंग!” हॉल में सब लोग बेतहाशा ठहाके लगाने लगे. मगर काले सूट वाला लड़का बहुत ख़ुश हो गया और उसने फ़ौरन रिसीवर पकड़ लिया. वह ख़ुशी—ख़ुशी बोला:  “सुन रहा हूँ!” और उसने माथे से पसीना पोंछा. आगे सब कुछ अपने आप हो गया. काले सूट वाले लड़के ने दाढ़ी वाले से कहा:  “मुझे बुला रहे हैं. मैं, बस, थोड़ी देर में आता हूँ.” और वो स्टेज से चला गया. और दूसरे कोने में खड़ा हो गया. अब दाढ़ी वाला लड़का पंजों के बल चलते हुए उसकी मेज़ तक पहुँचा और वहाँ कुछ ढूँढ़ने लगा. वह बार-बार कनखियों से इधर-उधर देख रहा था. फिर वह दुष्टतापूर्वक हँसा, उसने कोई फ़ाईल ले ली और पीछे की दीवार की ओर भागा, जिस पर गत्ते की खिड़की चिपकाई गई थी. इसी समय दूसरा लड़का भागते हुए बाहर आया और उस पर पिस्तौल से निशाना साधने लगा. मैंने फ़ौरन बोर्ड उठा लिया और पूरी ताक़त से कुर्सी पर दे मारा. मगर कुर्सी पर कोई अनजान बिल्ली बैठी थी. वह वहशियत से चीख़ी, क्योंकि मैंने उसकी पूँछ पर दे मारा था. गोली छूटने की आवाज़ तो आई नहीं, मगर बिल्ली उछल कर स्टेज पर आ गई. काले सूट वाला दाढ़ी वाले पर लपका और उसका गला दबाने लगा. बिल्ली उनके बीच में दौड़ती रही. जब लड़के लड़ रहे थे तो दाढ़ी वाले की दाढ़ी नीचे गिर गई. बिल्ली ने सोचा कि ये चूहा है, उसने दाढ़ी को मुँह में दबा लिया और भाग गई. जैसे ही उस लड़के ने देखा कि वह बिना दाढ़ी के रह गया है, तो वो फ़ौरन फ़र्श पर लेट गया – जैसे मर गया हो. अब स्टेज पर चौथी क्लास के बाकी के बच्चे भागते हुए आए, किसीके हाथ में बैग था, किसी के हाथ में झाडू, और वो सब पूछने लगे:  “गोली किसने चलाई? ये कैसी फ़ायरिंग थी?” मगर गोली तो किसीने भी नहीं चलाई थी. बस, बिल्ली आ गई थी और गड़बड़ करने लगी थी. मगर काले सूट वाले लड़के ने कहा:  “ये मैंने जासूस गद्यूकिन को मार डाला!” तभी लाल बालों वाली लड़की ने परदा बन्द कर दिया. हॉल में बैठे सब लोगों ने इतनी ज़ोर से तालियाँ बजाईं कि मेरा सिर दुखने लगा. मैं फ़ौरन क्लोक-रूम में आया, अपना कोट पहना और घर भागा. मगर जब मैं भाग रहा था, तो कोई चीज़ मुझे बार-बार तंग कर रही थी. मैं रुक गया, जेब में हाथ डाला और वहाँ से निकाली...साइकिल की घण्टी!


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27

ग्रैण्डमास्टर की हैट


उस दिन मैंने सुबह-सुबह जल्दी से होम वर्क कर लिया, क्योंकि वो बिल्कुल कठिन नहीं था. 

सबसे पहले मैंने बाबा-ईगा (रूसी लोक कथाओं की डायन) के घर का चित्र बनाया, जिसमें वो खिड़की के पास बैठकर अख़बार पढ़ रही है. फिर “हमने शेड बनाया” इस वाक्य की रचना की. बस, इसके अलावा कुछ और था ही नहीं. तो, मैंने ओवरकोट पहना, ताज़ी ब्रेड का एक टुकड़ा लिया और घूमने निकल पड़ा. दोनों ओर पेड़ों वाली हमारी सड़क के बीचोंबीच एक तालाब है, और तालाब में हँस, कलहँस और बत्तख़ें तैरती रहती हैं. 

उस दिन ख़ूब तेज़ हवा चल रही थी. पेड़ों की सारी पत्तियाँ एकदम उलटी हो रही थीं, और तालाब भी पूरा ऊपर-नीचे हो रहा था, जैसे हवा के कारण खुरदुरा-खुरदुरा हो गया हो. जैसे ही मैं सड़क पर आया, मैंने देखा कि आज वहाँ क़रीब-क़रीब कोई भी नहीं है, बस, सिर्फ दो अनजान लड़के सड़क पर भाग रहे हैं, और बेंच पर एक अंकल बैठकर अपने आप से ही शतरंज खेल रहे हैं. वो बेंच पर तिरछे बैठे हैं, और उनके पीछे पड़ी है उनकी हैट. 

तभी अचानक खूब ज़ोर की हवा चली, और अंकल की हैट हवा में उड़ने लगी. शतरंज के खिलाड़ी का ध्यान ही नहीं गया, वो बस बैठे हैं और अपने खेल में मगन हैं. शायद वो अपने खेल में पूरी तरह डूब गए थे, और दुनिया की हर चीज़ के बारे में भूल गए थे. मैं भी, जब पापा के साथ शतरंज खेलता हूँ, तो अपने चारों ओर की किसी भी चीज़ पर ध्यान नहीं देता, क्योंकि जीतने की धुन जो सवार रहती है! और ये हैट तो ऊपर उड़ने के बाद धीरे-धीरे नीचे उतरने लगी, और वो ठीक उन अनजान लड़कों के सामने उतरी जो सड़क पर खेल रहे थे. उन्होंने फ़ौरन उसकी ओर हाथ बढ़ाए. मगर बात तो कुछ और ही हुई, क्योंकि हवा जो चल रही थी! हैट ऊपर की ओर ऐसे उछली, मानो वो ज़िन्दा हो, इन लड़कों के सिरों के ऊपर से उड़ते हुए बड़ी ख़ूबसूरती से तालाब पर उतर गई! मगर वो पानी में नहीं गिरी, बल्कि सीधे एक हँस के सिर पर जाकर बैठ गई. बत्तखें तो खूब डर गईं, और कलहँस भी डर गए. वो हैट के डर से एकदम तितर-बितर हो गए. मगर हँसों को तो उल्टे मज़ा आ रहा था, कि ये क्या अजीब बात हो गई है, और वे सब हैट वाले हँस की ओर लपके. वो अपनी पूरी ताक़त से सिर हिलाए जा रहा था, जिससे हैट को दूर फेंक सके, मगर वो वहाँ से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी. सारे हँस इस विचित्र चीज़ को देख-देखकर आश्चर्यचकित हो रहे थे. 


तब किनारे पर खड़े अनजान लड़के हँसों को अपनी ओर बुलाने लगे. वे सीटी बजाने लगे: ”फ्यू-फ्यू-फ्यू!” जैसे कि हँस - कुत्ता हो!

मैंने कहा:  “अब मैं ब्रेड फेंककर उन्हें अपनी ओर बुलाऊँगा, और तुम लोग कोई लम्बा डंडा ढूँढ़कर ले आओ. हैट तो उस शतरंज के खिलाड़ी को देना ही चाहिए. हो सकता है, कि वो ग्रैण्डमास्टर हो...”

और मैंने अपनी जेब से ब्रेड बाहर निकाली और उसके बारीक-बारीक टुकड़े करके पानी में फेंकने लगा.    

 


  तालाब में जितने भी हँस थे, और कलहँस थे, और बत्तखें थीं, सब तैरते हुए मेरी तरफ़ आने लगे. किनारे के पास वो धक्कामुक्की और भीड़-भड़क्का हो गया कि पूछो मत. जैसे पंछियों का बाज़ार लगा हो! हैट वाला हँस भी धक्के मारते हुए आया और उसने ब्रेड के लिए अपना सिर झुकाया, और आख़िरकार, हैट उसके सिर से फिसल ही गई!

वो हमारे काफ़ी पास तैर रही थी. तभी वे अनजान लड़के भी आ गए. वे कहीं से मोटा-सा खंभा उठा लाए थे, और खंभे के सिरे पर थी एक कील. लड़के फ़ौरन उस हैट को हिलगाने लगे. मगर बस थोड़े में ही रह गए. तब उन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड़ा, और एक ‘चेन’ बन गई; और वो, जिसके हाथ में खंभा था, हैट को हिलगाने लगा.

मैंने उससे कहा:  “तू कील को ठीक बीचोंबीच गड़ाने की कोशिश कर! और फिर उसे खींच ले, जैसे मछली को खींचता है, समझा?” मगर वो बोला:  “अरे, मैं तो, तालाब में, बस गिरने ही वाला हूँ क्योंकि इसने मुझे कसके नहीं पकड़ा है.” मगर मैंने कहा:

 “चल, हट मैं करता हूँ!”  “दूर हट! वर्ना मैं धड़ाम से गिर ही जाऊँगा!”

“तुम दोनों मुझे ओवरकोट की बेल्ट से पकड़ो!”

वे मुझे पकड़े रहे. और मैंने दोनों हाथों से खम्भे को पकड़ा, पूरा का पूरा आगे को झुका, और ऐसे ज़ोर से हाथों को घुमाया, मगर धम् से मुँह के बल गिर पड़ा! ये तो अच्छा हुआ कि ज़ोर से नहीं लगी, क्योंकि वहाँ कीचड़ था, इसलिए ज़्यादा दर्द नहीं हुआ. मैंने कहा:  “ये कैसे पकड़ा तुम लोगों ने? अगर आता नहीं है, तो करो मत!” वे बोले:  “नहीं, हमने अच्छा ही पकड़ा था! ये तो तेरी बेल्ट उखड़ गई. कपड़े समेत.” मैंने कहा:  “उसे मेरी जेब में रख दो, और तुम ख़ुद मुझे कोट से पकड़ो, बिल्कुल किनारे से. ओवरकोट तो नहीं न फटेगा! चलो!” मैं फिर से खम्भे समेत हैट की ओर झुका. मैंने कुछ देर इंतज़ार किया, जिससे हवा उसे मेरे और पास धकेल दे. मैं पूरे समय खम्भे को चप्पू जैसे घुमाकर उसे अपनी ओर खींच रहा था. शतरंज के खिलाड़ी को उसकी हैट लौटाने की खूब जल्दी हो रही थी. हो सकता है कि वो वाक़ई में ग्रैण्डमास्टर हो? ये भी हो सकता है कि वो ख़ुद बत्वीन्निक हो! बस, यूँ ही घूमने निकल पड़ा हो, और बस. ज़िन्दगी में ऐसे भी किस्से हो जाते हैं! मैं उसे हैट दूँगा, और वो कहेगा, “थैन्क्यू, डेनिस!” इसके बाद मैं उसके साथ फोटो खिंचवाऊँगा और सब को दिखाया करूँगा... ये भी हो सकता है कि वो मेरे साथ एक ‘गेम’ खेलने के लिए तैयार हो जाए? और, मान लो, अचानक, मैं जीत जाऊँ? ऐसी घटनाएँ भी हो जाती हैं!” अब हैट तैरते हुए कुछ और पास आ गई थी, मैंने लपककर ठीक सिर वाली जगह पे कील चुभा दी. अनजान लड़के चिल्लाए:  “हुर्रे!” और मैंने हैट को कील से निकाला. वो एकदम गीली और भारी हो गई थी. मैंने कहा:  “इसे निचोड़ना पड़ेगा!”

उनमें से एक लड़के ने एक तरफ़ से हैट का किनारा पकड़ा और उसे बाईं ओर घुमाने लगा. और मैं इसके विपरीत, दूसरी ओर से दाईं तरफ़ घुमाने लगा. हैट में से पानी बाहर निकलने लगा.. हमने खूब ज़ोर लगाकर उसे निचोड़ा, वो बिल्कुल बीचोंबीच टूट भी गई. और वो लड़का, जो कुछ नहीं कर रहा था, बोला:  “अब सब ठीक है. इधर लाओ. मैं उसे अंकल को दे दूंगा.” मैंने कहा:  “ये भी ख़ूब रही! मैं ख़ुद ही दूँगा.”

तब वो हैट को अपनी ओर खींचने लगा, और दूसरा लड़का अपनी ओर. और मैं अपनी ओर. हमारे बीच झगड़ा होने लगा. उन्होंने हैट का अस्तर बाहर निकाल दिया. और पूरी हैट मेरे हाथ से छीन ली. मैंने कहा:  “मैंने ब्रेड के लालच से हँसों को अपनी तरफ़ खींचा था, मैं ही इसे वापस लौटाऊँगा!” वे बोले:  “कील वाला खम्भा कौन लाया था?” मैंने कहा:  “और बेल्ट किसके ओवरकोट की फटी थी?”

तब उनमें से एक ने कहा: ”ठीक है, इसे छोड़ देते हैं, मार्कूश्का! घर में बेल्ट के लिए तो इसकी ख़बर ली ही जाएगी!” मार्कूश्का ने कहा: ”ले, रख ले अपनी मनहूस हैट,” और उसने गेंद की तरह पैर से मेरी ओर हैट फेंक दी.

मैंने हैट को उठाया और फ़ौरन सड़क के आख़िरी छोर की ओर भागा जहाँ शतरंज का खिलाड़ी बैठा था. मैं भागकर उसके पास गया और बोला:  “अंकल, ये रही आपकी हैट!”  “कहाँ?” उसने पूछा.  “ये,” मैंने कहा और हैट उसकी ओर बढ़ा दी.  “तू गलत कह रहा है, बच्चे! मेरी हैट यहीं है.” और उसने मुड़कर पीछे देखा. वहाँ तो, ज़ाहिर है, कुछ था ही नहीं. तब वो चीख़ा:

 “ये क्या है? मेरी हैट कहाँ है, मैं तुझसे पूछ रहा हूँ?”

मैं थोड़ा दूर हट कर  बोला: “ये रही. ये. क्या आप देख नहीं रहे हैं?” अंकल की तो मानो साँस ही रुक गई:  “ये भयानक मालपुए जैसी चीज़ तू क्यों मेरी नाक में घुसेड़ रहा है? मेरी हैट एकदम नई थी, वो कहाँ है? फ़ौरन जवाब दे!”

मैंने उनसे कहा:  “आपकी हैट को हवा उड़ाकर ले गई, और वो तालाब में गिर गई. मगर मैंने कील से हिलगा लिया. फिर हमने उसे निचोड़ा और पानी बाहर निकाल दिया. ये रही वो. लीजिए...और ये रहा उसका अस्तर!”

उसने कहा:  “मैं अभ्भी तुझे तेरे माँ-बाप के पास ले जाता हूँ!!!”

 “मम्मा इन्स्टीट्यूट में है. पापा फैक्टरी में. आप, इत्तेफ़ाक से, कहीं बत्वीन्निक तो नहीं हैं?” वो पूरी तरह तैश में आ गया:  ‘भाग जा, लड़के! मेरी आँखों के सामने से दूर हो जा! वर्ना मैं तेरी धुलाई कर दूँगा!” मैं कुछ और पीछे सरका और बोला:  “क्या हम शतरंज खेलें?”

उसने पहली बार ध्यान से मेरी ओर देखा.  “क्या तुझे खेलना आता है?” मैंने कहा:  “हुँ!” तब उसने गहरी साँस लेकर कहा:  “अच्छा, चल बैठ!” 

*****



28.


ज़ू-कॉर्नर 

क्लास ख़त्म होने से पहले हमारी टीचर, रईसा इवानव्ना  ने कहा: ”मुबारक हो, बच्चों! स्कूल-कमिटी ने हमारे स्कूल में ज़ू-कॉर्नर बनाने का फ़ैसला किया है. एक छोटा-सा ज़ू-पार्क. तुम लोग ख़ुद ही जानवरों की निगरानी और देखभाल किया करोगे.” 

 

 

मैं तो ऐसे कूदा कि पूछो मत! ये तो वाक़ई में बहुत दिलचस्प है! मैंने पूछा:

 “ये ज़ू-कॉर्नर होगा कहाँ?”  “तीसरी मंज़िल पर,” रईसा इवानव्ना ने जवाब दिया, “स्टाफ़-रूम की बगल में...”   “बाप रे,” मैंने कहा, “मगर जंगली भैंसा तीसरी मंज़िल पे चढ़ेगा कैसे?”  “कैसा जंगली भैंसा?” रईसा इवानव्ना  ने पूछा.  “झबरीला,” मैंने कहा, “सींगों वाला और पूँछ वाला.”

 “नहीं,” रईसा इवानव्ना  ने कहा, “जंगली भैंसा हमारे यहाँ नहीं होगा, हमारे पास होंगे कई सारे पंछी, बहुत से साही, खूब सारी मछलियाँ और चूहे. तुममें से हर कोई एक-एक छोटा-सा प्राणी हमारे ज़ू-कॉर्नर के लिए ला सकता है. फिर मिलेंगे!”

मैं घर गया, फिर हमारे कम्पाऊण्ड में गया, मैं पूरे समय यही सोचता रहा कि हमारे ज़ू-कॉर्नर में बड़ॆ हिरन को, या याक को, या फिर कम से कम हिप्पोपोटेमस को कैसे पाला जाए, कितने ख़ूबसूरत होते हैं वे... मगर तभी वहाँ मीशा स्लनोव  भागकर आया और बोला:  “अर्बात पे ज़ू-शॉप में सफ़ेद चूहे दे रहे हैं!!”

मैं बेहद ख़ुश हो गया और मम्मा के पास भागा.

 “मम्मा,” मैंने चिल्लाते हुए कहा, “मम्मा बोलो ‘हुर्रे!’ अर्बात पे सफ़ेद चूहे दे रहे हैं.” मम्मा ने कहा:  “कौन दे रहा है, किसको दे रहा है, क्यों दे रहा है, और मैं ‘हुर्रे’ क्यों कहूँ?”

 मैंने कहा:  “ज़ू-शॉप में दे रहे हैं, ज़ू-कॉर्नर्स के लिए, मुझे पैसे दो, प्लीज़!” मम्मा ने पर्स लिया और बोली:  “और तुम लोगों को ज़ू-कॉर्नर के लिए सफ़ेद चूहे ही क्यों चाहिए? क्या साधारण, भूरे चूहों के पिल्लों से काम नहीं चल सकता?”

 “तुम भी ना, मम्मा” मैंने कहा, “दोनों में कैसा मुक़ाबला? भूरे चूहे – मतलब, एकदम साधारण; और सफ़ेद – जैसे नियमित, डाइट वाला खाना होता है, समझ गईं ना?” अब मम्मा ने मुझे एक हल्की-सी चपत लगाई, पैसे दिए, और मैं ज़ू-शॉप की ओर लपका. वहाँ लोगों की व्वो भीड़ थी. बेशक, ये बात समझ में भी आ रही थी, क्योंकि ज़ाहिर है, सफ़ेद चूहों को कौन प्यार नहीं करता?! इसलिए ज़ू-शॉप में धक्का-मुक्की हो रही थी, और मीश्का स्लनोव  काऊण्टर के पास खड़ा होकर व्यवस्था बनाने की कोशिश करने लगा. मगर फिर भी मेरा काम नहीं बना! ठीक मेरी आँखों के सामने चूहे ख़तम हो गए. मैंने सेल्स-गर्ल से कहा:  “अब, और चूहे कब आएँगे?” वो बोली:

 “जब हेड-ऑफ़िस से भेजेंगे. मेरा ख़याल है कि साल के अंत में.” मैंने कहा:  “आप जनता की ज़रूरत के मुताबिक चूहों की सप्लाई ठीक से नहीं करती हैं.” और मैं दूर हट गया. और, शायद मूड ऑफ़ होने के कारण मैं अचानक दुबला होने लगा. मगर मम्मा ने जैसे ही मेरे चेहरे के भाव देखे, वो हाथ नचाते हुए बोली:  “डेनिस, चूहों की वजह से अपना दिमाग़ ख़राब मत करो. नहीं हैं, तो कोई बात नहीं! चल, तेरे लिए मछली खरीदेंगे! पहली क्लास के बच्चे के लिए सबसे बढ़िया चीज़ है – मछली! तुझे कैसी वाली चाहिए, हाँ?”

मैंने कहा:  “ नील नदी का मगरमच्छ!”  “और अगर छोटी लें तो?”  “तो फिर मोलिनेज़िया?” मैंने कहा. “मोलिनेज़िया – इत्ती छोटी सी मछली होती है, बस आधी दियासलाई जित्ती.” और हम वापस उस शॉप में आए. मम्मा ने पूछा:  “ये मोलिनेज़िया कैसी दे रहे हैं आप? मुझे क़रीब दस ख़रीदनी हैं ये नन्ही-नही मछलियाँ, ज़ू-कॉर्नर के लिए.” सेल्सगर्ल ने जवाब दिया:  “डेढ़-डेढ़ रूबल्स की एक!” मम्मा ने सिर पकड़ लिया.  “ये,” मम्मा ने कहा, “मैंने कल्पना ही नहीं की थी! चल, बेटा, घर जाएँगे.”   “और मम्मा, मोलिनेज़िया?”  “हमें नहीं चाहिए,” मम्मा ने कहा. “घर जाएँगे. और मोलिनेज़िया, ओह, वो...वो काटती हैं.” 

मगर फिर भी, मुझे बताइए तो सही कि मैं अपने ज़ू-कॉर्नर के लिए क्या ले जाऊँ? चूहे ख़तम हो गए, और मोलिनेज़िया काटती हैं. क्या मुसीबत है!

*******










29.

कुत्ता चोर 

ज़रा सुनिए तो सही, कि एक बार क्या हुआ. जब मैं अपने चाचा वलोद्या के साथ समर-कॉटेज में रहता था, तो हमारी कॉटेज से कुछ दूर बरीस क्लिमेंत्येविच रहते थे, दुबले-पतले अंकल, ख़ुशमिजाज़, हाथ में छड़ी लिए रहते और इतने ऊँचे थे, जितनी फेन्सिंग होती है. उनके पास एक कुत्ता था जिसका नाम था चाप्का. बहुत ही बढ़िया कुत्ता था, काला, झबरा, थोबड़ा - जैसे ईंट, पूँछ - जैसे ठूँठ. मेरी उसके साथ बहुत दोस्ती हो गई.    एक बार बरीस क्लिमेंत्येविच ने तैरने के लिए जाने का, और चाप्का को अपने साथ न ले जाने का विचार किया. क्योंकि वो एक बार उनके साथ ‘बीच’ पे गया था और इस कारण वहाँ बड़ा हंगामा हो गया था. उस समय चाप्का पानी में घुस गया था, और पानी में तैर रही थी एक आण्टी. वो एक रबड़ के डिब्बे पर तैर रही थी, जिससे डूब न जाए. वो फ़ौरन चाप्का पर चिल्लाई:  “भाग जा! बस, इसी की कमी थी. बस, कुत्ते का इन्फेक्शन ही यहाँ छोड़ना बाकी था!” और वो चाप्का पर पानी उड़ाने लगी: “भाग यहाँ से, भाग जा!”

चाप्का को ये अच्छा नहीं लगा, और वो तैरते-तैरते आण्टी को काटने की कोशिश करने  लगा, मगर उस तक तो पहुँच नहीं पाया, हाँ अपने तेज़ दाँतों से  उसने रबड़ के डिब्बे को ज़रूर पकड़ लिया. बस, एक ही बार काटा था, कि डिब्बा फुस् करके फ्लैट हो गया. आण्टी ने सोचा कि वह डूब रही है और वो चीख़ने लगी: 

 “डूब रही हूँ, बचाओ!” पूरी ‘बीच’ बेहद घबरा गई. बरीस क्लिमेंत्येविच उसे बचाने के लिए लपके. वहाँ, जहाँ ये आण्टी उछल-कूद मचा रही थी, नदी का पानी बस उनके घुटनों तक था, और आण्टी के कंधों तक. उन्होंने आण्टी को बचा लिया, मगर चाप्का को छड़ी से मारा – बेशक, सिर्फ दिखाने के लिए. तब से वो चाप्का को ‘बीच’ पर नहीं ले जाते. 

 


तो, उन्होंने मुझसे विनती की कि मैं चाप्का के साथ कम्पाऊण्ड में घूमूं, जिससे वो उनके पीछे-पीछे न आए. और मैं कम्पाऊण्ड में आया, मैं चाप्का के खेलने लगा, उछलने लगा, भौंकने लगा, गिरने लगा, हँसने लगा. बरीस क्लिमेंत्येविच इत्मीनान से चले गए. मैं और चाप्का बड़ी देर तक खेलते रहे, तभी फेन्सिंग के पास से हाथ में बंसी लिए वान्का दीखव गुज़रा. उसने कहा:  “डेनिस्का, चल, मछली पकड़ते हैं!” मैंने कहा:  “नहीं आ सकता, मैं चाप्का की रखवाली कर रहा हूँ.” उसने कहा:  “चाप्का को घर में बन्द कर दे. अपनी जाली ले ले और भाग के आ जा.” और वो आगे निकल गया. मैंने चाप्का का पट्टा पकड़कर उसे हौले से घास पे खींचा. वो पंजे ऊपर उठाकर लेट गया, और ऐसे चल पड़ा जैसे छोटी से स्लेज पर फिसल रहा हो. मैंने दरवाज़ा खोला, उसे खींचकर कॉरीडोर में लाया, दरवाज़ा बन्द किया और जाली लेने चला गया. जब मैं वापस रास्ते पे आया, तो वान्का जा चुका था. वह नुक्कड़ के पीछे छुप गया था. मैं उसके पीछे भागा और अचानक क्या देखता हूँ कि जनरल स्टोर्स के पास रास्ते के ठीक बीचोंबीच बैठा है मेरा चाप्का, जीभ बाहर निकाले मेरी ओर ऐसे देख रहा है, जैसे कुछ हुआ ही ना हो...

तो, ये बात है! मतलब, मैंने दरवाज़ा ठीक से बन्द नहीं किया, या फिर ये चालाकी से बाहर आ गया और लोगों के कम्पाऊण्ड से होते हुई यहाँ आकर बैठ गया, मुझसे मिलने के लिए! बहुत होशियार है! मगर मुझे तो जल्दी जाना है. वहाँ, शायद, वान्का तो मछली भी खींच रहा होगा, और मुझे इसकी ही फिकर करनी है. ख़ास बात ये है, कि मैं इसे अपने साथ ले भी चलता, मगर बरीस क्लिमेंत्येविच कभी भी वापस लौट सकते हैं, और अगर उन्हें ये घर पे नहीं मिला, तो वो परेशान हो जाएँगे, इसे ढूँढ़ने निकल पड़ेंगे, और फिर मुझे डाँटेंगे... नहीं, ऐसे नहीं चलेगा! इसे वापस ले जाकर बन्द करना होगा. मैंने उसे पट्टे से पकड़ा और खींचते हुए घर ले आया. इस बार चाप्का अपने चारों पंजे ज़मीन में गड़ाकर विरोध कर रहा था. वो मेरे पीछे इस तरह घिसट रहा था जैसे मेंढ़क हो. मैं बड़ी मुश्किल से उसे दरवाज़े तक लाया. दरवाज़ा थोड़ा-सा खोलकर उसे भीतर धकेल दिया और दरवाज़े को कस के बन्द कर दिया. वो अन्दर से भौंकने लगा, बिसूरने लगा, मगर मैंने उसे चुप कराने की कोशिश नहीं की. मैंने पूरे घर का चक्कर लगाया, सारी खिड़कियाँ और जाली भी बन्द कर दी. और, हालाँकि मैं ये सब करते-करते बहुत थक गया, फिर भी मैं नदी की ओर भागा. मैं काफ़ी तेज़ दौड़ रहा था, और जब मैं ट्रान्सफॉर्मर वाले डिब्बे तक पहुँचा, तो उसके पीछे से उछल कर बाहर आया...फिर से चाप्का! मैं जल्दी-जल्दी भागने लगा. मुझे अपनी आँखों पे भरोसा नहीं हुआ. मुझे लगा कि शायद मुझे चाप्का का सपना आ रहा है...मगर चाप्का तो मानो काटने के लिए तैयार था, क्योंकि मैं उसे घर पे छोड़ आया था. गुर्रा रहा है और मुझ पर भौंक रहा है! अच्छा, रुक जा, अभी दिखाता हूँ तुझे! और मैं उसे पट्टे से पकड़ने लगा, मगर वो मेरे हाथ नहीं आया, वो घूम गया, गुर्राया, पीछे हटा, उछला और पूरे समय भौंकता रहा. तब मैं उसे मनाने लगा:  “चापच्का, चापच्का, त्यु-त्यु-त्यु, झबरीले, आ-आ-आ!” मगर वो नख़रे करता रहा और मेरी पकड़ में नहीं आया. ख़ास बात ये थी कि मेरी जाली मुझे परेशान कर रही थी, मैं उतनी फुर्ती नहीं दिखा सकता था. हम बड़ी देर तक ट्रान्सफॉर्मर वाले डिब्बे के चारों ओर उछलते रहे. और अचानक मुझे याद आया कि मैंने हाल ही में टीवी पर फिल्म देखी थी – जंगल की पगड़ण्डी. उसमें दिखाया गया था कि कैसे शिकारी जालियों से बन्दरों को पकड़ते हैं. मैंने भी अपनी जाली धप् से उसके ऊपर फेंकी! चाप्का को ढाँक दिया, जैसे बन्दर को ढाँकते हैं. वो पूरे ज़ोर से बिसूरने लगा, मगर मैंने जल्दी-जल्दी उसे जाली में लपेटा, कंधे पर डाला, और, एक सचमुच के शिकारी की तरह पूरी बस्ती से होता हुआ उसे घर ले आया. चाप्का मेरे पीछे जाली में टँगा हुआ था, और रुक रुक कर रोने लगता था. मगर मैंने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया, उसे खिड़की से घर के भीतर फेंक दिया और खिड़की को बाहर से डण्डा लगाकर बन्द कर दिया. वो फ़ौरन अलग-अलग तरह की आवाज़ें निकालते हुए वहाँ से रोने लगा, भौंकने लगा, मगर मैं तीसरी बार वान्का के पास भागा. ये तो मैं जल्दी-जल्दी बता रहा हूँ, वर्ना तो इस सब में काफ़ी समय निकल गया. नदी पे मैं वान्का से मिला. वो ख़ुश-ख़ुश चला आ रहा था, और उसके हाथ में घास की रस्सी थी, और उस पे लटक रही थीं दो मछलियाँ, बड़ी-बड़ी, हरेक चाय के चम्मच जितनी. मैंने कहा:  “ओहो! बढ़िया काम किया है!” वान्का ने कहा:  “हाँ, और ज़्यादा खींच नहीं सका. चल, ये मछली मेरी मम्मा को देते हैं, सूप बनाने के लिए, और खाने के बाद दुबारा जाएँगे. हो सकता है कि तू भी कुछ पकड़ ले.” और इस तरह बातें करते हुए हम बरीस क्लिमेंत्येविच के घर तक पहुँच गए. मगर घर के पास कुछ लोगों की भीड़ खड़ी थी. वहाँ धारियों वाला कच्छा पहने एक अंकल थे, उनका पेट तकिये जैसा था, और वहाँ एक आण्टी भी थी, वो भी कच्छे में थी और उसकी पीठ खुली थी. एक चश्मे वाला लड़का था और, और भी कोई था. वे सब हाथ हिला-हिलाकर चिल्ला रहे थे. फिर चश्मे वाले लड़के ने मुझे देखा और चीख़ा:  “ये ही है, ये ही है वो!” अब सब लोग हमारी तरफ़ मुड़े, और धारियों वाले अंकल चिल्लाए:  “कौन सा? मछली वाला या छोटा?!” चश्मे वाले लड़के ने कहा:  “छोटा वाला! पकड़ो उसे! ये ही है वो!” और वे सब मुझ पर झपट पड़े. मैं थोड़ा सा घबरा गया और उनसे दूर भागा, जाली फेंक दी और फ़ेन्सिंग पर चढ़ गया. फ़ेन्सिंग काफ़ी ऊँची थी: नीचे से मुझे पकड़ना मुश्किल था. खुली पीठ वाली आण्टी फ़ेन्सिंग के पास आई और भयानक आवाज़ में चिल्लाने लगी:  “फ़ौरन मेरे बोब्का को वापस दे! उसे कहाँ छुपा कर रखा है तूने, दुष्ट?” और अंकल अपने पेट समेत फेन्सिंग से चिपक गया, मुक्कों से खटखटाने लगा:  “और मेरा ल्युस्का कहाँ है? तू उसे कहाँ ले गया? क़ुबूल कर ले!” मैंने कहा:  “फेन्सिंग से दूर हट आईये. मैं किसी बोब्का-वोव्का को और किसी ल्युस्का-प्स्लुस्का को नहीं जानता. मैं तो उन्हें पहचानता भी नहीं! वान्का, इनसे कह दे!” वान्का चिल्लाया:  “ये आप बच्चे पे क्यों टूट पड़ॆ हैं? मैं अभी मम्मा के पास भागता हूँ, तब पता चलेगा तुम लोगों को!” मैं चीख़ा:  “तू जल्दी से भाग, वान्का, वर्ना ये लोग मेरे टुकड़े-टुकड़े कर डालेंगे!”

वान्का चीख़ा:

“डटा रह, फेन्सिंग से नीचे मत उतरना!” और वो भाग गया. मगर अंकल बोले:  “ये उसका साथी है, और कोई हो ही नहीं सकता. उनकी पूरी गैंग है! ऐ तू, फेन्सिंग के ऊपरवाला, फ़ौरन जवाब दे, मेरा ल्युस्या कहाँ है?” मैंने कहा:  “अपनी लड़की को आप ख़ुद ही ढूँढ़ लीजिए!”  “अच्छा, तो तू मज़ाक करने लगा? फ़ौरन नीचे उतर, पुलिस के पास जाएँगे.” मैंने कहा:  “बिल्कुल नहीं उतरूँगा!” तब चश्मे वाला लड़का बोला: ”अभ्भी मैं इसे पकड़ता हूँ!” और वो फेन्सिंग पर चढ़ने लगा. मगर उसे आता ही नहीं है. क्योंकि उसे मालूम ही नहीं है की कील कहाँ है, पकड़ने के लिए कोई चीज़ कहाँ है. मगर मैं तो सैकड़ों बार इस फेन्सिंग पर चढ़ चुका हूँ. फिर मैं इस लड़के को लात भी मार रहा हूँ. और वो, ख़ुदा का शुक्र है, गिर जाता है!

 “रुक, पाव्ल्या,” अंकल ने कहा, “आ, मैं तुझे ऊपर बिठाता हूँ!” और ये पाव्ल्या इस अंकल पर चढ़ने लगा. और मैं फिर से डर गया, क्योंकि पाव्ल्या हट्टा-कट्टा लड़का था, शायद तीसरी या चौथी क्लास में पढ़ता था. और मैंने सोचा कि अब मेरा अंत निकट है, मगर तभी मैंने देखा कि बरीस क्लिमेंत्येविच भागते हुए आ रहे हैं, और नुक्कड़ से वान्का और उसकी मम्मा भी भागते हुए आ रहे हैं. वे चिल्लाते हैं:  “रुक जाईये! क्या बात है?” अंकल गरजे:  “कोई बात नहीं है! सिर्फ, ये लड़का कुत्ते चुराता है! उसने मेरे कुत्ते ल्युस्का को चुराया है.” और कच्छे वाली आण्टी बोली:  “और मेरे बोब्का को चुराया है!” वान्का की मम्मा ने कहा:  “मैं कभी भी यक़ीन नहीं कर सकती, चाहे मुझे चीर ही क्यों न डालो.” मगर चश्मे वाला लड़का बीच में टपक पड़ा:  “मैंने ख़ुद देखा था. वो हमारे कुत्ते को जाली में डालकर ले जा रहा था, कंधे पे! मैं छत पर बैठा था और देख रहा था!”

मैंने कहा:  “शरम नहीं आती झूठ बोलते हुए? मैं चाप्का को ले जा रहा था. वो घर से भाग गया था!” बरीस क्लिमेंत्येविच ने कहा:  “ये बहुत अच्छा लड़का है. वो अचानक कुत्ते क्यों चुराएगा? घर के अन्दर चलते हैं, फ़ैसला करेंगे! आ, डेनिस, यहाँ आ जा!” वो फेन्सिंग के पास आए, और मैं सीधा उनके कंधों पर आ गया, क्योंकि वो बहुत ऊँचे हैं, मैंने पहले ही बताया था. अब सब लोग कम्पाऊण्ड में आ गए. अंकल गुरगुरा रहा था, कच्छे वाली आण्टी ऊँगलियाँ चटखा रही थी, चश्मे वाला पाव्ल्या उनके पीछे-पीछे था, और मैं बरीस क्लिमेंत्येविच के कंधों पर सवार था. हम ड्योढ़ी में आए, बरीस क्लिमेंत्येविच ने दरवाज़ा खोला, और अचानक वहाँ से तीन कुत्ते उछल कर बाहर आए! तीन-तीन चाप्का! बिल्कुल एक जैसे! मैंने सोचा कि मेरी आँखों को ही तीन-तीन दिखाई दे रहे हैं. अंकल चिल्लाया:  “ल्युसेच्का!” और एक चाप्का लपक कर आगे आया और सीधे उसके पेट पर चढ़ गया! और कच्छे वाली आण्टी और पाव्ल्या चीखे:  “बोबिक! बोबिक!” दोनों दूसरे चाप्का को दोनों ओर से खींचने लगे: वो अगले पैर पकड़ कर अपने ओर खींच रही थी और लड़का पिछले पैरों से – अपनी ओर! बस, सिर्फ तीसरा कुत्ता हमारे पास खड़ा था और पूँछ गोल-गोल घुमा रहा था. 

बरीस क्लिमेंत्येविच ने कहा:  “देख, तेरी पोल कैस खुल गई? मुझे ज़रा भी इसकी उम्मीद नहीं थी. तूने पराए कुत्तों से घर क्यों भर दिया?” मैंने कहा:  “मैं समझा कि वो चाप्का है! कितने मिलते-जुलते हैं! एक सा चेहरा. बिल्कुल जुड़वाँ कुत्ते हैं.”

और मैंने सब कुछ सिलसिले से बताया. अब तो सब लोग हँसने लगे, और जब उनकी हँसी रुकी, तो बरीस क्लिमेंत्येविच ने कहा:  “बेशक, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि तू धोखा खा गया. स्कॉच-टेरिअर्स एक दूसरे से बहुत मिलते जुलते हैं, इतने कि उनमें फ़रक करना मुश्किल हो जाता है. जैसे आज हुआ, सच कहा जाए, तो ये हमने, इन्सानों ने, कुत्तों को नहीं पहचाना, बल्कि कुत्तों ने हमें पहचाना है. तो, तेरा कोई क़ुसूर नहीं है. मगर फिर भी एक बात समझ ले, कि अब से मैं तुझे कुत्ता-चोर कहकर बुलाया करूँगा. ....और सही में, वो मुझे इसी नाम से बुलाते हैं...


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30

कलहँस की गर्दन 


 


जब हम लंच के लिए बैठे, तो मैंने कहा:  “आज मैं बाहर जाने वाला हूँ. मीश्का के यहाँ. बर्थडे पार्टी पे.”  “अच्छा?” पापा ने कहा. “वो कितने साल का हो गया?”  “नौ,” मैंने जवाब दिया. वो नौ साल का पूरा हो गया है, पापा. अब दसवाँ शुरू हो गया.”  “ वक़्त कैसे भागता है,” मम्मा ने गहरी साँस ली. “अभी परसों-परसों तक तो वह खिड़की की सिल पर मेज़ से निकाली हुई दराज़ में लेटा करता था, और अब देखिए, नौ साल का हो भी गया!”

 “तो फिर क्या,” पापा ने इजाज़त दे दी, “जाकर बर्थडे बॉय को मुबारकबाद दे देना. हाँ, ये तो बता कि इस यादगार दिन तू अपने दोस्त को क्या तोहफ़ा देगा?”  “है, तोहफ़ा भी है,” मैंने कहा, “मीश्का बहुत ख़ुश हो जाएगा...”  “क्या है वो तोहफ़ा?” मम्मा ने पूछा.  “कलहँस की गर्दन!” मैंने कहा. “आज वेरा सिर्गेयेव्ना कलहँस साफ़ कर रही थी, और मैंने उनसे कलहँस की गर्दन मांग ली, जिससे मीश्का को गिफ्ट दे सकूँ.”  “दिखा,” पापा ने कहा. मैंने जेब से कलहँस की गर्दन निकाली. वो धुली हुई, साफ़-सुथरी थी, एकदम प्यारी लग रही थी, मगर वो अभी कुछ नम थी, पूरी तरह से सूखी नहीं थी, मगर मम्मा उछल पड़ी और चीख़ी:  “इस गन्दी चीज़ को फ़ौरन यहाँ से ले जा! ओफ़, भयानक!” मगर पापा ने कहा:  “मगर इसकी क्या ज़रूरत है? और ये इतना चिपचिपी क्यों है?”       

 “अभी ये कच्ची है. मगर मैं ज़रूरत के मुताबिक इसे सुखा लूँगा और इसका एक गोल पहिया बना लूँगा. देख रहे हो? ऐसे.” मैंने पापा को दिखाया. वो ग़ौर से देख रहे थे.

“देख रहे हो, पापा?” मैंने कहा. “ये पतली वाली गर्दन मैं चौड़ी वाली में डाल दूंगा, उसमें क़रीब पाँच चने डाल दूँगा, जब ये सूख जाएगा, तो मालूम है कैसी आवाज़ करेगा! फ़र्स्ट क्लास!” पापा मुस्कुराए:  “अच्छा है तोहफ़ा...मगर-मगर!” और मैंने कहा:

 “परेशान न हो, पापा. मीश्का को पसन्द आएगा. मैं उसे अच्छी तरह जानता हूँ.” मगर पापा उठे और हैंगर्स की ओर गए. वहाँ उन्होंने जेबों में हाथ डाले.  “ये ले,” उन्होंने मेरी ओर कुछ सिक्के बढ़ाए, “ये थोड़े से पैसे ले. मीश्का के लिए चॉकलेट्स ख़रीद ले. और ये होगा मेरी तरफ़ से तोहफ़ा.” और पापा ने अपने कोट से एक ख़ूबसूरत नीला-नीला बैज निकाला जिस पर लिखा था ‘स्पूत्निक’.

मैंने कहा:  “हुर्रे! मीश्का तो सातवें आसमान पे चढ़ जाएगा. उसके लिये तो मेरी ओर से पूरे तीन-तीन तोहफ़े होंगे. बैज, चॉकलेट्स और कलहँस की गर्दन. इससे तो हर कोई ख़ुश हो जाएगा!” मैंने कलहँस की गर्दन सुखाने के लिए बैटरी के ऊपर रख दी. मम्मा ने कहा:

 “हाथ धो ले और खाना खा!”

और हम खाना खाने लगे, मैं खट्टा सूप खा रहा था और प्रसन्नता से हल्के-हल्के सी-सी कर रहा था. मगर अचानक मम्मा ने बे-बात के अपना चम्मच नीचे रख दिया और बोली:

“समझ में नहीं आ रहा है, कि इसे वहाँ भेजूँ या नहीं?” 

लो, हो गया कल्याण! साफ़ आसमान में बिजली कड़की! मैंने कहा:  “मगर क्यों?” और पापा ने भी पूछा:  “बात क्या है?”  “ये वहाँ हमे नीचा दिखाएगा. इसे तो बिल्कुल ही खाना नहीं आता. सी-सी करता है, सुड़कता है, कुलबुलाता है...भयानक!”  “कोई बात नहीं,” मैंने कहा, “मीश्का भी सी-सी करता है, मुझसे ज़्यादा.”  “ये कोई बात नहीं हुई,” पापा ने भौंहे चढ़ा लीं. “सलीके से खाना चाहिए. क्या तुझे कम सिखाया है?”  “मतलब, कम ही सिखाया है,” मम्मा ने कहा.  “कुछ भी नहीं सिखाया,” मैंने कहा. “मैं जैसे दिल चाहता है, वैसे खाता हूँ. और सब ठीक-ठाक ही है. इसमें सिखाने वाली बात क्या है?”  “नियम जानना चाहिए,” पापा ने सख़्ती से कहा. “क्या तुझे मालूम है? नहीं. ये होते हैं खाने के नियम: जब खाना खा रहे हो तो चप्-चप् नहीं करते, मच्-मच् नहीं करते, सुड़-सुड़ नहीं करते, खाने पर फूँक नहीं मारते, ख़ुशी के मारे सी-सी नहीं करते और आम तौर से खाते समय किसी भी तरह की आवाज़ नहीं करते.”  “मैं तो नहीं करता! क्या मैं आवाज़ निकालता हूँ?”  “और, कभी भी खाने से पहले ब्रेड और राई की चटनी नहीं खाते!” मम्मा चहकी. पापा बुरी तरह लाल हो गए. क्यों न होते! अभी कुछ ही दिन पहले उन्होंने खाने से पहले, क़रीब-क़रीब पूरी एक किलो ब्रेड राई की चटनी के साथ खा ली थी. जब मम्मा सूप लाई, तो पता चला कि ब्रेड ही नहीं है, पापा पूरी ब्रेड खा गए थे, और मुझे भागकर बेकरी से नई ब्रेड लानी पड़ी थी. इसीलिए अभी वो लाल हो गए थे, मगर वो चुप रहे. ऐसा लग रहा था कि मम्मा कह तो मुझसे रही है, मगर इससे पापा को अटपटा लग रहा है. और मुझे भी. मम्मा ने इतनी सुनाई, इतनी सुनाई, कि मैं तो डर ही गया. फिर कोई जिए कैसे? ये मत करो, वो मत करो!”  “फ़ोर्क फर्श पर मत गिरा,” मम्मा ने कहा, “और अगर गिरा दिया है, तो चुपचाप बैठा रह, चारों हाथों-पैरों पर खड़ा होकर, मेज़ के नीचे उसे मत ढूँढ़ और आधा घण्टे तक वहीं मत रेंगता रह. मेज़ पर ऊँगलियों से बैण्ड न बजा, सीटी मत बजा, गाना मत गा! मेज़ पर ठहाके न लगा! मछली चाकू से न खा, ख़ास तौर से जब किसी और के घर में खा रहे हो.”  “मगर, वो बिल्कुल मछली ही नहीं थी,” पापा ने कहा, और उनके चेहरे पर अपराधी भाव छा गए, “वो तो साधारण कैबेज-रोल्स थे.”  “ये तो और भी ज़रूरी है,” मम्मा को ज़रा भी दया नहीं आ रही थी. “क्या बात है, कैबेज-रोल्स – चाकू से! न तो कैबेज-रोल्स और न ही फ्राईड-एग्स चाकू से खाते हैं! ये नियम है!” मुझे बेहद आश्चर्य हुआ: ”मगर कैबेज-रोल्स बगैर चाकू के कैसे खा सकते हैं?” मम्मा ने कहा:  “वैसे ही जैसे कटलेट्स खाते हैं. फ़ोर्क से, और बस.”  “फिर तो पूरे ही प्लेट में रह जाएँगे! फिर कैसे?” मम्मा ने कहा:  “रहते हैं तो रहने दो!”

 “अफ़सोस तो होगा!” मैंने विनती की. “हो सकता है, मैंने अभी पूरा नहीं खाया हो, और वहाँ बच गया है...ख़तम तो करना पड़ेगा ना!” पापा ने कहा:  “तो जो है, उसे पूरा खा ले!” मैंने कहा:  “फिर, थैंक्यू!” फिर मुझे एक और ज़रूरी बात याद आ गई:  “और शोरवा?” मम्मा मेरी ओर मुड़ी.  “क्या शोरवा?” उसने पूछा.  “ चाटना चाहिए...” मैंने कहा. मम्मा की भौंहे बिल्कुल उसके बालों तक उठ गईं. उसने मेज़ पर मुक्का मारा:  “चाटने की हिम्मत न करना!” मैं समझ गया कि अब अपने आपको बचाना चाहिए.  “तुम भी क्या, मम्मा? मुझे मालूम है कि ज़बान से चाटना नहीं चाहिए! मैं क्या कोई कुत्ता हूँ! मैं, मम्मा, कभी भी नहीं चाटूँगा, ख़ासकर और लोगों के सामने. मैं तुमसे पूछ रहा हूँ: क्या ब्रेड से साफ़ किया जाए?”  “नहीं,” मम्मा ने कहा.  “मैं ऊँगलियों की बात थोड़े ही कर रहा हूँ! मैं ब्रेड की, ब्रेड-क्रम्प्स की बात कर रहा हूँ!”  “भाग जा,” मम्मा चीखी, “तुझसे कह रही हूँ!” और उसकी आँखें हरी-हरी हो गईं. जैसे गूज़-बेरी हो. मैं सोच रहा था : इसे, इस शोरवे को, न तो मैं चाटूँगा, ना ही ब्रेड से साफ़ करूँगा, अगर इससे मम्मा को इतना गुस्सा आता है तो मैं ऐसा नहीं करूँगा. मैंने कहा:  “ठीक है, मम्मा. नहीं करूँगा. बचा रहने दो.”  “वैसे,” पापा ने कहा, “मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ...  “पूछो,” मम्मा ने कहा, “तुम तो छोटे बच्चे से भी ज़्यादा ख़तरनाक हो.”

 “नहीं, सही में,” पापा कहते रहे, “हमारे यहाँ, जानती हो, कभी कभी पार्टियाँ होती हैं, कई तरह के आयोजन होते हैं... तो: अगर मैं वहाँ से कोई चीज़ उठा लूँ? जैसे कोई सेब, या संतरा....”

 “पागल मत बनो!” मम्मा ने कहा.  “मगर क्यों?” पापा ने पूछा.  “इसलिए कि आज तुमने एक सेब उठा लिया, और कल को तुम अपनी बगल वाली जेब में सलाद घुसा लोगे!”  “हाँ,” पापा ने कहा और छत की ओर देखने लगे, “हाँ, कुछ लोग सोसाइटी के नियम बड़ी अच्छी तरह से जानते हैं! बिल्कुल प्रोफ़ेसर! हम कहाँ! ...और, तेरा क्या ख़याल है, डेनिस्का – पापा ने मेरा कंधा पकड़कर अपनी ओर घुमाया, “ तेरा क्या ख़याल है,” उन्होंने आवाज़ भी ऊँची कर ली, “अगर तुम्हारे यहाँ मेहमान आए हैं और अचानक उनमें से एक जाना चाहता है...तू क्या सोचता है, क्या घर की मेज़बान को उसे दरवाज़े तक छोड़ने जाना चाहिए और उसके साथ कॉरीडोर में बीस मिनट तक खड़ा रहना चाहिए?” मुझे मालूम नहीं था कि पापा को क्या जवाब दूँ. ज़ाहिर था कि उन्हें इसमें बेहद दिलचस्पी थी, क्योंकि उन्होंने मेरा कंधा बहुत कसके पकड़ा था, वो दर्द भी कर रहा था. मगर मैं नहीं जानता था कि उन्हें क्या जवाब दूँ. मगर, शायद, मम्मा को मालूम था, क्योंकि उसने कहा:  “अगर मैं उसे छोड़ने गई, तो इसका मतलब ये है कि ऐसा करना ज़रूरी था. मेहमानों का जितना ज़्यादा ख़याल रखा जाए, उतना अच्छा होता है.” अब पापा अचानक ठहाके लगाने लगे. जैसे कि पिस्सू वाले गाने में है:  “हा-हा-हा-हा-हा! हा-हा-हा-हा-हा! और मेरा ख़याल है कि अगर ये उसे छोड़ने नहीं जाएगी, तो वो मर नहीं जाएगा! हा-हा-हा-हा-हा!”

पापा ने अचानक अपने बाल खड़े कर लिए और कमरे में इधर-उधर यूँ घूमने लगे, जैसे पिंजरे में बन्द शेर हो. उनकी आँखें पूरे समय बाहर निकलने को हो रही थीं. अब तो वो हिचकियाँ ले लेकर हँस रहे थे: “हा-हा! र्र र्र! हा-हा! र्र!” उनकी ओर देखते हुए मैं भी ठहाका मारकर हँस पड़ा:  “बेशक, नहीं मरेगा! हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा!” 

तभी एक आश्चर्यजनक बात हुई. मम्मा उठकर खड़ी हो गई, उन्होंने मेज़ से कप उठाया, कमरे के बीचोंबीच आईं और उस कप को फर्श पर दे मारा. कप के हज़ारों टुकड़े हो गए. मैंने कहा:  “ये क्या है, मम्मा? तुमने ये क्यों किया?” मगर पापा बोले:  “कोई बात नहीं, कोई बात नहीं. ये खुशी के लिए होता है! चल, डेनिस्का, तैयार हो जा. जा अपने मीश्का के यहाँ, वर्ना देर हो जाएगी! जा और मछली चाकू से न खाना, परिवार को शर्मिन्दा न करना!” मैंने अपनी गिफ्ट्स उठाईं और मीश्का के यहाँ गया. हमने वहाँ ख़ूब मस्ती की. हम दीवान पर इतना ऊँचे-ऊँचे उछलते रहे कि बस छत से भिड़ने वाले थे. इस उछलकूद से मीश्का लाल हो गया. अपने परिवार को मैंने शर्मिन्दा नहीं किया, क्योंकि वहाँ न तो लंच था, न डिनर, बल्कि लेमन जूस और मिठाईयाँ थीं. हमने सारी मिठाईयाँ खा लीं, सारी चॉकलेट्स ख़त्म कर दीं, चॉकलेट्स का वो डिब्बा भी खा गए, जो मैं मीश्का के लिए लाया था. वैसे मीश्का को कई तरह के तोहफ़े मिले: ट्रेन थी, किताबें थीं, कलर-बॉक्स थे. मीशा की मम्मा ने कहा:  “ओह, कितने सारे तोहफ़े हैं मीशूक, तेरे पास! तुझे कौन सा तोहफ़ा सबसे ज़्यादा पसन्द आया?” ”ये क्या पूछने की बात हुई? बेशक, कलहँस की गर्दन!” और वो ख़ुशी से लाल हो गया. मुझे तो ये मालूम ही था.


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31.

सूरमा


 


जब लड़कों के ‘कोरस’ की रिहर्सल ख़तम हुई तो म्यूज़िक-टीचर बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा:  “अच्छा चलो, ये बताओ कि तुममें से किस-किसने मम्मा को आठ मार्च पर तोहफ़ा दिया था? चल, डेनिस, तू बता.”  “मैंने आठ मार्च को मम्मा को सुईयाँ रखने का छोटा सा कुशन दिया. ख़ूबसूरत. मेंढ़क जैसा. तीन दिनों तक सीता रहा, सारी ऊँगलियाँ लहुलुहान हो गईं. मैंने ऐसे दो कुशन्स बनाए.” मीश्का ने भी जोड़ा:  “हम सबने दो-दो सिए. एक मम्मा के लिए, और दूसरा – रईसा इवानव्ना के लिए.”  “ये सबने कुशन्स क्यों सिये?” बरीस सिर्गेयेविच  ने पूछा. “आपने क्या तय कर लिया था, कि सब लोग एक ही चीज़ बनाएँगे?”  “ओह, नहीं,” वालेर्का ने कहा, “ये तो हमारे ‘कुशल-हाथ’ ग्रुप में है – हम आजकल कुशन्स बनाना सीख रहे हैं. पहले हमने छोटे-छोटे शैतान बनाए, और अब छोटे-छोटे कुशन्स की बारी है.”  “ कैसे शैतान?” बरीस सिर्गेयेविच  चौंक गए. मैंने कहा:  “प्लास्टीसीन के. हमारे लीडर्स, आठवीं क्लास के वोलोद्या और तोल्या छह महीनों तक हमसे शैतान बनवाते रहे. जैसे ही आते, फ़ौरन कहते, “शैतान बनाओ!” तो, हम बनाते रहते, और वे शतरंज खेलते रहते.”  “पागल हो जाऊँगा,” बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा. “कुशन्स! इस बात पर गौर करना ही पड़ेगा! ठहरो!” और वो अचानक ठहाका मारकर हँस पड़े. “और तुम्हारी, पहली ‘बी’ क्लास में कितने लड़के हैं?”  “पन्द्रह,” मीश्का ने कहा, “और लड़कियाँ – पच्चीस.” अब तो बरीस सिर्गेयेविच  हँसते-हँसते लोट पोट हो गए. मैंने कहा:

 “हमारे देश में औरतों की आबादी आदमियों के मुक़ाबले में ज़्यादा है.” मगर बरीस सिर्गेयेविच  ने मेरी बात पर हाथ झटक दिया.  “मैं उस बारे में नहीं कह रहा हूँ. मुझे तो ये देखने में बड़ा मज़ा आएगा कि रईसा इवानव्ना को कैसे पन्द्रह कुशन्स का तोहफ़ा मिलता है! अच्छा, ठीक है, सुनो: तुममें से कौन अपनी मम्मा को पहली मई की मुबारकबाद देने वाला है?” अब हँसने की बारी हमारी थी. मैंने कहा:  “बरीस सिर्गेयेविच, आप शायद मज़ाक कर रहे हैं, बस, पहली मई की मुबारकबाद ही बाकी रह गई थी.”

“ बिल्कुल नहीं, यही तो गलत है, पहली मई की मुबारकबाद अपनी-अपनी मम्मा को देना ज़रूरी है. साल में सिर्फ एक बार मुबारकबाद देना -  ये बुरी बात है. और अगर हर त्यौहार मनाया जाए तो ये होगा सूरमाओं जैसा काम. कौन बताएगा कि सूरमा कौन होता है?” मैंने कहा:  “वो घोड़े पे होता है, फ़ौलादी ड्रेस में.” बरीस सिर्गेयेविच  ने सिर हिलाया.  “हाँ, ऐसा बहुत पहले होता था. और तुम लोग भी, जब बड़े हो जाओगे, तो सूरमाओं के बारे में बहुत सारी किताबें पढ़ोगे, मगर आज भी, अगर किसी के बारे में कहते हैं कि वो सूरमा है, तो इसका मतलब है कि वो बड़े दिल वाला है, साहसी है और भला इन्सान है. और मैं समझता हूँ कि हर ‘पायनियर’ को ज़रूर सूरमा होना चाहिए. जो यहाँ सूरमा है, अपना हाथ उठाए?” हम सब ने हाथ उठा दिए.  “मुझे मालूम ही था,” बरीस सिर्गेयेविच  ने कहा, “जाओ, सूरमाओं!” हम अपने-अपने घरों को चल पड़े. रास्ते में मीश्का ने कहा:  “ठीक है, मैं मम्मा के लिए चॉकलेट खरीद लेता हूँ, मेरे पास पैसे हैं.”

मैं घर आ गया, मगर घर में कोई नहीं था. मैं निराश हो गया. अब, जब सूरमा बनना चाहता हूँ, तो पैसे ही नहीं हैं! तभी, जैसे जले पर नमक छिड़कने मीश्का भागते हुए आया, हाथों में ख़ूबसूरत डिब्बा था, जिस पर लिखा था : ‘पहली मई’. मीश्का ने कहा: ”तैयार है, अब बाईस कोपेक में मैं सूरमा बन गया. और तू क्यों ऐसे बैठा है?”  “मीश्का, तू सूरमा है ना?” मैंने कहा.

 “बिल्कुल, सूरमा हूँ,” मीश्का ने कहा.  “तब मुझे पैसे उधार दे.” मीश्का दुखी हो गया:  “मैंने तो सारे पैसे खर्च कर दिए.”  “तो, अब क्या किया जाए?” ”ढूँढ़ना पड़ेगा,” मीश्का ने कहा, “बीस कोपेक का सिक्का तो छोटा सा होता है, हो सकता है कि एकाध कहीं पड़ा मिल जाए, चल ढूँढ़ते हैं.” और हमने पूरा कमरा छान मारा – दीवान के पीछे, अलमारी के नीचे, मैंने मम्मा के सारे जूते भी झटक के देख लिए, उसकी पावडर के डिब्बे में भी ऊँगली डालकर टटोल लिया. कहीं भी कुछ नहीं मिला. अचानक मीश्का ने खाने के बर्तनों वाली अलमारी खोली:  “रुक, ये क्या है?”  “कहाँ?” मैंने पूछा. “आह, ये बोतलें हैं. तुझे, क्या दिखाई नहीं दे रहा है? यहाँ दो तरह की वाईन्स हैं: एक बोतल में – काली, और दूसरी में – पीली. ये मेहमानों के लिए है, हमारे यहाँ कल मेहमान आ रहे हैं.” मीश्का ने कहा:  “ऐख, अगर तुम्हारे मेहमान कल आ जाते तो तेरे पास पैसे होते.”  “वो कैसे?”  “बोतलें,” मीश्का ने कहा, “हाँ, ख़ाली बोतलों के बदले में पैसे देते हैं. नुक्कड़ पे. वहाँ लिखा है काँच का सामान लिया जाता है! ”        “तूने पहले क्यों नहीं बताया! अब हम ये काम कर डालेंगे. ला इधर, वो फलों के जूस का डिब्बा दे, वहाँ खिड़की में रखा है.” मीश्का ने मेरी ओर डिब्बा बढ़ाया, और मैंने बोतल खोली और काली-लाल वाईन डिब्बे में उँडेल दी.  “राईट,” मीश्का ने कहा. “उसे कुछ नहीं होगा?...”  “बेशक, कुछ नहीं होगा,” मैंने कहा. “और दूसरी कहाँ डालूँ?”  “वहीं,” मीश्का ने कहा, “क्या सब एक ही नहीं है? ये भी वाईन है, और वो भी वाईन है.”  “हाँ, ठीक है,” मैंने कहा. “अगर एक वाईन होती, और दूसरा केरोसिन, तब ऐसा करना मना है, मगर इस हालत में, ये तो ज़्यादा अच्छा है. पकड़ डिब्बा.” और हमने दूसरी बोतल भी उसी में उँडेल दी. मैंने कहा:  “इसे खिड़की में रख दे! ठीक है. प्लेट से ढाँक दे, और चल, अब भागते हैं!”

हम दुकान में गए. इन दो बोतलों के बदले हमें चौबीस कोपेक मिले. मैंने मम्मा के लिए चॉकलेट खरीदा. मुझे दो कोपेक वापस भी मिले. मैं ख़ुशी-ख़ुशी घर वापस आया, क्योंकि मैं सूरमा बन गया था, और, जैसे ही मम्मा और पापा घर लौटे, मैंने कहा: “मम्मा, मैं सूरमा बन गया हूँ. बरीस सिर्गेयेविच ने हमें सिखाया था!”

मम्मा ने कहा:  “चल, पूरी बात बता!” मैंने बताया कि कल मैं मम्मा को सरप्राइज़ देने वाला हूँ. मम्मा ने कहा:  “मगर तुझे पैसे कहाँ से मिले?”  “मम्मा मैंने काँच का ख़ाली सामान बेच दिया. ये दो कोपेक वापस भी मिले.” अब पापा बोले:  “शाबाश! ये दो कोपेक मुझे दे दे, टेलिफोन-बूथ के लिए!” हम खाना खाने बैठे. फिर पापा कुर्सी की पीठ से टिक गए और मुस्कुराए:  “फलों का जूस होता तो मज़ा आ जाता.”

 “माफ़ करना, आज मैं ला नहीं पाई,” मम्मा ने कहा. मगर पापा मेरी ओर देखकर आँख मिचकाते हुए बोले:  “और ये क्या है? मैं बहुत दिनों से देख रहा हूँ.” और वो खिड़की की तरफ़ गए, प्लेट हटाई और सीधा डिब्बे से पीने लगे. मगर वहाँ क्या था! बेचारे पापा इस तरह खाँसने लगे, जैसे उन्होंने लौंगें पी ली हों. वो डरावनी आवाज़ में चिल्लाए:  “ये क्या है? ये कैसा ज़हर है?!”

मैंने कहा:  “पापा, घबराओ मत! ये ज़हर नहीं है. ये तुम्हारी दो वाईन्स हैं!” पापा कुछ लड़खड़ा गए और उनका चेहरा बदरंग हो गया.  “कौन सी दो वाईन्स?!” वो पहले से भी ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाए.  “काली और पीली,” मैंने कहा, “जो क्रॉकरी वाली अलमारी में थीं. पहली बात, तुम घबराओ मत.” पापा क्रॉकरी वाली अलमारी के पास भागे और उसका दरवाज़ा खोल दिया. फिर वो आँखें झपकाने लगे और अपना सीना सहलाने लगे. उन्होंने मेरी तरफ़ इतने आश्चर्य से देखा जैसे मैं कोई साधारण बच्चा नहीं, बल्कि नीले रंग का हूँ या मेरे मुँह पर धब्बे हैं. मैंने कहा:  “क्या पापा, तुम्हें आश्चर्य हो रहा है? मैंने तुम्हारी दोनों वाईन्स डिब्बे में उँडेल दीं, वर्ना मुझे ख़ाली बोतलें कहाँ से मिलतीं? ख़ुद ही सोचो!” मम्मा चीख़ी, “ओय!” और वो दीवान लुढ़क गई. वो हँसने लगी, मगर इतनी ज़ोर से कि मुझे लगा कि उसकी तबियत बिगड़ जाएगी. मैं कुछ भी नहीं समझ पा रहा था, मगर पापा चिल्लाए:  “हँस रही हो? ठीक है, हँसो, हँसो! और हँसो! मगर तुम्हारा ये सूरमा मुझे पागल बना देगा, मैं अभी इसकी धुनाई करता हूँ, जिससे कि वो हमेशा के लिए अपने सूरमाई कारनामे भूल जाए.” और पापा ऐसा दिखाने लगे, जैसे चाबुक ढूँढ़ रहे हों.  “कहाँ है वो? ज़रा मेरे पास लाना इस आयवेंगो को! कहाँ ग़ायब हो गया?” मैं अलमारी के पीछे था. मैं तो कब से वहाँ छुप गया था, न जाने कब क्या हो जाए. और पापा बड़े गुस्से में थे. वो चीख़ रहे थे:  “कहीं ऐसा सुना है कि सन् 1954 की ब्लैक ‘मुस्कात’ को डिब्बे में उण्डॆल दो और उसमें झिगुली की बियर मिला दो?!” मम्मा हँसते-हँसते बेहाल हो रही थी. उसने बड़े मुश्किल से कहा:  “मगर ये उसने....अच्छे इरादे से...आख़िर, वो...सूरमा...मैं हँसी के मारे मर रही हूँ.” और वो हँसती रही. पापा कुछ देर और कमरे में घूमते रहे और फिर अचानक मम्मा की ओर बढ़े. उन्होंने कहा: ”तुम्हारी हँसी मुझे कितनी पसन्द है!” और उन्होंने झुककर मम्मा को ‘किस’ कर लिया. तब मैं आराम से अलमारी के पीछे से निकल आया. 

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32

वंडरफुल आइडिया                                                       

 


क्लासेज़ ख़त्म होने के बाद मैंने और मीश्का ने अपना-अपना बैग उठाया और घर जाने लगे. सड़क गीली, कीचड़ से भरी, मगर ख़ुशनुमा थी. अभी-अभी भारी बारिश हुई थी, और डामर ऐसे चमक रहा था जैसे नया हो, हवा ताज़गी भरी और साफ़-सुथरी थी, पानी के डबरों में घरों की और आसमान की परछाई पड़ रही थी, और अगर कोई पहाड़ी की तरफ़ से उतरे, तो किनारे पे, फुटपाथ के पास, गरजते हुए पानी की बड़ी भारी धार बह रही थी, मानो पहाड़ी नदी हो. ख़ूबसूरत धार - भूरी, उसमें बवण्डर थे, भँवर थे, तेज़ लहरें थीं. सड़क के कोने पे, ज़मीन में एक जाली बनाई गई थी, और यहाँ पानी पूरी तरह से बेक़ाबू हो रहा था, वह नाच रहा था और फ़ेन उगल रहा था, कलकल कर रहा था, जैसे सर्कस का म्यूज़िक हो, या, फिर इस तरह बुदबुदा रहा था जैसे फ़्रायपैन में तला जा रहा हो. आह, कितना ख़ूबसूरत...

मीश्का ने जैसे ही ये सब देखा, फ़ौरन जेब से माचिस की डिबिया निकाल ली. मैंने पाल बनाने के लिए उसे डिबिया से दियासलाई निकाल कर दी, कागज़ का टुकड़ा दिया, हमने पाल बनाया और ये सब माचिस की डिबिया में घुसा दिया. फ़ौरन एक छोटा सा जहाज़ बन गया. हमने उसे पानी में छोड़ा, और वह फ़ौरन तूफ़ानी गति से चल पड़ा. वह इधर उधर हिचकोले खा रहा था, लहरें उसे थपेड़े लगा रही थीं, वह उछलता और आगे चल पड़ता, कभी कुछ देर ठहर जाता और कभी एकदम सौ नॉटिकल माईल्स की गति से भागने लगता. हमने फ़ौरन कमाण्ड्स देना शुरू कर दिया, क्योंकि अचानक ही हम कैप्टन और नेवीगेटर बन गए थे – मैं और मीश्का. जब जहाज़ उथली जगह पर ठहर जाता तो हम चिल्लाते: 

 -पीछे चल – चुख़-चुख़-चुख़!                                 

 - पूरी तरह पीछे – चुख़-चुख़-चुख़! 

 - एकदम पूरी तरह पीछे – चुख़-चुख़-चुख़-चाख़-चाख़-चाख़!

और मैं ऊँगली से जहाज़ को जिधर चाहे उधर मोड़ता, और मीश्का गरजता :  

 - स्टार्ट! ऊह – दब रहा है! ये ठीक है! पूरा आगे! चुख़-चुख़-चुख़! इस तरह बदहवास चीख़ें निकालते हुए हम पागलों की तरह जहाज़ के पीछे-पीछे भाग रहे थे और भागते-भागते हम कोने तक पहुँचे, जहाँ जाली लगी थी, और अचानक हमारा जहाज़ पलट गया, भँवर में गोते लगाने लगा, और देखते-देखते नाक के बल उलट गया, टकराया और जाली में गिर गया.

मीश्का ने कहा:  “अफ़सोस की बात है. डूब गया...” और मैंने कहा:  “हाँ, उफ़नता सैलाब उसे निगल गया. चल, नया जहाज़ छोडेंगे?” मगर मीश्का ने सिर हिलाते हुए कहा:  “संभव नहीं है. आज मुझे देर से घर पहुँचना मना है. आज पापा की ड्यूटी है.”

मैंने कहा:  “किस बात की?”  “उनकी बारी है,” मीश्का ने जवाब दिया.  “नहीं,” मैंने कहा, “तू समझा नहीं. मैं पूछ रहा हूँ, कि तेरे पापा की किस काम की ड्यूटी है? किस काम की? सफ़ाई करने की? या मेज़ सजाने की?”  “मेरे हिसाब से,” मीश्का ने कहा, “पापा की ड्यूटी मेरे साथ लगी है. उन्होंने और मम्मा ने इस तरह से अपनी-अपनी बारी लगाई है: एक दिन मम्मा, दूसरे दिन पापा. आज पापा की बारी है. कहीं मुझे खाना खिलाने के लिए ऑफ़िस से न आ गए हों, और ख़ुद जल्दी मचाते हैं, उन्हें वापस भी तो जाना होता है ना!” ”मीश्का, तू भी ना, इन्सान नहीं है!” तुझे ख़ुद अपने पापा को खाना खिलाना चाहिए, और यहाँ तो एक ‘बिज़ी’ आदमी काम से आता है ऐसे ठस दिमाग़ को खाना खिलाने! तू आठ साल का हो गया है! दूल्हे मियाँ!”  “मम्मा को मुझ पर विश्वास ही नहीं होता. तू ऐसा मत सोच,” मीश्का ने कहा. “मैं घर में मदद तो करता हूँ, अभी पिछले ही हफ़्ते मैं उनके लिए ब्रेड लाया था...”  “उनके लिए!” मैंने कहा. “उनके लिए! ज़रा देखिए, वो खाते हैं, और हमारा मीशेन्का सिर्फ हवा खाकर ही ज़िन्दा रहता है! ऐह, तू भी ना!” मीश्का लाल हो गया और बोला:  “चल, अपने-अपने घर जाएँगे!” हमने अपनी चाल तेज़ कर दी. जब हम अपने-अपने घर की तरफ़ आने लगे तो मीश्का ने कहा:  “हर रोज़ मैं अपना फ्लैट नहीं पहचान पाता. सभी बिल्डिंगें बिल्कुल एक जैसी हैं, बहुत उलझन होती है. क्या तू पहचान जाता है?”  “नहीं, मैं भी नहीं पहचान पाता,” मैंने कहा, “अपनी बिल्डिंग का एंट्रेन्स ही नहीं पहचान पाता. ये हरा है, वो भी हरा है, सब हरे हैं...सब एक जैसे हैं, सब नये-नये हैं, और बालकनियाँ भी बिल्कुल एक जैसी हैं. सिर्फ मुसीबत.”  “तो फिर तू क्या करता है?” मीश्का ने पूछा.  “इंतज़ार करता हूँ, जब तक मम्मा बालकनी में नहीं आ जाती.”  “वो तो कोई और मम्मा भी बालकनी में आ सकती है! तू दूसरी के यहाँ भी जा सकता है...”  “क्या कह रहा है तू,” मैंने कहा, “मैं तो हज़ारों अनजान मम्माओं में से अपनी मम्मा को पहचान लूँगा.”  “कैसे” मीश्का ने पूछा.  “चेहरे से,” मैंने जवाब दिया.  “पिछली पेरेन्ट्स मीटिंग में सारे पेरेंट्स आए थे, और कोस्तिकव की दादी मेरे पापा के साथ जा रही थी,” मीश्का ने कहा, “तो, कोस्तिकव की दादी ने कहा कि क्लास में तेरी मम्मा सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है.”  “बकवास,” मैंने कहा, “तेरी मम्मा भी ख़ूबसूरत है!”  “बेशक,” मीश्का ने कहा, “मगर कोस्तिकव की दादी ने कहा कि तेरी मम्मा सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है.”  अब हम बिल्कुल अपनी बिल्डिंग्स तक पहुँच गए. मीश्का परेशानी से इधर-उधर देखने लगा और घबराने लगा, मगर तभी कोई एक दादी-माँ हमारे पास आई और बोली: 

 “ओह, ये तुम हो, मीशेन्का? क्या हुआ? मालूम नहीं है कि कहाँ रहते हो, हाँ? हमेशा की प्रॉब्लेम. ठीक है, चल, मैं तेरी पड़ोसन हूँ, घर तक ले जाऊँगी. उसने मीश्का का हाथ पकड़ा, और मुझसे बोली:  “हम एक ही फ्लोर पे रहते हैं.” और वो लोग चले गए. मीश्का ख़ुशी-ख़ुशी उसके साथ जा रहा था. मगर मैं अकेला रह गया बेनाम की इन एक जैसी गलियों में, बिना नंबरों वाली बिल्डिंग्स के बीच में और बिल्कुल भी सोच नहीं पा रहा था कि जाऊँ तो किधर जाऊँ, मगर मैंने तय कर लिया कि हिम्मत नहीं हारूँगा और मैं पहली ही बिल्डिंग की सीढ़ियाँ चढ़कर चौथी मंज़िल पर पहुँच गया. ये बिल्डिंगें तो कुल अठारह ही हैं, तो, अगर मैं सभी बिल्डिंगों की चौथी मंज़िल पर गया, तो घण्टे-दो घण्टे में अपने घर ज़रूर पहुँच जाऊँगा, ये पक्की बात है. हमारी सभी बिल्डिंग्स में, हर दरवाज़े पर, बाईं ओर लाल बटन वाली घंटी लगी है. तो, मैं चौथी मंज़िल पर पहुँचा और मैंने घण्टी का बटन दबाया. दरवाज़ा खुला, उसमें से लम्बी, मुड़ी हुई नाक बाहर निकली और दरवाज़े की दरार से चीख़ी: “रद्दी पेपर नहीं हैं! कितनी बार बताऊँ!” मैंने कहा, “सॉरी” और नीचे उतरा. हो गई गलती, क्या कर सकते हैं. फिर मैं अगली बिल्डिंग में घुसा. मैं घण्टी बजा भी नहीं पाया था कि दरवाज़े के पीछे से कोई कुत्ता इतनी भयानक, भर्राई हुई आवाज़ में भौंका कि मैं उस शिकारी कुत्ते के झपटने का इंतज़ार किए बगैर फ़ौरन भाग कर नीचे आ गया. अगली बिल्डिंग में, चौथी मंज़िल पर, एक लम्बी लड़की ने दरवाज़ा खोला और मुझे देखकर ख़ुशी से तालियाँ बजाते हुए चिल्लाने लगी:  “वलोद्या! पापा! मरीया  सिम्योनव्ना! साशा! सब लोग यहाँ आओ! छठवाँ!” कमरों से लोगों का एक झुण्ड बाहर आ गया, वो सब मेरी तरफ़ देख रहे थे, और ठहाके लगा रहे थे, तालियाँ बजा रहे थे, और गा रहे थे:  “छठवाँ! ओय-ओय! छठवाँ! छठवाँ!...” मैं आँखें फ़ाड़कर उनकी ओर देख रहा था. क्या पागल हैं? मैं बुरा मान गया: यहाँ तो भूख लगी है, और पैर दर्द कर रहे हैं, और घर के बदले अनजान लोगों के बीच पहुँच गया, और वो मुझ पर हंस रहे हैं...  मगर वह लड़की, ज़ाहिर था कि, समझ गई थी, कि मुझे अच्छा नहीं लग रहा है. 

 “तुम्हारा नाम क्या है?” उसने पूछा और मेरे सामने पालथी मारकर बैठ गई, वह अपनी नीली-नीली आँखों से मेरी आँखों में देख रही थी.  “डेनिस,” मैंने जवाब दिया. उसने कहा: “तू बुरा न मान, डेनिस! सिर्फ, आज तू छठवाँ बच्चा है जो हमारे यहाँ आ गया. वो सब भी भटक गए थे. ये ले, तेरे लिए, एपल, खा ले, तेरी ताक़त वापस आ जाएगी.” मैं एपल नहीं ले रहा था.  “ले ले, प्लीज़,” उसने कहा, “मेरी ख़ातिर. मुझ पर मेहरबानी कर.”  “सुन,” लड़की ने कहा, “मुझे ऐसा लगता है कि मैंने तुझे हमारे सामने वाली बिल्डिंग से निकलते हुए देखा है. तू एक बेहद ख़ूबसूरत औरत के साथ निकला था. वो तेरी मम्मा है?”  “बेशक,” मैंने कहा, “मेरी मम्मा क्लास में सबसे ज़्यादा ख़ूबसूरत है.” अब सब लोग फिर से हँस पड़े. बिना किसी वजह के. मगर लड़की ने कहा: “चल, तू भाग. अगर चाहे, तो हमारे यहाँ आया करना.” मैंने ‘थैंक्यू’ कहा और उस लम्बी लड़की ने जिधर इशारा किया था, उस तरफ़ भागा. मैं घण्टी का बटन दबा भी नहीं पाया था कि दरवाज़ा खुल गया, और देहलीज़ पर खड़ी थी – मेरी मम्मा! उसने कहा:  “हमेशा तेरा इंतज़ार करना पड़ता है!” मैंने कहा: “भयानक स्टोरी है! मेरे पैर दुख रहे हैं, क्योंकि मैं अपनी बिल्डिंग नहीं ढूँढ़ पा रहा था. मुझे मालूम ही नहीं है कि हमारी बिल्डिंग कौन सी है, सारी बिल्डिंगें बिल्कुल एक जैसी जो हैं. मीश्का के साथ भी ऐसा ही हुआ! कोई भी अपनी बिल्डिंग नहीं ढूँढ पाता है! मैं आज का छठवाँ बच्चा था...और, मुझे भूख लगी है!” और मैंने मम्मा को रद्दी पेपर वाली टेढ़ी नाक के बारे में, गुर्राते हुए खूँखार कुत्ते के बारे में और लम्बी लड़की और एपल के बारे में बताया.  “तेरे लिए कोई निशान बनाना चाहिए,” पापा ने कहा, “जिससे की तू अपनी बिल्डिंग पहचान ले.

मैं बहुत ख़ुश हो गया:  “पापा! मैंने सोच लिया! प्लीज़, हमारी बिल्डिंग पे मम्मा की तस्वीर लगा दो! मुझे दूर से ही पता चल जाएगा कि मैं कहाँ रहता हूँ!” मम्मा हँसने लगी और बोली:  “चल, बेकार की बात न सोच!” मगर  पापा ने कहा:  “आख़िर क्यों नहीं? एकदम वण्डरफुल आइडिया है!” 


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33.

क्सेनिया - मेरी बहना!

 


एक बार, एक आम तरह का ही दिन था. मैं स्कूल से आया, थोड़ा सा खाया और खिड़की की सिल पर चढ़ गया. बहुत दिनों से मेरा दिल खिड़की के पास बैठने, आने जाने वालों को देखने और ख़ुद कुछ भी न करने को चाह रहा था. इस समय इस बात के लिए एकदम सही मौक़ा था. और, मैं खिड़की की सिल पर बैठ गया, और ख़ुद निठल्लापन करने लगा. इसी समय पापा उड़ते हुए कमरे में आए. उन्होंने कहा:  “ ‘बोर’ हो रहा है?”

मैंने जवाब दिया:  “ओह, नहीं...बस यूँ ही...और, मम्मा आख़िर कब आएगी? पूरे दस दिनों से घर पे नहीं है!” पापा ने कहा:  “खिड़की पकड़! कस के पकड़, वर्ना सिर के बल उड़ने लगेगा.” मैंने सावधानी के लिए खिड़की की फ्रेम कस के पकड़ ली और कहा:  “क्या बात है?” वो एक कदम पीछे हटे, जेब से कोई कागज़ निकाला, उसे दूर से ही दिखाया और बोले:  “एक घण्टे बाद मम्मा आ रही है! ये रहा टेलिग्राम! तुझे बताने के लिए मैं सीधा काम से भागा भागा आया! खाना नहीं खाएँगे, सब एक साथ ही खाएँगे, मैं उसे रिसीव करने जा रहा हूँ, और तू कमरा ठीक-ठाक करके हमारा इंतज़ार कर! डन?”

मैं फ़ौरन खिड़की से कूदा:  “अफ़कोर्स, डन! हुर्रे! भागो, पापा, बुलेट की स्पीड़ से भागो, और मैं ये कर लेता हूँ! बस एक मिनट – और सब तैयार! चकाचक कर देता हूँ! भागो, टाइम मत वेस्ट करो, मम्मा को जल्दी ले आओ!”

पापा दरवाज़े की तरफ़ लपके. और, मैं काम पे लग गया. मेरा इमर्जेन्सी-जॉब शुरू हो गया, जैसे समन्दर में जा रहे जहाज़ पर होता है. इमर्जेन्सी-जॉब – ये डेक को चकाचक करने का काम होता है, और यहाँ तो मौसम शांत है, लहरों पर ख़ामोशी है – इसे निर्वात समय कहते हैं, और हम, नाविक, अपना काम करते रहते हैं.

“वन, टू! शिर्क-शार्क! कुर्सियाँ अपनी अपनी जगह पे! चुपचाप खड़े रहो! झाडू-वाडू! झाडू लगाएगा – फ़ौरन! कॉम्रेड फ़र्श, ये कैसे दिखाई दे रहे हो? चमको! अभ्भी! ऐसे! खाना! मेरी कमाण्ड सुनो! गैस पर, “प्लेटून” दाईं ओर से एक-एक, कड़ाही के पीछे भगौना – खड़े रहो! वन-टू! गाना गाएगा:  

पापा सिर्फ तीली से करेंगे  चिर्क! और आग फ़ौरन जलेगी 

फ़िर्क! 

गरम होते रहो! ऐसे. देखा, मैंने कैसा बढ़िया काम किया! असिस्टेंट! ऐसे बच्चे पर गर्व होना चाहिए! जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, तब पता है मैं क्या बनूंगा? मैं बनूंगा – ओहो! मैं ओहो-हो भी बनूंगा! ओहोहूहाहो! वो बनूंगा मैं!  मैं खूब देर तक खेलता रहा और जम कर अपनी तारीफ़ करता रहा, जिससे कि मम्मा और पापा का इंतज़ार ‘बोरिंग’ न लगे. आख़िर में दरवाज़ा धड़ाम से खुला, और उसमें फिर से पापा उड़ते हुए अन्दर आए! वो आ गए थे और बेहद उत्तेजित थे, सिर की हैट पीछे खिसक गई थी! वो अकेले ही पूरे ब्रास-बैण्ड ऑर्केस्ट्रा जैसे हो रहे थे, और साथ ही ऑर्केस्ट्रा के डाइरेक्टर भी! पापा हाथ हिला रहे थे. “ज़ूम-ज़ूम!” पापा चिल्लाए, और मैं समझ गया कि मम्मा के आने की ख़ुशी में ये बड़े बड़े बिगुल बज रहे हैं. “पीख़-पीख़! तांबे की तश्तरियाँ झनझना रही थीं.                      

 इसके बाद कोई बिल्लियों जैसा म्यूज़िक शुरू हो गया. सौ आदमियों का कोरस चिल्लाने लगा. इन सौ आदमियों के लिए पापा अकेले गा रहे थे, मगर चूँकि पापा के पीछे दरवाज़ा खुला था, मैं बाहर कॉरीडोर में भागा, जिससे कि मम्मा से मिल सकूँ. वह हाथों में एक बण्डल लिए हैंगर के पास खड़ी थी. जब उसने मुझे देखा, तो वह प्यार से मुस्कुराई और हौले से बोली:  “हैलो, मेरे बच्चे! मेरे बिना तुम कैसे रहे?” मैंने कहा:  “मैंने तुम्हें बहुत ‘मिस’ किया.” मम्मा ने कहा:  “और, मैं तुम्हारे लिए एक सरप्राइज़ लाई हूँ!” मैंने कहा:  “एरोप्लेन?” 

मम्मा ने कहा: ”देखो तो सही!”

हम बहुत धीमे से बात कर रहे थे. मम्मा ने बण्डल मेरी तरफ़ बढ़ाया. मैंने उसे ले लिया. 


 


 “ये क्या है, मम्मा?” मैंने पूछा.  “ये तेरी बहन क्सेनिया है,” उसी तरह धीमे से मम्मा ने कहा. मैं चुप रहा. तब मम्मा ने लेस वाला रूमाल हटाया, और मैंने अपनी बहन का चेहरा देखा.   ये छोSSSटा सा चेहरा था, और उसके ऊपर कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा था. मैंने उसे पूरी ताक़त से हाथों में पकड़ा.  “ज़ूम-बूम-त्रूम,” अचानक कमरे से मेरी बगल में पापा प्रकट हुए. उनका ऑर्केस्ट्रा अभी भी गरज रहा था. 

 “अटेन्शन,” पापा ने अनाऊन्सर की आवाज़ में कहा, “छोटे बच्चे डेनिस्का को छोटी-सी बहना क्सेनिया इनाम में दी जाती है. पंजों से सिर तक की लम्बाई पचास सेंटीमीटर्स, सिर से एड़ियों तक – पचपन! वज़न तीन किलो दो सौ पचास ग्राम्स, पैकेजिंग को छोड़कर. 

वो मेरे सामने पालथी मार के बैठ गए और मेरे हाथों के नीचे अपने हाथ लगा दिए, शायद, डर रहे थे, कि मैं क्सेनिया को गिरा दूँगा. उन्होंने मम्मा से अपनी नॉर्मल आवाज़ में पूछा:  “और, ये किसके जैसी है?”  “तुम्हारे जैसी,” मम्मा ने कहा.  “ओह, नो!” पापा चहके. “अपने स्कार्फ़ में ये हमारी रिपब्लिक की ख़ूबसूरत फ़ोक-आर्टिस्ट कर्चागिना-अलेक्सान्द्रोव्स्काया जैसी लग रही है, जिसे अपनी जवानी में मैं बहुत पसन्द करता था. अक्सर मैंने देखा है, कि अपनी ज़िन्दगी के आरंभ के कुछ दिनों में सभी छोटे बच्चे प्रसिद्ध आर्टिस्ट कर्चागिना-अलेक्सान्द्रोव्स्काया जैसे लगते हैं. ख़ासकर नाक तो बेहद मिलती-जुलती है. 

नाक तो एकदम निगाहों में भर जाती है.”

मैं अपनी बहन क्सेनिया को हाथों में लिए खड़ा ही रहा, जैसे बेवकूफ़ लिखे हुए झोले को लटकाए चलता है, और मुस्कुरा रहा था. मम्मा उत्तेजना से बोली:  “होशियारी से, प्लीज़, डेनिस, गिरा न देना.” मैंने कहा:  “क्या कहती हो, मम्मा? परेशान न हो! मैं बच्चों की पूरी साइकिल एक, बाएँ, हाथ में पकड़ लेता हूँ, क्या मैं इत्ती छोटी सी चीज़ को गिरा दूँगा?”

पापा ने कहा:  “शाम को इसे नहलाएँगे! तैयार रहना!” उन्होंने मेरे हाथों से बण्डल ले लिया, जिसमें क्सेनिया लिपटी थी, और चल पड़े. मैं भी उनके पीछे-पीछे चलने लगा, और मेरे पीछे – मम्मा. हमने क्सेनिया को अलमारी की बाहर निकली हुई दराज़ में सुला दिया, और वह आराम से वहाँ पड़ी रही. पापा ने कहा:  “ये सिर्फ अभी के लिए, एक रात के लिए है. कल मैं इसके लिए छोटा सा पलंग ख़रीदूँगा, और वह पलंग पे सोया करेगी. और तू, डेनिस, चाभियों पर नज़र रख, जिससे कोई तेरी छोटी सी बहना को अलमारी में बन्द न कर दे. वर्ना बाद में ढूँढ़ते रहेंगे कि वो कहाँ चली गई...” और, हम खाना खाने बैठे. मैं हर एक मिनट बाद उछल कर क्सेनिया को देख लेता. वह पूरे समय सोती रही. मुझे अचरज हुआ, और मैंने ऊँगली से उसका गाल छू लिया. गाल नरम-नरम था, बिल्कुल मक्खन  जैसा. अब, जब मैंने ध्यान से उसे देखा, तो पाया कि उसकी लम्बी-लम्बी काली पलकें हैं....

शाम को हम उसे नहलाने लगे. हमने पापा की मेज़ पर छोटा सा पाइप वाला टब रखा और वहाँ कई सारे गरम और ठण्डे पानी से भरे बर्तन ले आए. क्सेनिया अपने ड्रावर में लेटी रही और नहाने का इंतज़ार करती रही. वो, ज़ाहिर है, परेशान हो रही थी, क्योंकि ड्रावर चरमरा रहा था, दरवाज़े की तरह, और पापा, उल्टे, पूरे समय उसका मूड ठीक रखने की कोशिश कर रहे थे, जिससे कि वह ज़्यादा डरे नहीं. पापा इधर उधर पानी और तौलिए लिए घूम रहे थे, उन्होंने अपनी जैकेट उतारी, आस्तीनें चढ़ा लीं और ख़ुशामद करते हुए ज़ोर से चिल्लाए:  “हमारे घर में सबसे बढ़िया कौन तैरता है? कौन सबसे बढ़िया गोते लगाता है? कौन सबसे बढ़िया बबल्स बनाता है?” 

और, क्सेनिया का चेहरा ऐसा था, कि वही सबसे बढ़िया गोते लगाती है – पापा की ख़ुशामद काम कर गई. मगर जब उसे नहलाने लगे, तो उसके चेहरे पर इतना डर छा गया, कि देखो, भले आदमियों: सगे माँ-बाप अपनी बेटी को डुबा रहे हैं, और उसने एडी से टटोलते हुए टब की तली पा ली, उस पर एड़ी टिका ली और तभी कुछ शांत हुई, चेहरा कुछ सामान्य हुआ, अब वो इतना दुखी नहीं लग रहा था, और उसने अपने ऊपर पानी डालने दिया, मगर फिर भी उसके मन में शक ही था, अचानक पापा ने उसे थोड़ा सा पानी में डुबाया, उसका दम घुटने लगा...मैं फ़ौरन मम्मा की कुहनी के नीचे से निकला और क्सेनिया को अपनी ऊँगली थमा दी, और, ज़ाहिर है, मैं समझ गया था और मैंने वही किया जो करना चाहिए था, उसने मेरी ऊँगली पकड ली और पूरी तरह शांत हो गई. बच्ची ने इतनी बदहवासी से, इतनी कस कर मेरी ऊँगली पकड़ ली, जैसे डूबता हुआ इन्सान तिनके को पकड़ता है. और, मुझे उस पर दया आई, कि वह मेरा ही सहारा ले रही है, अपनी चिड़ियों जैसी ऊँगलियों की पूरी ताक़त से मुझे पकड़े हुए है, और इन ऊँगलियों से साफ़ महसूस हो रहा है कि अपनी बेशकीमती ज़िन्दगी के लिए वह अकेले मुझ पर ही भरोसा कर रही है और यह, कि ईमानदारी से कहूँ तो, ये सब नहाना-वहाना उसके लिए दुखदायी है, डरावना है, और ख़तरनाक है, और धमकीभरा है, और उसे ख़ुद को बचाना चाहिए: अपने ताक़तवर और बहादुर, बड़े भाई की ऊँगली थाम लेना चाहिए. और जब मैं ये सारी बात समझ गया, जब मैं समझ गया कि उस बेचारी को कितनी मुश्किल हो रही है, कितना डर लग रहा है, तो मैं फ़ौरन उससे प्यार करने लगा. 


*********






34.

झूठ खुल ही जाता है!


मैंने सुना कि मम्मी कॉरीडोर में किसीसे कह रही थी:

 “...झूठ हमेशा खुल ही जाता है.’

और जब वह अन्दर कमरे में आई तो मैंने पूछा:

 “मम्मी, इसका क्या मतलब है कि “झूठ हमेशा खुल ही जाता है?”

 “इसका मतलब ये है कि अगर कोई बेईमानी करता है, तो कभी न कभी इस बारे में पता चल ही जाता है, और तब उसे शर्मिन्दा होना पड़ता है, और उसे सज़ा मिलती है,..” मम्मी ने कहा. “समझ गए?...चल, सो जा!”

मैंने दाँतों पे ब्रश किया, लेट गया, मगर सोया नहीं, बल्कि पूरे समय सोचता रहा, ‘ऐसा कैसे होता है कि झूठ खुल जाता है?’ और मैं बड़ी देर तक नहीं सोया, मगर जब आँख खुली तो सुबह हो चुकी थी, पापा काम पर जा चुके थे, और मैं और मम्मी अकेले थे. मैंने फिर से दाँत ब्रश किए और नाश्ता करने लगा.

पहले मैंने अंडा खाया. ये तो फिर भी बर्दाश्त हो गया क्योंकि मैंने सिर्फ उसकी ज़र्दी बाहर निकाल ली और छिलके समेत सफ़ेदी के इतने बारीक बारीक टुकड़े कर दिए कि वह दिखे ही नहीं. मगर इसके बाद मम्मी पूरी प्लेट भरके सूजी का पॉरिज लाई.

 “ये भी है!” उसने कहा “बिना बहस किए!”

मैंने कहा:

”बर्दाश्त नहीं कर सकता ये सूजी का पॉरिज!”

मगर मम्मी चिल्लाने लगी:

 “देख, तू किसके जैसा हो गया है! बिल्कुल दुबले-पतले खूसट बूढ़े जैसा! खा. तुझे अपनी सेहत बनानी होगी.”

मैंने कहा:

 “वो मेरे गले में अटक जाता है!...”

तब मम्मी मेरी बगल में बैठ गई, कंधे पकड़ कर मुझे सीने से लगाया और बड़े प्यार से पूछा:

 “क्रेमलिन जाना चाहते हो? चलो, हम-तुम जाएंगे?”

वाह, क्या बात है...क्रेमलिन से ज़्यादा ख़ूबसूरत कोई और जगह मुझे मालूम ही नहीं है. मैं वहाँ हथियारों वाले हॉल में गया था, त्सार-तोप के पास खड़ा था, और मुझे यह भी मालूम है कि ईवान-ग्रोज़्नी कहाँ बैठता था. वहाँ और भी मज़ेदार चीज़ें हैं. इसलिए मैंने मम्मी को फ़ौरन जवाब दिया:

 “बेशक, क्रेमलिन जाना चाहता हूँ! बहुत जाना चाहता हूँ!”

तब मम्मी मुस्कुराई:

 “तो, पहले ये पूरी पॉरिज ख़त्म कर ले, फिर जाएँगे. तब तक मैं थोड़े बर्तन धो लेती हूँ. इतना याद रख – तुझे पूरा का पूरा खाना है!”

और मम्मी किचन में चली गईं.

मैं पॉरिज के साथ अकेला रह गया. मैंने उसे चम्मच से हिलाया. फिर उसमें नमक डाला. चख के देखा – ओह, खाना नामुमकिन है! तब मैंने सोचा, कि, हो सकता है, इसमें शकर कम हो गई हो? शक्कर छिड़क दी, चखा...अब तो ये और भी बुरा हो गया. मुझे तो पॉरिज अच्छा ही नहीं लगता, मैं कहता तो हूँ. ऊपर से वह इतना गाढ़ा था. अगर वह थोड़ा पतला होता, तो दूसरी बात थी, मैं आँखें बन्द करके पी जाता. अब मैंने पॉरिज में गरम पानी डाल दिया. फिर भी वह चिपचिपा, फिसलन भरा और बेहद बुरा ही रहा, उलटी आ रही थी. ख़ास बात ये थी कि जब उसे मैं निगल रहा हूँ तो मेरा गला जैसे सिकुड़ रहा है और पॉरिज को बाहर धकेल रहा है. ख़तरनाक, अपमानजनक! मगर क्रेमलिन तो जाना है ना! और तब मुझे याद आया कि हमारे यहाँ मूली का अचार है. ऐसा लगता है कि मूली के अचार के साथ हर चीज़ खाई जा सकती है! मैंने अचार का पूरा डिब्बा पॉरिज में उंडेल दिया, मगर जब मैंने थोड़ा सा चखा तो मेरी आँखें मानो ऊपर चली गईं, साँस रुक गई, और मैं, शायद, अपने होश खो बैठा, क्योंकि मैंने प्लेट उठाई, जल्दी से खिड़की के पास भागा और पॉरिज को रास्ते पर फेंक दिया. फिर फ़ौरन वापस आकर मेज़ पर बैठ गया.



 



तभी मम्मी आ गई. उसने प्लेट की ओर देखा और ख़ुश हो गई:

“ओह, डेनिस, प्यारा डेनिस, अच्छा बच्चा डेनिस! पूरी पॉरिज ख़तम कर ली! तो, उठ, कपड़े पहन, वर्किंग मैन, हम क्रेमलिन घूमने जाएंगे!” – और उसने मेरी पप्पी ली.


तभी दरवाज़ा खुला और कमरे में पुलिस वाला आया. उसने कहा:

 “नमस्ते!” और उसने खिड़की के पास जाकर नीचे देखा. – “ और ये पढ़े लिखे लोग हैं.”

 “आपको क्या चाहिए?” मम्मी ने सख़्ती से पूछा.

 “शर्म आनी चाहिए!” पुलिस वाला ‘अटेंशन’ में खड़ा था. “सरकार आपको नया घर देती है, सारी सुविधाओं के साथ और, साथ ही कूड़ा डालने की पाईप भी देती है. और आप हैं कि हर तरह की गन्दगी खिड़की से बाहर फेंकते हैं!”

 “इलज़ाम मत लगाइये. मैं कुछ भी नहीं फेंकती!”

 “ आह, नहीं फेंकती हैं?!” पुलिस वाले ने ज़हरीली हँसी से कहा. और कॉरीडोर वाला दरवाज़ा खोलकर चिल्लाया: “पीड़ित व्यक्ति!”


और कोई अंकल हमारे घर में घुसा.


 


जैसे ही मैंने उसकी ओर देखा, मैं फ़ौरन समझ गया कि अब क्रेमलिन नहीं जाऊँगा.


इस अंकल के सिर पर हैट थी. और हैट के ऊपर – हमारा पॉरिज. वह हैट के बिल्कुल बीचोंबीच पड़ा था, गहरे वाले गड्ढे में, और थोड़ा सा हैट की किनार पर भी  था, जहाँ रिबन होती है, थोड़ा सा कॉलर के ऊपर, और कंधों पर, और बाएँ जूते पर. जैसे ही वह अन्दर घुसा, लगा हकलाने:


 “ ख़ास बात ये है कि मैं फोटो खिंचवाने जा रहा था... और अचानक ये लफ़ड़ा...पॉरिज...स् स् ...सूजी का...गरम, और ऊपर से हैट से होकर और...जला रहा है...अब मैं अपना..फ् फ् फोटो कैसे भेजूँ, जब मैं पूरा पॉरिज में लथपथ हूँ?!”


अब मम्मी ने मेरी ओर देखा, और उसकी आँखें हरी हरी हो गईं, जैसे गूज़बेरी, ये पक्का इस बात का लक्षण है कि मम्मी को बड़ा ख़तरनाक गुस्सा आया है.

 “माफ़ कीजिए, प्लीज़,” उसने धीरे से कहा, “प्लीज़ इजाज़त दीजिए, मैं आपको साफ़ कर देती हूँ, इधर आ जाइए!”

और वे सब कॉरीडोर में चले गए.

और जब मम्मी वापस आई, तो मुझे उसकी तरफ़ देखने में भी बड़ा डर लग रहा था. मगर मैंने हिम्मत बटोरी, उसके पास गया और बोला:

 “हाँ, मम्मी, तुमने कल सच ही कहा था. झूठ हमेशा खुल ही जाता है!”

 मम्मी ने मेरी आँखों में देखा. वह बड़ी देर तक देखती रही और फिर पूछा:

 “अब ये बात तुझे ज़िन्दगी भर याद रहेगी!” और मैंने जवाब दिया:

 “हाँ.”


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35


मेरा दोस्त भालू

  

एक बार मैं क्रिसमस ट्री सेलेब्रेशन के लिए सकोल्निकी गया. हम सब को नीले कार्डबोर्ड के डिब्बे जैसा एक एक टिकट दिया गया था, वह छोटी सी किताब की तरह मुड़ा हुआ था, और कवर-पेज पर सुनहरे अक्षरों में चमचमा रहा था: “हैपी न्यू इयर!” और, जब टिकट खुलता, तो उसके पन्नों के बीच फ़ट् से एक सजी-धजी क्रिसमस ट्री खड़ी हो जाती, और उसके चारों ओर गरम कोट और लम्बे-लम्बे कानों वाली टोपियाँ पहने कई जानवर, जैसे ख़रगोश और लोमड़ियाँ, पिछले पैरों पर खड़े हो जाते. ये बहुत बढ़िया बनाया गया था, और, सिर्फ इस टिकट के कारण मैंने फ़ौरन उनके पास सकोल्निकी जाने का प्लान बना लिया. मैं ये देखना चाहता था कि उन्होंने वहाँ लड़कों के लिए और क्या क्या बनाया है. इससे पहले मैं सिर्फ अपने स्कूल की क्रिसमस ट्री पर जाता था या घर की क्रिसमस ट्री सजाता. इन क्रिसमस-ट्रीज़ पर बेहद मज़ा आता था, मगर उनमें जानवर नहीं होते थे. ऐसे वाले नहीं. इसलिए मैंने सोचा कि सकोल्निकी ज़रूर जाऊँगा. मैं निकल पड़ा. हालाँकि टिकट पर लिखा था “आरंभ – ठीक 2 बजे”, फिर भी मैं ढ़ाई बजे पहुँचा, क्योंकि मुझे देर हो गई थी. हर मज़ेदार मौक़े पर मैं लेट ही हो जाता हूँ, - कुछ न कुछ हो ही जाता है. एक बार थियेटर पहुँचा, और स्टेज पर किसी लड़के ने एक सफ़ेद बालों वाली लड़की को ‘किस’ किया, तभी सब लोगों ने तालियाँ बजाईं और चिल्लाने लगे “ब्रेवो”, “वन्स मोर”. अब छत के नीचे लाइट कौंधी, और ये लड़का और उसकी लड़की इस तरह झुक-झुक कर पब्लिक का अभिवादन करने लगे, जैसे उन्होंने कोई चमत्कार कर दिया हो. और भी कई बार मैं लेट हो गया था. मुझे याद है, कि एक बार मम्मा ने केक बनाया और बोली:  “आधा घण्टा घूम ले और जल्दी से आ जा, केक है!”

मैंने और मीश्का ने कम्पाऊण्ड में हॉकी की प्रैक्टिस की, और मैं फ़ौरन घर आ गया, मगर हमारा घर मेहमानों से भरा था, और मम्मा ने कहा:  “देर कर दी, भाई! तुम्हारी केक हम खा गए! किचन में जा!” मैं किचन में गया, वहाँ मुझे जैली और सूप दिया गया. केक के बदले ये क्या है? कोई मुक़ाबला ही नहीं है.

इस बार भी, हालाँकि मैं सात बजे उठ गया, मगर बेकार के काम करता रहा और क्रिसमस ट्री पर लेट हो गया. सकोल्निकी में इत्ती भीड थी! चारों ओर मुर्गियों के पैरों पर छोटे-छोटे घर बने थे, जैसे बाबा-ईगा का घर होता है, और मज़ेदार, बर्ड-हाऊस जैसे, चटखदार रंग में रंगे, सजे हुए और दोस्ताना घर. उनमें किताबें, मिठाइयाँ, डोनट्स या पैनकेक्स बेच रहे थे. सोकोल्निकी में बर्फ़ से बनी हुई बड़ी-बड़ी आकृतियाँ, ख़ूबसूरत घोड़े, डराने वाले ड्रैगन्स भी थे, और था एक मरा हुआ सिर, जिससे लड़ रहा था अविजित रुस्लान. तैंतीस भीमकाय हीरो बनाए गए थे, और हँस-राजकुमारी थी, स्पेस-शिप, ऐसा लगता था कि इन आकृतियों और प्रदर्शनियों का कोई अंत ही नहीं था, मैं एक आकृति से दूसरी की ओर जा रहा था, मुझे बहुत मज़ेदार लग रहा था, क्योंकि मैं भी आकृतियाँ बनाता हूँ, इसलिए इस बर्फीली ख़ूबसूरती से दूर नहीं हट सका और एक एक क़दम बढ़ाते बढ़ाते मैंने इस बात पर ग़ौर ही नहीं किया कि मैं लोगों से दूर इस वीथी पर बने जंगल में चला आया हूँ, मैंने इस बात पर भी ध्यान नहीं दिया कि रास्ता बार-बार मुड़ रहा था और लूप बना रहा था, और कुछ आकृतियाँ क़तार में नहीं, बल्कि कहीं बीच में रखी थीं, और मैं धीरे-धीरे थोड़ा सा भटक गया था. 

इस समय आसमान से बर्फ गिरना शुरू हो गई, चारों ओर अंधेरा छाने लगा, और मुझे ऐसा लगा कि अगर मैं इन बर्फ़ के टीलों के क़रीब से इसी रास्ते से वापस जाऊँगा, तो काफ़ी समय लग जाएगा. मैंने छोटे रास्ते से जाने का फ़ैसला किया और सीधे, जंगल के बीच से, होकर जाने लगा, क्योंकि मुझे क़रीब-क़रीब ये तो पता था कि क्रिसमस ट्री कहाँ है. मुझे याद था कि मैं कहाँ से आया था, इसलिए मैं काफ़ी ख़ुश-ख़ुश वापस संकरी, बर्फ़ से ढंकी पगडंडी पर भागने लगा. वो भी चारों ओर जा रही थी: दाएँ, बाएँ, और हर तरफ़, और रास्ते के ऐसे हिस्से भी थे कि कह नहीं सकते थे कि मेट्रो कहाँ है, बड़ी क्रिसमस-ट्री कहाँ है और लोग कहाँ हैं. इस तरह मैं काफ़ी देर तक भागता रहा और थकने लगा, परेशान भी होने लगा, मगर अचानक पास ही में मुझे एक सजा हुआ घर दिखाई दिया और मैं फ़ौरन शांत हो गया. इस घर की खिड़की में रोशनी नज़र आ रही थी, मुझे थोड़ी ख़ुशी हुई, और मैं सीधे सामने की ओर उछलने लगा, मगर मैं कुछ ही बार उछला होऊँगा, कि सामने खड़े एक मोटे चीड़ के पेड़ के पीछे से पगड़ण्डी पर एक भारी-भरकम भालू तैश में उछलकर सीधा मेरे सामने कूदा. हॉरिबल! वो गरजा और सीधा मुझ पर झपटा. मेरा तो कलेजा जैसे फट गया. मैं चिल्लाना चाहता था, मगर चिल्ला नहीं पाया. ज़बान चल ही नहीं रही थी. गला एकदम सूख गया. मैं जैसे ज़मीन में गड़ गया और मैंने हाथ ऊपर उठा दिए, मैं मुड़कर वापस भाग जाना चाहता था, मगर मुझे याद आया कि भालू अपने शिकार को शैतानी स्पीड से पकड़ लेता है, और अगर मैं उससे दूर भागूँगा, तो, हो सकता है कि उसे और गुस्सा आ जाए, और तब वह शायद तीन ही छलांगों में मुझे दबोच लेगा और मेरे टुकड़े- टुकड़े कर देगा! मैं ऐसा सोच रहा था, और भालू सीधा मेरे पास आया. वो इंजिन की तरह भक्-भक् कर रहा था, गरज रहा था और पंजे हिला रहा था, और मुझे याद आया कि मैंने पढ़ा था, कि अगर भालू के सामने पड़ जाओ तो अपने आप को कैसे बचाना चाहिए. ऐसा दिखाना चाहिए कि तुम मुर्दा हो, वो मुर्दों को नहीं खाता है! और पलक झपकते ही मैं ज़मीन पर गिर पड़ा और आँखें बन्द कर लीं, साँस रोकने की कोशिश करने लगा, मगर फिर भी साँस तो मैं ले ही रहा था, क्योंकि ये सब दौड़ने की वजह से हुआ था, और मेरा पेट धौंकनी की तरह चल रहा था. मैंने सुना कि भालू मेरे पास भागते हुए आ रहा है, और मैंने सोचा: “हो गया! अब मेरे टुकड़े-टुकड़े हो जाएँगे!” मगर वह मेरे नज़दीक नहीं आया...



  

और इस एक सेकण्ड में मैंने इतना कुछ सोचा, अपने आप से बुदबुदाता रहा!... इस बारे में किसीको नहीं बताऊँगा. कभी भी नहीं और किसी को भी नहीं. मगर फिर उत्सुकता मुझे बेचैन करने लगी. मैंनो सोचा: ‘ताज्जुब है, आख़िर भालू बच्चे को उठाता कैसे होगा? इस बारे में तो सिर्फ किताबों में पढ़ते हो, मगर सचमुच में देखने का मौका फिर कभी नहीं मिलेगा.’ और, मैंने धीरे धीरे अपनी बाईं आँख खोलना शुरू किया. वो मुश्किल से खुल रही थी, क्योंकि या तो डर लग रहा था, या पलकें कसके चिपक गई थीं, पता नहीं, मगर कोशिश करके आँख को खोल ही लिया. देखता क्या हूँ, कि भालू मेरे ऊपर खड़ा है, पिछले ही पैरों पर, और उसके चेहरे पर ऐसे भाव हैं, जैसे उसे मालूम ही न हो कि अब क्या करे. और मेरे दिमाग़ में फिर से बिजली की तरह एक ख़याल कौंध गया. मुझे अपने आप को बचाने का एक और उपाय याद आ गया. भालू बहुत डरपोक होता है, और किसी भी तरह उसे डराने की कोशिश करनी चाहिए. हो सकता है, कि मुझे ज़ोर से चिल्लाना चाहिए? और मैंने बेवकूफ़-इवान वाली कहानी की तरह फ़ौरन सोच लिया:  ‘जो होना है, हो! दो बार मरेगा नहीं, एक से बचेगा नहीं!’ 

और मैं ख़ौफ़नाक आवाज़ में चिल्लाया:  “ भा s s ग  यहाँ से!”

भालू थरथराया और एक ओर को हट गया. वह मुझसे यूँ छिटक गया, जैसे उसे बिजली का शॉक लगा हो. और, जब वो उछला, तो रुका नहीं और मुझसे दूर भागने लगा. वह बड़ी तेज़ी से भाग रहा था और चारों पैरों पर खड़ा नहीं हो रहा था, शायद, बेहद डर गया था और दुनिया की हर चीज़ के बारे में भूल गया था. और मैंने क़रीब दो किलो का बर्फ का गोला उठाया, जो मेरे पास ही पड़ा था, और ऐसे उसकी तरफ़ फेंका, जिससे वह, मतलब, और भी तेज़ी से मुझसे दूर भागे, और समझ जाए कि मेरे साथ मज़ाक करना महंगा पड़ सकता है! ये बर्फ़ का टुकड़ा ठीक उसके सिर पे लगा. टक्! इससे बेहतर हो ही नहीं सकता था. इस मार से भालू लड़खड़ा भी गया. और तभी एक आश्चर्य हुआ! भालू अचानक रुक गया, मेरी तरफ़ मुड़ा और बोला:  “बच्चे, बदमाशी न कर!”  मैं इतना डरा हुआ और उत्तेजित था, कि फ़ौरन इतना भी न समझ पाया कि दुनिया में ऐसा नहीं होता है कि भालू इन्सान की तरह बात करे, मैंने उससे कहा:  “आप ख़ुद ही बदमाशी न करें! ख़ुद ही तो मुझे खा जाना चाहते थे!” अब उसने कहा:  “तू क्या कह रहा है? आर यू सीरियस? तू मुझसे डर गया? कहीं तूने ये तो नहीं सोच लिया कि मैं असली भालू हूँ? डर मत, डर मत, मैं भालू नहीं हूँ! मैं आर्टिस्ट हूँ! समझा? मैं तो तुझसे मज़ाक करना चाहता था, मगर तू बेहोश हो गया...आर्टिस्ट हूँ...” मेरे दिल से एकदम बोझ उतर गया...मैं हँसने लगा. वाक़ई में, मैं भी कितना बेवकूफ़ हूँ! मैं ये भी भूल गया कि क्रिसमस-ट्री के प्रोग्राम में आर्टिस्ट अक्सर भालू की पोषाक पहन लेते हैं, जिससे बच्चों का मनोरंजन करें, और ये, ज़ाहिर था, कि वो ऐसा ही आर्टिस्ट था. मैं शांत हो गया और बोला:  “और साबित कैसे करोगे?” उसने कहा:  “ये देख.” उसने अपना सिर उतारा. जैसे लकड़ी के खंभे से घड़ा. जैसे टोपी. बस, उतार दिया. बेहद ख़ूबसूरत था सिर, बड़े बड़े दांत और चमकदार-लाल जीभ वाला. रोंएदार, और आँखें चमकदार. आर्टिस्ट ने उसे अपने फ़ैले हुए हाथों पर रखा और बोला:  “चल, ये ले! पकड़, डर मत. मैं कुछ देर ताज़ी हवा में सांस ले लूँ, कुछ देर सुस्ता लूँ. बेहद भारी है. और तू आराम से चक्कर खा गया, ये तो अच्छा हुआ, कि ये मेरा नहीं है, और अगर ये असली होता तो, क्या होता, आँ?”  

और वह अपना असली सिर घुमाने लगा. असली वाला बड़ा बेडौल था. गंजा. गोल-गोल दयनीय आँखें...

 तो, ऐसा भी होता है. अभी अभी तो मैं डर के मारे मरा जा रहा था, और अब बगल में, ख़रबूज़े की तरह, भालू का सिर दबाए खड़ा हूँ, और इस डरावने सिर का मालिक एक आर्टिस्ट है. मेरा मुँह खुला था, मगर आर्टिस्ट मेरी ओर देखकर मुस्कुराया. फिर वह थोड़ा सा कँपकँपाया और बोला:  “दिल में दर्द होता है...मुझे उत्तेजित नहीं होना चाहिए. और भागना नहीं चाहिए. चल, मुझे छोड़ दे.” उसने मेरी ओर पंजा, मतलब हाथ बढ़ाया, और हम उस घर की तरफ़ बढ़े जो पास ही में था. मैं इसी घर की तरफ़ कुछ देर पहले भाग कर आया था. हम पहुँचने ही वाले थे, कि अचानक झाड़ी में से एक जोकर उछलकर बाहर आया और मुझे भालू के साथ देखकर चिल्लाने लगा: ”अव्राशव, ये क्या है? आप कहाँ हैं? देर हो रही है! जल्दी करो, हमें अभी बुक्स-सिटी के पास डान्स करना है.”  “क्या?” आर्टिस्ट-भालू चीख़ा. “और डान्स करना है? मैं आज पाँच बार डान्स कर चुका हूँ! मेरे लिए इतना ही बहुत है!...क्या सब लोगों का दिमाग़ चल गया है?”

“गुसाझिन ने कहा है,” जोकर ने कहा, “उसका आइडिया है. हमें लोगों को हँसाना होगा. चल, भागें!”  “मेरे दिल में दर्द है,” आर्टिस्ट-भालू ने कहा, “और, गोशा, तुम हो कि ‘भागें!’.

“धीरे धीरे जाएँगे. चल, बच्चे,” उसने मुझसे कहा, “मुझे मेरा सिर दे दे, कुछ नहीं किया जा सकता.” उसने एक बार फिर अपनी दयनीय आँखों से मेरी तरफ़ देखा और मुँह टेढ़ा करके मुस्कुराया: “तो, थके हुए बूढे, चल अपना अपना शेक्सपियर खोजें!”  

मैं कुछ भी नहीं समझ पाया. कैसा थका हुआ बूढ़ा? कौन थका हुआ बूढ़ा? कहाँ? मगर अभी इसके लिए वक़्त नहीं था और मैंने उसे भालू का सिर पहनने में मदद की. उसने अपने नाख़ूनों वाले पंजों से मुझसे हाथ मिलाया.  “उधर जा,” उसने एक तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “अभी मैं वहाँ डान्स करने वाला हूँ.” और मैं उस तरफ़ चल पड़ा, जहाँ उसने इशारा किया था, और जल्दी ही वहाँ पहुँच गया, वहाँ कई सारे आर्टिस्ट्स थे, वे सवाल पूछ रहे थे, और बच्चे तुकबन्दी में जवाब दे रहे थे. ये ‘बोरिंग’ था, मगर अचानक जोकर प्रकट हुआ. वह एक तांबे का बर्तन बजा रहा था, और उसके पीछे पीछे मेरा दोस्त भालू लड़खड़ाते हुए चल रहा था. जोकर रो रहा था, और छींक रहा था, और जादू दिखा रहा था, और फिर उसने जेब से एक छोटा सा बाजा निकाला और उस पर ऊँगलियाँ फेरने लगा. और भालू ने अपनी जगह पर पैर से ताल देना शुरू कर दिया, और, आख़िर में, ज़ाहिर है, वह जोश में आकर डान्स करने लगा. वह ठीक-ठाक ही डान्स कर रहा था, और मुड़ रहा था, झुक रहा था, और गरज रहा था, और बच्चों की ओर लपक रहा था, और वे, हँसते हुए पीछे की ओर उछल रहे थे. उसने कई बार हँसाने वाले कारनामे किए, ये सब बड़ी देर तक चलता रहा. मैं एक ओर खड़ा होकर इंतज़ार कर रहा था, कि उसका प्रोग्राम कब ख़तम होता है, क्योंकि, चाहे जो भी हो जाए, मुझे एक बार फिर उसका इन्सानी चेहरा, उसकी दयनीय थकी हुई गोल-गोल आँखें देखना था.


*******











36


एड़वेन्चर


पिछले शनिवार और इतवार को मैं दीम्का के घर गया था. मेरे अंकल मीशा और आण्टी गाल्या का बेटा दीम्का, इतना प्यारा है. वो लोग लेनिनग्राद (पेरेस्त्रोयका के बाद – पीटरबुर्ग – अनु.) में रहते हैं. जब मेरे पास समय होगा तो मैं ये भी बताऊँगा कि मैं और दीम्का इस ख़ूबसूरत शहर में कितना घूमे और हमने वहाँ क्या क्या देखा. ये बेहद दिलचस्प और मज़ेदार किस्सा है. मगर अभी तो मैं आपको सीधा सादा किस्सा सुनाने जा रहा हूँ, कि कैसे मुझे मम्मा के पास मॉस्को फ्लाइट से आना पड़ा. ये भी मज़ेदार है, क्योंकि ये एक एड़वेन्चर था.

वैसे तो मैं हवाई जहाज़ से सफ़र कर चुका हूँ, मगर अकेले, बिना किसी की सहायता के, एक भी बार नहीं गया! अंकल मीशा मुझे हवाई जहाज़ में बिठा देने वाले थे. मैं सही-सलामत मॉस्को पहुंच जाऊँगा, और हवाई अड्डे पर मम्मा और पापा मुझे लेने आने वाले थे. हमने इतनी सीधी सादी और बढ़िया प्लानिंग की थी. मगर शाम को, जब मैं अंकल मीशा के साथ लेनिनग्राद एअरपोर्ट पहुँचा, तो पता चला कि कहीं कुछ फ्लाइट्स में देरी हो गई थी, और इसके कारण मॉस्को की फ्लाइट्स न पकड़ सकने वाले काफ़ी सारे लोग एअरपोर्ट पर इकट्ठे हो गए थे, और एक ऊँचा, तगड़ा अंकल हमें समझा रहा था कि परिस्थिति ऐसी है: मॉस्को जाने वाले लोग काफ़ी हैं, और हवाई जहाज़ है सिर्फ एक, और इसलिए, जो इस हवाई जहाज़ में घुस जाएगा, वही मॉस्को जा पाएगा. मैंने क़सम खाई कि इसी जहाज़ में घुसूंगा: क्योंकि मॉस्को में मेरे पापा जो आने वाले हैं एअरपोर्ट पे.


 


ये “ख़ुशख़बर” सुनकर अंकल मीशा ने मुझसे कहा:

 “जैसे ही हवाई जहाज़ में बैठेगा, मेरी ओर देखकर हाथ हिला देना, तब मैं फ़ौरन टेलिफ़ोन की ओर भागूँगा, तुम्हारे पापा को फोन कर दूँगा, कि तुम यहाँ से उड़ चुके हो, वो जागेंगे, कपड़े पहनेंगे और एअरपोर्ट पर तुझे लेने आ जाएँगे. समझ गया?” मैंने कहा:  “सब समझ गया!” और मैं अंकल मीशा के बारे में सोचने लगा : ‘कितने भले और सज्जन हैं अंकल मीशा. कोई और होता तो बस मुझे पहुँचा देता, और बस! मगर ये मेरे मम्मा पापा को फ़ोन भी करने वाले हैं. और मैं रिले-रेस के बेटन की तरह रहूँगा. अंकल फ़ोन करेंगे और पापा मुझे लेने आ जाएँगे, और मैं उनके बिना हवाई जहाज़ में सिर्फ एक घण्टा रहूँगा, और वहाँ भी, मतलब, हवाई जहाज़ में, सब अपने ही हैं. डरने की कोई बात नहीं है!’ मैंने ज़ोर से कहा:  “आप गुस्सा न करना कि मेरे कारण बस परेशानी ही होती है, मैं जल्दी ही हवाई जहाज़ में अकेले, अपने आप सफ़र करना सीख लूँगा, और आपको इतनी तकलीफ़ नहीं दूँग़ा...”   “ये आप क्या कह रहे हैं, डियर सर! मैं बहुत ख़ुश हूँ! दीम्का भी तुझसे मिलकर बेहद ख़ुश था! और गाल्या आण्टी! चल, ये पकड़!” उन्होंने मेरी ओर टिकट बढ़ाया और चुप हो गए. मैं भी चुप हो गया. 

और, तभी अचानक हवाई जहाज़ में ‘बोर्डिंग’ शुरू हो गई. ये तो भगदड़ ही हो रही थी. सब लोग हवाई जहाज़ की ओर लपके, और सबसे आगे भाग रहा था मैं, मेरे पीछे थे बाकी लोग. 

मैं सीढ़ी तक पहुँचा, वहाँ ऊपर दो लड़कियाँ खड़ी थीं. बेहद ख़ूबसूरत. मैं भागते हुए उन तक पहुँचा और अपना टिकट बढ़ा दिया. उन्होंने मुझसे पूछा: 

 “क्या तू अकेला है?” 

मैंने उन्हें सारी बात बताई और प्लेन के अन्दर गया. मैं खिड़की पास बैठ गया और बिदा करने वालों की भीड़ को देखने लगा. अंकल मीशा पास ही में थे, मैं उनकी तरफ़ देखकर हाथ हिलाने लगा, और मुस्कुराने लगा. उन्होंने इस मुस्कुराहट को पकड़ लिया, मुझे सैल्यूट किया और फ़ौरन पलटकर टेलिफ़ोन की तरफ़ बढ़े, जिससे मेरे पापा को फ़ोन कर सकें. मैंने साँस छोड़ी और इधर उधर देखने लगा. लोग बहुत ज़्यादा थे, और सभी जल्दी-जल्दी बैठने की और उड़ने की कोशिश कर रहे थे. रात हो चली थी. आख़िर में सब बैठ गए, सबने अपना-अपना सामान रख दिया, और मैंने सुना कि इंजिन शुरू हो गया है. वह बड़ी देर तक गूँ-गूँ करता रहा और चिंघाड़ता रहा. मैं उकता गया.       

मैं सीट पर पीछे की ओर टिककर बैठ गया और हौले से आँखें बन्द कर लीं, जिससे कुछ देर ऊँघ लूँ. फिर मैंने सुना, कि हवाई जहाज़ चल पड़ा, और मैंने पूरा मुँह खोल लिया, जिससे दाँतों में दर्द न हो. फिर मेरे पास एअर-होस्टेस आई, मैंने आँखें खोलीं – उसके पास ट्रे में सौ या हज़ार छोटी छोटी खट्टी, और पेपरमिंट की गोलियाँ थीं. मेरी पड़ोसन ने पहले एक गोली उठाई, फिर दूसरी, मगर मैंने एकदम पाँच उठा लीं और तीन, चार, पाँच और ले लीं. गोलियाँ स्वादिष्ट हैं, क्लास के लड़कों को दूँगा. वे ख़ुशी ख़ुशी ले लेंगे, क्योंकि ये गोलियाँ हवाई हैं, हवाई जहाज़ से आई हैं. अगर न चाहो, तो भी ले लेते हो. एअर-होस्टेस खड़े खड़े मुस्कुरा रही थी: जैसे कह रही हो, चाहे जितनी ले लो, हमें कोई अफ़सोस नहीं है! मैं गोली चूसने लगा और अचानक मुझे महसूस हुआ कि हवाई जहाज़ लैण्डिंग कर रहा है. मैं खिड़की से चिपक गया. मेरी पड़ोसन ने कहा:  “देख, कितनी जल्दी आ गए!” अब मैंने देखा कि हमारे सामने कई सारी बत्तियाँ प्रकट हो गई हैं. मैंने पड़ोसन से कहा:  “ आप देखिए – मॉस्को!” वो देखने लगी और अचानक मोटी आवाज़ में गाने लगी:  “मॉस्को मेरा, ख़ूबसूरत...” 

मगर तभी परदे के पीछे से एअरहोस्टेस बाहर आई, वही वाली, जो सबको गोलियाँ दे रही थी. मैं ख़ुश हो गया, कि अब वह और गोलियाँ देगी. मगर उसने कहा:  “कॉम्रेड, पैसेंजर्स, मौसम ख़राब होने की वजह से मॉस्को का हवाई अड्डा बन्द कर दिया गया है. हम वापस लेनिनग्राद आ गए हैं. अगली फ्लाईट सुबह सात बजे जाएगी. रात भर के लिए किसी तरह बन्दोबस्त कर लीजिए.”

 मेरी पड़ोसन ने फ़ौरन गाना बन्द कर दिया. चारों तरफ़ लोग ग़ुस्से से शोर मचाने लगे.

लोग सीढ़ी से उतरे और चुपचाप अपने अपने घरों को चल दिए, जिससे सुबह वापस आ जाएँ. मुझे तो याद ही नहीं था कि मीशा अंकल कहाँ रहते हैं. मुझे ये भी मालूम नहीं था कि उनके घर तक कैसे जाना चाहिए. मुझे उन लोगों के साथ रहना पड़ा, जिनके पास रात को रुकने के लिए जगह नहीं थी. ऐसे लोग भी काफ़ी सारे थे, और हम सब रेस्टॉरेंट की ओर चले खाना खाने के लिए. मैं भी उनके पीछे पीछे चला. सब मेज़ों पर बैठ गए. मैं भी बैठ गया. 

मैंने एक जगह पकड़ ली. वहाँ पास ही में टेलिफ़ोन-बूथ था, इंटरसिटी. मैंने मॉस्को का नंबर घुमाया. क्या ख़याल है, फ़ोन किसने उठाया होगा? मेरी अपनी मम्मा ने. उसने कहा:  “हैलो!”  मैंने कहा:  “हैलो!” उसने कहा:  “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. आपको कौन चाहिए?” मैंने कहा:  “अनास्तासिया वासिल्येव्ना.” उसने कहा:  “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है! क्या मरीया  पित्रोव्ना?” मैंने कहा:  “तुम! तुम! तुम! मम्मा, ये तुम्हीं हो ना?” उसने कहा:  “ठीक से सुनाई नहीं दे रहा है. एक एक अक्षर अलग अलग करके बोलिए.” मैंने कहा:  “एम-ए, एम-ए. मम्मा, ये मैं हूँ.” उसने कहा:  डेनिस्का, ये तू है?” मैंने कहा:  “मेरी फ्लाइट कल सुबह सात बजे की है. हमारा मॉस्को का एअरपोर्ट बन्द है, वैसे सब ठीक ठाक है. पी-ए पी-ए क-ओ म-उ-झ-से मि-ल-ने को कहो!” उसने कहा:  “अच्-छा!” मैंने कहा:  “तो, अप-ना ख़-या-ल र-ख-ना!” उसने कहा:  “इं-त-ज़ा-र करूँगी! पापा तुझे लेने के लिए ठीक सात बजे निकलेंगे!” 

मैंने रिसीवर रख दिया, और मेरे दिल में एकदम हल्कापन महसूस हुआ. तब मैं खाना खाने गया. मैंने कटलेट्स और पास्टा का ऑर्डर दिया, एक गिलास चाय भी मंगवाई. खाते खाते, यहाँ की चौड़ी-चौड़ी, आरामदेह कुर्सियाँ देखकर मैंने सोचा: “ओ-ओ, इन कुर्सियों पर आराम से सोया जा सकता है”.

मगर जब तक मैं खाता रहा, बड़े अचरज की बात हुई:  आधे ही मिनट के बाद मैंने देखा कि सब की सब कुर्सियाँ भर गई हैं. और मैंने सोचा: “कोई बात नहीं, मैं कोई सामन्त-वामन्त तो नहीं हूँ, फ़र्श पर भी सो जाऊँगा! कित्ती सारी जगह है!” फिर एक आश्चर्य! आधे ही सेकण्ड में क्या देखता हूँ – पूरा फ़र्श लोगों से भर गया है: पैसेंजर्स,  शॉपिंग बैग्स, सूटकेसेस, थैलियाँ, बच्चे भी; पैर रखने की भी जगह नहीं थी. मुझे ग़ुस्सा भी आ गया! 

फिर मैं बैठे हुए, लेटे हुए, अधलेटे लोगों के बीच से जाने लगा. बस, यूँ ही टर्मिनल पे घूमने निकल पड़ा. इस सोये हुए शहर में घूमना आसान नहीं था. मैंने घड़ी पर नज़र डाली. साढ़े ग्यारह बज गए थे. फिर अचानक मैं एक दरवाज़े तक पहुँचा, जिस पर लिखा था: “इंटर-सिटी टेलिफ़ोन”. मैं ख़ुश हो गया! यहाँ आराम से सोया जा सकता है. मैंने हौले से गद्देदार दरवाज़ा खोला. 

स्टॉप! अचानक उछल पड़ा: वहाँ पहले से ही दो लोग थे. दो अंकल. फ़ौजी अफ़सर. वे मेरी तरफ़ देख रहे थे, और मैं उनकी तरफ़.    

फिर मैंने कहा: ”आप लोग कौन हैं?” तब उनमें से एक, मूँछों वाले ने कहा:  “हम लावारिस हैं!”

मुझे उन पर दया आई, और मैंने बेवकूफ़ी से पूछा:  “और आपके माँ-बाप कहाँ हैं?” मूँछों वाले ने रोनी सूरत बनाई और जैसे रोते रोते बोला:

“प्लीज़, मेहेरबानी करो, मेरे पापा को ढूँढ़ दो!” और दूसरा, जो उससे जवान था, शेर की तरह ठहाके लगाने लगा. तब मुझे समझ में आया कि मूँछों वाला मज़ाक कर रहा है, क्योंकि अब वह भी हँसने लगा था, और उनके साथ मैं भी हँसने लगा. अब हम तीनों ही हँस रहे थे. उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और मेरे लिए जगह बना दी. मुझे गर्माहट महसूस होने लगी, मगर वहाँ तंग भी था और तकलीफ़देह भी, क्योंकि हर समय टेलिफ़ॉन बज रहा था और तेज़ रोशनी का बल्ब जल रहा था.

 तब हमने एक अख़बार पे मोटे मोटे अक्षरों से लिखा: “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, और जवान फ़ौजी ने बल्ब निकाल दिया. आवाज़ें बन्द हो गईं, रोशनी भी नहीं है. एक मिनट बाद बड़े दोस्त इस तरह खर्राटे लेने लगे, कि बस – ग़ज़ब! ऐसा लग रहा था जैसे वे बड़े बड़े लट्ठों को बड़ी बड़ी आरियों से काट रहे हैं. सोना तो असंभव था. 

मैं लेटे लेटे अपने कारनामे के बारे में सोच रहा था. मज़ाकिया लग रहा था, और मैं पूरे समय अंधेरे में मुस्कुराता रहा. 

अचानक एक ज़ोरदार, खनखनाती आवाज़ गूँजी: 

 “लेनिनग्राद-मॉस्को फ़्लाइट से जाने वाले मुसाफ़िर ध्यान दें! हवाई जहाज़ “TU- 104” क्रमांक  52-48, पन्द्रह मिनट बाद, चार बजकर पचपन मिनट पर अतिरिक्त उड़ान भरने वाला है. बोर्डिंग के लिए पैसेंजर्स कृपया अपने टिकट दिखाकर दो नंबर के गेट से प्रस्थान करें!”

मैं फ़ौरन उछला, जैसे मुझे शॉक लगा हो, और अपने पड़ोसियों को जगाने लगा. मैंने धीमी आवाज़ में, मगर साफ़ साफ़ उनसे कहा:  “ख़तरा! ख़तरा! उठो, ये ऑर्डर है!” वे फ़ौरन उछल पड़े, और मुच्छड़ ने टटोल कर बल्ब वापस लगा दिया. मैंने उन्हें समझाया कि बात क्या है. मुच्छड़ ने फ़ौरन कहा:  “शाबाश, बच्चे!” अब मैं तेरे साथ किसी भी मिशन पर जाऊँगा. मतलब, अपने लावारिसों को तूने छोड़ा नहीं?” मैंने कहा:  “क्या कह रहे हैं, ऐसा कैसे हो सकता है!” 

हम गेट नम्बर 2 की ओर भागे और हवाई जहाज़ में चढ़ गए. 

यहाँ ख़ूबसूरत एयरहोस्टेस नहीं थीं, मगर हमें कोई फ़रक नहीं पड़ता था. और जब हम हवा में ऊपर उठे, तो छोटा वाला फ़ौजी अचानक ठहाका मार कर हँस पड़ा.  “तू क्या कर रहा है?” मूँछों वाले ने उससे पूछा.  “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”, उसने जवाब दिया. “ हा-हा-हा!” “टेलिफ़ोन आउट ऑफ़ ऑर्डर”!...”

 “हम वो कागज़ निकालना भूल गए,” मूँछों वाले ने जवाब दिया. 

क़रीब चालीस मिनट बाद हम सही सलामत मॉस्को में उतर गए, और जब बाहर निकले, तो पता चला कि हमें लेने कोई भी नहीं आया है. 

मैंने अपने पापा को ढूँढ़ा. वो नहीं आए थे...कहीं भी नहीं दिखे. 

मैं समझ नहीं पा रहा था कि घर कैसे पहुंचूं. मैं निराश हो गया. रोने रोने को हो गया. और मैं, शायद रो ही पड़ता, मगर अचानक मेरे पास रात वाले दोस्त आए, मूँछों वाला और छोटा वाला. मूँछों वाले ने कहा:  “क्या, पापा नहीं आए?” मैंने कहा:  “नहीं मिले.” जवान फ़ौजी ने पूछा:  “तूने उन्हें कितने बजे आने के लिए कहा था?” मैंने कहा:  “मैंने उनसे कहा था कि जो फ़्लाइट सुबह सात बजे निकलती है, उस पे आ जाना.” जवान फ़ौजी बोला:  “समझ गया! यहाँ ग़लतफ़हमी हुई है. क्योंकि हम तो पाँच बजे की फ़्लाइट से निकले थे!” मूँछों वाला हमारी बातचीत में शामिल हो गया:  “मिलेंगे, कहीं नहीं जाएँगे! और, क्या तू कभी ‘कज़्लिक’ में गया है?” मैंने कहा:  “पहली बार सुन रहा हूँ! ये ‘कज़्लिक’ क्या चीज़ है?” उसने जवाब दिया:  “अभी देख.”

और उन्होंने अपने हाथ हिलाए. 

एअरपोर्ट के प्रवेशद्वार पे एक छोटी सी कार आई, बेहद गन्दी और धब्बों वाली. फ़ौजी ड्राइवर का चेहरा मुस्कुरा रहा था. 

मेरे फ़ौजी दोस्त कार में बैठ गए. 

जब वे उसमें बैठ गए, तो मुझे उदासी ने घेर लिया. मैं खड़ा था और समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूँ. बहुत दुखी था. मैं, बस, खड़ा था. मूँछों वाले ने खिड़की से सिर निकालकर पूछा:  “तू कहाँ रहता है?” मैंने जवाब दे दिया. उसने ड्राइवर से कहा:  “अलीयेव! एहसान का बदला चुकाना चाहिए?” वह कार से बोला:  “करेक्ट!” मूँछों वाला मेरी तरफ़ देखकर मुस्कुराया: “आ जा, डेनिस्का, ड्राइवर की बगल में बैठ जा. तुझे पता चलेगा कि फ़ौजी कैसे मदद करते हैं.” 

ड्राइवर दोस्ताना अंदाज़ में मुस्कुराया. मुझे लगा, कि वो अंकल मीशा जैसा है.  “बैठ जा, बैठ जा. हवा की स्पीड से ले चलूँगा!” उसने भर्राई आवाज़ में कहा. 

मैं फ़ौरन उसकी बगल में बैठ गया. मुझे ख़ुशी हो रही थी. ऐसे होते हैं फ़ौजी! उनके साथ रहो, तो ज़रा भी नहीं भटकोगे.” 

मैंने ज़ोर से कहा:  “करेत्नी र्‍याद स्ट्रीट!”

ड्राइवर ने चाभी घुमाई. हम चल पड़े. मैं चिल्लाया:  “हुर्रे!”


***** 



37


फ़ैंटोमस* 

* (एक काल्पनिक सुपरहीरो)


ये तस्वीर भी ग़ज़ब की तस्वीर है! ये है तस्वीर! मैं आपसे सही में कहता हूँ, कि इस तस्वीर को देखकर कोई भी दीवाना हो सकता है. साधारण तस्वीर को देखने से कोई असर नहीं होता.

 



मगर “फ़ैंटोमस” – बात ही अलग है! पहली बात, रहस्य! दूसरी, मास्क! तीसरी, एडवेन्चर्स और फ़ाइट्स! और चौथी बात, बेहद इंटरेस्टिंग है, बस!

और, ज़ाहिर है, सारे लड़कों ने, जैसे ही इस तस्वीर को देखा, सब “फ़ैंटोमस-फ़ैंटोमस” खेलने लगे. इसमें सबसे ख़ास है – बेहद ख़तरनाक चिट्ठियाँ लिखना और उन्हें अप्रत्याशित जगहों पर घुसेड़ देना. खूब मज़ा आता है. जिसे भी फ़ैंटोमस वाली चिट्ठी मिलती, फ़ौरन डर के मारे कांपने लगता. बूढ़ी औरतें भी, जो ज़िन्दगी भर प्रवेश द्वार के पास बैठी रहती थीं, अब ज़्यादातर घर में ही रहती हैं. अपनी मुर्गियों के साथ ही सो जाती हैं. बात समझ में भी आती है. आप ख़ुद ही सोचिए: क्या उस बूढ़ी औरत का दिमाग़ ठिकाने पे रह सकता है, जिसे अपने लेटर-बॉक्स में सुबह ही ऐसी मज़ेदार चिठी मिली हो: 

‘अपनी गिस-स्टव संबाल! वो उड़ जाने वाला है!’

ऐसे में तो बहादुर से बहादुर बुढ़िया का दिमाग़ भी ख़राब हो जाएगा, और वो पूरे दिन किचन में बैठी रहेगी, अपने गैस-स्टोव की हिफ़ाज़त करेगी और दिन में पाँच बार मॉस्को-गैस को फ़ोन लगाएगी. बड़ा ‘फ़नी’ लगता है. जब मॉस्को-गैस वाली लड़की पूरे दिन कम्पाऊण्ड में घूमती रहती है, और चिल्लाती है: “ये फ़ैंटोमस फिर से हंगामा कर रहा है! ऊ, सत्यानास हो जाए!” तो ऐसा लगता है कि हँसते-हँसते पेट फूट जाएगा!...

 सारे लड़के हँसते रहते हैं और एक दूसरे को आँख़ मारते हैं, और, न जाने कहाँ से बिजली की तेज़ी से नई-नई फ़ैंटोमस की चिट्ठियाँ प्रकट हो जाती हैं, हर फ्लैट में अलग-अलग. जैसे:

 ’रात को बाहर न निकलना. माड्डालूँगा!’        

या: 


‘तेरे बारे में सब जानते है, अपनी बीबी से डर!’ 

या फिर सिर्फ ऐसी: 

‘अपनी फ़ोटो बनवा! सफ़ेद चप्पल में.’ 

हालाँकि ये सब हर समय मज़ाकिया नहीं होता था , बल्कि बेवकूफ़ी भरा ही होता था, मगर फिर भी हमारे कम्पाऊण्ड में काफ़ी शांति रहने लगी. सब लोग जल्दी सोने लगे, और मिलिशिया कॉम्रेड पर्खोमव अक्सर हमारे यहाँ दिखाई देने लगा. वह हमें समझाता, कि हमारा खेल – ये बग़ैर किसी मक़सद का, बग़ैर किसी मतलब का खेल है, सिर्फ बेहूदगी है. वो ये भी बताता कि वही खेल अच्छा होता है, जिससे लोगों को कोई फ़ायदा हो – जैसे वोलीबॉल या फिर टाऊन-टाऊन जिनसे हमारी मारने की ताक़त और नज़र का निशाना मज़बूत होते हैं, मगर तुम्हारी चिट्ठियों से कुछ भी मज़बूत नहीं होता, और उनकी किसी को ज़रूरत भी नहीं है, वे सिर्फ आपकी बेवकूफ़ी ज़ाहिर करती हैं.  “अपनी ड्रेस की तरफ़ ही ध्यान देते,” कॉम्रेड पर्खोमव कहता. “देखो, जूते!” और उसने मीशा के धूल भरे जूतों की तरफ़ इशारा किया. “स्कूल के स्टूडेण्ट को शाम को ही उन्हें साफ़ करना चाहिए!”

ऐसा काफ़ी दिनों तक चलता रहा, और हम अपने फ़ैंटोमस को थोड़ा आराम देने लगे और सोचने लगे, कि अब बहुत हो गया. बहुत खेल लिए! मगर ऐसा नहीं था! 

अचानक हमारे यहाँ एक और फ़ैंटोमस हंगामा मचाने लगा, और वो भी कैसे! बस, भयानक! बात ये हुई कि हमारी बिल्डिंग में एक बूढ़ा टीचर रहता है, वो कब का रिटायर हो चुका है, लम्बा और दुबला पतला, जैसे स्कूल-मैगज़ीन का पात्र – कोल, हाथ में छड़ी भी वैसी ही लिए रहता है – ज़ाहिर है, अपनी ऊँचाई के हिसाब से ली होगी. हमने फ़ौरन उसका नाम कोल येदीनित्सिन रख दिया, मगर फिर अपनी सुविधा के लिए उसे सिर्फ ‘कोल’ कहकर बुलाने लगे. 

एक बार मैं सीढ़ियाँ उतर रहा था, तो देखता क्या हूँ कि उसके लेटर-बॉक्स में फ़टी हुई, मुड़ी-तुड़ी चिट्ठी लगी है. पढ़ता हूँ: 

“कोल, ऐ कोल!        चुबाऊँगा तुजमें उकोल*!”

इस चिट्ठी में लाल पेन से सारी गलतियाँ सुधारी गई थीं, और अंत में बड़ा सा ‘1’ ** बना था. और साफ़, सही-सही लिखा था: 

“तूने चाहे जैसे भी लिखा हो, इतने गन्दे, ज़मीन पे पड़े हुए कागज़ पे कभी नहीं लिखना चाहिए. एक बात और: सलाह देता हूँ कि ग्रामर का ध्यान रखो.”

दो दिन बाद हमारे ‘कोल’ के दरवाज़े पर नोटबुक का साफ़ कागज़ लटक रहा था. कागज़ पर दबा-दबा कर, जोश से लिखा गया था: 

“थूकता हूँ तेरे ग्रमर पे!”


तो, नासपीटा फ़ैंटोमस, ग़ुस्से में आ गया था! एक और सिलसिला शुरू हो रहा था. कितने शर्म की बात है. एक बात अच्छी थी: फ़ैंटोमस की चिट्ठी पूरी तरह लाल पेन्सिल से रंगी थी और नीचे पड़ा था – 2. पहली बार ही की तरह साफ़-साफ़ अक्षरों में ‘नोट’ लिखा था:

“कागज़ काफ़ी साफ़ है. तारीफ़ करता हूँ. सलाह: ग्रामर के नियमों के अलावा, अपनी निरीक्षण शक्ति भी बढ़ाओ, आँख वाली याददाश्त, तब तुम ‘ग्रमर’ नहीं लिखोगे. मैंने तो पिछले ख़त में इस शब्द का प्रयोग किया था. “ग्रामर”. याद रखना चाहिए.” 

इस तरह उनके बीच काफ़ी लम्बी ख़तो-किताबत चलती रही. फ़ैंटोमस काफ़ी दिनों तक हमारे ‘कोल’ को क़रीब-क़रीब हर रोज़ ख़त लिखता रहा, मगर ‘कोल’ उसके प्रति वैसा ही कठोर था. छोटी-छोटी गलतियों के लिए भी ‘कोल’ फ़ैंटोमस को अपना फ़ौलादी ‘2’ ही देता था, और ऐसा लगता था कि ये कभी ख़त्म ही नहीं होगा.

मगर एक दिन रईसा इवानव्ना  ने हमें क्लास में डिक्टेशन दिया. कठिन था. डिक्टेशन लिखते-लिखते  हम सब कराह रहे थे, पसीने-पसीने हो रहे थे. दुनियाभर के सबसे कठिन शब्द थे उस डिक्टेशन में. जैसे, अंत में ऐसा वाक्य था: “हम सुखद अंत तक पहुँच ही गए”. इस वाक्य ने सबको परेशान कर दिया. मैंने लिखा: “सखद अंत तक पहुँच गए”. और रईसा इवानव्ना  ने कहा:

 ”ऐह, तुम, दुखदाई लेखकों, सिर्फ एक मीशा स्लनोव  ने कुछ ढंग का लिखा है, मुझे तुम्हारी सूरत भी नहीं देखनी है! जाओ! टहलो! कल फिर से शुरू करेंगे.” 

हम अपने-अपने घर चले गए.         

मैं तो जलन के मारे चरमरा ही गया, जब अगले दिन ‘कोल’ के दरवाज़े पे बर्फ़ जैसे सफ़ेद कागज़ का पन्ना देखा और उस पर ख़ूबसूरत अक्षरों में लिखा था: 

“थैंक्यू, ‘कोल! मुझे रूसी भाषा में ‘3’ मिले हैं! ज़िन्दगी में पहली बार! हुर्रे!

तुम्हारी इज़्ज़त करने वाला - फ़ैंटोमस!”


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* उकोल रूसी शब्द है, जिसका अर्थ है – इंजेक्शन है, तुकबन्दी को देखते हुए इसका अनुवाद नहीं किया है – अनु.  

** यदि किसी विद्यार्थी को 1 या 2 नम्बर मिलते हैं, तो वह अनुत्तीर्ण होता है, पास होने के लिए 3, उत्तम – 4, और अतिउत्तम ग्रेड के लिए 5 अंक होना ज़रूरी है.  



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38


ख़ुशबू आसमान की और तमाकू की


अगर अब इस बारे में सोचूँ, तो लगता है कि कितना डरावना था: मैं अभी तक एक भी बार हवाई जहाज़ में नहीं उड़ा था. ये सच है, कि एक बार मैं बस हवाई जहाज़ का सफ़र करते-करते रह गया, बात बनी नहीं. प्लान गड़बड़ हो गया. ट्रेजेडी. और ये अभी हाल ही में हुआ था. मैं, अब छोटा तो नहीं हूँ, हाँलाकि ये भी नहीं कह सकते कि बड़ा हूँ. उस समय मम्मा को छुट्टियाँ थीं, और हम एक बड़े ‘सामूहिक फ़ार्म’ में उसके रिश्तेदारों के यहाँ गए थे. वहाँ बहुत सारे ट्रैक्टर्स और घास काटने वाली मशीनें थीं. मगर ख़ास बात ये थी, कि वहाँ जानवर भी थे: घोड़े, चूज़े और कुत्ते. और काफ़ी सारे लड़कों की हँसती-खेलती टोली थी. सब सफ़ेद बालों वाले और बेहद मिलनसार. 

रात को जब मैं छोटे से कैबिन में सोता, तो दूर से हार्मोनियम की आवाज़ आती, ऐसा लगता कि कोई दुखभरी धुन बजा रहे हों, और इस आवाज़ को सुनते हुए मैं फ़ौरन सो जाता.

इस सामूहिक फ़ार्म में मैं सबसे प्यार करने लगा, और ख़ास तौर पे लड़कों से, और मैंने फ़ैसला कर लिया कि पहले मैं चालीस साल का होने तक यहाँ रहूँगा, और बाद में सोचा जाएगा. मगर, अचानक स्टॉप, कार! नमस्ते! मम्मा ने कहा कि छुट्टियाँ तो जैसे एक पल में ख़तम हो गईं और हमें फ़ौरन घर जाना चाहिए. उसने दादा वाल्या से पूछा:

 “शाम की ट्रेन कितने बजे जाती है?” उसने कहा:  “तू ट्रेन में क्यों परेशान होती है? हवाई जहाज़ से चली जा! एअरपोर्ट तो सिर्फ तीन मील दूर है. बस, एक मिनट में डेनिस के साथ मॉस्को पहुँच जाएगी!” हूँ, तो दादा वाल्या – गोल्डन मैन है! बेहद भला. एक बार उन्होंने मुझे आसमानी-गाय प्रेज़ेंट दी थी. इसके लिए मैं उन्हें कभी नहीं भूलूँग़ा. और इस समय भी. जब उन्होंने देखा कि मैं कितनी बेताबी से हवाई जहाज़ में उड़ना चाहता हूँ, तो उन्होंने दो मिनट में मम्मा को मना लिया, और वो भी, न चाहते हुए भी, तैयार हो गई. 

दादा वाल्या ने ये सोचकर कि बेकार में ही ट्रक को क्यों दौड़ाया जाए, घोड़े को गाड़ी में जोता, हमारी भारी सूटकेस घास पे रखी, और हम गाड़ी में बैठकर चल पड़े. पता नहीं, कैसे बताऊँ, कि कितना बढ़िया लग रहा था गाड़ी में जाना, उसकी चरमराहट को सुनना, और चारों ओर से आ रही खेतों की, डामर की और तमाकू की ख़ुशबू महसूस करना. मैं ख़ुश था कि कुछ ही देर में उड़ने वाला हूँ, क्योंकि एक बार मीश्का कम्पाऊण्ड में बता रहा था, कि कैसे वो पापा के साथ त्बिलिसी गया था, हवाई जहाज़ में, कि उनका हवाई जहाज़ कित्ता बड़ा था, तीन कमरों वाला, और कैसे उन्हें जितनी चाहो, उतनी चॉकलेट्स दी गई थीं, और ब्रेकफ़ास्ट में पॉलिथीन की छोटी सी बैग में पैक सॉसेज दिए गए थे और ट्रे वाली छोटी सी मेज़ पर चाय दी गई थी. 

ख़यालों में मैं इतना खो गया कि पता ही नहीं चला, कब अचानक हमारी घोड़ा-गाड़ी क्रिसमस-ट्री की टहनियों से सजाए गए लकड़ी के ऊँचे गेट में घुसी. टहनियाँ पुरानी थीं, वे पीली होने लगी थीं. इस गेट के पीछे भी खेत थे, सिर्फ घास हरी-हरी नहीं, बल्कि सूखी, बदरंग थी. कुछ दूर, हमारे बिल्कुल सामने एक छोटी सी बिल्डिंग थी. दादा-वाल्या उसके पास गया. मैंने कहा:  “हम यहाँ क्यों आए हैं? हिचकोले खा-खा के मैं ‘बोर’ हो गया हूँ. जल्दी से एअरपोर्ट जाएँगे.” दादा वाल्या ने कहा:  “तो फ़िर ये क्या है? ये ही तो एअरपोर्ट है...क्या तुझे दिखाई नहीं दे रहा है?” मेरा दिल डूब गया. ये सूखा-सट् खेत – एअरपोर्ट है? क्या बेवकूफ़ी है! ख़ूबसूरती कहाँ है? ज़रा भी ख़ूबसूरती नहीं है! मैंने कहा:  “और हवाई जहाज़?”

 “इस टर्मिनल में जाएँगे,” उन्होंने हाथ से बिल्डिंग की ओर इशारा किया, “इसे पार करके दूसरे गेट से बाहर निकलेंगे, वहीं हवाई जहाज़ होंगे...क्या चारा खिलाऊँ?...”   

और उन्होंने हमारे घोड़े के सिर पे जई के दानों वाली थैली बांध दी, और वो खाने लगा. 

हम इस बिल्डिंग में गए. वहाँ बहुत घुटन थी और कैबेज-सूप की गंध आ रही थी. पहले कमरे में लोग बैठे थे. एक दद्दू थे हाथ में व्हील वाली छड़ी लिए, एक बोरे वाली दादी थी. उसके बोरे में कोई साँस ले रहा था – शायद सुअर का पिल्ला हो. एक औरत थी गुलाबी कमीज़ वाले दो छोटे बच्चों और एक दूध पीते नन्हे के साथ. उसने नन्हे को तौलियों में इतना कस के लपेटा था, और वो बिल्कुल केटरपिलर (इल्ली) जैसा लग रहा था, क्योंकि पूरे समय कुलबुला रहा था.

वहीं पर अख़बार का स्टाल था. दादा वाल्या ने हमारी भारी सूटकेस मम्मा के पास रख दी और स्टाल की ओर चल पड़ा. मैं भी उसके पीछे-पीछे गया. मगर स्टाल काम नहीं कर रहा था. काँच पे एक कागज़ लगा था, और उस पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था:  “20 मिनट बाद आऊँगा.” मैंने इसे ज़ोर से पढ़ा. व्हील वाले दद्दू ने कहा:  “देखिए – ये पढ़ रहा है!” और सब लोग मेरी ओर देखने लगे. और मैंने कहा:  “और सिर्फ छह साल का है.” सब लोग हँसने लगे. दादा वाल्या, जब हँसते थे तो अपने सारे दाँत दिखाते थे. उनके दाँत बड़े मज़ेदार थे: एक ऊपर – दाईं ओर, और दूसरा – नीचे बाईं ओर. दादा बड़ी देर तक हँसते रहे. इसी समय एक मोटे नौजवान ने कमरे में झाँका. उसने कहा:  “मॉस्को कौन जा रहा है?”  “हम”, सभी एक सुर में चिल्लाए और जल्दबाज़ी मचाने लगे. “मॉस्को – हम!”  “मेरे पीछे आइए,” नौजवान ने कहा और चल पड़ा.

 सब उसके पीछे हो लिए. हम लम्बे कॉरीडोर को पार करके बिल्डिंग की दूसरी तरफ़ आए. वहाँ एक खुला हुआ दरवाज़ा था. उससे नीला आसमान दिखाई दे रहा था. दरवाज़े के सामने दो पहलवान खड़े थे – हट्टेकट्टे अंकल, जैसे सर्कस वाले फ़ाईटर्स हों. एक की दाढ़ी काली थी, और दूसरे की – लाल. उनके पास थी वज़न नापने की मशीन. जब हमारी बारी आई, तो दादा वाल्या ने “ऊँ..” करते हुए भारी सूटकेस काऊंटर पे रख दी. सूटकेस का वज़न किया गया, मम्मा ने पूछा:  “हवाई जहाज़ कितनी दूर है?”

 “क़रीब चार सौ मीटर्स,” लाल पहलवान ने कहा.  “पाँच सौ भी हो सकता है,” काले ने कहा.  “सूटकेस ले जाने में मदद कीजिए, प्लीज़,” मम्मा ने कहा.

 “हमारे यहाँ ‘सेल्फ-सर्विस’ है,” लाल वाले ने कहा. दादा वाल्या ने मम्मा की ओर देखकर आँख मिचकाई, वो खाँसा, सूटकेस उठाई, और हम खुले दरवाज़े से बाहर निकले. दूर कोई एक नन्हा सा जहाज़ खड़ा था, ड्रैगनफ्लाइ जैसा, बस वो सारस जैसी टाँगों पर खड़ा था. हमारे आगे-आगे सारे परिचित चल रहे थे: व्हील, सुअर के पिल्ले वाला बोरा, गुलाबी कमीज़ें, केटरपिलर. जल्दी ही हम हवाई जहाज़ तक पहुँच गए. नज़दीक से तो वह और भी छोटा नज़र आ रहा था. सब उसमें घुसने लगे, और मम्मा ने कहा:  “वाह, वाह! ये क्या रूसी हवाई जहाज़ों का दादा है?”  “ले-देकर ये प्रदेश में जाने-आने वाला आंतरिक जहाज़ है,” हमारे दादा वाल्या ने कहा. “बेशक, TU-104 नहीं है! क्या कर सकते हैं. आख़िर उड़ता तो है! एअरोफ्लोत है.”  “अच्छा?” मम्मा ने पूछा. “क्या ये उड़ता है? बड़ी प्यारी बात है! ये उड़ता भी है? ओह, बेकार ही में हम ट्रेन से नहीं गए! मुझे तो इस उड़ने वाली चिड़िया पर भरोसा ही नहीं है. जैसे कोई मध्ययुगीन चीज़ हो...”  “एअरलाइनर नहीं है, बेशक!” दादा वाल्या ने कहा. “झूठ नहीं बोलूँगा. लाइनर नहीं है, गॉड सेव! क्या करें!”  

और, वो मम्मा से बिदा लेने लगे, और फिर मुझसे. उन्होंने हौले से मेरे गाल को अपनी नीली दाढ़ी से छुआ, और मुझे अच्छा लगा, कि उसमें से तमाकू की ख़ुशबू आ रही है, फिर मैं और मम्मा हवाई जहाज़ में चढ़ गए. हवाई जहाज़ के अन्दर, दीवारों से सटी हुईं दो लम्बी बेंचें थीं. पायलेट भी दिखाई दे रहा था, उसके लिए कोई कैबिन नहीं था, सिर्फ एक हल्का सा दरवाज़ा था, वो खुला था. जब मैं हवाई जहाज़ के भीतर आया तो उसने मुझे देखकर हाथ हिलाया. 

इससे मेरा मूड एकदम अच्छा हो गया, और मैं आराम से बैठ गया – पैर सूटकेस पे रखके. 

मुसाफ़िर एक दूसरे के सामने बैठे थे. मेरे सामने गुलाबी कमीज़ें बैठी थीं. पायलेट कभी इंजिन चालू करता, कभी बन्द करता. सारी बातों की ओर देखते हुए ऐसा लग रहा था, कि बस, अभ्भी उड़ने वाले हैं. मैंने बेंच को पकड़ना भी शुरू कर दिया, मगर तभी हवाई जहाज़ की तरफ़ एक लॉरी आई, जिसमें ठसाठस लोहे का सामान भरा था. लॉरी से दो आदमी उछल कर बाहर आए. उन्होंने पायलेट से चिल्लाकर कुछ कहा. अपनी गाड़ी का बोर्ड निकाला, हमारे लाइनर के ठीक दरवाज़े पे आए और सीधे हवाई जहाज़ में अपनी लोहे की भारी भरकम चीज़ें चढ़ाने लगे.  

जब लॉरी वाले ने अपना पहला सामान हवाई जहाज़ की पूँछ में फेंका, तो पायलेट ने देखा और कहा: “वहाँ धीरे से फ़ेंको. क्या फर्श तोड़ने का इरादा है?” मगर लॉरी वाले ने कहा: ”घबराओ नहीं!” तभी उसका साथी अगला डला लाया और फिर:  “ब्र्याक!” पहले वाला एक और लाया:  “श्वार्क!” एक और:  “बूत्स!” फिर और:  “ज़िन!” पायलेट कहता है:  “ऐ, लोगों! सब कुछ पूँछ में मत फेंको. वर्ना तो मैं हवा में कुँलाटें लगाने लगूँगा. पूँछ के बल कुँलाटें – और, शाबाश.”

लॉरी वाला बोला:  “डरो नहीं!” और फिर से: ”बाम्स!” ”ग्ल्यान्त्स!” पायलेट बोला:  “क्या अभी बहुत है?”  “क़रीब डेढ़ टन,” लॉरी वाले ने जवाब दिया. अब हमारे पायलेट को गुस्सा आ गया और उसने दोनों हाथों से सिर पकड़ लिया.  “तुम क्या कर रहे हो?” वो चिल्लाया. पागल हो गए हो क्या! आप समझ रहे हैं, कि मैं टेक-ऑफ़ नहीं कर पाऊँगा? आँ?!” मगर लॉरी वाले ने फिर कहा:  “डरो नहीं!” और फिर से: 

“ब्रूम्स!” “ब्राम्स!”

इस सबसे हमारे हवाई जहाज़ में बेचैन सी ख़ामोशी छा गई. मम्मा का चेहरा फ़क् हो गया, और मेरे पेट में गुड़गुड़ होने लगी. और तभी:  “ब्राम्स!” पायलेट ने अपनी टोपी उतार दी और चीख़ा:  “मैं तुमसे आख़िरी बार कह रहा हूँ – अब और लादना बन्द करो! मेरा इंजिन टूट जाएगा! लो, सुनो!” और उसने इंजिन चालू किया. पहले हमने एक सी आवाज़ सुनी: त्रर् र् र् र् र् .......फिर न जाने कहाँ से: चाव-चाव-चाव-चाव... और फिर एकदम: ख्लूप-ख्लूप-ख्लूप... फिर अचानक: स्युप-स्युप-स्युप.....पीइ- पीइ-! पीइ...

पायलेट बोला:  “तो, ऐसे इंजिन के होते हुए क्या ज़्यादा वज़न लादा जा सकता है?”

लॉरी वाले ने जवाब दिया:  “डरो नहीं! ये हम सिर्गाचेव के हुक्म से लाद रहे हैं. सिर्गाचेव ने हुक्म दिया, और हम लाद रहे हैं.” 

हमारे पायलेट ने बुरा मुँह बनाया और चुप हो गया. मम्मा पीली पड़ गई, और बूढ़ी औरत का सुअर का पिल्ला अचानक चिंघाड़ने लगा, मानो समझ गया हो कि मामला बुरा है. मगर लॉरी वाले लगातार अपना ही काम किए जा रहे थे:  “त्रूख!”  “त्रूख!” मगर पायलेट ने विद्रोह कर दिया:  “आप मुझसे फ़ोर्स्ड-लैण्डिंग करवाएँगे! पिछली गर्मियों में भी दस किलोमीटर्स दूर कोश्किनो तक भी खींच नहीं पाया था. मुझे खेत में लैण्ड करना पड़ा था! ये ख़ूब है, आपके ख़याल से क्या पैसेंजर्स को दस मील पैदल दौड़ाऊँ?”  “डर का माहौल मत पैदा करो!” लॉरी वाले ने कहा. “चला जायेगा!” ”आपसे ज़्यादा अच्छी तरह मैं अपने जहाज़ को जानता हूँ, कि जा सकता है या नहीं!” पायलेट चिल्लाया. “क्या, मैं पूरे जहाज़ को बरबाद कर दूँ? सिर्गाचेव को इसके लिए सज़ा नहीं होगी, नहीं. मगर मुझे तो जेल हो ही जाएगी!”  “नहीं होगी,” लॉरी वाले ने कहा. “और अगर बिठा दिया, तो दूसरा ले आऊँगा.” और, जैसे कुछ हुआ ही न हो:  “बर्रीन्ज़!”

अब मम्मा खड़ी हो गई और बोली:  “कॉम्रेड पायलेट! क्या फ़्लाइट शुरू होने तक मेरे पास पाँच मिनट का समय है?”  “जाइए,” पायलेट ने कहा,” मगर फ़ुर्ती से...और सूटकेस क्यों ले जा रही हैं?”  “मैं कपड़े बदलना चाहती हूँ,” मम्मा ने बेझिझक कहा, “मुझे बेहद गर्मी लग रही है. गर्मी से मेरा दम निकल जाएगा.”  “जल्दी ...” पायलेट ने कहा. मम्मा ने मुझे बगल में पकड़ा और दरवाज़े की ओर लाई. वहाँ लॉरी वाले ने मुझे 

 


पकड़ लिया और ज़मीन पर रख दिया. मम्मा मेरे पीछे कूद गई. लॉरी वाले ने उसे सूटकेस थमा दी. और, हालाँकि हमारी मम्मा हमेशा से कमज़ोर है, मगर इस समय उसने हमारी भारी-भरकम सूटकेस को कंधे पर रख लिया और हवाई जहाज़ से दूर जाने लगी. वो टर्मिनल की तरफ़ जाने लगी. मैं उसके पीछे भाग रहा था. पोर्च में दादा वाल्या खड़े थे. जब उन्होंने हमें देखा तो सिर्फ हाथ हिला दिए. शायद, वो फ़ौरन सब कुछ समझ गए, क्योंकि उन्होंने मम्मा से कुछ भी नहीं पूछा. हम सबने जैसे एक राय बना ली थी, चुपचाप इस बेढंगी बिल्डिंग से से दूसरी ओर चलते रहे, हमारी घोड़ा गाड़ी की ओर. हम गाड़ी में बैठ गए और चलने ही वाले थे, कि मैंने मुड़ कर देखा कि एअरपोर्ट से धूल भरे रास्ते पर, सूखी पगडंडी पे हमारी तरफ़ गिरते पड़ते और हाथ फ़ैलाए भागी चली आ रही हैं दोनों गुलाबी कमीज़ें. उनके पीछे अपने कसकर लिपटे कैटरपिलर को सीने से चिपटाए उनकी मम्मा भाग रही थी.  

हमने उन सबको गाड़ी में बिठा लिया. दादा वाल्या ने लगाम खींची, घोड़ा चल पड़ा और मैं पीठ टिकाकर बैठ गया. चारों ओर नीला आसमान था, गाड़ी चरमरा रही थी, और आह, कितनी बढ़िया ख़ुशबू थी खेत की, डामर की और तमाकू की.


*******





    










39.

बीस साल पलंग के नीचे


 वो सर्दियों की शाम मैं कभी नहीं भूलूँगा. कम्पाऊण्ड में ठण्ड थी, तेज़ हवा चल रही थी, वो गालों को, जैसे चाकू से चीर रही थी, बर्फ खूब तेज़ी से गोल गोल घूम रहा थी. बहुत उदास और ‘बोरिंग’ लग रहा था, बिसूरने को जी कर रहा था, और ऊपर से पापा और मम्मा पिक्चर देखने चले गए थे. तो, जब मीश्का ने फ़ोन करके मुझे अपने घर बुलाया, तो मैं फ़ौरन कपड़े पहनकर उसके घर चला गया. वहाँ ख़ूब उजाला था और गर्माहट थी और काफ़ी सारे लोग आए थे.  अल्योन्का आई, उसके पीछे पीछे कोस्तिक और अन्द्र्यूशा आए. हम सभी तरह के खेल खेल रहे थे, और ख़ूब शोर हो रहा, ख़ुशी हो रही थी. और अंत में अल्योन्का ने अचानक कहा: 

 “और अब, छुपन-छुपैया खेलते हैं! चलो, छुपन-छुपैया खेलें!”

हम छुपन-छुपैया खेलने लगे. ये बहुत बढ़िया था, क्योंकि मैं और मीश्का पूरे समय इस तरह से ट्रिक चलते रहे, कि ढूँढ़ने का काम छोटे बच्चों पर पड़े : कोस्तिक पे या अल्योन्का पे, और हम ख़ुद छुपते रहे और छुटकों की नाक में दम करते रहे. मगर हमारे सारे खेल सिर्फ मीश्का के कमरे में ही हो रहे थे, और जल्दी ही हम इससे ‘बोर’ हो गए, क्योंकि कमरा बहुत छोटा था, तंग था और हमें या तो परदे के पीछे, या अलमारी के पीछे या सन्दूक के पीछे ही छुपना पड़ रहा था, और अंत में हम चुपके से मीश्का के कमरे से छिटक कर बड़े, लम्बे कॉरीडोर में खेलने लगे.

कॉरीडोर में खेलने में ज़्यादा मज़ा आ रहा था, क्योंकि हर दरवाज़े के पास हैंगर-स्टैण्ड थे, जिनमें ओवरकोट और फ़र-कोट लटक रहे थे. ये हमारे लिए काफ़ी अच्छा था, क्योंकि, जैसे, अगर कोई हमें ढूँढ़ने आ रहा है, तो वह फ़ौरन तो अंदाज़ नहीं लगा पायेगा कि मैं मरीया  सिम्योनव्ना के ओवरकोट के पीछे छुपा हूँ और फ़र-कोट के नीचे रखे लम्बे बूट्स में घुस गया हूँ.           

जब कोस्तिक पे ढूँढ़ने की बारी आई, तो वह दीवार की तरफ़ मुँह करके खड़ा हो गया और ज़ोर से चिल्लाने लगा:  “एक! दो! तीन! चार! पाँच! पहुँचा मैं तुम्हारे पास!” 

अब सब बच्चे छुपने के लिए अलग-अलग दिशाओं में भागे, कोई कहीं, तो कहीं. कोस्तिक ने कुछ देर इंतज़ार किया और फिर से चिल्लाया:  “एक! दो! तीन! चार! पाँच! पहुँचा मैं तुम्हारे पास! दूसरी बार!”

ये दूसरा सिग्नल समझा जाता था. मीश्का फ़ौरन खिड़की की सिल पे चढ़ गया, अल्योन्का – अलमारी के पीछे, और मैं और अन्द्र्यूश्का कॉरीडोर में भागे. अन्द्र्यूश्का ज़्यादा कुछ सोचे बगैर मरीया  सिम्योनव्ना के फ़र-कोट के अन्दर घुस गया, जहाँ मैं हमेशा छुपता था, और पता चला कि अब मेरे पास छुपने के लिए कोई जगह ही नहीं बची! मैं अन्द्र्यूश्का को एक चांटा मारने ही वाला था, कि मेरी जगह छोड़ दे, मगर तभी कोस्तिक ने तीसरा सिग्नल भी दे दिया:  “छुपे, ना छुपे, चला मैं आँगन से!”

मैं डर गया, कि वो मुझे अभ्भी देख लेगा, क्योंकि मैं छुपा ही नहीं था, और मैं घायल ख़रगोश की तरह कॉरीडोर में इधर उधर भागने लगा. तभी मैंने एक खुला हुआ दरवाज़ा देखा और मैं फ़ौरन उछल कर उसके भीतर चला गया.

 

ये कोई एक कमरा था, और उसमें सामने ही, दीवार के पास, एक पलंग रखा था, ऊँचा और चौड़ा, तो, मैं फ़ौरन इस पलंग के नीचे घुस गया. वहाँ थोड़ा अंधेरा था और कई सारी चीज़ें पड़ी थीं, मैं ग़ौर से उन्हें देखने लगा. पहली बात, इस पलंग के नीचे अलग-अलग फ़ैशन के कई सारे औरतों के जूते थे, मगर वे सब काफ़ी पुराने थे, लकड़ी की एक चिकनी सूटकेस भी थी, और सूटकेस के ऊपर एल्युमिनियम का एक बेसिन उल्टा रखा था, मैं बड़े आराम से एडजस्ट हो गया: सिर को एल्युमिनियम के बर्तन पे, कमर के नीचे सूटकेस – बहुत हलका और आरामदेह था. मैं अलग-अलग तरह के स्लीपर्स और चप्पलें देख रहा था, और सोच रहा था, कि मैं कितनी अच्छी तरह से छुपा था और कितना मज़ा आयेगा, जब कोस्तिक मुझे यहाँ ढूँढ़ेगा.            

मैंने कंबल का किनारा ज़रा सा हटाया, जो पलंग के चारों ओर से फ़र्श तक लटक रहा था, और जिसने पूरे कमरे को मुझसे छुपा रखा था: मैं दरवाज़े की ओर देखना चाह रहा था, जिससे ये देख सकूँ कि कैसे कोस्तिक भीतर आकर मुझे ढूँढ़ता है. मगर कमरे में कोई कोस्तिक-वोस्तिक नहीं, बल्कि इफ़्रसीन्या पित्रोव्ना आई, ये थी तो प्यारी सी बूढ़ी औरत, मगर कुछ-कुछ बाबा इगा (रूसी लोक कथाओं की जादूगरनी) जैसी थी. 

वह तौलिए से हाथ पोंछती हुई आई. मैं पूरे समय ख़ामोशी से उसकी तरफ़ देख रहा था, सोच रहा था, कि जब कोस्तिक मुझे पलंग के नीचे से खींचकर निकालेगा, तो वह कितनी ख़ुश हो जाएगी. मैं भी हँसाने के लिए उसका कोई जूता दाँतों में पकड़ लूँगा, तब तो वह हँसते हँसते गिर ही पड़ेगी. मुझे यक़ीन था कि बस एक-दो सेकण्ड बाद ही कोस्तिक मुझे ज़रूर ढूँढ़ लेगा. इसलिए मैं अपने आप ही हँस रहा था, बिना आवाज़ किए. 

मेरा मूड बेहद अच्छा था. मैं पूरे समय इफ़्रसीन्या पित्रोव्ना को देखे जा रहा था. इस बीच वो बड़े आराम से दरवाज़े की ओर गई और यूँ ही उसे ज़ोर से बन्द कर दिया. इसके बाद, देखता क्या हूँ, कि चाभी घुमा दी – और बस, काम तमाम! अन्दर बन्द हो गई. उसने सारी दुनिया से अपने आप को बन्द कर लिया! मेरे समेत और एल्यूमिनियम के बर्तन समेत. चाभी दो बार घुमा दी.

कमरे में अचानक अजीब सी ख़ामोशी और वहशत सी छा गई. मगर मैंने सोचा कि उसने कुछ ही देर के लिए दरवाज़ा बन्द किया है, एक मिनट को, और अभी खोल देगी और सब ठीक हो जाएगा, और फिर से होगी हँसी और ख़ुशी, और कोस्तिक अपने आप को बड़ा ख़ुशनसीब समझेगा कि ऐसी मुश्किल जगह पे भी उसने मुझे ढूँढ़ लिया! इसलिए, मैं हालाँकि थोड़ा सा नर्वस ज़रूर हुआ था, मगर मैं इफ्रसीन्या पित्रोव्ना को देखता रहा, कि आगे वह क्या करती है. 

वो पलंग पे बैठ गई, और मेरे ऊपर स्प्रिंग्स चरमरा उठे, और गाना गाने लगे, मुझे उसके पैर नज़र आ रहे थे. उसने एक के बाद दूसरा जूता उतार दिया और सिर्फ मोज़ों में दरवाज़े तक गई, मेरा दिल ख़ुशी से उछलने लगा. मुझे यक़ीन था कि अब वो ताला खोलेगी, मगर ये बात नहीं थी. सोचिए, उसने – खट्! – और लाइट बन्द कर दिया. मैंने फिर से स्प्रिंग्स को अपने सिर के ऊपर बिसूरते हुए सुना, चारों ओर घुप अंधेरा था, और इफ्रसीन्या पित्रोव्ना अपने पलंग पे लेटी है, और उसे ये नहीं मालूम है, कि मैं भी यहाँ हूँ, पलंग के नीचे. मैं समझ गया, कि बुरी तरह फँस गया हूँ, मैं अब क़ैद में हूँ, जाल में फँस गया हूँ.

 मैं कितनी देर यहाँ पड़ा रहूँगा? अगर एक या दो घण्टे भी पड़ा रहूँ तो ख़ुशी की बात होगी! मगर, यदि सुबह तक रहना पड़ा तो? और, सुबह भी बाहर कैसे निकलूँ? और, अगर मैं घर नहीं पहुँचा, तो पापा और मम्मा ज़रूर मिलिशिया में शिकायत कर देंगे. मिलिशियामैन आएगा खोजी-कुत्ते के साथ. उसका नाम मुख़्तार है.

और, अगर हमारे मिलिशिया में कुत्ते ही न हुए तो? और, अगर मिलिशिया मुझे न ढूँढ़ पाई तो? और, अगर इफ्रसीन्या पित्रोव्ना सुबह तक सोती रही तो, और सुबह अपने फ़ेवरेट स्क्वेयर पे बैठने के लिए गई और जाते जाते मुझे बन्द कर गई तो? तब कैसे? मैं, बेशक, उसकी अलमारी से कुछ निकाल कर खा लूँगा, और, जब वो वापस आएगी, तो मुझे फिर पलंग के नीचे जाना पड़ेगा, क्योंकि मैं उसकी चीज़ें खा चुका होऊँगा, और वह मुझे क़ानून के हवाले कर देगी! और, इसलिए, शर्मिन्दगी से बचने के लिए क्या मैं हमेशा उसके पलंग के नीचे पड़ा रहूँगा? ये सबसे बड़ी मुसीबत होगी! बेशक, इसमें कुछ अच्छी बात भी है, कि मैं स्कूल का पूरा जीवन पलंग के नीचे बिता दूँगा, मगर सर्टिफ़िकेट कैसे मिलेगा, ये प्रॉब्लेम है. सर्टिफ़िकेट – बड़े हो जाने का! पलंग के नीचे बीस साल बिताकर मैं बड़ा तो नहीं हो जाऊँगा, मैं बूढ़ा ही हो जाऊँगा.     

 अब मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ और मैं गुस्से में उस बेसिन पर घूँसे बरसाने लगा, जिस पर मेरा सिर था! भयानक आवाज़ हुई! इस डरावनी ख़ामोशी में, घुप अंधेरे में और मेरी परेशान हालत में मुझे ये आवाज़ बीस गुना डरावनी प्रतीत हुई. उस आवाज़ से मैं जैसे बहरा हो गया.

 डर के मारे मेरा दिल जम गया. और मेरे ऊपर, इस भयानक आवाज़ से, इफ़्रसीन्या पित्रोव्ना जाग गई. शायद वह काफ़ी देर से गहरी नींद में थी, और अचानक ये – पलंग के नीचे से – ताख़-ताख़...! वह कुछ देर पड़ी रही, फिर गहरी साँस लेकर कमज़ोर और डरी हुई आवाज़ में अंधेरे से पूछने लगी:  “चौ-की-दा-र?!”        

मैं उससे कहना चाहता था: “क्या आप भी, इफ़्रसीन्या पित्रोव्ना, यहाँ कहाँ से आया ‘चौकीदार’ ? सो जाइए, ये मैं हूँ, डेनिस्का!” मैं उससे ये सब कहना चाहता था, मगर इसके बदले पूरी ताक़त से छींक पड़ा:  “आप्छी! छी:! छी:! छी:!...” शायद, इस सब करामात से पलंग के नीचे धूल ऊपर उठी होगी, मगर मेरी छींक से इफ्रसीन्या पित्रोव्ना को यक़ीन हो गया कि पलंग के नीचे कोई भयानक बात हो रही है, वह बेहद डर गई और ज़ोर से चिल्लाई:  “चौकीदार!” और, मैं न जाने क्यों, फिर से पूरी ताक़त से छींका:  “आप्छी-ऊ ऊ!”

जैसे ही इफ़्रसीन्या पित्रोव्ना ने ये बिसूरने की आवाज़ सुनी, वो और भी धीमी और कमज़ोर आवाज़ में चिल्लाई:  “चोरी कर रहे हैं!...” ज़ाहिर है, कि फिर उसने ही सोचा कि अगर चोरी कर रहे हैं, तो ये सिर्फ ग़लत बात है, डरावनी बात नहीं है. और अगर...तो, अब वो ज़ोर से चिल्लाई:  “मार डालेंगे!” 

कितना झूठ बोलती है! कौन उसे मार डालेगा? और किसलिए? और किससे? क्या रात को झूठमूठ चिल्लाना चाहिए? इसलिए मैंने फ़ैसला कर लिया, कि ये सब ख़त्म करने का समय आ गया है, और जब वो सो ही नहीं रही है, मुझे बाहर आ जाना चाहिए. 

मेरे नीचे की हर चीज़ गरज रही थी, ख़ासकर बर्तन, क्योंकि अँधेरे में तो मुझे दिखाई नहीं दे रहा था ना. शैतान जैसा शोर हो रहा था, और इफ्रसीन्या पित्रोव्ना अजीब तरह से चिल्ला रही थी:

 “चोरीकार! चौकी कर रहे हैं!”

 मैं उछल कर बाहर आया, और दीवार टटोलने लगा, कि स्विच कहाँ है, मगर स्विच के बदले मेरा हाथ चाभी पर पड़ा, मैं ख़ुश हो गया कि ये दरवाज़ा है. मैंने चाभी घुमा दी, मगर पता चला कि मैंने अलमारी का दरवाज़ा खोल दिया है, मैं इस दरवाज़े की चौख़ट से गिर गया, और खड़ा होकर चारों ओर भागने की कोशिश करने लगा, सिर्फ सुन रहा था कि कैसे मेरे सिर पे सामान गिर रहा है.

इफ्रसीन्या पित्रोव्ना चिंघाड़ रही थी, और मैं डर के मारे गूँगा हो गया, तभी सचमुच के दरवाज़े पर कोई ज़ोर ज़ोर से मारने लगा! “ऐ, डेनिस्का! फ़ौरन बाहर आ जा! इफ्रसीन्या पित्रोव्ना! डेनिस्का को वापस दे दो, उसके लिए उसके पापा आए हैं!” और पापा की आवाज़:  “प्लीज़, बताइए, क्या मेरा बेटा आपके यहाँ है?” तभी भक् से लाइट जल उठी. दरवाज़ा खुला. और हमारी पूरी टोली कमरे में घुस गई. वे कमरे में दौड़ने लगे, मुझे ढूँढ़ने लगे, और जब मैं अलमारी से बाहर आया, तो मुझ पर पड़ी थीं दो टोपियाँ और तीन ओवरकोट. पापा ने कहा:  “तेरे साथ क्या हुआ था? तू कहाँ खो गया था?” कोस्तिक और मीश्का ने भी कहा:  “तू कहाँ था, तेरे साथ क्या एडवेन्चर हुआ? बता!” मगर मैं ख़ामोश रहा. मुझे ऐसा लग रहा था, कि मैं वाक़ई में बीस साल पलंग के नीचे बैठकर आया हूँ. 

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40.

 गेंद वाली लड़की

 


एक बार मैं अपनी पूरी क्लास के साथ सर्कस गया. सर्कस जाते हुए मैं बहुत ख़ुश था, क्योंकि जल्दी ही मैं आठ साल का होने वाला हूँ, मगर सर्कस मैं सिर्फ एक बार गया हूँ, और वो भी काफ़ी पहले. ख़ास बात, अल्योन्का सिर्फ छह साल की है, मगर वह पूरे तीन बार सर्कस जा चुकी है. इससे मुझे बहुत इन्सल्ट लगती है. और अब, हमारी पूरी क्लास सर्कस के लिए निकली, और मैं सोच रहा था, कि मैं बड़ा हो गया हूँ और अब, इस समय सब कुछ अच्छी तरह देखूँगा. पिछली बार मैं छोटा था, मुझे समझ में ही नहीं आता था, कि सर्कस क्या होती है. उस समय, जब सर्कस के अरेना में कलाबाज़ निकले और एक के सिर पे दूसरा चढ़ गया, तो मैं ठहाके मारते हुए हँस रहा था, क्योंकि मैंने सोचा कि ये सब वो लोग जानबूझकर कर रहे हैं, हँसाने के लिए, क्योंकि घर में तो मैंने बड़े अंकल्स को एक दूसरे के ऊपर चढ़ते हुए कभी नहीं देखा था. रास्ते पर भी ऐसा कभी नहीं हुआ था. इसलिए मैं ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगा रहा था. तब तक मुझे नहीं मालूम था कि ये आर्टिस्ट्स अपना हुनर दिखा रहे हैं. उस बार मैं ज़्यादातर ऑर्केस्ट्रा की तरफ़ ही देख रहा था, कि वे कैसे बजाते हैं – कोई ड्रम बजा रहा था, कोई पाईप – डाइरेक्टर डंडी हिलाता है, मगर उसकी तरफ़ कोई नहीं देखता, बल्कि सब अपनी मर्ज़ी से बजा रहे हैं. ये मुझे बहुत अच्छा लगा था, मगर जब मैं इन संगीतकारों की तरफ़ देख रहा था, तो अरेना के बीच में आर्टिस्ट्स अपना कमाल दिखा रहे थे. मैंने उनकी ओर नहीं देखा और सबसे मज़ेदार चीज़ छोड़ दी. बेशक, उस समय मैं बिल्कुल बेवकूफ़ ही तो था.

 तो, हमारी पूरी क्लास सर्कस पहँची. मुझे एकदम पसन्द आ गया कि यहाँ कोई ख़ास तरह की ख़ुशबू है, दीवारों पर चमकदार तस्वीरें लगी हैं, छत खूब ऊँची है, और वहाँ अलग-अलग तरह के चमचमाते झूले टंगे हैं. इसी समय म्यूज़िक शुरू हो गया और सब लोग अपनी अपनी कुर्सी पर बैठने के लिए लपके, फिर ‘एस्किमो’ ख़रीदी और खाने लगे. अचानक लाल परदे के पीछे से लोगों की एक पूरी क़तार निकली, उन्होंने बेहद ख़ूबसूरत कपड़े पहने थे – पीली धारियों वाली लाल ड्रेस. वे परदे के किनारों पर खड़े हो गए, और उनके बीच से काले सूट में उनका डाइरेक्टर निकला. उसने ज़ोर से कुछ कहा, जो मुझे समझ में नहीं आया, और म्यूज़िक तेज़-तेज़ और ज़ोर से बजने लगा, और अरेना में आया कलाकार-बाज़ीगर, और मनोरंजन शुरू हो गया. वह गेंदें उछाल रहा था, दस या सौ एक साथ ऊपर की ओर, और उन्हें वापस पकड़ रहा था. फिर उसने धारियों वाली गेंद पकड़ी और उससे खेलने लगा...वह सिर से भी उसे मार रहा था, मुँह से भी, माथे से भी, और पीठ पर भी घुमा रहा था, और एड़ी से दबा रहा था, गेंद उसके पूरे जिस्म पर इस तरह घूम रही थी जैसे उसमे चुम्बक चिपका हो. ये बहुत बढ़िया था. और फिर अचानक बाज़ीगर ने गेंद पब्लिक की ओर उछाल दी, और वहाँ सचमुच की गड़बड़ होने लगी, क्योंकि उस गेंद को मैंने पकड़कर वालेर्का की ओर फेंक दिया, और वालेर्का ने मीश्का की ओर, और मीश्का ने बगैर किसी बात के, अचानक निशाना साध कर म्यूज़िक-डाइरेक्टर की ओर उसे फेंका, गेंद उसे नहीं लगी, बल्कि ड्रम पर जा गिरी! बाम्! ड्रम बजाने वाले को गुस्सा आ गया और उसने गेंद को वापस बाज़ीगर की तरफ़ उछाल दिया, मगर गेंद वहाँ तक नहीं पहुँची, वो एक ख़ूबसूरत आण्टी के जूड़े पे बैठ गई, और पता चला कि उसने विग लगाया था, जो गिर गया. हम सब इतनी ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाने लगे कि बस दम ही निकलते-निकलते बचा. 

और, जब बाज़ीगर परदे के पीछे भाग गया, तो हम बड़ी देर तक शांत न हो सके. मगर फिर अरेना में एक बड़ी-भारी नीली गेंद लाई गई, और अनाऊन्सर अंकल बीचोंबीच आकर कुछ चिल्लाया. कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, और ऑर्केस्ट्रा ने भी फिर से बढ़िया धुन बजाना शुरू कर दिया, बस इस बार वो इतनी जल्दी-जल्दी नहीं बज रहा था, जितना पहले बज रहा था.

 अचानक एक छोटी सी लड़की भागते हुए अरेना में आई. मैंने इतनी छोटी और इतनी सुन्दर लड़कियों को पहले कभी नहीं देखा था. उसकी आँखें नीली-नीली थीं, और उनके चारों ओर लम्बी पलकें थीं. उसने चांदी जैसी चमचमाती ड्रेस और एक हवाई ‘केप’ पहना था, उसके हाथ लम्बे थे; उसने पंछी की तरह हाथ हिलाए, और उछल कर इस ख़ूब बड़ी गेंद पर चढ़ गई, जिसे उसीके लिए लाए थे. वह गेंद पर खड़ी हो गई. और फिर अचानक उस पर दौड़ने लगी, जैसे गेंद से कूदना चाहती हो, मगर गेंद उसके पैरों के नीचे घूम रही थी, और वह उसके ऊपर ऐसे कर रही थी, मानो दौड़ रही हो, मगर असल में अरेना का गोल-गोल चक्कर लगा रही थी. मैंने ऐसी लड़कियों को पहले कभी नहीं देखा था. वे सब साधारण थीं, मगर, ये कोई ख़ास तरह की लड़की थी. वह अपने नन्हे-नन्हे पैरों से गेंदपर इस तरह दौड़ रही थी, जैसे समतल ग्राऊण्ड पे दौड़ रही हो, और नीली गेंद उसे अपने ऊपर उठाए-उठाए ले जा रही थी : वह उस पर सीधे, आगे, पीछे, दाएँ, बाएँ, जहाँ चाहे वहाँ जा सकती थी! जब इस तरह से दौड़ रही थी, मानो तैर रही हो, तो वह प्रसन्नता से मुस्कुरा रही थी, और मैंने सोचा कि, शायद, ये ही थम्बेलिना है, इत्ती छोटी, प्यारी और असाधारण थी वो. इस समय वह रुक गई और किसी ने उसे घुंघरुओं वाले ब्रेसलेट्स दिए, उसने अपने जूतों पर, और हाथों में उन्हें पहन लिया और फिर से धीरे-धीरे गेंद पर घूमने लगी, जैसे डान्स कर रही हो. ऑर्केस्ट्रा शांत किस्म का म्यूज़िक बजाने लगा, और लड़की के लम्बे हाथों के सुनहरे घुंघरू कितनी महीन आवाज़ कर रहे थे. ये सब किसी परी-कथा के समान था. अब लाइट भी बन्द कर दी गई, और ऐसा लगा कि लड़की अंधेरे में प्रकाशित होना भी जानती है, और वो हौले-हौले गोल चक्कर लगा रही थी, चमक रही थी, और घुंघरुओं की नाज़ुक आवाज़ कर रही थी, और ये सब आश्चर्यजनक था, - मैंने अपनी ज़िन्दगी में इस तरह की कोई चीज़ नहीं देखी थी. 

और जब लाइट जलाई गई, तो सब लोग तालियाँ बजाने लगे, और ‘शाबाश’ चिल्लाने लगे, मैं भी ‘शाबाश’ चिल्लाया. लड़की अपनी गेंद से नीचे उछली और सामने की ओर भागने लगी, हमारी तरफ़, और भागते-भागते बिजली की तरह सिर के बल कुलाँटे लेने लगी, और बार-बार कुलाँटे लेते हुए सामने आने लगी. मुझे ऐसा लगा कि अभ्भी वह रेलिंग से टकरा जाएगी, और मैं डर गया, उछल कर खड़ा हो गया और उसकी तरफ़ भागने को तैयार हो गया, जिससे उसे पकड़ कर बचा सकूँ, मगर लड़की अचानक रुक गई, जैसे ज़मीन में गड़ गई हो, उसने अपने दोनों हाथ फ़ैलाए, ऑर्केस्ट्रा ख़ामोश हो गया, और वह खड़ी होकर मुस्कुराने लगी. सब लोग पूरी ताक़त से तालियाँ बजाने लगे और पैरों से भी खटखटाने लगे. इसी पल लड़की ने मेरी तरफ़ देखा, और मैंने देखा, कि उसने देख लिया है कि मैं उसे देख रहा हूँ और मैं ये भी देख रहा हूँ, कि वो मुझे देख रही है, और उसने मेरी ओर देखते हुए हाथ हिलाया और मुस्कुरा दी. उसने अकेले मेरी तरफ़ ही देखकर हाथ हिलाया था और मुस्कुराई थी. मेरा दिल फिर से भाग कर उसके पास जाने को करने लगा, और मैंने उसकी तरफ़ हाथ बढ़ा दिए. उसने अचानक सबको एक फ्लाइंग किस दिया और लाल परदे के पीछे भाग गई, जहाँ सारे आर्टिस्ट्स भाग कर चले गए थे. फिर अरेना में आया एक जोकर अपने मुर्गे को लेकर और छींकने लगा, गिरने लगा, मगर मुझे उससे कोई मतलब नहीं था. मैं बस, पूरे समय गेंद वाली लड़की के बारे में ही सोचता रहा, कि वो कितनी वन्डरफुल है, कैसे उसने मेरी तरफ़ देखकर हाथ हिलाया था और मुस्कुराई थी, मैं कुछ और नहीं देखना चाहता था. बल्कि, मैंने अपनी आँखें कस के बन्द कर लीं, जिससे लाल नाक वाले इस बेवकूफ़ जोकर को न देखना पड़े,  क्योंकि उसने मेरी वाली लड़की का मज़ा किरकिरा कर दिया था: मेरे ख़यालों में अभी तक नीली गेंद पे खड़ी हुई वही लड़की थी. 

इसके बाद इंटरवल हुआ, और सब लड़के सिट्रो पीने के लिए बुफ़े की ओर भागे, मगर मैं हौले से नीचे उतरा और परदे की तरफ़ गया, जहाँ से सारे आर्टिस्ट्स बाहर निकलते थे. 

मैं और एक बार उस लड़की को देखना चाहता था, और इसलिए परदे के पास खड़े होकर देखता रहा – क्या पता अचानक वो बाहर आ जाए? मगर वो नहीं आई. 

इंटरवल के बाद शेरों वाला प्रोग्राम हुआ, मुझे अच्छा नहीं लग रहा था कि रिंग-मास्टर उनकी पूँछें पकड़कर उन्हें घसीट रहा था, जैसे वो शेर नहीं, बल्कि मरी हुई बिल्लियाँ हों. वह उन्हें एक जगह से दूसरी जगह पे बैठने के लिए मजबूर कर रहा था, या उन्हें फ़र्श पर लिटा कर उनके ऊपर से चल रहा था, जैसे कालीन पर चल रहा हो, शेरों को देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे उन्हें इस बात की शिकायत हो कि उन्हें चैन से लेटने भी नहीं देते हैं. ये बिल्कुल मज़ेदार नहीं था, क्योंकि शेर को तो असीमित जंगलों में शिकार करना चाहिए, जंगली भैंसों का पीछा करना चाहिए, अपनी भयंकर दहाड़ से आस-पास के इलाके को बहरा करना चाहिए, जो लोगों को काँपने पर मजबूर कर दे. और, ये तो शेर नहीं, बल्कि पता नहीं कौन लग रहा था. 

जब ‘शो’ ख़तम हुआ और हम घर जाने लगे, मैं पूरे समय गेंद वाली लड़की के बारे में ही सोच रहा था. 

शाम को पापा ने पूछा:  “तो? अच्छी लगी सर्कस?” मैंने कहा:  “पापा! सर्कस में एक छोटी लड़की है. वो नीली गेंद पर डान्स करती है. इतनी प्यारी, सबसे बढ़िया! उसने मेरी तरफ़ देखकर हाथ हिलाया और मुस्कुराई! क़सम से, सिर्फ मेरी तरफ़! समझ रहे हो, पापा? अगले इतवार को सर्कस जाएँगे! मैं तुमको दिखाऊँगा!” पापा ने कहा:  “ज़रूर जाएँगे. मुझे सर्कस बहुत अच्छी लगती है!” 

मम्मा ने हम दोनों की ओर ऐसे देखा, जैसे पहली बार देख रही हो. 

...और, एक लम्बा हफ़्ता शुरू हुआ, मैं खा रहा था, पढ़ाई कर रहा था, उठ रहा था, सो रहा था, खेल रहा था, और झगड़ा भी कर रहा था, मगर फिर भी हर रोज़ सोच रहा था कि न जाने इतवार कब आएगा, और मैं पापा के साथ कब सर्कस जाऊँगा, और फिर से गेंद वाली लड़की को देखूँगा, और पापा को दिखाऊँगा, और, हो सकता है, पापा उसे हमारे घर बुला लें, तब मैं उसे अपनी ब्राऊनिंग-पिस्तौल दूँग़ा और पालों वाले जहाज़ की तस्वीर बनाऊँगा. 

मगर इतवार को पापा नहीं जा सके. उनके पास दोस्त लोग आ गए, वे कुछ चार्ट्स देख रहे थे, और चिल्ला रहे थे, और सिगरेट पी रहे थे, और चाय पी रहे थे और काफ़ी देर तक बैठे रहे, और उनके जाने के बाद मम्मा का सिर दर्द करने लगा, और पापा ने मुझसे कहा:  “अगले इतवार को...प्रॉमिस करता हूँ, पक्का प्रॉमिस.”

 मैं फिर से अगले इतवार का इंतज़ार करने लगा, ये भी याद नहीं है कि वह हफ़्ता मैने कैसे गुज़ारा. पापा ने अपना वादा पूरा किया: वे मेरे साथ सर्कस आए और दूसरी कतार की टिकट्स ख़रीदीं, मैं ख़ुश हो गया कि हम इतने क़रीब बैठे हैं, शो शुरू हुआ, और मैं इंतज़ार करने लगा कि कब गेंद वाली लड़की आती है. मगर अनाऊन्समेंट करने वाला आदमी, अलग-अलग आर्टिस्टों के नाम लेता रहा, वे बाहर आते और हर तरह के खेल दिखाते, मगर लड़की आ ही नहीं रही थी. मैं बेचैनी के मारे थरथराने लगा, मेरा दिल बेहद चाह रहा था कि पापा उसे देखें, कि अपनी चमचमाती ड्रेस और हवाई ‘केप’ में वह कैसी असाधारण लगती है और कितनी सफ़ाई से वो नीली गेंद पर दौड़ती है. हर बार जब कोई आर्टिस्ट बाहर निकलता, मैं पापा से फ़ुसफुसा कर कहता:  “अब उसके बारे में अनाऊन्समेंट होगा!”

 मगर, वह, जैसे जानबूझकर किसी और ही का नाम लेता, और मेरे मन में उसके प्रति नफ़रत जागने लगी, मैं पूरे समय पापा से कहता रहा:  “ये भी क्या! ये तो बकवास है! ये वो नहीं है!” 

 पापा मेरी तरफ़ देखे बिना कहते:

“डिस्टर्ब न कर, प्लीज़! ये बहुत मज़ेदार है! सबसे मज़ेदार!”  

मैंने सोचा कि अगर पापा को ये बहुत मज़ेदार लग रहा है, तो इसका मतलब ये हुआ कि उन्हें सर्कस अच्छी तरह से समझ में नहीं आता है. देखते हैं, कि जब वो गेंद वाली लड़की को देखेंग़े, तो क्या कहेंगे. शायद अपनी सीट पे ही दो मीटर ऊँचे उछल पड़ेंगे...

मगर तभी अनाऊन्सर निकला और उसने अपनी गूँगी-बहरी आवाज़ में घोषणा की:  “इं-ट-र-वल!” मुझे अपने कानों पर यक़ीन ही नहीं हुआ! इंटरवल? क्यों? दूसरे सेक्शन में तो सिर्फ शेर ही होंगे! और, मेरी गेंद वाली लड़की कहाँ है? कहाँ है वो? वो क्यों नहीं आ रही है? हो सकता है, कि बीमार हो? हो सकता है, कि वह गिर गई हो और उसके दिमाग़ पे चोट लगी हो? मैंने कहा:  “पापा, जल्दी से जाकर पता लगाते हैं कि गेंद वाली लड़की कहाँ है!” पापा ने जवाब दिया:  “हाँ, हाँ! हाँ, वो तेरी बैलेन्सर कहाँ है? दिखाई नहीं दी! चल, जाकर प्रोग्राम-शीट ख़रीदते हैं!...” पापा ख़ुश और संतुष्ट थे. उन्होंने चारों ओर नज़र दौड़ाई, मुस्कुराए और बोले:  “ आह, कितनी अच्छी लगती है सर्कस! ये ख़ुशबू...दिमाग़ चकराने लगता है...” 

हम कॉरीडोर में आए. वहाँ लोगों की बेहद भीड़ थी, और चॉकलेट्स, वेफ़र्स बेचे जा रहे थे, दीवारों पर कई तरह के शेरों के थोबड़े लटक रहे थे, हम कुछ देर घूमे और आख़िर में प्रोग्राम-शीट्स बेचने वाली कंट्रोलर हमें मिल ही गई. पापा ने उससे एक प्रोग्राम-शीट ख़रीदी और देखने लगे. मुझसे रहा न गया और मैंने कंट्रोलर से पूछा:  “प्लीज़, बताइए कि गेंद वाली लड़की का प्रोग्राम कब है?”  “कौन सी लड़की का ?”

पापा ने कहा: ”प्रोग्राम में गेंद पर दिखाई गई है बैलेन्सर टी. वरन्त्सोवा. वो कहाँ है?” मैं चुपचाप खड़ा था. कंट्रोलर ने कहा:  “आह, आप तानेच्का वरन्त्सोवा के बारे में पूछ रहे हैं? वो चली गई. चली गई. आपने बड़ी देर कर दी?” मैं चुपचाप खड़ा था. पापा ने कहा:  “हमें दो हफ़्तों से चैन नहीं है. बैलेन्सर तानेच्का वरन्त्सोवा को देखना चाहते हैं, और वो नहीं है.”    कंट्रोलर बोली: हाँ, वो चली गई...अपने माँ-बाप के साथ...उसके माँ-बाप हैं “कॉपरमैन – दि टू-एवर्स” (एवर्स इन कलाकारों का उपनाम है. दि टू एवर्स से तात्पर्य है एवर्स अण्ड एवर्स. ये लोग बदन पर तांबे के रंग का पेंट पोत लिया करते थे, इस कारण उन्हें ‘कॉपरमैन’ कहा जाता था – अनु.). शायद आपने सुना हो? बेहद अफ़सोस हुआ. कल ही गए हैं.” मैंने कहा:  “देखो, पापा...”  “मुझे नहीं मालूम था, कि वो चली जाएगी. कितने अफ़सोस की बात है...ओह, तू, माय गॉड!...फिर, क्या...कुछ नहीं कर सकते...” मैंने कंट्रोलर से पूछा:

 “मतलब, पक्का, चली गई? 

उसने कहा:  “पक्का.”  “पता है, कि कहाँ गई?” उसने कहा: “व्लदिवस्तोक.” ओह, कित्ती दूर. व्लदिवस्तोक. मुझे मालूम है कि व्लदिवस्तोक नक्शे के बिल्कुल आख़िरी छोर पे है, मॉस्को से दाईं ओर. मैंने कहा:  “कित्ती दूर!” कंट्रोलर अचानक जल्दी करने लगी:  “जाइए, जाइए, अपनी जगह पे जाइए, लाइट बुझा रहे हैं! पापा ने कहा:  “चल, डेनिस्का! अब आएँगे शेर! झबरे, दहाडेंगे – भयानक! चल, भागें!” मैंने कहा:  “पापा घर जाएँगे.” उन्होंने कहा:  “एक बार...” कंट्रोलर मुस्कुराने लगी. मगर हम क्लोक-रूम की ओर चल पड़े, मैंने नंबर निकाला, और हमने अपने कोट पहने और सर्कस से निकल गए. हम ‘बुलवार’ पे चल रहे थे और बड़ी देर तक चलते रहे, फिर मैंने कहा:  “व्लदिवस्तोक – नक्शे के बिल्कुल आख़िर में है. अगर रेल से जाओ, तो वहाँ पहुँचने में पूरा महीना लग जाएगा...” पापा चुप रहे. उन्हें, ज़ाहिर है, मुझसे कोई मतलब नहीं था. हम कुछ देर और चले, और मुझे अचानक हवाई जहाज़ों की याद आई और मैंने कहा:  “मगर TU-104 से तीन घंटे में पहुँच जाएँगे!” मगर पापा ने अभी भी कोई जवाब नहीं दिया. उन्होंने मेरा हाथ कसके पकड़ा था. जब हम गोर्की स्ट्रीट पर आए तो उन्होंने कहा:  “कॅफ़े-आईस्क्रीम में जाएँगे. दो स्कूप्स खाएँगे, हाँ?” मैंने कहा:  “न जाने क्यों, दिल नहीं चाह रहा, पापा.”  “वहाँ पानी भी मिलता है, उसे कहते हैं “कखितीन्स्काया”. दुनिया भर में इससे अच्छा पानी नहीं पिया.”  मैंने कहा:  “दिल नहीं चाहता, पापा.”

उन्होंने मुझे मनाया नहीं. उन्होंने रफ़्तार तेज़ कर दी और मेरा हाथ कसके पकड़ लिया. मेरा हाथ दर्द भी करने लगा. वो बेहद तेज़ चल रहे थे, और मैं मुश्किल से उनके साथ चल पा रहा था. वो इतनी तेज़ क्यों चल रहे थे? वो मुझसे बात क्यों नहीं कर रहे थे? मैं उनका चेहरा देखना चाहता था. मैंने सिर उठाया. उनका चेहरा बहुत गंभीर और दुखी था.                                                  

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41


एक आश्चर्यजनक दिन 


कुछ दिन पहले हमने स्पेस-शिप को छोड़ने के लिए प्लेटफॉर्म बनाना शुरू किया था और अभी तक उसे पूरा नहीं कर पाए हैं, और पहले मैं सोचता था कि दो-तीन बार में ही सब तैयार हो जाएगा. मगर बात बन ही नहीं रही थी, सिर्फ इसलिए कि हम जानते ही नहीं थे कि ये प्लेटफॉर्म कैसा होना चाहिए. 

 


हमारे पास कोई प्लान नहीं था. तब मैं घर गया. एक कागज़ लिया और उस पर ड्राईंग बनाने लगा, कि कहाँ क्या होना चाहिए: कहाँ प्रवेश द्वार, कहाँ बाहर निकलने का रास्ता, कहाँ ड्रेसिंग रूम, कहाँ अंतरिक्ष यात्री को बिदा करेंगे और कहाँ बटन दबाना है. कागज़ पर तो ये सब बहुत अच्छी तरह बन गया, ख़ासकर बटन. मगर जब मैं प्लेटफॉर्म बना रहा था, तो मैंने उसके साथ ही रॉकेट भी बना दिया. पहली स्टेज, और दूसरी स्टेज, और अंतरिक्ष यात्री की कैबिन, जहाँ वो वैज्ञानिक अवलोकन करता रहेगा, और एक अलग कोना, जहाँ वह खाना खाएगा, और मैंने ये भी सोच लिया कि वह हाथ-मुँह कहाँ धोएगा, और इसके लिए स्वयंचालित बकेट्स भी बना दीं, जिनमें वो बरसात का पानी जमा कर सके.    

जब मैंने ये प्लान अल्योन्का, मीश्का और कोस्तिक को दिखाया, तो उन्हें बहुत पसन्द आया. सिर्फ बकेट्स पे मीश्का ने क्रॉस लगा दिया. उसने कहा:  “वो स्पीड़ कम कर देंगी.” और कोस्तिक ने कहा:  “बेशक, बेशक! ये बकेट्स हटा दे.”

और अल्योन्का ने कहा:  “बिल्कुल हटा दे!” मैंने उनसे बहस नहीं की, और हम सारी बेकार की बातें करना बन्द करके काम पे लग गए. हम एक भारी धम्मस ढूँढ़ लाए. मैं और मीश्का ज़मीन पर उसे मारने लगे. हमारे पीछे-पीछे अल्योन्का चल रही थी और बिल्कुल हमारे नज़दीक अपनी सैण्डल्स ला रही थी. उसके सैण्डल्स नए थे, बहुत ख़ूबसूरत थे, मगर पाँच ही मिनटों में वे मटमैले हो गए. उन पर धूल का रंग चढ़ गया. हमने बहुत अच्छे से ज़मीन को समतल किया और हम मिलजुल कर काम कर रहे थे. एक और लड़का, अन्द्र्यूश्का हमारे साथ हो लिया, वो छह साल का है. हालाँकि उसके बाल थोड़े लाल-लाल हैं, मगर वह काफ़ी स्मार्ट है. जब काम पूरे ज़ोरों पर था, तभी चौथी मंज़िल की खिड़की खुली, और अल्योन्का की मम्मा चिल्लाई:  “अल्योन्का, फ़ौरन घर आ! ब्रेकफ़ास्ट!”

जब अल्योन्का भाग गई, तो कोस्तिक ने कहा:  “अच्छा ही हुआ, जो चली गई!” और मीश्का ने कहा: “अफ़सोस है. कुछ भी हो, वर्किंग हैण्ड तो है...”    

मैंने कहा:  “चलो, दबाते हैं!” और हमने ज़ोर ज़ोर से ज़मीन को दबाना शुरू किया, और बहुत जल्दी प्लेटफॉर्म तैयार हो गया. मीश्का ने उसे घूम-घूमकर देखा, ख़ुशी से मुस्कुराया और कहने लगा:  “अब, ख़ास बात तय करना है: अन्तरिक्ष यात्री कौन बनेगा.” अन्द्र्यूश्का फ़ौरन चहका:  “मैं बनूँगा अन्तरिक्ष यात्री, क्योंकि मैं सबसे छोटा हूँ, मेरा वज़न सबसे कम है!” और कोस्तिक बोला:  “ये अभी पता नहीं है. मैं बीमार हो गया था, और पता है, कितना दुबला हो गया था? तीन किलो! अन्तरिक्ष यात्री मैं बनूँगा.”

मैंने और मीश्का ने एक दूसरे की तरफ़ देखा. इन छुटकों ने पहले ही तय कर लिया, कि वे अन्तरिक्ष यात्री बनेंगे, और हमारे बारे में तो जैसे भूल ही गए.

वैसे, ये सारा खेल तो मैंने ही सोचा था. और, इसलिए, साफ़ है, कि अन्तरिक्ष यात्री मैं ही बनूँगा!

मैंने इतना सोचा ही था, कि अचानक मीश्का ने ऐलान कर दिया:  “और, इस सब काम के दौरान कमाण्ड्स कौन दे रहा था? मैं कमाण्ड दे रहा था! मतलब, मैं ही अन्तरिक्ष यात्री बनूँगा!” ये सब मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगा. मैंने कहा:  “चलो, पहले रॉकेट बनाते हैं. फिर अन्तरिक्ष यात्री का इम्तिहान लेंगे. इसके बाद ही लॉन्च के बारे में फ़ैसला करेंगे.”

वे फ़ौरन ख़ुश हो गए, कि अभी काफ़ी खेल बाकी है, और अन्द्र्यूश्का ने कहा:  “क्या मुझे रॉकेट बनाने दोगे?” कोस्तिक ने कहा:  “ठीक है!”

और मीश्का ने कहा:  “उसमें क्या है, मुझे मंज़ूर है.” 

हम सीधे अपने लॉन्चिंग प्लेटफॉर्म पर ही रॉकेट बनाने लगे. वहाँ एक मोटे पेट वाली खाली बैरेल पड़ी थी. पहले उसमें चूना था, मगर अब वह खाली पड़ी थी. वो लकड़ी की थी और बिल्कुल सही सलामत थी, और मैंने फ़ौरन हर चीज़ की कल्पना कर ली और कहा:  “ये होगी कैबिन. यहाँ कोई भी अन्तरिक्ष यात्री समा सकता है, असली वाला भी, ये नहीं कि सिर्फ मैं या मीश्का ही समा सकते हैं.” 

हमने इस बैरेल को बीचोंबीच रख दिया, और कोस्तिक फ़ौरन गुप्त दरवाज़े से न जाने किसका पुराना समोवार उठा लाया. उसने उसे बैरेल से जोड़ दिया, जिससे उसमें ईंधन डाल सके. ये बड़ी आसानी से हो गया. मैंने और मीश्का ने अन्दर की चीज़ें बनाईं और किनारों पर दो छोटी-छोटी खिड़कियाँ बनाईं: ये निरीक्षण के लिए इल्यूमिनेटर्स थे. अन्द्र्यूश्का एक काफ़ी बड़ा, ढक्कन वाला डिब्बा उठा लाया और उसे आधा बैरेल में घुसा दिया. पहले मुझे समझ में नहीं आया, कि ये क्या है, और मैंने अन्द्र्यूश्का से पूछा:  “ये किसलिए?” उसने जवाब दिया:  “क्या- किसलिए? ये सेकण्ड स्टेज है!”

मीश्का ने कहा:  “शाबाश!” 

हमारा काम खूब तेज़ी से चल रहा था. हमने कई तरह के रंग, और कुछ टीन के टुकड़े, और कीलें, और रस्सियाँ इकट्ठी कीं और इन रस्सियों को रॉकेट के इर्द गिर्द लपेट दिया, और टीन के टुकड़ों को पूँछ वाले हिस्से में फ़िट कर दिया, और पूरी बैरेल पर रंगों की लम्बी-लम्बी पट्टियाँ बना दीं, और भी बहुत कुछ किया, सब कुछ तो बता नहीं सकता. और, जब हमने देखा कि सब कुछ तैयार है, तो मीश्का ने अचानक समोवार का नल खोल दिया, मगर वहाँ से कुछ भी नहीं निकला. मीश्का को ख़ूब ग़ुस्सा आ गया, मगर उसने ऊँगली से नल का निचला हिस्सा छुआ, उसे अन्द्र्यूश्का की ओर मोड़ा, जो हमारा प्रमुख इंजीनियर समझा जाता था, और दहाड़ा:  “ये क्या है? तुमने क्या कर दिया है?” अन्द्र्यूश्का ने कहा:  “क्या हुआ?” तब मीश्का को बेहद गुस्सा आ गया और वो और भी ज़ोर से गरजा:  “ख़ामोश! तुम प्रमुख इंजीनियर हो, या घास काटने वाले?” अन्द्र्यूश्का ने कहा:  “मैं प्रमुख इंजीनियर हूँ. तू चिल्ला क्यों रहा है?” और मीश्का बोला:  “मशीन में ईंधन कहाँ है? समोवार में...मतलब, टैंक में ईंधन की एक भी बून्द नहीं है.”  और अन्द्र्यूश्का:  “तो फिर क्या?” मीश्का ने उससे कहा:  “एक झापड़ दूँगा, तब पता चलेगा ‘तो फिर क्या?’ !”

अब मैं बीच में पड़ा और चिल्लाया:  “टैंक भरो! मेकैनिक, जल्दी!”

मैंने कड़ी नज़र से कोस्तिक की तरफ़ देखा. वो फ़ौरन समझ गया कि वही मेकैनिक है, उसने छोटी बकेट उठाई और बॉयलर रूम में पानी के लिए भागा. वहाँ उसने आधी बकेट गरम पानी लिया, भागकर वापस आया, एक ईंट पर चढ़ा और पानी डालने लगा. उसने समोवार में पानी डाला और चिल्लाया:  “ईंधन है! सब ठीक है!” मीश्का समोवार के ऊपर खड़ा होकर अन्द्र्यूशा को अनाप-शनाप डाँट रहा था. मगर, तभी मीश्का के ऊपर पानी गिरने लगा. वो ख़ूब गरम तो नहीं था, मगर ठीक ही था, गुनगुना था, और, जब पानी मीश्का की कॉलर पे और सिर पे गिरा, तो वह खूब डर गया और झुलसी हुई बिल्ली की तरह उछलकर दूर हट गया. ज़ाहिर था, कि समोवार में छेद थे. उसने मीश्का को लगभग पूरा भिगो दिया और प्रमुख इंजीनियर दुष्टता से ठहाके लगाने लगा:  “तेरे साथ ऐसा ही होना चाहिए!” मीश्का की आँखें चमकने लगीं. मैंने देखा कि मीश्का अभ्भी इस बदमाश इंजीनियर का गिरेबान पकड़ने वाला है, इसलिए मैं फ़ौरन उन दोनों के बीच में खड़ा हो गया और बोला: ”सुनो, लड़कों, हम अपने स्पेस-शिप का नाम क्या रखेंगे?”  “टॉर्पीडो”... कोस्तिक ने कहा.  “या ‘स्पार्ताक’ ”, अन्द्र्यूश्का ने उसकी बात काटी, “या फिर ‘दिनामो’ ”.

मीश्का फिर से ताव खा गया और बोला:  “नहीं, तब, सिस्का!”

मैंने उनसे कहा: ”ये कोई फुटबॉल नहीं है! आप तो हमारे रॉकेट को “पाख़्ताकोर” भी कहेंगे! उसका नाम ‘वोस्तोक-2’ होना चाहिए! क्योंकि गगारिन वाले शिप का नाम था सिर्फ ‘वोस्तोक’, और हमारा होगा ‘वोस्तोक-2’! ...चल मीश्का, रंग ले और लिख!” उसने फ़ौरन ब्रश लिया और नाक सुड़सुड़ाते हुए रंग पोतने लगा. उसने जीभ भी बाहर निकाली. हम उसकी ओर देखने लगे, मगर उसने कहा:  “डिस्टर्ब मत करो! मेरी तरफ़ मत देखो!” और हम उससे दूर हट गए.

 अब मैंने थर्मामीटर लिया, जो मैंने बाथरूम से पार किया था, और अन्द्र्यूश्का का टेम्प्रेचर नापने लगा. उसका टेम्प्रेचर निकला 48.600 . मैंने अपना सिर पकड़ लिया: ऐसा तो मैंने कभी नहीं देखा था कि एक साधारण बच्चे का टेम्प्रेचर इत्ता ज़्यादा हो. मैंने कहा: ”ये कैसी भयानक बात है! शायद तुझे र्‍यूमेटिज़्म है या टाइफ़ाइड हो गया है. टेम्प्रेचर 48.600  है. अलग हट.” वो हट गया, मगर तभी कोस्तिक बीच में बोल पड़ा:  “अब मुझे ‘चेक’ कर! मैं भी अंतरिक्ष यात्री बनना चाहता हूँ!” 

देखिए, कैसी मुसीबत हो जाती है: सभी चाहते हैं! उनसे छुटकारा ही नहीं है. सारे छुटके एक जैसे ही हैं!

मैंने कोस्तिक से कहा:  “पहली बात, तू अभी अभी खसरे से उठा है. कोई भी मम्मा तुझे अंतरिक्ष यात्री नहीं बनने देगी. दूसरी बात, अपनी ज़ुबान दिखा. उसकी ज़ुबान गीली और गुलाबी थी, मगर थोड़ी ही दिखाई दे रही थी. मैंने कहा:  “ये तू क्या छोटा सा सिरा दिखा रहा है! पूरी जीभ बाहर निकाल!” उसने फ़ौरन अपनी पूरी जीभ बाहर निकाली, इतनी कि बिल्कुल कॉलर तक पहुँचने ही वाली थी. उसकी ओर देखने से बड़ी घिन लग रही थी, और मैंने उससे कहा: ”बस, बस, बस है! बहुत हो गया! अपनी जीभ हटा ले. बेहद लम्बी है तेरी जीभ, ख़तरनाक हद तक लम्बी. मुझे तो आश्चर्य हो रहा है कि वो तेरे मुँह में कैसे समाती है.” कोस्तिक पूरी तरह गड़बड़ा गया, मगर फिर उसने अपने आप को संभाला, आँखें फ़ड़फ़ड़ाईं और धमकाने वाले अंदाज़ में बोला:  “तू चिर-चिर मत कर! सीधे-सीधे बता: मैं अंतरिक्ष यात्री बनने लायक हूँ या नहीं?” तब मैंने कहा:  “ऐसी जीभ के साथ? बेशक, नहीं! क्या तू समझता नहीं है कि अगर अंतरिक्ष यात्री की ज़ुबान लम्बी हो तो वह किसी काम के लायक़ नहीं है? आख़िर वो पूरी दुनिया को सारे सीक्रेट्स बताता है: कहाँ कौन सा तारा घूमता है, और ऐसा ही बहुत कुछ...नहीं, तू, कोस्तिक, बेहतर है, कि शांत हो जा! तेरे जैसी जीभ के साथ धरती पर बैठना ही बेहतर है.”

 अब कोस्तिक बिना बात के लाल हो गया, टमाटर जैसा. वह मुझसे एक क़दम दूर हटा, उसने अपनी मुट्ठियाँ भींचीं, और मैं समझ गया, कि अब मेरी उसके साथ सचमुच की लड़ाई होने वाली है. इसलिए मैंने भी अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं और पैर आगे किया, जिससे कि असली बॉक़्सर की पोज़ में आ जाऊँ, जैसे कि लाइट-वेट चैम्पियन की फ़ोटो में होता है. कोस्तिक ने कहा:  “अभ्भी एक घूँसा दूँगा!” और मैंने कहा:  “ख़ुद दो खाएगा!” उसने कहा:  “ज़मीन पे गिर पड़ेगा!” और मैंने उससे कहा:  “समझ ले, कि तू मर गया है!” तब उसने सोचा और कहा:   “तेरे साथ जुड़ने को दिल ही नहीं चाहता...” और मैंने कहा:  “तो, ख़ामोश हो जा!” तभी मीश्का ने रॉकेट से चिल्लाकर कहा:  “ऐ, कोस्तिक, डेनिस्का, अन्द्र्यूश्का! जल्दी आओ ये नाम पढ़ने के लिए.” 

हम मीश्का के पास भागे और देखने लगे. ठीक ही था लिखा हुआ नाम, सिर्फ तिरछा था, और आख़िर में नीचे की ओर झुक रहा था. अन्द्र्यूश्का ने कहा:  “वॉव, बढ़िया है!” और कोस्तिक ने कहा:  “शानदार!” मगर मैंने कुछ नहीं कहा. क्योंकि वहाँ लिखा था: ‘वास्तोक-2’. मैंने इस बात को लेकर मीश्का को छेड़ा नहीं, मगर क़रीब जाकर दो गलतियाँ सुधार दीं. मैंने लिखा : ‘वोस्तोग-2’. 

और बस, मीश्का लाल हो गया और चुप रहा. फिर वो मेरे पास आया, सैल्यूट मारा. 

“लॉन्चिंग कब है?” मीश्का ने पूछा. मैंने कहा:  “एक घण्टे बाद!” मीश्का ने कहा:   “ज़ीरो-ज़ीरो?” और मैंने जवाब दिया:  “ज़ीरो-ज़ीरो!” 

***


सबसे पहले हमें विस्फोटकों की ज़रूरत थी. ये कोई आसान काम नहीं था, मगर किसी तरह सब कुछ इकट्ठा हो गया. पहले, अन्द्र्यूश्का क्रिसमस वाली दस फुलझडियाँ लाया. फिर मीश्का एक पैकेट लाया, मैं उसका नाम भूल गया, शायद बोरिक एसिड था. मीश्का ने कहा, कि ये एसिड बहुत बढ़िया जलता है. और मैं दो पटाखे लाया, जो मेरे पास पिछले साल से संदूक में पड़े थे. अब हमने अपने समोवार-टैंक का पाईप लिया, उसे एक तरफ़ से पुराने कपड़े से बन्द किया और उसमें अपने सारे विस्फ़ोटक भर दिए और उसे सही तरीक़े से रख दिया. इसके बाद कोस्तिक अपनी मम्मा के गाऊन से कोई बेल्ट लाया, और हमने उसका फ़्यूज़ बना दिया. अपने पूरे पाईप को हमने रॉकेट की दूसरी स्टेज पे रखा और उसे रस्सी से बांध दिया, फ्यूज़ को बाहर खींचा, और वह हमारे रॉकेट के पीछे ज़मीन पर बिछ गया, जैसे साँप की पूँछ हो. अब सब कुछ तैयार था.  “अब”, मीश्का ने कहा, “वक़्त आ गया है ये फ़ैसला करने का कि कौन उड़ेगा. तू या मैं, क्योंकि अन्द्र्यूश्का और कोस्तिक अभी इसके लिए योग्य नहीं हैं.”  “हाँ,” मैंने कहा, “वे स्वास्थ्यगत कारणों से योग्य नहीं हैं.” जैसे ही मैंने ये कहा, अन्द्र्यूश्का की आँखों से फ़ौरन आँसू बहने लगे, और कोस्तिक दीवार की ओर मुड़ गया, क्योंकि, शायद, उसके भी आँसू टपक रहे थे, मगर वो शरमा रहा था, कि जल्दी ही सात साल का होने वाला है, फिर भी रोता है. तब मैंने कहा:

 “कोस्तिक को प्रमुख इग्निशन ऑफ़िसर बनाया जाता है!” मीश्का ने जोड़ा:  “और अन्द्र्यूश्का को बनाया जाता है प्रमुख लॉन्चिंग ऑफ़िसर!” वे दोनों हमारी ओर मुड़े और उनके चेहरे पर थोड़ी ख़ुशी की झलक दिखाई दी, आँसू ग़ायब हो गए, वंडरफुल!

तब मैंने कहा:  “सिर्फ, देख, मैं गिनता हूँ!”

और हम गिनने लगे: ”ख़रगोश-सफ़ेद-कहाँ-भागा-जंगल–में-चीड़-के-क्या-किया-पत्ते-नोंचे-कहाँ-रखे-ठूँठ-के-नीचे-कौन-चुराया-स्पिरिदोन-मोर-देल-वो-तिन्तिल-विन्तिल-भाग-यहाँ-से!”

मीश्का पे “भाग यहाँ से” आया. वो, बेशक, कोस्तिक और अन्द्र्यूश्का से तो बड़ा है, मगर इस ख़याल से कि उसे नहीं उड़ना है, उसकी आँखें इतनी दयनीय हो गईं, कि बस, भयानक!

मैंने कहा:  “मीश्का, तू अगली फ्लाइट में जाएगा बिना किसी गिनती-विनती के, ठीक है?” और उसने कहा:  “चल, बैठ!” क्या करें, कुछ भी नहीं किया जा सकता था, मेरी टर्न तो ईमानदारी से ही आई थी. हम दोनों ने गिना था, और उसने ख़ुद भी गिना, और बारी मेरी आई, यहाँ कुछ नहीं कर सकते. मैं फ़ौरन बैरेल में घुस गया. वहाँ अंधेरा था, जगह तंग थी, ख़ासकर दूसरी स्टेज मुझे बहुत परेशान कर रही थी. उसके कारण आराम से लेटा नहीं जा सकता था, वो कमर में चुभ रही थी. मैं पलट कर पेट के बल लेटना चाह रहा था: मगर तभी मेरा सिर टैंक से टकरा गया, वो सामने की ओर निकल रहा था. मैंने सोचा कि अंतरिक्ष यात्री को कैबिन में बैठने में मुश्किल होती है, क्योंकि उपकरण बहुत ज़्यादा होते हैं, बेहद ज़्यादा! मगर फिर भी मैं किसी तरह बैठ गया, और गुड़ी-मुड़ी बनकर लेट गया, और लॉन्च का इंतज़ार करने लगा. मैंने सुना – मीश्का चिल्ला रहा था;  “रेडी! अटेन्शन! लॉन्चिंग ऑफ़िसर, नाक मत खुजाओ! चलो, इंजन की ओर जाओ.” और, अचानक अन्द्र्यूश्का की आवाज़:  “इंजन के पास!” मैं समझ गया कि अब जल्दी ही लॉन्चिंग़ है, और लेटा रहा.        सुन रहा हूँ – मीश्का फिर से कमाण्ड देता है:  “प्रमुख इग्नीशन ऑफ़िसर! रेडी! जला....” और अचानक मैंने सुना, कि कैसे कोस्तिक अपनी माचिस की डिबिया खड़खड़ा रहा है और, लगता है, कि परेशानी के मारे दियासलाई नहीं निकाल पा रहा है, और मीश्का, बेशक, कमाण्ड को लम्बा किए जा रहा है, जिससे कि दोनों चीज़ें एक साथ हो जाएँ – कोस्तिक की दियासलाई और उसकी कमाण्ड. वो खींचे जा रहा है:  “जल्ल्ल्ल....”

और मैंने सोचा: बस, अभी! मेरा दिल भी ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा! मगर कोस्तिक है कि अभी तक दियासलाई जलाए जा रहा है. मुझे साफ़ समझ में आ रहा था कि उसके हाथ थरथरा रहे हैं और वह दियासलाई पकड़ नहीं पा रहा है. मीश्का अपना ही राग अलापे जा रहा था:  “जल्ल्ल्ल्लल...चल भी, दुखदाई! जल्ल्ल...” और अचानक मैंने साफ़ साफ़ सुना: छक्!

और मीश्का की प्रसन्न आवाज़: ”...ल्ल्ल्ल्ला! जला!”

मैंने आँखें सिकोड़ लीं, सिकुड़ गया और उड़ने के लिए तैयार हो गया. कितना अच्छा होता, अगर ये सचमुच में हो जाता, सब लोग पगला जाते, और मैंने आँखें और ज़्यादा सिकोड़ लीं. मगर कुछ भी नहीं हुआ: न तो विस्फोट, न धक्का, न आग, न धुँआ – कुछ भी नहीं. अब मैं उकता गया, और मैं बैरेल के भीतर से दहाड़ा:  “क्या जल्दी होने वाला है? मेरी पूरी कमर अकड़ गई है – दुख रही है!” और मीश्का मेरे पास आया रॉकेट के अन्दर. उसने कहा:  “ख़तम. फ्यूज़ बेकार हो गया.” मैंने गुस्से के मारे बस उसे लात ही नहीं मारी:  “ऐह, तुम लोग, इंजीनियर कहलाते हो! एक छोटा सा रॉकेट भी नहीं लॉन्च कर सकते! अब देख, मैं करता हूँ!” और मैं रॉकेट से बाहर आ गया. अन्द्र्यूश्का और कोस्तिक फ्यूज़ ठीक कर रहे थे, और उनसे कुछ भी नहीं हो रहा था. मैंने कहा:  “कॉम्रेड मीश्का! इन बेवकूफ़ों को काम से हटा दो! मैं ख़ुद ही कर लूँगा!” 

और मैं समोवार के पाईप के पास गया और सबसे पहले उनकी मम्मा का फ्यूज़ वाला बेल्ट हटा दिया. मैंने उनसे चिल्लाकर कहा:  “अरे, दूर हटो! जल्दी!” और वे इधर-उधर भागने लगे. मैंने पाईप में हाथ डाला, और फिर से भीतर का सब कुछ उलट-पलट किया, फुलझड़ियों को सबसे ऊपर रखा. फिर मैंने दियासलाई जलाई और उसे पाईप में घुसा दिया. मैं चिल्लाया:

“होशियार!” और मैं एक किनारे को भागा. मैंने सोचा भी नहीं था कि कोई ख़ास बात होगी, क्योंकि वहाँ, पाईप में, ऐसी कोई चीज़ थी ही नहीं. मैं ज़ोर से चीख़ना चाहता था: “बुख, त्राआआख़!” – जैसे विस्फोट हो रहा हो, जिससे खेल आगे बढ़े. मैंने गहरी साँस ली और ज़ोर से चिल्लाने ही वाला था कि तभी पाईप में कोई चीज़ ऐSSसी सीटी बजाने लगी और ऐSSसी फूटी! और पाईप दूसरी स्टेज से दूर उड़ गया, और कुछ दूर उड़ने लगा, और नीचे गिरने लगा, और धुँआ! ...फिर कैसी भयानक आवाज़ ! ओहो! ये शायद पटाखे जल रहे थे, पता नहीं, या फिर मीश्का की पाउडर थी! बाख! बाख! बाख! इस बाख! से मैं कुछ घबरा गया, क्योंकि मैंने अपने सामने दरवाज़ा देखा, और उसमें घुसने का फ़ैसला कर लिया, और खोला, और दरवाज़े में घुस गया, मगर ये दरवाज़ा नहीं था, बल्कि खिड़की थी, और मैं सीधे उसके भीतर भागा, कैसे गिरा, और सीधे हाऊसिंग कमिटी में जा गिरा. वहाँ मेज़ के पीछे ज़िनाइदा इवानव्ना  बैठी थी और मशीन पर हिसाब लगा रही थी कि क्वार्टर के लिए किसको कितने पैसे देने हैं. जब उसने मुझे देखा, तो, शायद, फ़ौरन पहचान नहीं पाई, क्योंकि मैं तो गन्दी बैरल से निकला था, मुझ पर पूरी कालिख पुती थी, घायल और बदहाल. जब मैं खिड़की से छिटककर उसके पास गिरा, तो उसकी, बस, बोलती बन्द हो गई, और वो दोनों हाथों से मुझे दूर धकेलने लगी. वह चिल्ला रही थी:  “क्या है? कौन है?” शायद मैं किसी शैतान या किसी अण्डरग्राऊण्ड नमूने की तरह लग रहा था, क्योंकि वह पूरी तरह से  अपना आपा खो बैठी और मुझ पर ऐसे चिल्लाने लगी, जैसे मैं कोई नपुंसकलिंग वाली संज्ञा होऊँ. 

“चल भाग जा! भाग यहाँ से! भाग!”

मगर मैं अपने पैरों पर खड़ा हो गया, हाथ अटेन्शन वाली ‘पोज़’ में रखे और बड़े प्यार से उससे बोला:  “नमस्ते, ज़िनाइदा इवानव्ना! परेशान न हों, ये मैं हूँ!”

और चुपचाप दरवाज़े की तरफ़ जाने लगा. ज़िनाइदा इवानव्ना  ने पीछे से चिल्लाकर मुझसे कहा:  “आह, ये डेनिस है! अच्छी बात है!...रुक जा!...तू भी मुझे क्या याद रखेगा!...अलेक्सै अकीमिच को सब कुछ बता दूँगी!” इन चीखों से मेरा मूड बहुत बिगड़ गया. क्योंकि अलेक्सै अकीमिच – हमारी हाऊसिंग सोसाइटी का डाइरेक्टर है. वो मुझे मम्मा के पास ले जाएगा और पापा से शिकायत करेगा, और ये मेरे लिए बुरा होगा. मैंने सोचा, कितना अच्छा होता कि वो हाऊसिंग कमिटी के ऑफ़िस में न हो, और मैं दो-तीन दिनों तक उसके सामने न पडूँ, जब तक सब ठीक नहीं हो जाता. ये सोचकर मेरा मूड अच्छा हो गया, और मैं ख़ुश-ख़ुश हाऊसिंग कमिटी के ऑफ़िस से निकला. जैसे ही मैं कम्पाऊण्ड में पहुँचा, मैंने अपने लड़कों का पूरा झुण्ड देखा. वे भाग रहे थे और बातें कर रहे थे, और उनके आगे-आगे काफ़ी फुर्ती से अलेक्सै अकीमिच भाग रहा था. मैं बेहद डर गया. मैंने सोचा कि उसने हमारा रॉकेट देख लिया है, ये भी देखा है कि वो कैसा टूटा-फूटा पड़ा है और, हो सकता है, कि उस नासपीटॆ पाईप ने खिड़की और कोई और चीज़ फोड़ दी हो, और अब वह अपराधी को ढूँढ़ने के लिए भाग रहा है, और उससे किसीने कह दिया है, कि मुख्य अपराधी मैं हूँ, कि उसने मुझे देख लिया है, मैं सीधे उसके सामने पड़ गया, और अब वह पूरी ताक़त से मेरे पीछे भाग रहा है, और मुझे अभी पकड़ लेगा! ये सब मैंने एक सेकण्ड में सोच लिया, और, जब मैं ये सब सोच रहा था, तो मैं अलेक्सै अकीमिच से दूर भाग भी रहा था, मैं पार्क के पास से गुज़रा, क्यारियों का चक्कर लगाया, मगर अलेक्सै अकीमिच मेरी ओर लपका और पतलून में ही फ़व्वारा पार करके मेरे पास आया और मेरी कमीज़ पकड़ ली, मैंने सोचा: सब ख़तम. मगर उसने दोनों हाथ मेरी बगल में डाल कर मुझे पकड़ा और ऊपर की ओर उछाला! अगर कोई मुझे बगल में हाथ डालकर उठाए, तो मैं बर्दाश्त नहीं कर: मुझे गुदगुदी होती है, और मैं कसमसाता हूँ, समझ में नहीं आता कि कैसे छूटूँ. तो, मैं ऊपर से उसकी ओर देख रहा था और कसमसा रहा था, और वह मुझे देखते हुए अचानक बोल पड़ा:  “चिल्ला ‘हुर्रे! अरे! फ़ौरन चिल्ला ‘हुर्रे!”

 अब तो मैं और भी डर गया: मैंने समझा कि उसका दिमाग चल गया है. और, अगर वह पागल हो गया है, तो उसके साथ बहस करना ठीक नहीं है.  और मैं ज़ोर से चिल्लाया:  “हुर्रे!... मगर बात क्या है?” अब अलेक्सै अकीमिच ने मुझे ज़मीन पर उतारा और कहा:  “बात ये है कि आज दूसरे अंतरिक्ष यात्री को स्पेस में भेजा गया! कॉम्रेड गेर्मन तितोव को! तो, क्या ये हुर्रे वाली बात नहीं है?” अब मैं भी चिल्लाया:  “बेशक, हुर्रे! और, वो भी कैसा हुर्रे!”

 मैं इतनी ज़ोर से चिल्लाया कि ऊपर कबूतर फड़फड़ाने लगे. और अलेक्सै अकीमिच मुस्कुराया और अपने  हाऊसिंग कमिटी वाले ऑफ़िस में चला गया. 

हमारा पूरा झुण्ड लाऊडस्पीकर की ओर भागा और पूरे घण्टे भर हम सुनते रहे कि कॉम्रेड तितोव के बारे में, उसकी फ्लाइट के बारे में क्या क्या बताया जा रहा है, कि वह क्या खाता है, वगैरह, वगैरह, वगैरह. 

और जब रेडिओ पर इंटरवल हुआ तो मैंने कहा;  “और मीश्का कहाँ है?” और अचानक मैंने सुना:  “ये रहा मैं!” सच था, वो मेरे पास ही था. मैं इतना उत्तेजित था कि उसे देखा ही नहीं. मैंने कहा:  “तू कहाँ था?”  “मैं यहीं था. पूरे समय यहीं था.” मैंने पूछा:  “और हमारे रॉकेट का क्या हुआ? क्या विस्फ़ोट में उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए?” और मीश्का बोला;  “तू भी क्या! सही सलामत है! बस, सिर्फ पाईप ही टूट गया था. मगर रॉकेट, उसे क्या होना था? ऐसे खड़ा है, जैसे कुछ हुआ ही न हो!”  “चल, भागकर देख आएँ?” 

जब हम भागते हुए वहाँ आए, तो मैंने देखा कि सब कुछ ठीक है, सब सही सलामत है और उसके साथ चाहे जितना खेल सकते हो. मैंने कहा:  “मीश्का, मतलब, अब दो अंतरिक्ष यात्री हो गए?” उसने कहा:  “हाँ. गगारिन और तितोव.” और मैंने कहा:  “शायद, वे दोस्त हैं?”  “बेशक,” मीश्का ने कहा, “वो भी कैसे दोस्त!” 

तब मैंने मीश्का के कंधे पे हाथ रखा. उसका कंधा छोटा और पतला है. और हम ख़ामोशी से खड़े रहे, फिर मैंने कहा:  “मैं और तू भी दोस्त हैं, मीश्का. और अगली फ्लाइट में हम दोनों साथ साथ उडेंगे.”   

इसके बाद मैं रॉकेट के पास गया, और रंग ढूँढ़कर उसे मीश्का को दिया, जिससे वह पकड़े. वो मेरे पास खड़ा था, और उसने हाथ में रंग पकड़ा था और वह देख रहा था कि मैं कैसे चित्र बनाता हूँ, वो सूँ-सूँ करने लगा, मानो हम दोनों ही चित्र बना रहे थे. मैंने एक और गलती देखी और उसे सुधार दिया, जब मैंने ख़तम किया, तो हम दो क़दम पीछे हटे और देखा, कि हमारे वण्डरफुल स्पेस शिप पर कितनी ख़ूबसूरती से लिखा है “वस्तोक-3”.


*****















42.

   नीले आसमान में लाल गुब्बारा           


अचानक हमारा दरवाज़ा खुल गया और कॉरीडोर से ही अल्योन्का चिल्लाई: ”बड़ी दुकान में बसंत का बज़ार!” वह ख़ौफ़नाक ढंग से चिल्ला रही थी, और उसकी आँख़ें बटन जैसी गोल-गोल और बदहवास हो रही थीं. पहले मैंने सोचा कि किसी का खून हो गया है. मगर उसने फिर से गहरी साँस ली और लगी चिल्लाने:  “चल, भागें, डेनिस्का! जल्दी! वहाँ फ़ेन वाला ‘क्वास’ (क्वास – खट्टा फ़ेन वाला पेय- अनु.) है! म्यूज़िक बज रहा है, और तरह तरह की गुड़िया है! चल, भागें!” 

वो ऐसे चिल्ला रही है, जैसे कहीं आग लग गई हो. इससे मैं भी कुछ परेशान हो गया, और मेरे पेट में गुड़गुड़ी होने लगी, मैं फ़ौरन कमरे से बाहर उछला.

मैंने अल्योन्का का हाथ पकड़ा और हम पागलों की तरह बड़ी दुकान में भागे. वहाँ लोगों की येSS भीड़ लगी थी और उसके बिल्कुल बीचोंबीच न जाने किस चीज़ से बनाए हुए बेहद चमकदार औरत और आदमी खड़े थे, खूब बड़े, छत तक पहुँच रहे थे, और, हालाँकि वो नकली थे, मगर आँखें फ़ड़फ़ड़ा रहे थे और निचले होंठ हिला रहे थे, मानो बोल रहे हों. आदमी चिल्लाया:  “बसंSSत–बज़ाSSर! बसंSSत–बज़ाSSर!” और, औरत:  “आपका स्वागत है! आपका स्वागत है!” हम बड़ी देर तक उनकी तरफ़ देखते रहे, और फिर अल्योन्का ने कहा:  “ये चिल्लाते कैसे हैं? ये तो असली नहीं हैं ना!”  “समझ में नहीं आ रहा,” मैंने कहा. तब अल्योन्का बोली:

 “मुझे मालूम है. वो ख़ुद नहीं चिल्ला रहे हैं! उनके अन्दर ज़िन्दा आर्टिस्ट बैठे हैं, वो पूरे दिन चिल्लाते रहते हैं. और ख़ुद रस्सियाँ खींचते हैं, इस वजह से गुड़ियों के होंठ हिलते हैं.” मैं ठहाका मार कर हँस पड़ा:  “साफ़ पता चल रहा है, कि तू छोटी है. जभी तुझे लगता है कि इन गुड़ियों के पेट में पूरे-पूरे दिन आर्टिस्ट्स बैठे रहते हैं. क्या तू सोच सकती है? पूरे दिन गुड़ी-मुड़ी होकर – थक जाएगी! और खाना-पीना तो पड़ेगा ना? और, और भी बहुत कुछ...ऐह, तू, ठस दिमाग़! ये उनके भीतर रेडिओ चीख़ रहा है.” अल्योन्का ने कहा;  “बात को इतना भी न बढ़ा!”

 और हम आगे चले. चारों ओर भीड़ ही भीड़ थी, सभी बिना गरम कपड़ों के थे, सभी ख़ुश थे; और म्यूज़िक बज रहा था, और एक अंकल लॉटरी का टिकट घुमा घुमा कर चिल्ला रहा था: 

जल्दी जल्दी आईये, चीज़ों की लॉटरी के टिकट पाईये! हर कोई जीतेगा जल्दी ’वोल्गा’ कार हल्की! और कुछ जोशीले ’मस्क्विच’ भी जीतेंगे! 


उसके पास भी हम हँस रहे थे, कैसे ज़ोर से चिल्ला रहा है, और अल्योन्का ने कहा:  “फिर भी, जब कोई ज़िन्दा चीज़ चिल्लाती है, तो रेडिओ के मुक़ाबले में ज़्यादा अच्छा लगता है. 

हम काफ़ी देर तक बड़े लोगों की भीड़ में दौड़ते रहे और बहुत ख़ुश होते रहे, किसी फ़ौजी अंकल ने अल्योन्का को बगल से पकड़ कर उठा लिया, और उसके दोस्त ने दीवार में लगा हुआ स्विच दबा दिया, वहाँ से फ़ौरन यूडीकोलोन का फ़व्वारा निकला, और जब उसने अल्योन्का को ज़मीन पे रखा तो उससे कैण्डी की ख़ुशबू आ रही थी, और अंकल बोले:   “कितनी सुन्दर बच्ची है, कह नहीं सकता!” मगर अल्योका उनसे दूर भाग गई, और मैं – उसके पीछे, और आख़िरकार हम ‘क्वास’ वाले स्टाल के पास पहुँचे. मेरे पास ब्रेकफ़ास्ट के लिए पैसे थे, और इसलिए मैंने और अल्योन्का ने दो–दो बड़े ग्लास ‘क्वास’ पिया, अल्योन्का का पेट फुटबॉल की गेंद जैसा हो गया, और मेरे नाक से गैस निकल रही थी और नाक में सुईयाँ चुभ रही थीं. बढ़िया, एकदम ताज़ा था ‘क्वास’, नंबर 1, और इसके बाद जब हम दुबारा भागने लगे, तो मुझे अपने पेट में ‘क्वास’ की गुड़गुड़ सुनाई दे रही थी. हम घर जाने की सोचने लगे और भाग कर रास्ते पर आ गए. वहाँ और भी ख़ुशनुमा था, और बड़ी दुकान के प्रवेश द्वार के पास ही एक औरत खड़ी होकर हवाई गुब्बारे बेच रही थी.

 


अल्योन्का ने जैसे ही उस औरत को देखा, रुक गई, जैसे ज़मीन से चिपक गई हो. उसने कहा:  “ओय! मुझे ग़ुब्बारा चाहिए!” मगर मैंने कहा;  “ठीक है, मगर पैसे नहीं हैं.” अल्योन्का बोली:  “मेरे पास एक सिक्का है.” ”दिखा.” उसने जेब से सिक्का निकाला. मैंने कहा:  “ओहो! दस कोपेक. आण्टी, इसे गुब्बारा दीजिए!” वो आण्टी मुस्कुराई:  “कौन सा चाहिए? लाल, नीला, आसमानी?” अल्योन्का ने लाल गुब्बारा लिया, और हम चल पड़े. अचानक अल्योन्का बोली:  “पकड़ना चाहता है?”          और उसने मेरी तरफ़ डोर बढ़ा दी. मैंने उसे पकड़ लिया. और जैसे ही पकड़ा, मैंने महसूस किया कि गुब्बारा हौले-हौले डोरी से खिंचा जा रहा है! शायद वो उड़ना चाहता था. तब मैने डोरी को थोड़ा ढीला किया और फिर से महसूस किया कि कैसे वो ज़िद्दीपन से हाथों से खिंचा जा रहा है, जैसे उड़ने की विनती कर रहा हो. मुझे अचानक उस पे दया आई, कि वो उड़ सकता है, मगर मैं हूँ कि उसे डोरी से पकड़े बैठा हूँ, और मैंने उसे छोड़ दिया. और ग़ुब्बारा, पहले तो मुझसे दूर नहीं उड़ा, जैसे उसे यक़ीन ही न हो रहा हो, मगर फिर उसने महसूस कर ही लिया, कि ये सच है, और फ़ौरन छिटक कर लैम्प-पोस्ट से ऊपर उड़ गया. अल्योन्का ने अपना सिर पकड़ लिया:

 “ओय, किसलिए, पकड़!..”

और वो उछलने लगी, जैसे उछल कर गुब्बारे तक पहुँच जाएगी, मगर जब देखा कि नहीं जा सकती, तो रोने लगी:

“तूने उसे क्यों छोड़ दिया?...” मगर मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया. मैं ऊपर गुब्बारे की ओर देख रहा था. वह ऊपर की ओर उड़ता जा रहा था, हौले से, शांति से, जैसे पूरी ज़िन्दगी यही करना चाहता हो.

 मैं सिर ऊपर उठाए खड़ा था, और देख रहा था, और अल्योन्का भी, और कई सारे बड़े लोग भी रुक गए और उन्होंने भी अपने सिर ऊपर उठाए – ये देखने के लिए कि ग़ुब्बारा कैसे उड़ रहा है, और वो उड़ रहा था और छोटा-छोटा होता जा रहा था. 

वो बड़ी बिल्डिंग की आख़िरी मंज़िल पार कर गया, किसी ने खिड़की से बाहर सिर निकाला और उसे देखकर पीछे से हाथ हिलाया, और, वो ऊपर और ऊपर, और कुछ तिरछे, अन्टेना से ऊपर, कबूतरों से भी ऊपर, और एकदम छोटा हो गया...जब वो उड़ रहा था, तो मेरे कानों में कुछ सनसना रहा था, और अब वो क़रीब-क़रीब ग़ायब हो गया. वो बादल के पीछे चला गया, बादल छोटा सा, और फूला-फूला था, ख़रगोश के नन्हे पिल्ले जैसा, फिर वह बाहर आया, ग़ायब हो गया और पूरी तरह नज़रों से ओझल हो गया और अब, शायद चाँद के पास पहुँच गया हो, हम सब ऊपर देखे जा रहे थे, और मेरी आँखों के सामने कुछ पूँछ वाले बिन्दुओं का पैटर्न बन रहा था. गुब्बारा अब कहीं नहीं था. अल्योन्का ने मुश्किल से सुनाई दे रही साँस ली, और सब अपने-अपने काम पे चल दिए.

हम भी चल पड़े, हम चुप थे, और पूरे रास्ते मैं सोच रहा था कि जब कम्पाऊण्ड में बसंत आया हुआ हो, तो कितना सुन्दर लगता है, सब लोग सजे-धजे और ख़ुश रहते हैं, और कारें यहाँ-वहाँ घूमती हैं, और मिलिशियामैन सफ़ेद हाथ-मोज़े पहने रहता है, और साफ़ नीले-नीले आसमान में हमसे दूर उड़ता है लाल गुब्बारा. मुझे इस बात का अफ़सोस भी हो रहा था, कि मैं ये सब अल्योन्का से नहीं कह सकता. मुझे शब्दों में ये सब कहना नहीं आता, और अगर आता भी तो भी अल्योन्का को समझ में नहीं आता, क्योंकि वो छोटी है. वो मेरे साथ-साथ चल रही है, एकदम शांत, उसके गालों पे आँसू अभी तक सूखे नहीं हैं. उसे शायद अपने गुब्बारे का अफ़सोस है.

 इस तरह हम अपनी बिल्डिंग तक पहुँच गए और ख़ामोश ही रहे, हमारे गेट के पास, जब एक दूसरे से बिदा ले रहे थे, तो अल्योन्का ने कहा:  “अगर मेरे पास पैसे होते, तो मैं एक और गुब्बारा ख़रीदती...जिससे तू उसे आसमान में छोड़ सकता.”


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43

नदी के किनारे 


 हमारी क्लास, 1- C  के सभी लड़कों के पास पिस्तौलें थीं. 

हमने ये तय किया था कि हमेशा हथियार साथ में रखेंगे. हममें से हर बच्चे की जेब में हमेशा एक बढ़िया छोटी सी पिस्तौल रहती थी और उसके साथ पटाखों की एक टेप भी होती थी. हमें ये अच्छा लगता था, मगर ऐसा कुछ ही दिन चला. सब फ़िल्म की वजह से... 

एक दिन रईसा इवानव्ना  ने कहा:  “बच्चों, कल इतवार है. हम सब मिलकर इसे मनाएँगे. कल हमारी क्लास, और 1-A और 1-B, तीनों क्लासें मिलकर फ़िल्म “लाल सितारे” देखने “आर्ट” थियेटर जाएँगे. ये बहुत दिलचस्प फ़िल्म है न्यायपूर्ण उद्देश्य के लिए हमारे संघर्ष के बारे में... कल अपने साथ दस-दस कोपेक लाना. सब बच्चे सुबह दस बजे स्कूल के पास इकट्ठे होंगे!

मैंने शाम को मम्मा को ये सब बताया, और मम्मा ने मेरी बाईं जेब में टिकट के लिए दस कोपेक रख दिए और दाईं जेब में कुछ और सिक्के रख दिए शरबत के लिए. उसने मेरी साफ़ कमीज़ पर इस्त्री भी कर दी. मैं जल्दी सोने चला गया, जिससे कि जल्दी से सुबह हो जाए, और जब मैं उठा तो मम्मा अभी तक सो रही थी. तब मैं तैयार होने लगा. मम्मा ने आँख़ें खोलीं और कहा:  “सो जा, अभी रात है!” कहाँ की रात – दिन जैसा उजाला हो रहा है! मैंने कहा:  “कहीं देर न हो जाए!” मगर मम्मा ने फुसफुसाकर कहा:  “सिर्फ छह बजे हैं. तू पापा को न जगा, सो जा, प्लीज़!” 

मैं फिर से लेट गया और बड़ी देर तक लेटा रहा, पंछी भी गाने लगे, और स्वीपर्स कम्पाऊण्ड में झाडू लगाने लगे, खिड़की के बाहर मशीन की घूँ-घूँ सुनाई देने लगी. अब तो शायद उठ ही जाना चाहिए. और मैं फिर से तैयार होने लगा. मामा कसमसाई और उसने सिर ऊपर उठाया:  “अरे, परेशान इन्सान, तू कर क्या रहा है?” मैंने कहा:  “देर हो रही है! कितने बजे हैं?”  “ छह बजकर पाँच मिनट हुए हैं,” मम्मा ने कहा, “तू सो जा, परेशान न हो, जब टाइम हो जाएगा, मैं तुझे जगा दूँगी.”

  और सचमुच में, उसने बाद में मुझे जगा दिया. मैंने कपड़े पहने, हाथ-मुँह धोया, ब्रेकफास्ट किया और स्कूल की तरफ़ चला. मैंने और मीशा ने जोड़ी बना ली, और जल्दी ही हम सब सिनेमा के लिए निकल पड़े. रईसा इवानव्ना आगे-आगे थीं, और एलेना स्तिपानव्ना हमारे पीछे-पीछे.

हॉल में हमारी क्लास ने पहली लाईन की बढ़िया सीटों पर कब्ज़ा जमा लिया, फिर हॉल में अंधेरा हो गया और फ़िल्म शुरू हुई. हमने देखा कि कैसे लम्बी-चौड़ी स्तेपी में, जो जंगल से कुछ ही दूर थी, रेड-आर्मी के सैनिक बैठे थे, कैसे वो एकॉर्डियन की धुन पर गा रहे थे और नाच रहे थे. एक सैनिक धूप में सो रहा था, और उससे थोड़ी ही दूरी पर ख़ूबसूरत घोड़े घास चर रहे थे, वो अपने नरम-नरम होठों से घास, डेज़ी और घण्टी के फूल चबा रहे थे. हल्की-हल्की हवा चल रही थी, नदी का साफ़ पानी बह रहा था, और एक दाढ़ी वाला सैनिक छोटे से अलाव के पास बैठकर फ़ायर-बर्ड (ऐसा पंछी जिसके पंख आग जैसे लाल होते हैं – अनु.) की कहानी सुना रहा था.

 


इसी समय, न जाने कहाँ से व्हाईट-आर्मी के ऑफ़िसर्स प्रकट हो गए, वे काफ़ी सारे थे, और उन्होंने गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया. रेड-आर्मी वाले गिरने लगे और ख़ुद को बचाने लगे, मगर व्हाईट वाले बहुत ज़्यादा थे...

 एक रेड-गनमैन ने दनादन गोलियाँ चलाना शुरू कर दिया, मगर उसने देखा कि उसके पास बेहद कम गोलियाँ हैं; और उसने अपने दाँत भींचे और रोने लगा.

अब हमारे सारे लड़के भयानक शोर मचाने लगे, पैर पटकने लगे और सीटियाँ बजाने लगे, कोई दो ऊँगलियाँ मुँह में डालकर और कोई वैसे ही. मेरे दिल में दर्द होने लगा, मैं बर्दाश्त न कर पाया, अपनी पिस्तौल निकाल ली और पूरी ताक़त से चिल्लाया:  “क्लास 1-‘C’! फ़ायर!!!”

और हमने एक साथ कई पिस्तौलों से गोलियाँ दागना शुरू कर दिया. चाहे जो हो जाए, हम रेड-सैनिकों की मदद करना चाहते थे. मैं पूरे समय एक मोटे फ़ासिस्ट पर गोलियाँ चला रहा था, वो सबसे आगे था, उसने काले-काले क्रॉस और कई सारे स्टार्स लगाए हुए थे; मैंने उस पर, शायद, सौ गोलियाँ चला दीं, मगर उसने मेरी ओर देखा तक नहीं. 

चारों ओर भयानक भगदड़ मची थी. वाल्का कुहनियों से मार रहा था, अन्द्र्यूश्का रुक-रुक कर फ़ायर कर रहा था, जबकि मीश्का, शायद स्नाइपर था, क्योंकि हर बार फ़ायर करने के बाद चिल्ला रहा था:  “रेडी!” मगर व्हाईट- सैनिक हमारी ओर ध्यान ही नहीं दे रहे थे, और आगे-आगे बढ़ते जा रहे थे. तब मैंने चारों ओर देखा और चिल्लाया:  “मदद करो! अपनों को बचाओ!” अब 1-A और 1- B  के सारे बच्चों ने पटाखों वाली स्टन-गन्स निकाल लीं और वोSS बूम्-बूम् करने लगे कि छत दहल गई और धुँए की, बारूद की, गंधक की बू फैल गई.

हॉल के अन्दर ख़तरनाक भागदौड़ होने लगी. रईसा इवानव्ना और एलेना स्तिपानव्ना क़तारों में भाग रही थीं और चिल्ला रही थीं:  “बदतमीज़ी बन्द करो! स्टॉप!” और उनके पीछे सफ़ेद बालों वाली डोर-कीपर्स भाग रही थीं और पूरे समय ठोकर खा रही थीं...और तभी एलेना स्तिपानव्ना का हाथ ग़लती से एक नागरिक की कोहनी पर पड़ा, जो एक्स्ट्रा कुर्सी में बैठी थी. और, उस नागरिक के हाथ में थी ‘एस्किमो’ आईस्क्रीम. वो किसी स्क्रू की तरह उड़ कर एक अंकल के गंजे सिर पर लगी. वो उछला और पतली आवाज़ में चीख़ा:  “अपने इस पागलखाने को शांत कीजिए!!!”

मगर हम अटैक करते ही रहे, क्योंकि रेड-गनमैन क़रीब-क़रीब शांत हो गया था, वह ज़ख़्मी हो गया था, और उसके सफ़ेद-झक् चेहरे पर लाल खून बह रहा था...अब हमारी बारूद भी ख़तम हो गई थी, और पता नहीं, आगे क्या होता, मगर तभी जंगल के पीछे से लाल-घुड़सवार उछलते हुए आए, और उनके हाथों में तलवारें चमक उठीं, वे दुश्मन के बीच में घुस गए!

 और दुश्मन जहाँ सींग समाए, वहाँ भागने लगे, धरती के उस छोर पर, और रेड-सैनिक चिल्लाए ‘हुर्रे!” और हम सब भी एक आवाज़ में चिल्लाए” “हुर्रे!” 

और जब व्हाईट-गार्ड ओझल हो गए, तो मैं चिल्लाया:  “फ़ायरिंग बन्द!” सबने फ़ौरन फ़ायरिंग रोक दी, और परदे पर म्यूज़िक बजने लगा, और एक लड़का मेज़ पर बैठकर पॉरिज खाने लगा. तभी मैं भी समझ गया कि बहुत थक गया हूँ और मुझे भूख भी लगी है. फिर फिल्म बहुत अच्छी तरह से ख़तम हुई और हम अपने अपने घर चल दिए. 

मगर सोमवार को, जब हम स्कूल पहुँचे, तो हम सब लड़कों को, जो फिल्म देखने गए थे, बड़े हॉल में इकट्ठा किया गया. 

वहाँ एक मेज़ रखी थी. मेज़ के पीछे हमारा डाइरेक्टर फ़्योदर निकलायेविच बैठा था. वह उठा और कहने लगा:  “अपने अपने हथियार दे दो!” 

हम सबने बारी बारी से मेज़ पर अपने हथियार रख दिए. मेज़ पर, पिस्तौलों के अलावा दो गुलेलें और मटर के दाने मारने वाला पाईप भी था. फ़्योदर निकलायेविच ने कहा:  “हमने सुबह विचार-विमर्श किया, कि आपके साथ क्या किया जाए. अलग-अलग प्रस्ताव आए...मगर मैं मनोरंजन केन्द्र की बिल्डिंग में आचरण संबंधी कानून तोड़ने के लिए तुम सब की मौखिक रूप से निंदा करता हूँ! इसके अलावा, तुम लोगों की ‘आचरण’ वाली ग्रेड भी कम की जाएगी. और अब जाओ – ध्यान से पढ़ाई करो!”

 हम क्लास में गए, मगर मैं बैठा रहा और पढ़ाई में ध्यान न लगा सका. मैं सोच रहा था कि निन्दा करना – बहुत बुरी सज़ा है और मम्मा, शायद, ग़ुस्सा हो जाएगी....

मगर शॉर्ट इंटरवल में मीश्का स्लनोव  ने कहा:  “फिर भी, अच्छा हुआ कि हमने रेड-आर्मी के सैनिकों की डटे रहने में मदद की, जब तक उनके लोग नहीं आ गए! और मैंने कहा:  “बेशक!!! हालाँकि ये फ़िल्म थी, मगर,  हो सकता है, हमारे बिना वो डटे नहीं रहते!”  “किसे पता...”


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44

बूढ़ा नाविक


 



मरीया  पित्रोव्ना  हमारे यहाँ अक्सर चाय पीने के लिए आती है. वो पूरी की पूरी ऐसी मोटी-मोटी है, उसकी ड्रेस ऐसी तंग, खिंची-खिंची होती है, जैसे तकिए पर खींच-खींच कर गिलाफ़ चढ़ाया गया हो. उसके कानों में तरह-तरह की बालियाँ लटकती रहती हैं. और वो कोई सूखा सा, मीठा-मीठा सेन्ट लगाती है. जब मैं ये ख़ुशबू सूंघता हूँ तो मेरा गला फ़ौरन सिकुड़ जाता है. मरीया पित्रोव्ना जैसे ही मुझे देखती है, तो फ़ौरन सवाल पूछने लगती है: कि मैं क्या बनना चाहता हूँ. मैं उसे पहले ही पाँच बार समझा चुका हूँ, मगर वो है कि एक ही सवाल बार-बार पूछे ही जाती है. अजीब है. जब वो पहली बार हमारे यहाँ आई, तो बसंत का मौसम था, खिड़कियों से हरियाली की ख़ुशबू आ रही थी, और, हालाँकि शाम हो चुकी थी, फिर भी उजाला था. मम्मा मुझे सोने के लिए कहने लगी, और, जब मैंने कहा, कि मैं अभी नहीं सोना चाहता, तो मरीया पित्रोव्ना अचानक बोली:  “अच्छे बच्चे बनो, सो जाओ, और अगले इतवार को मैं तुम्हें समर-कॉटेज ले जाऊँगी, क्ल्याज़्मा में. हम इलेक्ट्रिक ट्रेन से जाएँगे. वहाँ नदी है और कुत्ता भी है, और हम तीनों बोटिंग भी करेंगे.” 

मैं फ़ौरन लेट गया, मैंने अपने आपको सिर तक ढँक लिया, और अगले इतवार के बारे में सोचने लगा, कि मैं कैसे समर-कॉटेज जाऊँगा, कैसे नंगे पैर घास पर घूमूँगा, और नदी देखूँग़ा, और, हो सकता है, मुझे चप्पू चलाने देंगे, और चप्पुओं की कड़ियाँ झनझनाएँगी, और पानी बुड़बुड़ाएगा, और चप्पुओं से पानी में बूंदें गिरती रहेंगी, पारदर्शक, बिल्कुल शीशे जैसी. मैं वहाँ छोटे से कुत्ते से दोस्ती करूँगा, शायद उसका नाम झूच्का या तूज़िक होगा, मैं उसकी पीली आँखों में देखूँगा, और जब गर्मी के कारण ज़ुबान बाहर निकालेगा, तो मैं उसे छू लूँगा.

मैं इस तरह लेटा था, और सोच रहा था, और मरीया पित्रोव्ना  की हँसी सुन रहा था, और न जाने कब सो गया. इसके बाद पूरे हफ़्ते, जब सोने जाता, तो बस यही बात सोचता.

 जब शनिवार आया, तो मैंने अपने जूते साफ़ किए, और दाँत भी ब्रश किए, और अपनी पेन्सिल तेज़ करने का चाकू लिया, उसे गैस के स्टोव पे रगड़ कर तेज़ भी किया, क्योंकि क्या पता, कौन सी टहनी तोड़ना पडे, हो सकता है, अख़रोट की भी टहनी हो. 

सुबह मैं सबसे पहले उठा, और कपड़े पहनकर मरीया पित्रोव्ना  का इंतज़ार करने लगा.

जब पापा ने ब्रेकफ़ास्ट कर लिया और अख़बार भी पढ़ लिए, तो बोले:  “चल, डेनिस्का, ‘चिस्तीये’ लेक पर चलते हैं, घूमेंगे!”  “क्या कह रहे हो, पापा! और मरीया पित्रोव्ना? अभी वो आएगी मुझे लेने, और हम क्ल्याज़्मा जाएँगे. वहाँ कुत्ता है और नाव है. मुझे उसका इंतज़ार करना पड़ेगा.” पापा चुप हो गए और उन्होंने मम्मा की तरफ़ देखा, फिर उन्होंने कंधे उचकाए और चाय का दूसरा गिलास पीने लगे. मैंने जल्दी से ब्रेकफ़ास्ट पूरा किया और कम्पाऊण्ड में निकला. मैं गेट के पास घूम रहा था, जिससे कि जैसे ही मरीया  पित्रोव्ना  आए, फ़ौरन उसे देख सकूँ. मगर न जाने क्यों वो बड़ी देर तक नहीं आई. तब मीश्का मेरे पास आया, उसने कहा:  “चल, एटिक पे चढ़ते हैं! देखेंगे कि कबूतरों के पिल्ले पैदा हुए या नहीं...”  “समझ रहा है, मैं नहीं आ सकता...मैं एक दिन के लिए गाँव जा रहा हूँ. वहाँ कुत्ता है और नाव भी है. अभी एक आण्टी मुझे लेने आएगी, और मैं उसके साथ इलेक्ट्रिक ट्रेन में जाऊँगा.” तब मीश्का ने कहा:  “क्या बात है! क्या ऐसा हो सकता है, कि तुम मुझे भी ले चलो?” मैं बहुत ख़ुश हो गया, कि मीश्का भी हमारे साथ जाना चाहता है, उसके साथ तो मुझे ज़्यादा मज़ा आएगा, सिर्फ अकेली मरीया पित्रोव्ना  के साथ तो वो बात नहीं होगी. मैंने कहा:  “इसमें बहस की क्या बात है! बेशक, हम ख़ुशी-ख़ुशी तुझे ले चलेंगे! मरीया  पित्रोव्ना दयालु है, उसका क्या जाता है!”

अब मैं और मीश्का दोनों इंतज़ार करने लगे. हम बाहर गली में निकले और बड़ी देर तक खड़े रहे और इंतज़ार करते रहे. जैसे ही कोई औरत दिखाई देती, मीश्का ज़रूर पूछता:  “ये?”

एक मिनट बाद फिर:  “ये वाली?” मगर ये सब अनजान औरतें थीं, और हम वहाँ खड़े-खड़े ‘बोर’ हो गए, इंतज़ार करते-करते थक गए. मीश्का को ग़ुस्सा आ गया और वो बोला:  “मैं ‘बोर’ हो गया!”

और वो चला गया. मगर मैं इंतज़ार करता रहा. मैं उसके आने तक इंतज़ार करना चाहता था. मैंने लंच तक उसका इंतज़ार किया. लंच के दौरान पापा ने फिर से कहा, बस यूँ ही:  “तो ‘चिस्तीये लेक’ पर आ रहा है? सोच ले, वर्ना मैं और मम्मा फ़िल्म देखने चले जाएँगे!” मैंने कहा:  “मैं इंतज़ार करूँगा. आख़िर मैंने उससे वादा किया था इंतज़ार करने का. ऐसा नहीं हो सकता कि वो आये ही नहीं.”

 मगर वो नहीं आई. उस दिन न तो मैं चिस्तीये लेक पर गया और न ही मैंने कबूतरों को देखा, और जब पापा फ़िल्म देखकर वापस आए, तो उन्होंने मुझसे गेट से हटने को कहा. उन्होंने मुझे कंधों से लिपटा लिया और जब हम घर जा रहे थे, तो कहा:  “ये सब तो ज़िन्दगी में तुझे मिलेगा ही... घास, और नदी, और नाव, और कुत्ता... सब कुछ होगा, अपनी नाक हमेशा ऊँची रख!” 

मगर मैं सोते समय भी गाँव के बारे में, नाव के बारे में और छोटे से कुत्ते के बारे में ही सोचता रहा, बस, जैसे मैं वहाँ मरीया पित्रोव्ना  के साथ नहीं, बल्कि मीश्का के साथ और पापा के साथ या फिर मीश्का और मम्मा के साथ था. समय गुज़रता रहा, और मैं मरीया पित्रोव्ना के बारे में बिल्कुल भूल गया. अचानक एक दिन, फ़रमाइए, क्या हुआ! दरवाज़ा खुलता है और वह ख़ुद हाज़िर हो जाती है. कानों में झुमके ज़्व्याक-ज़्व्याक, और मम्मा के साथ च्मोक-च्मोक, और पूरे क्वार्टर में सूखी और मीठी गंध, और सब बैठते हैं मेज़ पर और पीने लगते हैं चाय. मगर मैं मरीया पित्रोव्ना के पास नहीं गया, मैं अलमारी के पीछे बैठा रहा क्योंकि मैं मरीया  पित्रोव्ना से ग़ुस्सा था.   

और, वो ऐसे बैठी थी, जैसे कुछ हुआ ही न हो, ये बड़े अचरज की बात थी! जब उसने अपनी पसन्द की चाय पी ली, तो उसने यूँ ही, बिना बात के, अलमारी के पीछे देखा और मेरी ठोढ़ी पकड़ ली.  “तू ऐसा उखड़ा-उखड़ा क्यों लग रहा है?”  “कुछ नहीं,” मैंने जवाब दिया.  “चल, बाहर आ,” मरीया पित्रोव्ना ने कहा.  “मुझे यहाँ भी अच्छा लगता है!” मैंने कहा. तब वह ठहाका मार के हँस पड़ी, और ठहाकों के कारण उसकी हर चीज़ झनझना रही थी, और जब हँसी ख़त्म हुई, तो बोली:  “बता, मैं तुझे कौन सी गिफ्ट देने वाली हूँ...” मैंने कहा:  “कुछ नहीं चाहिए!”

उसने कहा:  “तलवार नहीं चाहिए?” मैंने कहा:  “कौन सी?” ”बुदेन्योव्स्क (रोस्तोव प्रांत का एक भाग – अनु.) की. असली. टेढ़ी.”

ये हुई ना बात! मैंने कहा:  “क्या आपके पास है?”  “है,” उसने कहा.  “और, क्या आपको उसकी ज़रूरत नहीं है?” मैंने पूछा.  “किसलिए? मैं औरत हूँ, मैंने तो युद्ध की तरक़ीब सीखी नहीं, मुझे क्या ज़रूरत है तलवार की? बेहतर है, कि मैं तुम्हें दे देती हूँ.” उसकी ओर देखने से पता चल रहा था, कि उसे तलवार का ज़रा भी अफ़सोस नहीं है. मैंने यक़ीन भी कर लिया कि वो वाक़ई में दयालु है. मैंने पूछा:  “कब?”  “कल,” उसने कहा. “कल तू स्कूल से वापस आएगा, और तलवार – यहाँ. ये यहाँ, मैं उसे सीधे तेरी कॉट पे रख दूँगी.”  “अच्छा, ठीक है,” मैंने कहा और अलमारी के पीछे से बाहर आ गया, और मेज़ पर गया, उसके साथ चाय भी पी, और जब वो जाने लगी, तो उसे दरवाज़े तक बिदा भी किया.

दूसरे दिन मैं मुश्किल से स्कूल में बैठा और जैसे ही स्कूल ख़त्म हुआ, तीर की तरह घर भागा. मैं भाग रहा था और हाथ हिला रहा था – हाथ में अदृश्य तलवार थी, और मैं फ़ासिस्टों को काट रहा था, उनके बदन में तलवार घुसा रहा था, और अफ्रीका के काले बच्चों की रक्षा कर रहा था, क्यूबा के सारे दुश्मनों को काट रहा था. मैं उन्हें कैबेज की तरह काट रहा था. मैं भाग रहा था, घर में तलवार मेरा इंतज़ार कर रही थी, सचमुच की तलवार, और मुझे मालूम था कि वॉलन्टीयर्स में नाम लिखाऊँगा, और चूँकि मेरे पास अपनी तलवार है, तो मुझे ज़रूर ले लेंगे. और जब मैं भागते हुए कमरे के भीतर आया, तो मैं फ़ौरन अपनी कॉट की ओर भागा. तलवार नहीं थी. मैंने तकिए के नीचे देखा, कम्बल के नीचे देखा, कॉट के नीचे भी देखा. तलवार नहीं थी. नहीं थी तलवार. मरीया पित्रोव्ना ने अपना वादा पूरा नहीं किया था. तलवार कहीं भी नहीं थी. और, हो भी नहीं सकती थी.

मैं खिड़की के पास गया. मम्मा ने कहा:  “हो सकता है, वो अभी भी आ जाए?” मगर मैंने कहा:  “नहीं, मम्मा, वो नहीं आएगी. मुझे मालूम ही था.” मम्मा ने कहा:  “तू कॉट के नीचे क्यों घुसा था?...” मैंने उसे समझाया:  “मैंने सोचा: हो सकता है, वो आई हो? समझ रही हो? अचानक. इस बार.” मम्मा ने कहा:  “समझ रही हूँ. चल, खा ले.” और, वो मेरे पास आई. मैंने कुछ खा लिया और फिर से खिड़की के पास खड़ा हो गया. कम्पाऊण्ड में जाने को जी नहीं चाह रहा था.

 और जब पापा आए, तो मम्मा ने उन्हें सब कुछ बताया, और उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया. उन्होंने अपनी शेल्फ से एक किताब निकाली और बोले:  “आ जा, ब्रदर, कुत्ते के बारे में ये बढ़िया किताब पढेंगे. उसका नाम है “माइकल- जैरी का भाई”. जैक लण्डन ने लिखी है. 

मैं जल्दी से पापा के पास बैठ गया, और वो पढ़ने लगे. पापा बढ़िया पढ़ते हैं, एकदम वण्डरफुल! और किताब भी बहुत कीमती थी. मैं पहली बार इतनी दिलचस्प कहानी सुन रहा था. कुत्ते के एडवेन्चर्स. कैसे जहाज़ के एक छोटे अफ़सर ने उसे चुरा लिया. और वे ख़ज़ाना ढूँढ़ने के लिए जहाज़ में जाते हैं. जहाज़ के मालिक हैं तीन अमीर. उन्हें रास्ता दिखा रहा था एक बूढ़ा नाविक, वो बीमार था और अकेला था, उसने कहा कि वो ख़ज़ाने का पता जानता है, और उसने इन तीन अमीरों से वादा किया कि उनमें से हरेक को हीरे-जवाहरात का एक एक ढेर मिलेगा, इस वादे के ऐवज़ में अमीरों ने बूढ़े नाविक को खिलाया-पिलाया. फिर अचानक पता चला, कि जहाज़ तो खज़ाने की जगह तक जा ही नहीं सकता, क्योंकि पानी बेहद उथला है. ये भी बूढ़े नाविक की चाल थी. और अमीरों को ख़ाली हाथ वापस लौटना पड़ा. इस बेईमानी से बूढ़े नाविक ने अपने लिए खाना पा लिया, क्योंकि वो ज़ख़्मी, ग़रीब बूढ़ा था.

जब हमने ये किताब ख़त्म की और फिर से उसके बारे में बात करने लगे, तो पापा अचानक हँस पड़े और बोले:

 “और ये बूढ़ा नाविक तो फिर भी अच्छा है! वो सिर्फ बेईमान ही है, तेरी मरीया  पित्रोव्ना जैसा.” मगर मैंने कहा:  “तुम क्या कह रहे हो, पापा! बिल्कुल उसके जैसा नहीं है. बूढ़े नाविक ने अपनी ज़िन्दगी बचाने के लिए धोखा दिया. वो बिल्कुल अकेला जो था, बीमार भी था. मगर मरीया पित्रोव्ना ? क्या वो बीमार है?”  “तन्दुरुस्त है,” पापा ने कहा.  “हाँ,” मैंने कहा. “अगर बूढ़ा नाविक झूठ न बोलता, तो वो बेचारा, किसी पोर्ट पे मर जाता, नंगी चट्टानों के ऊपर, पेटियों और गाठों के बीच में, बर्फ़ीली हवा और धुँआधार बारिश के नीचे. उसके सिर पर तो कोई छत नहीं थी ना! मगर मरीया  पित्रोव्ना के पास तो बढ़िया कमरा है – अठारह वर्ग मीटर्स का, सारी सुविधाओं के साथ. और कितने सारे झुमके, बालियाँ और चेन्स हैं उसके पास!”  “क्योंकि वो स्वार्थी बुर्जुआ है” पापा ने कहा.           

और हालाँकि मैं नहीं जानता था कि ‘स्वार्थी बुर्जुआ’ क्या होता है, मगर पापा की आवाज़ से मैं समझ गया कि ये कोई बुरी चीज़ है, और मैंने उनसे कहा:  “मगर बूढ़ा नाविक भला था: उसने अपने बीमार पेट्टी-ऑफ़िसर की जान बचाई – ये हुई पहली बात. और, तुम सोचो, पापा, वो सिर्फ दुष्ट अमीरों को ही धोखा देता है, जबकि मरीया पित्रोव्ना ने – मुझे धोखा दिया है. बताओ, वह मुझे क्यों धोखा देती है? क्या मैं अमीर हूँ?”  “चल, तू भूल भी जा,” मम्मा ने कहा, “इतना परेशान होने की ज़रूरत नहीं है!”

 पापा ने उसकी तरफ़ देखा, सिर हिलाया और ख़ामोश हो गए. हम दोनों दीवान पर ख़ामोश लेटे रहे, उनके पास मुझे गर्माहट महसूस हो रही थी, और मुझे नींद आने लगी, मगर फिर भी सोने से पहले मैंने सोचा:  “नहीं, इस ख़तरनाक मरीया पित्रोव्ना का मेरे भले, दयालु बूढ़े नाविक से कोई मुक़ाबला ही नहीं है!”


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45.

अंग्रेज़ पाव्ल्या


 “कल पहली सितम्बर है,” मम्मा ने कहा. “देखते-देखते शरद ऋतु आ गई, और तू दूसरी क्लास में जाएगा. ओह, टाईम कैसे उड़ता है!...”  “इस ख़ुशी में,” पापा ने पुश्ती जोड़ी, “हम अभी ‘काटेंगे’ तरबूज़!”


 

उन्होंने चाकू लिया और तरबूज़ काटा. जब वो काट रहे थे, तो ऐसी भरी-भरी, प्यारी-प्यारी, हरी-हरी कर-कर सुनाई दे रही थी, कि मेरी पीठ में इस ख़याल से ठंडक दौड़ गई कि ये तरबूज़ मैं कैसे खाऊँगा. मैंने अपना मुँह खोल लिया, जिससे कि तरबूज़ की गुलाबी स्लाईस को पकड़ लूँ, मगर तभी दरवाज़ा खुला, और कमरे में आया पाव्ल्या (पावेल को प्यार से पाव्ल्या, पाव्लिक पुकारते हैं. अंग्रेज़ी में ये नाम है – पॉल – अनु. ). हम सब बेहद ख़ुश हुए, क्योंकि वो बहुत दिनों से हमारे यहाँ नहीं आया था, और हमें उसकी याद आती थी.  “ओहो, कौन आया है!” पापा ने कहा. “ख़ुद पाव्ल्या. ख़ुद पाव्ल्या-दाढ़ीवाला!”

 “हमारे साथ बैठो, पाव्लिक, तरबूज़ खाओ,” मम्मा ने  कहा, “डेनिस्का, थोड़ा सरक जा.” मैंने कहा: “हैलो!” और उसे मेरे पास जगह दे दी.

“हैलो!” उसने कहा और बैठ गया.

 हमने तरबूज़ खाना शुरू किया और बड़ी देर तक चुपचाप खाते रहे. बातें करने को दिल नहीं चाह रहा था. जब मुँह में इतनी स्वादिष्ट चीज़ भरी हो, तो कोई बात कैसे कर सकता है! 

जब पाव्ल्या को तीसरी स्लाईस दी गई, तो उसने कहा: “आह, मुझे तरबूज़ पसंद है. बेहद पसंद है. मुझे दादी कभी भी जी भरके नहीं खाने देती.”  “ऐसा क्यों?” मम्मा ने पूछा.  “वो कहती है, कि तरबूज़ खाने के बाद मुझे नींद नहीं आएगी, मैं बस मस्ती करने लगूँगा.”  “सही है,” पापा ने कहा. “इसीलिए तो हम तरबूज़ सुबह, जल्दी खाते हैं. शाम तक उसका असर ख़त्म हो जाता है, और बड़ी अच्छी नींद आती है. चल, खा ले, घबराने की ज़रूरत नहीं है.”  “मैं नहीं घबराता,” पाव्ल्या ने कहा.

और हम फिर से खाने लगे और फिर से बड़ी देर तक चुप रहे. जब मम्मा छिलके उठाने लगी, तो पापा ने कहा:  “पाव्ल्या, तू इतने दिन हमारे यहाँ क्यों नहीं आया?”  “हाँ,” मैंने कहा. “तू कहाँ ग़ायब हो गया था? क्या कर रहा था?”

 पाव्ल्या अकड़ दिखाने लगा, वो लाल हो गया, उसने इधर-उधर देखा और अचानक ऐसे बोला, जैसे ज़बर्दस्ती बता रहा हो:  “क्या कर रहा था, क्या कर रहा था?... ये कर रहा था, कि अंग्रेज़ी सीख रहा था.”

मैं एकदम सन्न हो गया. मैं फ़ौरन समझ गया कि मैं पूरी गर्मियाँ बस बेवकूफ़ियाँ करता रहा. साही से खेलता रहा, बैट-बॉल खेलता रहा, बेकार की चीज़ें करता रहा. और इस पाव्ल्या ने समय नहीं बर्बाद किया, नहीं, शरारतें नहीं कीं, वह अपने आप को अच्छा बनाने में लगा रहा, अपनी शिक्षा के स्तर को बढ़ाता रहा.

वो अंग्रेज़ी सीख रहा था और अब इंग्लैण्ड के पायनीयर्स से पत्र-व्यवहार कर सकेगा और अंग्रेज़ी किताबें पढ़ सकेगा!

मुझे लगा कि मैं जलन के मारे मर जाऊँगा, और ऊपर से मम्मा ने भी कहा:  “देख डेनिस्का, सीख. ये कोई बैट-बॉल नहीं है!” ”शाबाश!” पापा ने कहा. “मैं इज़्ज़त करता हूँ!” पाव्ल्या का चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा.

 “हमारे यहाँ एक स्टूडेंट, सीवा आया है. वो हर रोज़ मुझे सिखाता है. पूरे दो महीने हो गए. पूरी तरह तंग कर दिया है.” ”क्या अंग्रेज़ी कठिन है?” मैंने पूछा.  “पागल हो जाते हो,” पाव्ल्या ने गहरी साँस ली.  “मुश्किल कैसे नहीं होगी,” पापा भी बात में शामिल हो गए. “वहाँ तो शैतान को भी नानी याद आ जाए. बेहद मुश्किल है अंग्रेज़ी लिखना. लिखते हो लिवरपूल और कहते हो मैनचेस्टर.”  “वाह, वा!!” मैंने कहा. “क्या ये सही है, पाव्ल्या?”  “बिल्कुल मुसीबत है,” पाव्ल्या ने कहा. “इन लेसन्स से मैं बेज़ार हो गया हूँ, मेरा वज़न भी दो सौ ग्राम्स कम हो गया है.”  “तो तू अपने ज्ञान का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है, पाव्लिक?” मम्मा ने कहा. “जब तू आया, तो तूने अंग्रेज़ी में हमसे ‘नमस्ते’ क्यों नहीं कहा?”  “अभी मैंने ‘नमस्ते’ सीखा नहीं है,” पाव्ल्या ने कहा.  “अच्छा, जब तूने तरबूज़ खाया, तो ‘धन्यवाद’ क्यों नहीं कहा?”

 “मैंने कहा था,” पाव्ल्या ने जवाब दिया.  “हाँ, रूसी में तो तूने कहा था, मगर अंग्रेज़ी में?”  “हम अभी ‘धन्यवाद’ तक नहीं पहुँचे हैं,” पाव्ल्या ने कहा. “बहुत मुश्किल है...”

तब मैंने कहा:  “पाव्ल्या, चल, तू मुझे सिखा कि अंग्रेज़ी में ‘एक, दो, तीन’ कैसे कहते हैं.”  “ये मैंने अभी नहीं सीखा है,” पाव्ल्या ने कहा.  “तो तूने सीखा क्या है?” मैं चिल्लाया. “दो महीनों में तूने कुछ तो सीख होगा?”  “मैंने सीखा कि अंग्रेज़ी में ‘पेत्या’ को कैसे बुलाते हैं,” पाव्ल्या ने कहा.  “कैसे?”   “‘पीट’!” पाव्ल्या ने शान से जवाब दिया. “अंग्रेज़ी में ‘पेत्या’ होगा ‘पीट’. वह ख़ुशी से मुस्कुराया और आगे बोला: “कल क्लास में जाकर पेत्का गर्बूश्किन से कहूँगा: “पीट, ऐ पीट, रबर दे!” वो अचरज से मुँह खोलेगा, कुछ भी नहीं समझेगा. बड़ा मज़ा आएगा! है ना, डेनिस?”

 “सही है,” मैंने कहा. “अच्छा, और क्या क्या जानता है तू अंग्रेज़ी में?”  “बस, अभी इतना ही,” पाव्ल्या ने कहा. 



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46.

मुझे सिंगापुर के बारे में बताइये!


मैं और पापा इतवार को अपने रिश्तेदारों से मिलने गए. वो लोग मॉस्को के पास ही एक छोटे से शहर में रहते थे, और हम इलेक्ट्रिक ट्रेन से जल्दी वहाँ पहुँच गए. अंकल अलेक्सेइ मिखाइलविच और आण्टी मीला ने प्लेटफॉर्म पर हमारा स्वागत किया.

 

अलेक्सेइ मिखाइलविच ने कहा:  “ओहो, डेनिस्का कितना बड़ा हो गया है!” और मीला आण्टी बोली: 

 “डेनिस्का, आ जा, मेरे साथ चल.” और उसने पूछा: “ये बास्केट कैसी है?”  “इसमें प्लास्टिसीन (रंग-बिरंगी मिट्टी का गूदा) है, पेन्सिलें हैं और पिस्तौलें भी हैं...”  मीला आण्टी मुस्कुराने लगी, और हम रेल की पटरियाँ पार करके स्टेशन की बगल से निकलकर एक कच्चे रास्ते पर आए: रास्ते के किनारों पर पेड़ थे. मैंने जल्दी से जूते उतार दिए और नंगे पैर चलने लगा, कुछ गुदगुदा रहा था, एडियों में कुछ चुभ रहा था, वैसे ही जैसे पिछले साल हुआ था, जब मैं सर्दियों के बाद पहली बार नंगे पैर चला था. अब रास्ता किनारे की ओर मुड़ गया, और हवा में नदी की और कोई मीठी-मीठी ख़ुशबू फ़ैल गई, मैं घास पर दौड़ने लगा, उछलने लगा और चिल्लाने लगा: “ओ-हा-हा-आ!” मीला आण्टी ने कहा:  “बछड़े जैसी ख़ुशी!”

जब हम घर पहुँचे तो लगभग अंधेरा हो चुका था, और हम सब छत पर चाय पीने बैठे, मुझे भी बड़े कप में चाय दी गई. अचानक अलेक्सेइ मिखाइलोविच ने पापा से कहा;  “पता है, आज रात को 00.40 मिनट पर हमारे यहाँ चैरितोशा आने वाला है. वो हमारे यहाँ एक दिन रहेगा, कल रात को ही जाएगा. वो इस तरफ़ से गुज़र रहा है.” पापा तो बेहद ख़ुश हो गए.

 


 “डेनिस्का,”  पापा ने कहा, “मेरा ‘कज़िन’ – मतलब तेरा बड़ा चाचा चैरिटोन वासिल्येविच आ रहा है! वो कब से तुझसे मिलना चाहता था!”

मैंने कहा:  “मैं उसे क्यों नहीं जानता?” मीला आण्टी फिर से हँसने लगी.  “क्योंकि वो ‘नॉर्थ’ में रहता है,” उसने कहा, “और मॉस्को बहुत कम आता है.” मैंने पूछा:  “और वो करता क्या है?” अलेक्सेइ मिखाइलविच ने ऊँगली ऊपर उठाई:  “ वो - लम्बी समुद्री यात्राओं का कप्तान है.”

मेरी पीठ पर जैसे चींटियाँ रेंगने लगीं. ऐसा कैसे? मेरे बड़े अंकल – समुद्री कप्तान हैं? मुझे इस बारे में बस अभी पता चला? पापा हमेशा ऐसे ही हैं – सबसे ज़रूरी बात भी उन्हें ‘बाइ-चान्स’ ही याद आती है!

 “क्या है, पापा! तुमने मुझे बताया क्यों नहीं कि मेरे अंकल लम्बी समुद्री यात्राओं के कप्तान हैं? जाओ, अब मैं भी तुम्हारे जूते साफ़ नहीं करूँगा!”

मीला आण्टी फिर से खिलखिलाने लगी. मैंने कब से नोट किया है कि मीला आण्टी बात-बेबात हँसने लगती है. इस समय वो बिना किसी बात के हँस रही थी. मगर पापा बोले:  “मैंने तुझे पिछले से पिछले साल ही बताया था, जब वो सिंगापुर से आया था, मगर तब तू बहुत छोटा था. और तू, शायद, भूल गया. मगर कोई बात नहीं, अब सो जा, कल तू उससे मिलने ही वाला है!” 

अब मीला आण्टी ने मेरा हाथ पकड़ा और छत से घर के भीतर ले गई, हम एक छोटे कमरे से गुज़रते हुए दूसरे छोटे कमरे में आए. वहाँ कोने में एक छोटा सा दीवान रखा था. खिड़की के पास एक बड़ा फूलदार पार्टीशन रखा था.

 “ये यहाँ, सो जा,” मीला आण्टी ने कहा. “कपड़े बदल ले! तेरी ये पिस्तौलों वाली बास्केट मैं पैरों के पास रखती हूँ.” मैंने पूछा:  “और पापा कहाँ सोएँगे?” उसने कहा:  “शायद, छत पे ही सोएँगे. तुझे तो मालूम है कि तेरे पापा को ताज़ी हवा कितनी पसन्द है. क्या हुआ? क्यों पूछ रहा है? क्या तुझे डर लगेगा?” मैंने कहा:  “बिल्कुल नहीं.” मैं कपड़े बदल कर लेट गया. मीला आण्टी ने कहा:  “आराम से सोना, हम यहीं, पास में ही हैं.” और वो चली गई. मैं दीवान पे लेट गया और बड़ी चौख़ाने वाली चादर ओढ़ ली. लेटे-लेटे मैं सुन रहा था कि छत पर हल्की आवाज़ में बातें कर रहे हैं और हँस रहे हैं, और मैं सोना चाहता था, मगर पूरे समय अपने कप्तान बड़े चाचा के बारे में सोचता रहा. 

मैं ताज्जुब से सोच रहा था, कि कैसी होगी उसकी दाढ़ी? क्या दाढ़ी सीधे गर्दन से निकल रही होगी, जैसा कि मैंने तस्वीरों में देखा था? और पाईप कैसा होगा? सीधा या मुड़ा हुआ? और तलवार – डिज़ाइन वाली या प्लेन? लम्बी समुद्री यात्राओं के कप्तानों को बहादुरी दिखाने के लिए डिज़ाइन वाली तलवार से सम्मानित किया जाता है. सही है, क्योंकि अपनी यात्राओं के दौरान वे लगभग हर रोज़ आइसबर्ग्स से टकराते हैं, या येS  बड़ी-बड़ी व्हेलों और सफ़ेद  भालुओं का सामना करते हैं, या मुसीबत में फँसे जहाज़ों को बचाते हैं. साफ़ है, कि ऐसी परिस्थिति में बहादुरी दिखाना ही पड़ती है, वर्ना तो तुम ख़ुद ही अपने सभी नाविकों के साथ डूब जाओगे, और जहाज़ भी बर्बाद कर दोगे. और अगर ऐसा जहाज़, जैसे न्यूक्लियर उपकरणों से लैस बर्फ तोड़ने वाला जहाज़ ‘लेनिन’ – नष्ट हो जाए, तो दुख तो होगा ही, है ना? और, वैसे भी, ज़रूरी नहीं है कि लम्बी यात्राओं वाले कप्तान सिर्फ ‘नॉर्थ’ की तरफ़ ही जाएँ, ऐसे भी होते हैं जो अफ्रीका जाते हैं, और उनके जहाज़ों पर बन्दर और मुंगूस रखे जाते हैं, जो साँपों को मार डालते हैं, उनके बारे में मैंने किताब में पढ़ा था. ये ही मेरा वाला लम्बी यात्रा का कप्तान – पिछले से पिछले साल सिंगापुर से आया था. कितना वण्डरफुल नाम है: “सिं-गा-पुर”!... मैं अंकल से ज़रूर कहूँगा कि मुझे सिंगापुर के बारे में बताए: वहाँ कैसे लोग रहते हैं, कैसे बच्चे हैं, कैसी नौकाएँ और कैसे उनके पाल हैं...ज़रूर पूछूँग़ा. और मैं इत्ती देर तक सोचता रहा, और न जाने कब मेरी आँख़ लग गई...

मगर बीच रात में ही मैं भयानक गुरगुराहट से जाग गया. शायद ये कोई कुत्ता था, जो कमरे में घुस आया था, उसने सूंघ लिया कि मैं यहाँ सो रहा हूँ, और उसे ये अच्छा नहीं लगा. वो बड़े खूँख़ार तरीके से गुर्रा रहा था, कहीं फूलदार पार्टीशन के नीचे से, और मुझे ऐसा लगा, कि मैं अंधेरे में उसकी झुर्रियों वाली नाक और सफ़ेद नुकीले दाँत भी देख रहा हूँ. मैं पापा को आवाज़ देना चाहता था, मगर मुझे याद आया कि वो दूर सो रहे हैं, छत पे, और मैंने सोचा कि आज तक तो मैं कभी भी कुत्तों से नहीं डरा था और इस समय भी घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है. वैसे भी मैं जल्दी ही आठ साल का होने वाला हूँ. मैं चिल्लाया:  “तूबा! सो जा!” कुत्ता फ़ौरन चुप हो गया. मैं खुली आँखों से अँधेरे में लेटा था. खिड़की से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था, सिर्फ एक टहनी नज़र आ रही थी. वो ऊँट जैसी थी, जैसे वो पिछले पैरों पर खड़ा होकर कुछ कर रहा हो. और मैं सात की टेबल (पहाड़ा) दुहराने लगा, इससे मुझे फ़ौरन नींद आ जाती है. और सही में : मैं सात सत्ते तक भी नहीं पहुँचा, कि मेरे दिमाग़ में सब गड्ड-मड्ड होने लगा, और मैं लगभग सो ही गया, मगर तभी कोने में, पार्टीशन के पीछे कुत्ता, जो कि शायद नहीं सोया था, फिर से गुर्राने लगा. और वो भी कैसे! पहले से सौ गुना ज़्यादा डरावनी आवाज़ में. मेरे भीतर कुछ-कुछ चुभने लगा. मगर फिर भी मैं उसके ऊपर चिल्लाया:  “तूबा! लेटा रह! फ़ौरन सो जा!...” वो फिर से थोड़ा सा शांत हो गया. तभी मुझे याद आया कि मेरी ट्रेवल-बास्केट मेरे पैरों के पास रखी है और उसमें मेरी अपनी चीज़ों के अलावा खाने का एक पैकेट भी है, जो मम्मा ने रास्ते के लिए रख दिया था. मैंने सोचा कि अगर इस कुत्ते को थोड़ा सा खिला दूँ, तो उसका मूड अच्छा हो जाएगा और वो मुझ पर गुर्राना बन्द कर देगा. मैं उठकर बैठ गया, बास्केट में हाथ डालकर टटोलने लगा, और हालाँकि अंधेरे में समझना मुश्किल था, फिर भी मैंने उसमें से कटलेट और दो अंडे निकाले – मुझे उनके बारे में कोई अफ़सोस नहीं था, क्योंकि वो सॉफ्ट-बॉइल्ड थे. जैसे ही कुत्ता फिर गुर्राया, मैंने एक के बाद एक दोनों अंडे पार्टीशन के पीछे फेंक दिए:  “तूबा! खा ले! और फ़ौरन सो जा!...” पहले तो वो चुप रहा, मगर फिर इतने गुस्से से गुर्राया, कि मैं समझ गया: उसे भी सॉफ्ट-बॉइल्ड अंडे पसन्द नहीं हैं. तब मैंने उसकी तरफ़ कटलेट फेंका, सुनाई दे रहा था कि कैसे कटलेट उससे टकराया, कुत्ता चुप हो गया और उसने गुर्राना बन्द कर दिया. मैंने कहा:  “अब ठीक है. और अब – सो जा! फ़ौरन!” कुत्ता और नहीं गुर्राया, बल्कि सिर्फ नाक से सूँ-सूँ करता रहा. मैंने अपने आपको कम्बल में कसके बन्द कर लिया और सो गया... 

सुबह सूरज की तेज़ धूप से मैं उछलकर उठा और सिर्फ अंडरवियर में छत पे भागा. पापा अलेक्सेइ मिखायलोविच और मीला आण्टी मेज़ पे बैठे थे. मेज़ पे सफ़ेद मेज़पोश था और पूरी प्लेट भरके लाल-मूली रखी थी, और ये बहुत ही ख़ूबसूरत लग रहा था, और सब लोग नहाए-धोए, साफ़-सुथरे लग रहे थे कि मेरा दिल ख़ुश हो गया, और मैं भी आंगन में नहाने के लिए भागा. सिंक घर के दूसरी तरफ़ लगा था, जहाँ सूरज की रोशनी नहीं आ रही थी, और ठण्डक थी, पेड़ की छाल नम थी, और नल से बर्फ़ जैसा ठण्डा पानी आ रहा था, वो नीले रंग का था, मैं बड़ी देर तक पानी से छपछपाता रहा, और ठण्ड से जम गया, और मैं ब्रेकफ़ास्ट के लिए भागा. मैं मेज़ पर बैठा और कुर-कुर करके मूली खाने लगा, काली ब्रेड के की स्लाईस में रखकर, उस पर नमक डाला, मुझे बहुत अच्छा लग रहा था – मैं पूरे दिन उसी तरह कुरकुराती मूली खाता रहता. मगर फिर अचानक मुझे सबसे महत्वपूर्ण बात याद आई!  मैंने कहा:  “और, लम्बी यात्राओं वला कप्तान कहाँ है? कहीं आपने मुझे बुद्धू तो नहीं बनाया!” मीला आण्टी खिलखिलाने लगी, और अलेक्सेइ मिखाइलविच ने कहा:  “ऐह, तू भी! सारी रात तो उसीकी बगल में सोता रहा और तुझे पता भी नहीं चला....अच्छा, चल, ठीक है, मैं अभी उसे लाता हूँ, वर्ना वो पूरा दिन सोता रहेगा. यात्रा से थक कर आया है.” 

मगर तभी छत पर लाल चेहरे और हरी-हरी आँखों वाला एक लम्बा आदमी आया. वो नाइट सूट में था. उसकी कोई दाढ़ी-वाढ़ी नहीं थी. वह मेज़ के पास आया और भयानक मोटी आवाज़ में बोला:  “गुड मॉर्निंग! और ये कौन है? कहीं डेनिस तो नहीं?” उसकी आवाज़ इतनी भारी थी, कि मुझे ताज्जुब होने लगा कि वह उसके गले में समाती कैसे है. पापा ने कहा:  “हाँ, ये सौ ग्राम झाईयाँ – यही है डेनिस. मिलिए. डॆनिस, ये है तुम्हारा कप्तान जिसका तुम बेसब्री से इंतज़ार कर रहे थे!” मैं फ़ौरन खड़ा हो गया. कप्तान ने कहा:  “वॉव!” और उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ा दिया. वो इतना कड़ा था, जैसे बोर्ड हो. कप्तान बहुत प्यारा था. मगर उसकी आवाज़ बहुत डरावनी थी. और फिर, तलवार कहाँ है? कोई पैजामा पहना है. और, पाईप कहाँ है? सीधा या मुड़ा हुआ – चाहे जैसा भी हो, मगर कोई पाईप तो हो! मगर नहीं था...

 “नींद कैसी आई, चैरितोशा?” मीला आण्टी ने पूछा.  “बहुत बुरी!” कप्तान ने कहा. “पता नहीं, क्या बात थी. पूरी रात कोई मुझ पर चिल्ला रहा था. समझ रहे हैं, जैसे ही मेरी आँख लगती, कोई चिल्लाता: 

 “सो जा! फ़ौरन सो जा!” यही सुनकर मेरी नींद खुल जाती! फिर थकावट अपना असर दिखा रही थी, पूरे पाँच दिनों से सफ़र कर रहा था, आँखें चिपकी जा रही थीं, मैं फिर से ऊँघने लगता, सो जाता, और, सपने में, समझ रहे हैं, फिर से वही चीख़: “सो जा! लेट जा!” ऊपर से, न जाने कहाँ से मुझ पर तरह-तरह की चीज़ें गिरने लगीं – अण्डे, या कुछ और....शायद, सपने में मुझे कटलेट्स की ख़ुशबू भी आई थी. और नींद में कुछ अजीब-अजीब से शब्द भी सुनाई दे रहे थे : या तो ‘कूश,’ या ‘अपोर्त’...  “तूबा,” मैंने कहा.  “अपोर्त” नहीं, बल्कि “तूबा”. क्योंकि मैंने सोचा कि वहाँ कोई कुत्ता है...कोई उसी तरह से गुर्रा रहा था!”

 “मैं गुर्रा नहीं रहा था, मैं, शायद, खर्राटे ले रहा था?”

  ये तो बहुत भयानक था. मैं समझ गया कि वो मुझसे कभी भी दोस्ती नहीं करेगा. मैं उठकर अटेन्शन की पोज़ में खड़ा हो गया. मैंने कहा:  “कॉम्रेड, कैप्टन! बिल्कुल गुर्राहट जैसा था. और मैं, शायद कुछ डर गया था.” कप्तान ने कहा:  “आराम से. बैठ जा.” मैं मेज़ पे बैठा था, और महसूस कर रहा था, कि मेरी आँखों में किसीने रेत डाल दी है, वो चुभ रही है, और मैं कप्तान की तरफ़ देख नहीं पा रहा हूँ. हम सब बड़ी देर तक चुप रहे. 

फिर उसने कहा:  “ध्यान रख, मैं ज़रा भी गुस्सा नहीं हूँ.” मगर फिर भी मैं उसकी तरफ़ नहीं देख सका. तब उसने कहा; ”अपनी डिज़ाइन वाली तलवार की कसम.”

उसने ये इतनी प्रसन्नता से कहा, कि मेरे सीने से जैसे फ़ौरन बोझ हट गया.

मैं कप्तान के पास गया और बोला;  “अंकल, मुझे सिंगापुर के बारे में बताइए.” 

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47.

हरे तेंदुए


मैं, मीश्का और अल्योन्का हाऊसिंग कमिटी के ऑफ़िस के पास रेत पर बैठे थे और स्पेस शिप लाँच करने के लिए प्लेटफॉर्म बना रहे थे. हमने गढ़ा खोद कर उसमें ईंटें और काँच के टुकड़े भर दिए थे, और  बीचोंबीच रॉकेट के लिए थोड़ी ख़ाली जगह भी छोड़ी थी. मैं बकेट लाया और सारे औज़ार उसमें रख दिए. मीश्का ने कहा: “रॉकेट के नीचे साइड में एक छेद रखना चाहिए, जिससे कि जब वो ऊपर उड़ेगा, तो गैस इस रास्ते से बाहर निकले.” और हम फिर से खुरचने और खोदने लगे और जल्दी ही थक गए, क्योंकि वहाँ बहुत पत्थर थे. 

इसी समय दूसरे प्रवेश द्वार से कोस्तिक अन्दर आया. वो इतना दुबला हो रहा था, कि उसे पहचानना मुश्किल हो रहा था. उसका रंग फ़ीका पड़ गया था, धूप में भी रंग गहराया नहीं था. वो हमारे पास आया और बोला:  “हैलोS, साथियों!” हम सबने कहा:   “हैलोS, कोस्तिक!”

वो चुपचाप हमारे पास आकर बैठ गया. मैंने कहा: ”क्या रे, कोस्तिक, तू इतना दुबला क्यों हो गया है? बिल्कुल कोश्ची (रूसी लोककथाओं का एक पात्र, जो बेहद दुबला और बूढ़ा है – अनु.) जैसा... उसने कहा;  “हूँ, मुझे मीज़ल्स हो गए थे.”  “क्या अब तू अच्छा हो गया?”  “हाँ,” कोस्तिक ने कहा, “अब मैं पूरा अच्छा हो गया हूँ.” मीश्का कोस्तिक से दूर सरक गया और बोला:  “मेरा ख़याल है कि ये ‘इन्फ़ेक्शस’ है?” मगर कोस्तिक मुस्कुराकर बोला: “नहीं, क्या कह रहा है तू, घबरा मत. मुझे इन्फ़ेक्शन नहीं है. कल डॉक्टर ने कहा कि मैं बच्चों के ग्रुप में घूम फिर सकता हूँ.” मीश्का वापस कोस्तिक की ओर सरक गया, और मैंने पूछा:  “जब तू बीमार था, तो क्या दर्द होता था?”  “नहीं”, कोस्तिक ने जवाब दिया, “दर्द नहीं होता था. मगर ‘बोरिंग़’ बहुत था. वैसे और कोई बात नहीं थी. मुझे खूब सारी स्टिकर्स वाली तस्वीरें प्रेज़ेंट में मिलीं, मैं पूरे समय उन्हें बनाता रहा, इत्ता बोर हो गया...”

अल्योन्का बोली:  “हाँ, बीमार पड़ना अच्छा है! जब बीमार होते हो तो हमेशा कुछ न कुछ प्रेज़ेंट देते हैं.” मीश्का ने कहा:  “वो तो जब तुम अच्छे होते हो, तब भी देते हैं. बर्थ-डे पर या क्रिसमस पे.”

मैंने कहा:  “जब ‘ए’ ग्रेड लेकर अगली क्लास में जाते हो, तब भी देते हैं.” 

 

मीश्का ने कहा: “मुझे नहीं देते. मेरी तो हमेशा ‘सी’ ग्रेड ही आती है! मगर जब मीज़ल्स होते हैं, तो कोई ख़ास चीज़ नहीं देते, क्योंकि बाद में सारे खिलौने जला देने पड़ते हैं. बुरी बीमारी है मीज़ल्स, किसी काम की नहीं.” कोस्तिक ने पूछा:  “और, क्या अच्छी बीमारियाँ भी होती हैं?”  “ओहो,” मैंने कहा, “जित्ती चाहो! मिसाल के तौर पे, चिकन-पॉक्स. बहुत अच्छी, मज़ेदार बीमारी है. जब मैं बीमार पड़ा था, तो हर दाने के ऊपर एक-एक करके हरा ऑइन्टमेंट पोता गया था. मैं हरे तेंदुए की तरह हो गया था. क्या ये बुरी बात है?”  “बेशक, अच्छी बात है,” कोस्तिक ने कहा. 

अल्योन्का ने मेरी तरफ़ देखा और कहा:  “जब हर्पीज़ हो जाती है, तो वो भी बड़ी ख़ूबसूरत बीमारी है.” मगर मीश्का सिर्फ हँसा:  “लो, सुन लो – ‘ख़ूबसूरत’! बस दो तीन धब्बे लगा देते हैं, और बस, यही सारी ख़ूबसूरती है. नहीं हर्पीज़ – छोटी-मोटी चीज़ है. मुझे तो सबसे ज़्यादा ‘फ्लू’ पसन्द है. जब ‘फ्लू’ होता है, तो रास्पबेरी-जैम के साथ चाय देते हैं. जितना चाहो, उतना खाओ, यक़ीन ही नहीं होता. एक बार जब मैं बीमार पड़ा था, तो जैम का पूरा डिब्बा खा गया था. मम्मा को भी बड़ा अचरज हुआ: “देखिए, वो बोली, बच्चे को ‘फ्लू’ हुआ है, टेम्परेचर 380 है, और भूख कितनी लगी है”. और दादी ने कहा: “फ्लू भी अलग-अलग तरह का होता है, ये कोई नई तरह का फ्लू है, उसे और दो, उसका शरीर मांग कर रहा है”. और, मुझे और जैम दिया गया, मगर मैं ज़्यादा नहीं खा सका, कितनी अफ़सोस की बात थी...इस फ्लू का मुझ पर शायद इतना बुरा असर हुआ है”. 

अब मीश्का हाथ पर चेहरा टिकाकर बैठ गया और सोचने लगा, मैंने कहा:  “फ्लू, बेशक, अच्छी बीमारी है, मगर टॉन्सिल्स से उसका कोई मुक़ाबला ही नहीं है, वो बात ही और है!”  “ वो क्या?” 

“वो ये कि”, मैंने कहा, “जब टॉन्सिल्स काटकर निकाल देते हैं, तो बाद में आईस्क्रीम देते हैं, जमा देने के लिए. ये तुम्हारे जैम से ज़्यादा अच्छा है!”

अल्योन्का ने कहा: ”टॉन्सिल्स क्यों हो जाते हैं?” मैंने कहा:  “सर्दी-ज़ुकाम से. वो नाक में पनपते हैं, जैसे मशरूम्स, क्योंकि वहाँ नमी होती है.” मीश्का ने गहरी साँस लेकर कहा:  “ज़ुकाम, बहुत बकवास बीमारी है. नाक में कुछ डालते हैं, नाक और भी तेज़ बहने लगती है.” मैंने कहा:  “मगर केरोसिन पी सकते हैं. ज़रा भी बू नहीं होती.” ”और केरोसिन क्यों पीना चाहिए?” मैंने कहा:  “मतलब, पीना नहीं, मुँह में रखना. जैसे कि जादूगर पूरा मुँह भर लेता है, और फिर हाथ में जलती हुई दियासलाई लेकर... और मुँह से ऐसी आग निकलती है! बिल्कुल आग का ख़ूबसूरत फ़व्वारा दिखाई देता है. बेशक, जादूगर इसके पीछे का सीक्रेट जानता है. बिना सीक्रेट जाने ये मत करना, कुछ भी हासिल नहीं होगा.”  “सर्कस में तो मेंढ़क भी निगल जाते हैं,” अल्योन्का ने कहा.  “और मगरमच्छ भी!” मीश्का ने पुश्ती जोड़ी. मैं हँसते-हँसते लोट-पोट हो गया. क्या ऐसी गप भी मारी जा सकती है. सबको मालूम है, कि मगरमच्छ ‘शेल्स’ से बना होता है, उसे कैसे खा सकते हैं? मैंने कहा:  “मीश्का, साफ़ पता चल रहा है, कि तेरा दिमाग़ चल गया है! तू मगरमच्छ को कैसे खा सकता है, जब वो इतना कड़ा होता है. उसे किसी भी तरह से चबा नहीं सकता.”  “अगर वो बॉइल्ड हो तो!” मीश्का ने कहा.  “क्या कह रहा है! अब तू मगरमच्छ उबालेगा!” मैं मीशा पे चिल्लाया.  “उसके तो नुकीले दाँत होते हैं,” अल्योन्का ने कहा, और ज़ाहिर था कि वो डर गई थी. और कोस्तिक ने आगे जोड़ा:  “वो ख़ुद ही हर रोज़ अपने ट्रेनर्स को खा जाता है.”  अल्योन्का ने कहा:

 “ऐसा?” और उसकी आँखें सफ़ेद बटन्स जैसी हो गईं. कोस्तिक ने एक ओर थूक दिया. अल्योन्का ने होंठ टेढ़े किए:  “अच्छी-अच्छी बातों के बारे में बात कर रहे थे – मशरूम्स के बारे में और हर्पीज़ के बारे में, और अब मगरमच्छों के बारे में. मुझे उनसे डर लगता है...” मीश्का ने कहा;  “बीमारियों के बारे में खूब बातें कर लीं. खाँसी, मिसाल के तौर पे. उसमें क्या दम है? जब तक स्कूल की छुट्टी न करनी पड़े...”

  “चलो, ये भी ठीक है.” कोस्तिक ने कहा, “और, वैसे आपने सही कहा कि जब बीमार पड़ते हो, तो सब लोग तुमसे ज़्यादा प्यार करते हैं.”                            “ प्यार करते हैं,” मीश्का ने कहा, “सहलाते हैं...मैंने ‘नोट’ किया है: जब बीमार पड़ते हो, तो हर चीज़ की फ़रमाइश कर सकते हो. जो ‘गेम’ चाहो, या हथियार, या सोल्डरिंग मशीन.” मैंने कहा:  “बेशक. बस, ये ज़रूरी है कि बीमारी ज़्यादा ख़तरनाक किस्म की हो. जैसे, अगर टाँग या गर्दन तुड़वा बैठो, तब तो जो चाहो, ख़रीद देंगे.” अल्योन्का ने कहा:  “और साइकल?” कोस्तिक हिनहिनाया:   “अगर पैर टूटा है, तो साइकल किसलिए?”  “मगर वो तो जुड़ जाएगा ना!” मैंने कहा. कोस्तिक ने कहा:  “सही है!” मैंने कहा:  “और वो जाएगा कहाँ! हाँ, मीश्का?” मीश्का ने सिर हिलाया, और तभी अल्योन्का ने अपनी ड्रेस घुटनों तक खींची और पूछा:  “और ऐसा क्यों होता है, कि, जैसे थोड़ा सा जल जाओ, या घूमड़ निकल आए, या कोई नील पड़ जाए, तो उल्टे, ऊपर से धुलाई ही होती है. ऐसा क्यों होता है?”  “ये तो अन्याय है!” मैंने कहा और पैर से बकेट को ठोकर मारी, जिसमें हमारे औज़ार रखे थे. कोस्तिक ने पूछा:  “और, ये आपने क्या बनाया है?” मैंने कहा:  “स्पेस-शिप की लॉन्चिंग के लिए प्लेटफॉर्म!” कोस्तिक चीख़ पड़ा:  “तो, तुम लोग चुप क्यों हो! धारियों वाले शैतानों! बातें बन्द करो. चलो, जल्दी से बनाएँगे!!!” और हमने बातचीत बन्द करके बनाना शुरू कर दिया.  

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48

चिकन सूप

 

मम्मा दुकान से एक मुर्गी लाई, खूब बड़ी, नीली-नीली, लम्बे हड़ीले पैरों वाली. मुर्गी के सिर पर एक बड़ी लाल कलगी थी. मम्मा ने उसे खिड़की के बाहर लटकाया और कहा:  “अगर पापा मुझसे पहले आएँ, तो उबालने को कहना. कह देगा?”

मैंने कहा:  “ज़रूर!” और मम्मा इन्स्टिट्यूट चली गई. मैंने अपने वाटर-कलर्स निकाले और ड्राइंग बनाने लगा. मैं गिलहरी बनाना चाहता था, कि कैसे वो जंगल में पेड़ों पर फ़ुदकती है. पहले तो बढ़िया हो रहा था, मगर बाद में मैंने देखा कि ये तो गिलहरी नहीं बनी, बल्कि कोई अंकलजी बन गए हैं, मोयददीर जैसे (कर्नेइ चुकोव्स्की की रूसी बालकथा का एक पात्र, जो बच्चों को साफ़-सुथरा रहने पर ज़ोर देता है. इसका चित्र वाश-बेसिन्स पर लगा होता है. – अनु.). गिलहरी की पूँछ जैसे मोयददीर की नाक बन गई थी, और पेड़ों की टहनियाँ – उसके बाल, कान और हैट...मुझे बहुत अचरज हुआ, ऐसा कैसे हो गया, और, जब पापा आए, तो मैंने कहा:  “बताओ, पापा, मैंने क्या बनाया है?” उन्होंने देखा और सोच में पड़ गए:  “आग?”  “तुम भी ना, पापा? तुम अच्छे से देखो!” तब पापा ने अच्छी तरह देखा और बोले:  “आह, सॉरी, ये, शायद, फुटबॉल है...” मैंने कहा:   “तुम बिल्कुल ध्यान नहीं देते! तुम, शायद थक गए हो?” और वो बोले:: “अरे, नहीं, बस, भूख लगी है. मालूम है, कि आज लंच में क्या है?”

मैंने कहा:  “वो, खिड़की के बाहर मुर्गी टंगी है. उबाल लो और खा लो!” 

पापा ने रोशनदान से मुर्गी को निकाला और मेज़ पर रखा. ”कहना आसान है, उबाल लो! उबाला जा सकता है. उबालना – बकवास है. सवाल ये है कि हम इसका क्या बनाकर खाएँगे? मुर्गी से कम से कम सौ तरह के बढ़िया पकवान बनाए जा सकते हैं. जैसे कि, मुर्गी के कटलेट्स बना सकते हैं, चिकन श्नीज़ेल बनाया जा सकता है – अंगूर के साथ! मैंने इसके बारे में पढ़ा था! हड्डी के ऊपर ऐसा कटलेट बनाया जा सकता है – उसे कहते हैं ‘कीएव्स्काया’ – ऊँगलियाँ चाटते रह जाओगे. मुर्गी को नूडल्स के साथ पका सकते हैं, और उसे इस्त्री से दबा कर, लहसुन मिलाते हैं और जोर्जिया का ‘तम्बाकू-चूज़ा’ बनता है. और फिर...” मगर मैंने उन्हें रोक दिया. मैंने कहा:  “पापा, तुम कुछ आसान सा बना लो, बिना इस्त्री के. कोई, सबसे फ़टाफ़ट बनने वाली चीज़!”

पापा फ़ौरन राज़ी हो गए:  “सही कह रहे हो, बेटा! हमारे लिए क्या महत्वपूर्ण है? जल्दी से खाना! तूने असली बात पकड़ ली है. जल्दी से क्या बन सकता है? जवाब सीधा-सादा और स्पष्ट है: सूप!” पापा ने हाथ भी मले. मैंने पूछा:  “क्या तुम्हें सूप बनाना आता है?” मगर पापा सिर्फ मुस्कुरा दिए. 

 “उसमें ‘आने’ की बात क्या है?” उनकी आँखें चमकने लगीं. “सूप – स्टीम्ड चुकन्दर से भी ज़्यादा आसान है: पानी में डालो और पकने तक इंतज़ार करते रहो, बस, इतनी सी बात है. तो, फ़ैसला कर लिया! हम सूप उबालेंगे, और बहुत जल्दी हमारे पास लंच में दो डिशेस होंगी: सूप और ब्रेड, और बॉइल्ड चिकन, गरम-गरम, भाप निकालता हुआ. तो, अब तू अपना ब्रश फेंक और मदद कर!” मैंने पूछा:  “मुझे क्या करना होगा?”  “देख! देख रहा है, मुर्गी के बदन पे कैसे बाल हैं. तू उन्हें काट दे, क्योंकि मुझे बालों वाला सूप पसन्द नहीं है. तू इन बालों को काट, तब तक मैं किचन में जाकर पानी उबलने के लिए रख देता हूँ!”

और वो किचन में चले गए. मैंने मम्मा की कैंची उठाई और एक-एक करके मुर्गी के बाल काटने लगा. पहले मैंने सोचा कि ज़्यादा बाल नहीं होंगे, मगर फिर ध्यान से देखा, तो पता चला कि खूब सारे बाल हैं, बल्कि अनगिनत बाल हैं. मैं उन्हें कतरने लगा, और दनादन काटने की कोशिश करने लगा, जैसे कि हेयर सलून में करते हैं, और एक बाल से दूसरे पर जाते हुए कैंची से हवा में कच्-कच् कर रहा था. 

पापा कमरे में आए, मेरी तरफ़ देखा और बोले: ”किनारों से ज़्यादा काट, वर्ना ‘ज़ीरो-कट’ जैसा हो जाएगा!” मैंने कहा:  “जल्दी-जल्दी नहीं कट रहा है...” मगर पापा ने अपने माथे पर हाथ मारा:  “माय गॉड! डेनिस्का, हम दोनों बेवकूफ़ हैं! मैं ये बात कैसे भूल गया! ये काटना-वाटना बन्द कर! उसे आग में भूनना पड़ता है! समझ रहा है? सब ऐसा ही करते हैं. हम इसे आग में भूनेंगे, और तब सारे बाल जल जाएँगे, तब उन्हें न तो कटिंग की और न ही शेविंग की ज़रूरत पड़ेगी. आ जा मेरे पीछे!” 

और उन्होंने मुर्गी को पकड़ा और किचन में भागे. मैं उनके पीछे भागा. हमने नया बर्नर जलाया, क्योंकि एक पर तो पानी वाला बर्तन रखा था, और हम चारों तरफ़ से मुर्गी को आग पर भूनने लगे. वो बढ़िया जल रही थी और पूरे क्वार्टर में जले हुए रोओं की गंध बिखेर रही थी. पापा उसे एक साइड से दूसरी साइड पे पलट रहे थे और कहते जा रहे थे:  “अभ्भी, अभ्भी! ओह, बढ़िया मुर्गी है! अब वो पूरी तरह झुलस जाएगी और साफ़-सुथरी, सफ़ेद-सफ़ेद हो जाएगी...” मगर मुर्गी तो इसके विपरीत कैसी काली-काली तो होने लगी, कुछ कोयले जैसी दिखने लगी, और पापा ने आख़िरकार गैस बन्द कर दी. उन्होंने कहा:  “मेरे ख़याल से ये अचानक धुआँ छोड़ने लगी है. तुझे धुएँदार मुर्गी पसन्द है?” मैंने कहा;  “नहीं. ये धुँआ नहीं छोड़ रही है, ये बस कालिख से पुत गई है. लाओ, पापा, मैं इसे धो देता हूँ.” वो एकदम ख़ुश हो गए.     

 “शाबाश!” उन्होंने कहा. “तू स्मार्ट है. ये अच्छे गुण तुझे विरासत में मिले हैं. तू पूरा मुझ पे गया है. तो, दोस्त, इस चिमनी जैसी कालिख लगी मुर्गी को उठा और उसे नल के नीचे अच्छे से धो ले, मैं तो इस भाग-दौड़ से थक गया हूँ.” और वो स्टूल पे बैठ गए. मैंने कहा:  “अभ्भी, एक मिनट में!” मैं सिंक के पास गया और नल खोला, पानी की धार के नीचे हमारी मुर्गी को रखा और पूरी ताक़त से दाएँ हाथ से उसे मल-मल के धोने लगा. मुर्गी बेहद गरम थी और बेतहाशा गंदी थी, मेरे हाथ कुहनियों तक गंदे हो गए. पापा स्टूल पे बैठे-बैठे हिल रहे थे.

 “ओह, पापा,” मैंने कहा, “तुमने उसे क्या कर दिया है. साफ़ ही नहीं हो रही है. बहुत कालिख है.”  “बकवास,” पापा ने कहा, “कालिख सिर्फ ऊपर-ऊपर है. वो पूरी की पूरी तो कालिख से नहीं ना बनी है? रुक!” और, पापा बाथरूम में गए और वहाँ से स्ट्राबेरी-सोप लेकर आए.  “ले,” उन्होंने कहा, “ठीक से धोना! खूब साबुन लगा.”

और मैं इस बदनसीब मुर्गी को साबुन लगाने लगा. अब तो वो एकदम मरियल लगने लगी. मैंने उसे खूब साबुन लगाया, मगर वो साफ़ ही नहीं हो रही थी, उसके बदन से गंदगी बह रही थी, क़रीब आधे घण्टे से बह रही थी, मगर वह साफ़ हुई ही नहीं. मैंने कहा:  “ये भयानक मुर्गी सिर्फ साबुन में पुती ही जा रही है.”

तब पापा बोले:  “ये रहा ब्रश! ले, उसे अच्छे ब्रश से साफ़ कर! पहले पीठ, और बाद में बाकी का हिस्सा.”  “मैं ब्रश से साफ़ करने लगा. मैं पूरी ताकत से ब्रश कर रहा था, कहीं कहीं पर तो चमड़ी भी छील दी. मगर, फिर भी मुझे बहुत मुश्किल हो रही थी, क्योंकि मुर्गी तो जैसे अचानक ज़िन्दा हो गई और मेरे हाथों में गोल-गोल घूमने लगी, फ़िसलने लगी और हर पल उछलने की कोशिश करने लगी. और पापा थे कि अपने स्टूल से उतर ही नहीं रहे थे और बस हुक्म दिए जा रहे थे:  “कस के घिस! हौले से! परों से पकड़! ऐह, तू भी ना! मैं देख रहा हूँ कि तुझे मुर्गी धोना ज़रा भी नहीं आता है.” तब मैंने कहा:  “पापा, तुम ख़ुद ही कोशिश कर लो!” और मैंने मुर्गी उनकी तरफ़ बढ़ा दी. मगर वो उसे ले भी नहीं पाए थे, कि अचानक वह मेरे हाथों से कूदी और सबसे दूर वाली शेल्फ़ के नीचे घुस गई. मगर पापा परेशान नहीं हुए. उन्होंने कहा:  “ ‘मॉप’ ला!” मैं ‘मॉप’ लाया, पापा ने डंडे से मुर्गी को शेल्फ के नीचे से बाहर खींचने की कोशिश की. पहले वहाँ से पुरानी चूहेदानी बाहर आई, फिर मेरा पिछले साल वाला टीन का सोल्जर, मैं ख़ूब ख़ुश हो गया, क्योंकि मैं सोचता था कि वो गुम गया है, मगर वो वहाँ था, मेरा प्यारा सोल्जर. 

इसके बाद, आख़िरकार, पापा ने मुर्गी बाहर निकाल ही ली. वो पूरी तरह धूल में सन गई थी. और पापा हो गए थे लाल-लाल. मगर उन्होंने उसका पंजा पकड़ा और फिर से सिंक में घुसा दिया. उन्होंने कहा:  “चल, अब, पकड़. ब्लू बर्ड.”

उन्होंने उसे काफ़ी साफ़ धोया और पानी से भरे बर्तन में रख दिया. तभी मम्मा आई. उसने कहा:  “ये क्या गड़बड़ चल रही थी?”

पापा ने गहरी साँस लेकर कहा:  “मुर्गी पका रहे हैं.” मम्मा ने पूछा:  “बहुत देर से?”

“अभी-अभी रखी है,” पापा ने कहा. मम्मा ने बर्तन का ढक्कन हटाया.

 “नमक डाला?”  “बाद में,” पापा ने कहा, “जब पक जाएगी.” मगर मम्मा ने बर्तन को सूँघा.

 “इसे अन्दर से साफ़ किया?” उसने पूछा.  “बाद में,” पापा ने जवाब दिया, “जब पक जाएगी.” मम्मा ने गहरी साँस ली और मुर्गी को बर्तन से बाहर निकाल दिया. उसने कहा:  “डेनिस्का, मेरा एप्रन ला, प्लीज़. तुम लोगों के लिए पूरी तैयारी करनी पड़ेगी, ग्रेट-कुक्स.”

मैं कमरे में भागा, एप्रन लिया और मेज़ से अपनी बनाई हुई तस्वीर उठाई. मैंने मम्मा को एप्रन दिया और उससे पूछा:  “देखो, मैंने क्या बनाया है? पहचानो, मम्मा!” मम्मा ने देखा और बोली:  “सिलाई मशीन? हाँ?” 

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49.

तरबूज़ों वाली गली    




  







मैं कम्पाऊण्ड से फुटबॉल खेलकर लौटा. बेहद थका हुआ और न जाने किसके जैसा गन्दा हो रहा था. मैं ख़ुश था, क्योंकि हमने बिल्डिंग नं, 5 से 44:37 पॉइन्ट्स से मैच जीत लिया था. अच्छा हुआ कि बाथरूम में कोई नहीं था.  मैंने जल्दी से हाथ धोए, कमरे में भागा और मेज़ पे बैठ गया. मैंने कहा:  “मम्मा, इस समय मैं बैल भी खा सकता हूँ.” वो मुस्कुराई.  “ज़िन्दा बैल?” उसने पूछा.  “आहा,” मैंने कहा, “ज़िन्दा बैल, खुरों और नथुनों के साथ!” मम्मा फ़ौरन गई और एक सेकण्ड में हाथों में एक प्लेट लेकर आई. प्लेट से वो S भाप निकल रही थी, और मैं फ़ौरन समझ गया कि उसमें अचार है. मम्मा ने प्लेट मेरे सामने रख दी.  “खा ले!” मम्मा ने कहा. मगर ये तो नूडल्स थे. दूध वाले. पूरा फ़ेन-फ़ेन. ये क़रीब-क़रीब वो ही चीज़ है, जैसे दलिए का पॉरिज. पॉरिज में ज़रूर गुठलियाँ-गुठलियाँ होती हैं, और नूडल्स में ज़रूर फ़ेन. जैसे ही मैं फ़ेन देखता हूँ, मैं बस, मर जाता हूँ, खाने की बात तो छोड़ ही दो. मैंने कहा:  “मैं नूडल्स नहीं खाऊँगा!” मम्मा ने कहा;  “कोई बहस नहीं!” ”इसमें फ़ेन है!”

मम्मा ने कहा:  “तू मुझे मार डालेगा! कहाँ है फ़ेन? तू किसके जैसा है? तू एकदम कोश्ची (रूसी लोककथाओं का एक बेहद दुबला-पतला, बूढ़ा पात्र-अनु.) जैसा है!” मैंने कहा:  “इससे अच्छा है, कि मुझे मार ही डालो!” मगर मम्मा एकदम लाल हो गई और मेज़ पर हाथ मारते हुए बोली:

 “तू ही मुझे मारे डाल रहा है!”

तभी पापा अन्दर आए. उन्होंने हमारी तरफ़ देखा और पूछा:  “किस बात पे झगड़ा हो रहा है? इतनी गरमागरम बहस किसलिए?” मम्मा ने कहा:  “फ़रमाइए! नहीं खाना चाहता. लड़का जल्दी ही ग्यारह साल का होने वाला है, और वो, छोटी बच्ची की तरह, नख़रे कर रहा है.” मैं जल्दी ही नौ साल का होने वाला हूँ. मगर मम्मा हमेशा कहती है, कि मैं जल्दी ही ग्यारह का हो जाऊँगा. जब मैं आठ साल का था, तो वो कहती थी कि मैं जल्दी ही दस का हो जाऊँगा.” पापा ने कहा:  “क्यों नहीं खाना चाहता? क्या सूप जल गया है, या उसमें नमक ज़्यादा हो गया है?” मैंने कहा:  “ये नूडल्स हैं, और उसमें फ़ेन है...” पापा ने सिर हिलाया:  “आह, ये बात है! हिज़ हाईनेस वॉन बैरोन कूत्किन-पूत्किन को दूध वाली नूडल्स नहीं खानी हैं! शायद उन्हें बादाम का हलवा चाहिए, चाँदी की तश्तरी में!”

मैं हँसने लगा, क्योंकि जब पापा मज़ाक करते हैं, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है.  “वो क्या होता है – बादाम का हलवा?”  “मालूम नहीं,” पापा ने कहा, “शायद कोई मीठी चीज़ होगी और उसमें से यूडीकलोन की ख़ुशबू आती होगी. ख़ास करके वॉन-बैरोन कूत्किन-पूत्किन के लिए बनाई जाती होगी!...चल, खा ले नूडल्स!”  “मगर फ़ेन है!” ”तूने खूब खा लिया है, ब्रदर, बस, यही बात है!” पापा ने कहा और मम्मा की तरफ़ मुड़े. “उससे नूडल्स वापस ले लो,” उन्होंने कहा, “ मुझे तो बहुत गुस्सा आ रहा है! पॉरिज, उसे नहीं चाहिए, नूडल्स नहीं खा सकता!...नख़रे तो देखो! बर्दाश्त नहीं होता!...” 

वो कुर्सी पे बैठ गए और मेरी तरफ़ देखने लगे.  उनका चेहरा ऐसा था, जैसे मैं उनके लिए कोई अजनबी हूँ. वो कुछ नहीं कह रहे थे, बस उसी तरह – अजनबी की तरह देखे जा रहे थे. मैंने फ़ौरन मुस्कुराना बन्द कर दिया – मैं समझ गया कि मज़ाक कब के ख़त्म हो गए हैं. पापा बड़ी देर तक ख़ामोश रहे, और हम सब भी ख़ामोश थे, फिर वे बोले, मगर न तो मुझसे न ही मम्मा से, बल्कि किसी ऐसे इन्सान से, जो उनका दोस्त हो:  “नहीं, मैं शायद उस भयानक पतझड़ को कभी नहीं भूलूँग़ा,” पापा ने कहा, “कितना दुख, कितनी परेशानी थी तब मॉस्को में...युद्ध, फ़ासिस्ट शहर की ओर बढ़ चले आ रहे हैं. ठण्ड़, भूख, बड़े लोग भौंहे चढ़ाए घूम रहे हैं, हर घण्टे रेडिओ सुनते हैं...तो, सब साफ़ था, है ना? मैं तब ग्यारह-बारह साल का था, और, महत्वपूर्ण बात ये थी, कि मैं ख़ूब जल्दी-जल्दी बढ़ रहा था, ऊँचा-ऊँचा हो रहा था, और मुझे हर समय ख़ूब खाने का मन करता था. खाना मेरे लिए पर्याप्त ही नहीं होता था. मैं हमेशा मम्मी-पापा से ब्रेड मांगा करता, मगर उनके पास एक्स्ट्रा ब्रेड होती ही नहीं थी, वे अपनी ब्रेड भी मुझे दे देते, मगर मुझे ये भी बस नहीं लगती थी. मैं भूखा ही सो जाता, और सपने में भी ब्रेड ही देखा करता. क्या करता...सभी के साथ ऐसा ही था. ये इतिहास सबको मालूम है. इसके बारे में बार-बार लिखा गया है, बार बार पढ़ा गया है... एक बार मैं एक छोटी सी गली में जा रहा था, जो हमारे घर के पास ही थी, और अचानक क्या देखता हूँ – एक बड़ा-भारी ट्रक खड़ा है, ऊपर तक तरबूज़ों से भरा हुआ. मुझे मालूम नहीं, कि वे मॉस्को तक पहुँचे कैसे. शायद तरबूज़ रास्ता भूल गए थे. शायद, उन्हें राशन-कार्ड पर बाँटने के लिए लाए थे. गाड़ी में ऊपर एक अंकल खड़ा था, ऐसा दुबला, दाढ़ी बढ़ी हुई, शायद बिना दाँतों वाला था, क्योंकि उसका मुँह अन्दर को खिंच रहा था. वो एक तरबूज़ उठाता और उसे अपने कॉम्रेड की ओर फेंकता, और वो – सफ़ॆद एप्रन वाली सेल्स-गर्ल को, और वो – किसी और चौथे को...उनकी जैसे चेन बन गई थी: तरबूज़ गाड़ी से दुकान तक जैसे किसी बेल्ट पर लुढ़कता चला जाता. और अगर किनारे से देखो, तो ऐसा लग रहा था कि लोग हरी धारियों वाली गेंदों से खेल रहे हैं, बड़ा दिलचस्प खेल था, मैं बड़ी देर तक खड़ा-खड़ा उन्हें देख रहा था, और दुबले अंकल भी मेरी ओर देखते हुए अपने पोपले मुँह से मुस्कुरा रहे थे, अच्छे इन्सान थे. मगर फिर मैं खड़े-खड़े थक गया और घर जाने ही वाला था, कि अचानक उस चेन में कोई गलती कर बैठा, शायद उसका ध्यान हट गया या फिर चूक गया, और फ़रमाईये – त्राख़!...एक भारी तरबूज़ अचानक फ़ुटपाथ पर गिर पड़ा. ठीक मेरी बगल में. वो कुछ आड़ा-टेढ़ा फूट गया था, और बर्फ की तरह सफ़ेद पतली परत दिखाई दे रही थी, उसके पीछे लाल-लाल गूदा, शक्कर जैसी नसें, और तिरछे-तिरछे बीज, जैसे तरबूज़ की शरारती आँख़ें भीतर से ही मुझे देखकर मुस्कुरा रही हैं. और, जब मैंने इस गूदे को और तरबूज़ के रस को उछलते हुए देखा और जब ये ख़ुशबू मुझ तक पहुँची, इतनी ताज़ा और इतनी तेज़, तभी मैं समझा कि मुझे कितनी भूख लगी है. मगर मैं मुड़ गया और घर की तरफ़ चल पड़ा. मैं वहाँ से हटा ही था कि अचानक मुझे सुनाई दिया – कोई मुझे बुला रहा है: 

“बच्चे, बच्चे!”

मैंने चारों ओर देखा, मेरी तरफ़ वही बिना दांतों वाला मज़दूर भागा चला आ रहा है, और उसके हाथों में फ़ूटा हुआ तरबूज़ है. वह बोला:  “प्यारे, तरबूज़ तो ले जा, घर में खाना!” मैं उसकी तरफ़ ठीक से देख भी नहीं पाया था कि वो मुझे तरबूज़ थमाकर वापस अपनी जगह पे चला भी गया, बाकी के तरबूज़ों को उतारने के लिए. मैंने तरबूज़ को कस के दोनों हाथों में पकड़ लिया, और मुश्किल से घर तक पहुँचा, मैंने अपने दोस्त वाल्का को बुलाया, और हम दोनों ये बड़ा तरबूज़ खा गए. आह, कितना स्वादिष्ट था! बताना मुश्किल है! मैंने और वाल्का ने बड़े बड़े टुकड़े काटे, पूरी चौड़ाई में, जब हम उन्हें खाते तो तरबूज़ के टुकड़ों के किनारे हमारे कानों को दबाते, हमारे कान गीले हो गए और उनसे लाल-लाल तरबूज़ का रस टपक रहा था. हम दोनों के पेट फूल गए और वो भी तरबूज़ की तरह हो गए. अगर ऐसे पेट पर ऊँगली से टक-टक किया जाए तो पता है कैसी आवाज़ निकलती है! जैसे ड्रम बज रहा हो. हमें बस एक ही बात का अफ़सोस था, कि हमारे पास ब्रेड नहीं है, वर्ना हम और भी मज़े ले-लेकर खाते. हाँ...” पापा मुड़े और खिड़की से बाहर देखने लगे.  “और, इसके बाद पतझड़ का मौसम और भी बुरा रहा,” उन्होंने कहा, “ख़ूब ठण्ड पड़ी, आसमान से सर्दियों वाली, सूखी और भुरभुरी बर्फ गिरने लगी, और सूखी और तेज़ हवा उसे फ़ौरन उड़ा देती. खाना हमारे पास खूब कम हो गया, फ़ासिस्ट मॉस्को की ओर बढ़े चले आ रहे थे, मैं हर समय भूखा रहता. अब मुझे न सिर्फ ब्रेड के सपने आते, बल्कि तरबूज़ों के सपने भी आते. एक बार सुबह मैंने महसूस किया कि मेरा पेट तो है ही नहीं, वो जैसे रीढ़ की हड्डी से चिपक गया है, और मैं खाने के अलावा किसी और चीज़ के बारे में सोच भी नहीं सकता था. मैंने वाल्का को बुलाया और उससे कहा:  “चल, वाल्का, उस तरबूज़ों वाली अली में जाएँगे, हो सकता कि वहाँ फिर से तरबूज़ उतारे जा रहे हों, और, हो सकता है, कि उनमें से एक गिर जाए, और वो लोग फिर से हमें वो तरबूज़ दे दें.” 

हम दोनों ने कोई दादियों जैसे कपड़े पहने, क्योंकि ठण्ड भयानक थी, और चल पड़े तरबूज़ों वाली गली की ओर. सड़क पर मटमैला दिन था, लोग बेहद कम थे, और मॉस्को में ख़ामोशी थी, ऐसा नहीं, जैसा अब होता है. तरबूज़ों वाली गली में कोई भी नहीं था, और हम दुकान के दरवाज़ों के सामने खड़े होकर इंतज़ार करने लगे कि कब तरबूज़ों वाला ट्रक आता है. अंधेरा होने को आया मगर ट्रक आया ही नहीं. मैंने कहा:

“शायद, कल आयेगा...”  “हाँ,” वाल्का ने कहा, “शायद, कल आए.” हम घर चले गए. दूसरे दिन फिर से उस गली में गए, और ये जाना बेकार ही हुआ. हम हर रोज़ जाते और ट्रक का इंतज़ार करते, मगर ट्रक आया ही नहीं... 

पापा ख़ामोश हो गए. वो खिड़की से बाहर देख रहे थे, और उनकी आँखें ऐसी हो रही थीं, जैसे वो कोई ऐसी चीज़ देख रहे हैं, जिसे न तो मैं, न ही मम्मा देख पा रहे थे. मम्मा उनके पास गई, मगर पापा फ़ौरन उठ गए और कमरे से बाहर चले गए. मम्मा उनके पीछे गईं. मैं अकेला रह गया. मैं भी बैठा था, और खिड़की से बाहर उसी तरफ़ देख रहा था, जिधर पापा देख रहे थे, और मुझे लगा कि मैं पापा को और उनके दोस्त को देख रहा हूँ, कि वो कैसे ठिठुर रहे हैं और इंतज़ार कर रहे हैं, इंतज़ार कर रहे हैं, इंतज़ार कर रहे हैं...ये सब मेरी बर्दाश्त से बाहर हो गया, और मैं अपनी प्लेट पर टूट पड़ा और चम्मच पे चम्मच खाकर पूरी नूडल्स खा गया, फिर उसे अपनी ओर झुकाकर, बचा-खुचा दूध पी गया, और ब्रेड से उसकी तली भी साफ़ कर दी, और चम्मच भी चाटकर साफ़ कर दिया. 

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50


सर्कस वालों, मैं भी कम नहीं हूँ


मैं अक्सर सर्कस जाता रहता हूँ. वहाँ मेरी ख़ूब पहचान हो गई है और दोस्त भी बन गए हैं. और, जब मैं चाहता हूँ, तो मुझे बिना टिकट के भी अन्दर जाने देते हैं. क्योंकि अब मैं भी सर्कस-आर्टिस्ट जैसा हो गया हूँ. एक लड़के के कारण. ये अभी हाल ही में हुआ था. मैं दुकान से घर जा रहा था – अब हम नए क्वार्टर में रहते हैं, जो सर्कस के पास ही है, वहीं कोने पे एक बड़ी दुकान भी है. तो, मैं कागज़ की बैग लिए दुकान से जा रहा हूँ, उसमें पड़े हैं डेढ़ किलो टमाटर और कार्डबोर्ड के ग्लास में तीन सौ ग्राम दही. अचानक देखता हूँ कि सामने से आ रही है दूस्या आण्टी, पुरानी बिल्डिंग से, वो बहुत भली है, उसने पिछले साल मुझे और मीश्का को क्लब के टिक़ट दिए थे. मैं बहुत ख़ुश हुआ, वो भी ख़ुश हो गई. उसने कहा: ”कहाँ से आ रहा है?” मैंने कहा:  “दुकान से. टमाटर ख़रीदे! नमस्ते, दूस्या आण्टी!” वो हाथ नचाकर बोली: ”क्या तू ख़ुद दुकान में जाता है? अभी से? समय तो कैसे उड़ रहा है!” उसे अचरज होता है. इन्सान नवें साल में है, और उसे अचरज हो रहा है. मैंने कहा;  “अच्छा, फिर मिलेंगे, दूस्या आण्टी.” और मैं चल पड़ा. वो पीछे से चिल्लाई:  “रुक जा! कहाँ जा रहा है? मैं तुझे अभ्भी सर्कस में छोड़ती हूँ, दिन वाले ‘शो’ में. क्या तू देखना चाहता है?” ये भी कोई पूछने की बात है! अजीब है. मैंने कहा:  “बेशक, चाहता हूँ! इस बारे में दो राय हो ही नहीं सकती!...” उसने मेरा हाथ पकड़ा और हम चौड़ी-चौड़ी सीढ़ियों पर चढ़े. दूस्या आण्टी कंट्रोलर के पास गई और बोली:  “लो, मरीया  निकोलायेव्ना, अपने नौजवान को लाई हूँ, देखने दो. ठीक है?” वो भी मुस्कुराई और मुझे अन्दर छोड़ दिया, मैं अन्दर गया, आण्टी दूस्या और मरीया  निकलायेव्ना पीछे-पीछे आ रही थीं. मैं कुछ अंधेरे में चल रहा था, और मुझे ये सर्कस की ख़ुशबू फिर से बहुत अच्छी लगी – ये एक ख़ास तरह की ख़ुशबू है, और जैसे ही मैंने उसे सूंघा, मेरे दिल में न जाने क्यों एक ही साथ ख़ुशी और बेचैनी के भाव आ गए. कहीं म्यूज़िक बज रहा था, मैं उस तरफ़ लपका, उसकी आवाज़ की दिशा में, और अचानक मुझे गेंद वाली लड़की की याद आ गई, जिसे मैंने यहाँ कुछ ही दिन पहले देखा था - गेंद वाली लड़की, उसकी चाँदी जैसी चमचमाती ड्रेस, और ‘केप’, और उसके लम्बे-लम्बे हाथ; वह कहीं दूर चली गई है, मेरे दिल में अजीब से भाव आए, पता नहीं, कैसे समझाऊँ...और, अब हम किनारे वाले दरवाज़े तक पहुँच गए, मुझे आगे धकेला जा रहा था, और मरीया  निकलायेव्ना फुसफुसाई:  “बैठ जा! पहली लाईन में ख़ाली सीट है, बैठ जा...”

 


 मैं फ़ौरन बैठ गया. मेरी बगल में एक लड़का बैठा था, मेरे जैसी ही कद-काठी का, वैसे ही स्कूल के यूनिफॉर्म में, नाक तोते जैसी, आँखें चमक रही थीं. उसने काफ़ी ग़ुस्से से मेरी तरफ़ देखा, कि एक तो मैं देर से आया हूँ और अब डिस्टर्ब कर रहा हूँ, वगैरह, वगैरह, मगर मैंने उसकी ओर ध्यान ही नहीं दिया. मैंने अपना पूरा ध्यान आर्टिस्ट पर लगा दिया, जो इस समय अपना प्रोग्राम पेश कर रहा था. वो अरेना के बीचों बीच खड़ा था, सिर पर बड़ी भारी कैप थी, और उसके हाथों में क़रीब आधा मीटर लम्बी सुई थी. सुई में धागे के बदले थी एक लम्बी और पतली रेशमी रिबन. इस आर्टिस्ट के पास खड़ी थीं दो लड़कियाँ और वो किसी को भी नहीं छू रही थीं. अचानक वो बिना बात के उनमें से एक लड़की के पास गया और – खच्! – अपनी लम्बी सुई से उसका पेट सी दिया आर-पार, सुई उसकी पीठ से बाहर निकली! मैंने सोचा कि अब लड़की ज़ोर से चिल्लाएगी, मगर नहीं, वो ख़ामोशी से खड़ी रही और मुस्कुराती रही. अब आर्टिस्ट बिल्कुल दूर हट गया – खच्च! – और दूसरी के भी आर-पार सुई घुसा दी! ये भी नहीं चिल्लाई, बल्कि सिर्फ अपनी पलकें झपकाती रही. तो वो दोनों इस तरह सिली-सिलाई खड़ी हैं, उनके बीच में है रिबन, और वो ऐसे मुस्कुरा रही हैं, जैसे कुछ हुआ ही न हो. अरे, मेरी प्यारियों, क्या बात है!

मैंने कहा:  “वो चिल्लाती क्यों नहीं हैं? क्या बर्दाश्त कर रही हैं?” बगल वाला लड़का बोला:  “चिल्लाएँगी क्यों? उन्हें दर्द नहीं हो रहा है!” मैंने कहा:  “तेरे साथ होता तो कैसा होता! मैं सोच सकता हूँ कि तू कितनी ज़ोर से चिल्लाता...”

वो मुस्कुराने लगा, जैसे कि वह मुझसे कुछ बड़ा हो, फिर बोला:  “पहले मैंने सोचा कि तू सर्कस वाला है. तुझे माशा आण्टी बिठा कर गई थी ना... मगर, लगता है कि तू सर्कसवाला नहीं है... हमारा नहीं है.”

मैंने कहा:  “एक ही बात है कि मैं कौन हूँ – सर्कस वाला या बिना सर्कस वाला. मैं नागरिक हूँ, समझा? और सर्कस वाला – क्या अलग होता है?” उसने मुस्कुराते हुए कहा:  “नहीं, सर्कस वाले – ख़ास होते हैं...” मुझे ग़ुस्सा आ गया:  “उनके क्या तीन पैर होते हैं?”  मगर वो बोला:  “तीन होते हैं या नहीं होते, मगर फिर भी वे औरों से ज़्यादा फुर्तीले होते हैं – कोई मुक़ाबला ही नहीं! – और ज़्यादा ताक़तवर, और ज़्यादा हाज़िरजवाब होते हैं.” मुझे एकदम गुस्सा आ गया और मैंने कहा:  “चल, ज़्यादा गप न मार! यहाँ भी कोई कम नहीं है! तू, क्या, सर्कसवाला है?” उसने आँख़ें झुका लीं:  “नहीं, मैं मम्मा का बेटा हूँ...” और होठों के कोनों से मुस्कुराने लगा, चालाकी से. मगर मैं इसे समझ नहीं पाया, ये मैं अब समझ रहा हूँ, कि वो चालाकी कर रहा था, मगर तब मैं ठहाका मार कर हँस पड़ा था, और उसने अपनी चंचल नज़रें मुझ पर गड़ा दीं:  “तू प्रोग्राम तो देख!... घुड़सवार!...”

सही में, म्यूज़िक ज़ोर से और तेज़-तेज़ बजने लगा, और अरेना में उछलते हुए एक सफ़ेद घोड़ा आया, इतना मोटा और चौड़ा, जैसे कोई दीवान हो. घोड़े के ऊपर खड़ी थी एक आण्टी, और उसने भागते हुए घोड़े पर अलग-अलग तरह से कूदना शुरू कर दिया: कभी वो एक पैर पे कूदती, हाथ साइड में, कभी दोनों पैरों पर, जैसे रस्सी कूद रही हो. मैंने सोचा, कि इतने चौड़े घोड़े पर कूदना - बकवास है, ये ऐसा ही है, जैसे तुम लिखने की मेज़ पर कूद रहे हो; और ये, कि मैं भी ऐसा कर सकता हूँ. ये आण्टी बस कूदती रही, कूदती रही, और एक आदमी, काले कपड़ों में, बस चाबुक लहरा रहा था, जिससे घोड़ा कुछ फुर्ती से चले, वर्ना तो वो उनींदी मक्खी की तरह लड़खड़ा रहा था. वह उस पर चिल्ला रहा था और पूरे समय चाबुक हिला रहा था. मगर, घोड़ा था कि ध्यान ही नहीं दे रहा था. कैसी-तो उदासी...मगर आण्टी जी भर के कूद ली और परदे के पीछे भाग गई, मगर घोड़ा गोल गोल चक्कर लगाता रहा.

अब आया ‘पेन्सिल’. मेरी बगल में बैठे लड़के ने फिर से मुझ पर जल्दी से नज़र डाली, फिर आँखें फेर लीं और बड़ी उदासीनता से बोला:  “क्या तुमने ये प्रोग्राम पहले कभी देखा है?”  “नहीं, पहली बार देखूँगा,” मैंने कहा. वह बोला:  “तब मेरी सीट पे आ जा. यहाँ से तुझे ज़्यादा अच्छा नज़र आएगा. बैठ. मैं इसे पहले ही देख चुका हूँ.” वह हँसा. मैंने कहा:  “तू कर क्या रहा है?”  “ऐसे ही,” वह बोला, “कुछ नहीं. अब ‘पेन्सिल’ ऐसी-ऐसी कारनामे दिखाएगा, खूब मज़ेदार! चल, सीट बदल ले.” जब वो इतना भला है, तो कोई बात नहीं. मैं उसकी सीट पे बैठ गया. और वो मेरी वाली सीट पे बैठ गया, वहाँ, सही में, ज़्यादा बुरा था, एक खंभा देखने में डिस्टर्ब कर रहा था. अब ‘पेन्सिल’ ने कारनामे शुरू कर दिए. वो चाबुक वाले अंकल से बोला:  “अलेक्सान्द्र बरीसविच! क्या मैं इस घोड़े पे घूम सकता हूँ?” और उसने कहा:  “प्लीज़, ख़ुशी से!” और ‘पेन्सिल’ इस घोड़े पे चढ़ने लगा. वह हर तरह से कोशिश कर रहा था, अपना छोटा सा पैर उसके ऊपर रखता, और बार बार फ़िसल जाता, और गिर पड़ता – घोड़ा बेहद मोटा था. तब वो बोला:  “मुझे इस घोड़े पे बिठा दीजिए.” फ़ौरन सहायक आया और झुका, ‘पेन्सिल’ उसकी पीठ पे चढ़ गया, और घोड़े पे बैठ गया, मगर उल्टा बैठ गया. वो घोड़े के सिर की तरफ़ पीठ करके बैठा था, और मुँह पूँछ की तरफ़ था. सब लोग हँसते-हँसते लोट पोट हुए जा रहे थे! चाबुक वाले अंकल ने उससे कहा:  “ ‘पेन्सिल’! आप ग़लत बैठे हैं.”  मगर ‘पेन्सिल’ ने जवाब दिया:  “गलत कैसे? आपको कैसे मालूम कि मुझे किस तरफ़ जाना है?” तब अंकल ने घोड़े के सिर को छुआ और कहा:  “सिर तो यहाँ है!”

‘पेन्सिल’ ने घोड़े की पूँछ पकड़ ली और कहा:

 “मगर दाढ़ी तो यहाँ है!” तभी उसकी कमर में रस्सी बांध दी गई, वो सर्कस के गुम्बद के ठीक नीचे लगे किसी पहिए से गुज़र रही थी, और उसका दूसरा सिरा चाबुक वाले अंकल के हाथ में था. वो चिल्लाया:  “मास्टर, सरपट! हैलो!”  ऑर्केस्ट्रा गरज उठा, और घोड़ा भागने लगा. ‘पेन्सिल’ उस पर ऐसे हिल रहा था, जैसे बागड़ पे बैठी हुई मुर्गी, और वह कभी एक ओर को फ़िसलता, तो कभी दूसरी ओर, और अचानक घोड़ा उसके नीचे से बाहर निकलने लगा, वो पूरी सर्कस में ज़ोर से चिल्लाया:

 “ओय, दोस्तों, घोड़ा ख़तम हो रहा है!”

और वो, सचमुच में उसके नीचे से निकल गया और टप्-टप् करते हुए परदे के पीछे चला गया, और ‘पेन्सिल’, शायद नीचे गिर कर मर जाता, मगर चाबुक वाले अंकल ने रस्सी खींची और ‘पेन्सिल’ हवा में टँग गया. हमारा हँसी के मारे दम घुटने लगा, और मैं पास वाले लड़के से कहने वाला था कि अब मेरा पेट फट जाएगा, मगर वो था ही नहीं. कहीं चला गया था. इस बीच ‘पेन्सिल’ हाथ ऐसे नचाने लगा, जैसे हवा में तैर रहा है, और फिर उसे छोड़ दिया गया, वो नीचे आने लगा, मगर जैसे ही उसने ज़मीन को छुआ, वो फिर से इधर उधर भागा और फिर से ऊपर उड़ने लगा. ऐसा लग रहा था कि वो लम्बे-लम्बे क़दम रखते हुए कभी ऊपर, कभी नीचे आ रहा है, सब लोग हँसते-हँसते बेज़ार हो रहे थे. वो इसी तरह से उड़ता ही रहा, और उसकी पतलून खिसकते खिसकते बची, मैंने सोचा कि अब तो इन  ठहाकों से मेरा दम घुटने ही वाला है, मगर तभी फिर से वह ज़मीन पे उतरा और अचानक मेरी तरफ़ देखकर ख़ुशी से आँख मारी. हाँ! उसने मुझे ही आँख़ मारी थी. मैंने भी उसे आँख़ मारी. और, ये क्या?! उसने अचानक फिर से मुझे आँख़ मारी, अपने हाथ मले और पूरी ताक़त से भागते हुए मेरे पास आया और दोनों हाथों से मुझे पकड़ लिया, चाबुक वाले अंकल ने फ़ौरन रस्सी खींच ली और मैं ‘पेन्सिल’ के साथ ऊपर उड़ गया! हम दोनों! उसने मेरा सिर बगल में दबाया और पेट से चिपकाए रखा, खूब कस के, क्योंकि हम काफ़ी ऊँचाई पर थे. नीचे लोग नहीं थे, बल्कि घनी सफ़ेद और काली पट्टियाँ नज़र आ रही थीं, क्योंकि हम तेज़ी से घूम रहे थे, और मेरे मुँह में भी गुदगुदी सी हो रही थी. जब हम ऑर्केस्ट्रा के ऊपर से उड़ रहे थे, तो मैं डर गया, कि झनझनाती तश्तरियों से टकरा जाऊँगा और मैं चिल्ला पड़ा:  “मम्मा!” फ़ौरन एक शोर उड़ता हुआ मुझ तक आया. ये सब लोग हँस रहे थे. मगर ‘पेन्सिल’ फ़ौरन मुझे चिढ़ाते हुए आँसू भरी आवाज़ से चीख़ा:  “म्य-म्म्या!”

नीचे से भयानक शोर और गडगड़ाहट सुनाई दे रही थी, और हम कुछ देर इसी तरह उड़ते रहे, ऐसा लगा कि अब मुझे आदत हो रही है, मगर तभी मेरे हाथों का पैकेट फट गया, और मेरे टमाटर उड़ने लगे, वे बमों की तरह अलग-अलग दिशाओं में उड़ रहे थे – डेढ़ किलो टमाटर. शायद, वे लोगों के ऊपर गिरे, क्योंकि नीचे से ऐसा शोर उठा, कि बताना मुश्किल है. मैं सोच रहा था कि कहीं दही का गिलास भी न उड़ने लगे – तीन सौ ग्राम्स. तब तो मम्मा मेरी वो ख़बर लेगी कि ख़ुदा बचाए! और ‘पेन्सिल’ अचानक लट्टू की तरह गोल-गोल घूमने लगा, और मैं भी उसके साथ-साथ, और मुझे ये नहीं करना चाहिए था, क्योंकि मैं फिर से घबरा गया और उसे मारने और खरोंचने लगा, और ‘पेन्सिल’ ने शांति से मगर कड़ाई से कहा, मैंने सुना:  “तोल्का, क्या कर रहा है?” मैं गरजा:  “मैं तोल्का नहीं हूँ! मैं डेनिस हूँ! मुझे छोड़िए!” और मैं छूटने की कोशिश करने लगा, मगर उसने और कस के मुझे चिपटा लिया, क़रीब-क़रीब मेरा गला ही घोंट दिया, और हम बेहद धीरे उड़ने लगी, मैंने पूरी सर्कस देखी, और चाबुक वाले अंकल भी, वो हमारी तरफ़ देख रहे थे और मुस्कुरा रहे थे. इसी समय दही का गिलास बाहर उड़ ही गया. मुझे मालूम ही था. वो सीधे चाबुक वाले गंजे अंकल के सिर पे जा गिरा. वो चिल्लाकर कुछ बोले, और हम धीरे धीरे नीचे उतरने लगे... जैसे ही हम नीचे उतरे और ‘पेन्सिल’ ने मुझे छोड़ा, मैं, ख़ुद भी न समझते हुए, पूरी ताक़त से भागा. मगर वहाँ नहीं; मुझे पता नहीं कि मैं किधर भाग रहा था, और मैं लड़खड़ा रहा था, क्योंकि मेरा सिर चकरा रहा था, आख़िरकार साइड वाले दरवाज़े में मैंने दूस्या आण्टी और मरीया निकलायेव्ना को देख ही लिया, उनके चेहरे सफ़ॆद हो रहे थे, और मैं उनकी तरफ़ भागा, चारों ओर सब लोग पागलों की तरह तालियाँ बजा रहे थे. दूस्या आण्टी ने कहा:  “थैंक गॉड, सही सलामत है! चल, घर चलें!” मैंने कहा:  “और टमाटर?”  “मैं खरीद दूँगी. चल.” उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा, और हम तीनों आधे-अंधेरे कॉरीडोर में निकले. वहाँ हमने देखा कि दीवार पर लगे लैम्प के पास एक लड़का खड़ा है. ये वो ही लड़का था, जो मेरी बगल में बैठा था. मरीया निकलायेव्ना ने कहा:  “तोल्का, तू कहाँ था?” लड़के ने जवाब नहीं दिया.  मैंने कहा:  “तू कहाँ चला गया था? जैसे ही मैं तेरी सीट पे बैठा तो जानते हो क्या-क्या हुआ!...’पेन्सिल’ ने मुझे झपट्टा मार कर उठा लिया और आसमान में ले गया.”

मरीया  निकलायेव्ना ने पूछा:  “और, तू उसकी जगह पे क्यों बैठा?”  “इसीने मुझसे कहा था,” मैंने जवाब दिया. “इसने कहा कि यहाँ से ज़्यादा अच्छा दिखाई देगा, और मैं बैठ गया. और वो ख़ुद कहीं चला गया!”

 “समझ गई,” मरीया  निकलायेव्ना ने कहा. “मैं ऑफ़िस में रिपोर्ट करूँगी. तोल्का, तुझे सर्कस से निकाल देंगे.” लड़के ने कहा:  “नहीं, माशा आण्टी.” मगर वो फुसफुसाते हुए चिल्लाई:  “तुझे शरम कैसे नहीं आई! तू सर्कस वाला बच्चा है, तूने प्रक्टिस की थी, और तूने अपनी जगह पर एक अनजान लड़के को बिठा दिया?! और, अगर वो गिर जाता? उसे तो तैयार नहीं किया गया है!” मैंने कहा:  “कोई बात नहीं. मैं तैयार हो गया हूँ...तुम, सर्कस वालों से बुरा नहीं हूँ! क्या मैं फूहड़पन से उड़ रहा था?” लड़के ने कहा:  “बढ़िया! और, वो टमाटरों वाला आइडिया भी अच्छा था, मुझे कभी ऐसा ख़याल ही नहीं आया. मगर सब कुछ खूब मज़ाहिया था.”  “और ये आपका आर्टिस्ट भी,” दूस्या आण्टी ने कहा, “ख़ूब है! किसी को भी पकड़ लेता है!”  “मिखाइल निकलायेविच,” माशा आण्टी ने कहा, “पूरे फॉर्म में था, वो पहले ही हवा में उड़ रहा था, वो भी कोई लोहे का बना हुआ नहीं है, उसे पक्का मालूम था कि इस सीट पर, हमेशा की तरह, एक ख़ास लड़का बैठा होता है, सर्कस वाला, ये कानून है. और ये छुटका और वो – बिल्कुल एक जैसे हैं, और यूनिफॉर्म भी एक जैसी हैं, उसने ध्यान से नहीं देखा...”  “देखना चाहिए!:          दूस्या आण्टी ने कहा. “ऐसे झपट्टा मर कर उठा लिया बच्चे को, जैसे बाज़ चूहे को उठा लेता है.” मैंने कहा:  “चलो, जाएँगे?” तोल्का ने कहा:  “सुन, अगले सण्डे को आना दो बजे. मुझसे मिलने के लिए आना. मैं ऑफ़िस के पास तेरा इंतज़ार करूँग़ा.”  “ठीक है,” मैंने कहा, “ठीक है...उसमें क्या है!...आऊँगा.”

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51

      सादोवाया स्ट्रीट पर बेहद ट्रैफ़िक है

 


वान्का दीखव के पास एक साइकिल थी. बहुत पुरानी थी, मगर ठीक ही थी. पहले ये वान्का के पापा की साइकिल थी, मगर, जब साइकिल टूट गई, तो वान्का के पापा ने कहा:  “वान्का, पूरे दिन क्यों रेस लगाता रहे, ये ले तेरे लिए गाड़ी, इसे दुरुस्त कर ले, और तेरे पास तेरी अपनी साइकिल होगी. ये, अभी तक ठीक ही है. मैंने इसे कभीS कबाड़ी की दुकान से खरीदा था, लगभग नई ही थी. साइकिल पाकर वान्का इतना ख़ुश हो गया कि बताना मुश्किल है. वह उसे कम्पाऊण्ड के दूसरे छोर पे ले गया और उसने रेस लगाना पूरी तरह बन्द कर दिया – उल्टे वो पूरे-पूरे दिन अपनी साइकिल पे लगा रहता, ठोंकता, पीटता, स्क्रू खोलता और स्क्रू लगाता. गाड़ियों के तेल से हमारा वान्का पूरा गन्दा हो गया, उसकी ऊँगलियों पर भी खरोंचें आ गईं थीं, क्योंकि जब वो काम करता, तो उसका निशाना अक्सर चूक जाता और हथौड़ा उसकी ऊँगलियों पर ही पड़ता. मगर उसका काम बढ़िया हो गया, क्योंकि पाँचवीं क्लास में उन्हें ‘फिटर’ का काम सिखाया जाता है, और वान्का तो मेहनत के काम में हमेशा ‘ए’ ग्रेड लाता था. गाड़ी रिपेयर करने में मैं भी वान्का की मदद कर रहा था, और वो हर दिन मुझसे कहता:  “थोड़ा ठहर जा, डेनिस्का, जब हम इसे रिपेयर कर लेंगे, तो मैं तुझे इस पर घुमाऊँगा. तू पीछे कैरियर पे बैठेगा, और हम दोनों पूरा मॉस्को घूमेंगे!”

 


और, इसलिए कि वो मुझसे इतनी दोस्ती रखता है, हालाँकि मैं सिर्फ दूसरी क्लास में हूँ, मैं उसकी और ज़्यादा मदद करने लगा. मैं, ख़ासकर, ये कोशिश करता कि कैरियर ख़ूबसूरत बन जाए. मैंने उसे चार बार काले पेंट से रंगा, क्योंकि वो मेरा अपना कैरियर था. और वो कैरियर इतना चमकने लगा, जैसे नई-नई ‘वोल्गा’ कार चमकती है. मैं ये सोचकर ख़ुश होता कि मैं उस पे बैठा करूँगा, वान्का की बेल्ट पकड़े रहूँगा, और हम पूरी दुनिया घूमेंगे. 

और एक दिन वान्का ने अपनी साइकिल ज़मीन से उठाई, पहियों में हवा भरी, उसे कपड़े से पोंछा, ख़ुद ड्रम से पानी लेकर नहाया और पतलून में नीचे की ओर क्लिप्स लगाईं. मैं समझ गया कि अब हमारा फ़ेस्टिवल नज़दीक आ रहा है.            

वान्का गाड़ी पे बैठा और चल पड़ा. पहले उसने बिना जल्दबाज़ी किए कम्पाऊण्ड का चक्कर लगाया, गाड़ी स्मूथ-स्मूथ चल रही थी, और सुनाई दे रहा था, कि ज़मीन से घिसते हुए टायर कितनी मीठी-मीठी आवाज़ कर रहे हैं. फिर वान्का ने स्पीड बढ़ाई, और कमानियाँ चमकने लगीं, और वान्का करतब दिखाने लगा, वो लूप बनाने लगा, आठ का अंक बनाने लगा, और पूरी ताक़त से गाड़ी चलाने लगा, और अचानक ज़ोर से ब्रेक लगा दिया, और उसके नीचे गाड़ी ऐसे खड़ी हो गई, जैसे ज़मीन में गड़ गई हो. उसने हर तरह से गाड़ी की जाँच कर ली, जैसे कोई ट्रेनी-पाइलट करता है, और मैं खड़ा था और देख रहा था, उस मेकैनिक जैसा, जो नीचे खड़े होकर अपने पाइलट के करतब देखता है. मुझे बहुत अच्छा लग रहा था, कि वान्का इतनी अच्छी तरह चला रहा है, हालाँकि मैं उससे भी अच्छा चला सकता हूँ, कम से कम उससे बुरा तो चला ही नहीं सकता. मगर साइकिल मेरी नहीं थी, साइकिल वान्का की थी, और इस बारे में ज़्यादा बात करने की ज़रूरत नहीं थी, अपनी साइकिल पे वो जो चाहे वो करे. ये देखकर भी अच्छा लग रहा था कि गाड़ी पेंट के कारण बढ़िया चमक रही है, और ये सोचना भी नामुमकिन था कि वो पुरानी है. वो किसी भी नई गाड़ी से बेहतर थी. ख़ासकर कैरियर. बहुत ही प्यारा लग रहा था उसकी तरफ़ देखने से दिल ख़ुश हो रहा था.

इस गाड़ी पे वान्का क़रीब आधे घण्टे घूमता रहा, और मैं तो डरने भी लगा कि वो मेरे बारे में बिल्कुल भूल गया है. मगर नहीं, मैं वान्का के बारे में बेकार ही ऐसा सोच रहा था. वो मेरे पास आया, पैर को फ़ेन्सिंग पे टिकाया और बोला:  “चल, चढ़ जा.”

मैंने चढ़ते-चढ़ते पूछा:  “कहाँ जाएँगे?” वान्का ने कहा:  “कहीं भी? पूरी दुनिया में!”

और मेरा मूड एकदम ऐसा हो गया, जैसे हमारी पूरी दुनिया में सिर्फ प्रसन्न लोग ही रहते हैं और वो सिर्फ इसी बात का इंतज़ार करते हैं कि कब मैं और वान्का उनके घर जाएँगे. और जब जाएँगे – वान्का हैण्डल पे, और मैं कैरियर पे, - तो फ़ौरन एक बड़ा समारोह शुरू हो जाएगा, और झण्डे फ़हराने लगेंगे, और गुब्बारे उड़ने लगेंगे, और गाने, और डंडी पे एस्किमो आइस्क्रीम, ऑर्केस्ट्रा गरजने लगेगा, और जोकर्स सिर के बल चलने लगेंगे. इतना अचरजभरा मूड था मेरा, और मैं अपने करियर पे जम गया और वान्का के बेल्ट को पकड़ लिया. वान्का ने पैडल्स घुमाए, और...बाय-बाय पापा! बाय-बाय मम्मा! बाय-बाय पुराने कम्पाऊण्ड, और कबूतरों, फिर मिलेंगे! हम दुनिया की सैर पे जा रहे हैं!

वान्का कम्पाऊण्ड से बाहर निकला, फिर नुक्कड़ के पार, और हम अलग-अलग गलियों में गए, जहाँ पहले मैं सिर्फ पैदल जाता था. अब हर चीज़ बिल्कुल अलग थी, कुछ अनजानी-सी, वान्का हर पल घण्टी बजा रहा था, जिससे कि किसी को साइकिल के नीचे दबा न दे: ज़्ज़्ज़! ज़्ज़्ज़! ज़्ज़्ज़!....

पैदल चलने वाले उछलकर दूर हट रहे थे, जैसे मुर्गियाँ उछलती हैं, और हम अभूतपूर्व रफ़्तार से जा रहे थे, मुझे खूब ख़ुशी हो रही थी, दिल में आज़ादी का अनुभव हो रहा था, और कुछ बदहवास सी आवाज़ निकालने को जी चाह रहा था. मैंने निकाला ‘आ’. इस तरह से: आआआआआआआआआआआआ! जब वान्का एक पुरानी गली में घुसा, जिसमें रस्ता कच्चा था, जैसे सम्राट ‘दाल’ (रूसी लोककथाओं का एक पात्र – अनु.)  के ज़माने का हो, तब तो बहुत मज़ा आया. गाड़ी हिचकोले खाने लगी, और मेरी ‘आ-गरज’ बीच बीच में टूटने लगी, जैसे उसके मुँह से बाहर उड़ते ही किसी ने उसे तेज़ कैंची से काट दिया हो और हवा में फेंक दिया हो. अब मुँह से निकल रहा था: आ! आ! आ! आ! आ! 

हम और भी बड़ी देर तक गलियों में घूमते रहे और आख़िरकार थक गए. वान्का रुक गया, और मैं अपने कैरियर से कूद गया. वान्का ने कहा:  “तो?”  “फ़न्टास्टिक!” मैंने कहा.  “तू आराम से तो बैठा था?”  “वॉव, जैसे दीवान पे बैठा था,” मैंने कहा, “उससे भी ज़्यादा आराम से. क्या गाड़ी है! एकदम एक्स्ट्रा-क्लास!”

वह हँसने लगा और उसने अपने बिखरे बालों को ठीक किया. उसका चेहरा गन्दा, धूल भरा हो गया था, सिर्फ आँखें ही चमक रही थीं – नीली आँखें, किचन की दीवार पे टंगे कप्स के समान. और दाँत तो ख़ूब चमक रहे थे. 

तभी हमारे पास ये लड़का आया. वो बहुत लम्बा था और उसका एक दाँत सुनहरा था. उसने लम्बी आस्तीनों की धारियों वाली कमीज़ पहनी थी, और उसके हाथों में कई तरह की तस्वीरें, पोर्ट्रेट्स और लैण्डस्केप्स थे. उसके पीछे इतना झबरा कुत्ता डोल रहा था, तरह तरह के ऊनों से बनाया हुआ.  काले ऊन के टुकड़े थे, सफ़ेद, भूरे और एक हरा टुकड़ा भी दिखाई दे रहा था...उसकी पूँछ गाँठ वाले नमकीन बिस्कुट जैसी थी, एक पैर दबा हुआ था. इस लड़के ने पूछा:  “तुम कहाँ से आए हो, लड़कों?” हमने जवाब दिया:  “त्र्योखप्रूद्नी से.” उसने कहा:  “वॉव! शाबाश! कहाँ से चला के लाए हो? क्या ये तेरी गाड़ी है?” वान्का ने कहा:  “मेरी. पहले पापा की थी, अब मेरी है. मैंने ख़ुद उसे रिपेयर किया है. और ये”, वान्का ने मेरी तरफ़ इशारा किया, “इसने, मेरी मदद की है.”

इस लड़के ने कहा:  “हाँ...देखो. ऐसे साधारण बच्चे हैं, और ठेठ केमिकल-मेकैनिकल इंजीनियर.”

मैंने पूछा:  “क्या ये कुत्ता आपका है?” लड़के ने सिर हिला दिया:  “हँ. मेरा. ये बहुत कीमती कुत्ता है. ऊँची नस्ल का है. स्पेनिश बैसेट (कम ऊँचाई का लम्बा कुत्ता – अनु.).

वान्का ने कहा:  “क्या कह रहे हैं! ये कहाँ से बैसेट होने लगा? बैसेट पतले और लम्बे होते हैं.”  “जब जानते नहीं हो, तो चुप बैठो!” इस लड़के ने कहा. “मॉस्को या र्‍य़ाज़ान का बैसेट – लम्बा होता है, क्योंकि वो पूरे टाईम अलमारी के नीचे बैठा रहता है और इसलिए लम्बाई में बढ़ता है, मगर ये दूसरी टाइप का कुत्ता है, कीमती वाला. ये वफ़ादार दोस्त है. नाम है – बदमाश.” वो कुछ देर चुप रहा, फिर उसने तीन बार गहरी साँस ली और कहा:  “फ़ायदा क्या है? हालाँकि वफ़ादार कुत्ता है, फिर भी, है तो कुत्ता. मुसीबत में मेरी मदद नहीं कर सकता...” उसकी आँखों में आँसू आ गए. मेरा दिल बैठ गया. उसे क्या हुआ है? वान्का ने डरते हुए पूछा:  “क्या मुसीबत आई है आप पे?”  “दादी मर रही है,” उसने कहा और बार-बार होठों से हवा लेते हुए हिचकियाँ लेने लगा. “मर रही है, प्यारी दादी...उसे डबल अपेंडिसाइटिस है...” उसने कनखियों से हमारी तरफ़ देखा और आगे बोला: “डबल अपेंडिसाइटिस, और मीज़ल्स भी...” अब वो बिसूरने लगा और मुट्ठी से आँसू पोंछने लगा. मेरा दिल ज़ोर से धक्-धक् करने लगा. लड़का दीवार से टिककर आराम से खड़ा हो गया और खूब ज़ोर से चिल्लाने लगा. उसका कुत्ता भी, उसकी ओर देखते हुए, चिल्लाने लगा, ये सब बहुत दुख भरा था. इस चीख से वान्का का चेहरा अपनी धूल के नीचे ही सफ़ेद पड़ गया. उसने इस लड़के के कंधे पे हाथ रखा और कांपती हुई आवाज़ में बोला:  “चिल्लाइए नहीं, प्लीज़! आप ऐसे क्यों चिल्ला रहे हैं?”

 “कैसे ना चिल्लाऊँ,” इस लड़के ने कहा और सिर हिलाने लगा, “कैसे ना चिल्लाऊँ, जब कि मेरे पास दवा की दुकान तक जाने की भी ताक़त नहीं है! तीन दिनों से खाया नहीं है!...आय-उय-उय-युय!...”

और, वो और भी बुरी तरह से चिल्लाने लगा. कीमती कुत्ता बैसेट भी और ज़ोर से चिल्लाने लगा. आस- पास कोई भी नहीं था. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करना चाहिए. मगर वान्का ज़रा भी परेशान नहीं हुआ.  “क्या आपके पास प्रेस्क्रिप्शन है?” वो चिल्लाया. “अगर है, तो फ़ौरन दीजिए, मैं अभी गाड़ी पे उड़ता हुआ मेडिकल शॉप जाता हूँ और दवा ले आता हूँ. मैं फ़ुर्ती से उडूँगा!” मैं ख़ुशी से बस उछलने ही वाला था. शाबाश, वान्का! ऐसे दोस्त के साथ तुम्हें कोई ख़तरा नहीं है, वो हमेशा जानता है कि क्या करना चाहिए. हम दोनों इस लड़के के लिए दवाई लाएँगे और उसकी दादी को मरने से बचाएँगे. मैं चीख़ा;  “प्रेस्क्रिप्शन दीजिए! एक मिनट भी नहीं खोना चाहिए!” मगर ये लड़का तो और भी बुरी तरह से हिचकियाँ लेने लगा, हमारी तरफ़ देखकर हाथ हिलाए, चिल्लाना बन्द कर दिया और गरजा:  “नहीं! कहाँ जाओगे! तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है? मैं दो छोटे बच्चों को सादोवाया पे कैसे जाने दे सकता हूँ? आँ? वो भी साइकिल पे? तुम लोग कह क्या रहे हो? क्या तुम्हें मालूम है कि सादोवाया पे कैसी ट्रैफ़िक होती है? आ? आधे सेकण्ड में ही तुम्हारे चीथड़े हो जाएँगे...हाथ कहाँ, पैर कहाँ, सिर अलग-थलग!...वहाँ होती हैं लॉरियाँ- पाँच टन वाली! येS बड़ी-बड़ी क्रेन्स चलती हैं!... तुम्हारा क्या, तुम तो दब जाओगे, मगर मुझे तुम्हारे लिए जवाब देना पड़ेगा! मैं तुम्हें नहीं जाने दूँगा, चाहे मुझे मार ही क्यों न डालो! इससे अच्छा तो दादी को मर ही जाने दो, बेचारी मेरी फ़िव्रोन्या पलिकार्पव्ना!...”

और अपनी मोटी आवाज़ में वो फिर से रोने लगा. कीमती कुत्ता बैसेट तो बिना रुके रोता ही जा रहा था. मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ – कि ये इतना अच्छा लड़का है और अपनी दादी की जान भी जोखिम में डालने के लिए तैयार है – सिर्फ इसलिए कि कहीं हमारे साथ कुछ न हो जाए. इस सबसे मेरे होंठ विभिन्न दिशाओं में टेढ़े होने लगे, और मैं समझ गया कि बस कुछ ही देर में मैं भी कीमती कुत्ते जैसा ही बिसूरने लगूँगा. वान्का की आँखें भी नम हो गईं थीं, और वो भी नाक से सुड़सुड़ कर रहा था:  “हमें क्या करना चाहिए?”  “बिल्कुल आसान बात है,” इस लड़के ने कामकाजी भाव से कहा. “सिर्फ एक ही रास्ता है. तुम्हारी साइकिल दो, मैं उस पर जाऊँगा. फ़ौरन लौट आऊँगा. माँ कसम!...” और उसने अपने गले पे हाथ रखा. ये, शायद, उसने सबसे भयानक क़सम खाई थी. उसने गाड़ी की तरफ़ हाथ बढ़ाया. मगर वान्का ने उसे कस के पकड़ रखा था. इस लड़के ने उसे खींचा, फिर छोड़ दिया और फिर से हिचकियाँ लेने लगा:  “ओय-ओय-ओय! मेरी दादी मर रही है, तम्बाकू की वजह से नहीं, दस-बीस रूबल्स की वजह से नहीं...ओय-ऊयूयू....”

और, वो अपने सिर के बाल नोचने लगा. बालों को कस के पकड़ लिया और दोनों हाथों से उखाड़ने लगा. ऐसा ख़ौफ़नाक नज़ारा मैं बर्दाश्त नहीं कर सका. मैं रो पड़ा और वान्का से बोला:  “उसे साइकिल दे दे, उसकी दादी मर रही है! अगर तेरे साथ ऐसा होता तो?” मगर वान्का साइकिल पकड़े खड़ा है और हिचकियाँ लेते हुए कहता है:  “बेहतर है, कि मैं ख़ुद ही जाऊँ...”

अब उस लड़के ने पगलाई आँख़ों से वान्का की ओर देखा और पागल की तरह भर्राने लगा:  “ मुझ पर भरोसा नहीं है, हाँ? भरोसा नहीं है? एक मिनट के लिए अपनी कबाड़ा गाड़ी देने में अफ़सोस हो रहा है? बुढ़िया चाहे मर ही क्यों न जाए? हाँ? बेचारी बुढ़िया, सफ़ेद स्कार्फ़ पहने, चाहे मीज़ल्स से मर जाए? मरने दो, हाँ? मगर इस लाल-टाई वाले पायनियर को अपने कबाड़े का अफ़सोस हो रहा है? ऐह, तुम भी! इन्सानों के हत्यारे! स्वार्थी!...”

उसने कमीज़ से बटन खींच कर निकाल ली और उसे पैरों से मसलने लगा. हम हिले तक नहीं. मैं और वान्का उसके ताने सुनते रहे. तब इस लड़के ने अचानक बे बात के अपने कीमती कुत्ते बैसेट को उठाया और उसे कभी मेरे, तो कभी वान्का के हाथों में ठूँसने लगा:

 “चल! अपने दोस्त को तुम्हारे पास बंधक रखता हूँ! वफ़ादार दोस्त को दे रहा हूँ! अब तो विश्वास करोगे? विश्वास करते हो या नहीं?! कीमती कुत्ता बंधक रख रहा हूँ, कीमती कुत्ता बैसेट!” और उसने वान्का के हाथों में उस कुत्ते को घुसेड़ ही दिया, और तभी मेरी समझ में आ गया. मैंने कहा:  “वान्का, वो तो कुत्ते को हमारे पास गिरवी रख रहा है. अब वो कोई चाल नहीं चल सकता, ये तो उसका दोस्त है, और ऊपर से कीमती भी है. गाड़ी दे दे, डर मत.” अब वान्का ने इस लड़के के हाथ में हैण्डिल दे दिया और पूछा:  “क्या पन्द्रह मिनट काफ़ी हैं?”  “ओय, बहुत ज़्यादा,” लड़का बोला, “इतने थोड़ी लगेंगे! सब मिलाकर सिर्फ पाँच! मेरा यहीं पे इंतज़ार करना. जगह से हिलना नहीं!” और वह फुर्ती से उछल के गाड़ी पे बैठ गया, सफ़ाई से बैठा और सीधे सादोवाया की तरफ़ मुड़ गया. जैसे ही वो नुक्कड़ पे मुड़ा, कीमती कुत्ता बैसेट अचानक वान्का के हाथों से उछला और बिजली की तरह उसके पीछे लपका.

वान्का ने चिल्लाकर मुझसे कहा:  “पकड़!”     मगर मैंने कहा:  “कहाँ से, उसे पकड़ना मुश्किल है. वो अपने मालिक के पीछे भाग गया, उसके बगैर उसे अच्छा नहीं लगेगा! ऐसा होता है वफ़ादार दोस्त. मुझे भी ऐसा...” मगर वान्का ने दबी ज़ुबान से सवाल किया:  “मगर वो तो बंधक है, ना?”  “कोई बात नहीं,” मैंने कहा, “वो जल्दी ही वापस आ जाएँगे.” और हमने पाँच मिनट उनका इंतज़ार किया.  “ये आ क्यों नहीं रहा है.” वान्का ने कहा.  “शायद लम्बा क्यू लगा हो,” मैंने कहा. इसके बाद और दो घण्टे बीत गए. वो लड़का आया ही नहीं. और कीमती कुत्ता भी नहीं आया. जब अंधेरा होने लगा, तो वान्का ने मेरा हाथ पकड़ा.  “सब समझ में आ गया,” उसने कहा. “चल, घर चलें...”  “क्या समझ में आ गया, वान्का?” मैंने पूछा.  “बेवकूफ़ हूँ मैं, बेवकूफ़,” वान्का ने कहा. “वो कभी नहीं लौटेगा, ये टाइप, और साइकिल भी नहीं आएगी. और कीमती कुत्ता बैसेट भी!” इसके बाद वान्का ने एक भी शब्द नहीं कहा. वो, शायद, नहीं चाहता था, कि मैं डरावनी बातों के बारे में सोचूँ. मगर मैं इसी के बारे में सोचता रहा. आख़िर, सादोवाया पे बेहद ट्रैफ़िक है...


*****
















52.

नीले चेहरे वाला आदमी 

हम वलोद्या अंकल की समर-कॉटेज के पास लट्ठों पर बैठे थे. पापा अखरोट के पेड़ की एक बड़ी टहनी को मेरे धनुष के लिए चिकना कर रहे थे, और मैं धनुष की प्रत्यंचा के लिए रस्सी को मोम लगा रहा था. 

हर तरफ़ सुकून और ख़ामोशी थी, सिर्फ गली में रोड-रोलर शोर मचा रहा था. इस मशीन में पहियों के बदले दो रोलर्स थे – मशीन हमारी बस्ती में डामर का रोड बना रही थी.   

इस गाड़ी में बैठने की सीट्स बेहद ऊँची थी, और जब वो हमारे पास से गुज़रती, तो हमारी फ़ॆन्सिंग के ऊपर सड़क पर काम करने वाले एक ‘वर्कर’ का सिर तैर जाता. उसका चेहरा पूरा नीला था, क्योंकि उसकी दाढ़ी बहुत जल्दी बढ़ती थी. वह हर रोज़ ‘शेव’ करता था, और इससे उसका चेहरा हमेशा नीला रहता था. इस नीले चेहरे की बगल में एक गुलाबी लड़की का चेहरा भी तैरता, ये उसकी सहायक थी, उसकी ख़ूबसूरत काली-काली आँखें और लम्बी-लम्बी पलकें थीं.

मुझे मालूम था कि ये ‘वर्कर्स’ सोसेन्की में अपनी ‘बेस’ पे लंच के लिए गए हैं, क्योंकि वो रात ही से काम करना शुरू कर देते थे, जब सब लोग सो रहे होते और धूप तेज़ न हुई होती. 






 


इस नीले चेहरे वाले अंकल ने एक बार मुझे एक टहनी से पैरों पर ज़ोर से मारा था, क्योंकि जब वो चला गया था, तो मैंने उसकी मशीन चलाई थी. उसने जमके मेरी धुलाई की थी, और मैं उसे पसन्द नहीं करता था. मैं डरता भी था कि कहीं अब पापा से मेरी शिकायत न कर दे, कि मैं बहुत शरारत करता हूँ, मगर उसने, थैंक्स गॉड, मुझे देखा नहीं और सीधे निकल गया.

तो, मैं और पापा एक दूसरे के पास लट्ठों पर बैठे थे, मैं सीटी बजा रहा था, और पापा ख़ामोश थे, और हम एक दूसरे की ओर देखकर सिर्फ मुस्कुरा देते थे, क्योंकि हमें इस बस्ती में रहना बहुत अच्छा लगता था. हमें यहाँ आये छह दिन हो गए थे, मेरी पड़ोस के लड़कों से दोस्ती हो गई थी, अपने कुत्तों से फिर से मुलाक़ात हो गई थी, और मैं उनमें से हरेक को उसके नाम और उपनाम से जानता था. हम बोटिंग करते, अलाव जलाते और मशरूम्स चुनने जंगल में जाते और देखते कि कैसे गाय और बछड़ा दूर खेत में भाग रहे हैं.

आज मैं और पापा पहले तीरंदाज़ी करने वाले हैं, और उसके बाद पतंग उड़ाने वाले हैं – ऊँची, ख़ूब ऊँची, सूरज के ठीक नीचे तक. 

जब मैं ये सब सोच रहा था, तभी अचानक गेट बजा, और हमारे पड़ोसी अलेक्सान्द्र सिम्योनिच आँगन में आए. उनके पास अपनी गाड़ी है – ‘वोल्गा’. वो पापा के दोस्त हैं.

वो हमारे पास बैठ गए और बोले:  “मुसीबत!”  “क्या हुआ?” अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने कहा:  “उसकी, पता है, शादी है! तो, मुझे क्या लेना देना है? आज शादी है - आज शादी, कल बाप्तिज़्मा, परसों नामकरण!...तो मुझे क्या करना चाहिए!...बिना ड्राइवर के बैठा रहूँ?” उन्होंने मुट्ठी से किसी को धमकाया. “मेरे पास तुम्हारी शादी से ज़्यादा ज़रूरी काम है!” पापा ने कहा:  “संक्षेप में बताइए.”

और अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने बताया, कि उनके ड्राइवर लेशा ने अपनी पहचान की एक लड़की से शादी का फ़ैसला किया है और आज उसकी शादी है.  “करने दो शादी,” पापा ने कहा, “आपको क्या प्रॉब्लेम है?” मगर अलेक्सान्द्र सिम्योनिच गरम हो गए. “मुझे शहर जाना है,” उन्होंने कहा, “ये बात है! समझ में आया?”

और उन्होंने अपनी हथेली को गले पर फेरा. जैसे, ज़िन्दगी और मौत का सवाल हो. मगर पापा ख़ामोश रहे.

 “आहा,” अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने व्यंग्य से कहा, “ख़ामोश बैठे हैं? डंड़ियाँ बना रहे हैं? और कॉम्रेडशिप की भावना कहाँ है?” ”भाई, छुट्टी है,” पापा ने कहा, “बेटे के साथ भी तो वक़्त गुज़ारना चाहिए.”

“वो कहीं नहीं जाएगा,” अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने ज़ाहिर किया और मेरी पीठ थपथपाई. “हम उसे भी अपने साथ ले जाएँगे! लड़के को थोड़ी सी ख़ुशी भी देना चाहिए. घूम आएगा!” आख़िर मै समझ ही गया कि वो क्या कहना चाहते हैं. ये मैं फ़ौरन ही क्यों नहीं समझा? वो तो गाड़ी में जा नहीं सकते. अपनी ख़ुद की ‘वोल्गा’ चलाना उन्हें नहीं आता. मगर पापा को आता है. ‘वोल्गा’ भी, ‘पबेदा’ भी, ‘गाज़-51’ भी, और जो भी चाहो. क्योंकि पापा के पास ड्राइविंग लाइसेन्स है, वो मॉस्को-खबारोव्स्क ऑटो-रेस में भी गए थे, बस अपनी ख़ुद की कार उनके पास नहीं है, मगर ड्राइविंग वो बढ़िया करते हैं! और अलेक्सान्द्र सिम्योनिच हमारे पास इसलिए आए हैं कि पापा उन्हें शहर ले जाएँ और वापस ले आएँ.

 हालाँकि मैं देख रहा था कि पापा का जाने का मन नहीं है, क्योंकि वो धूप ताप रहे थे, और उन्हें पुरानी पतलून पहनकर गोदाम के पास बैठना और चुपचाप टहनी छीलना अच्छा लगता है, और उन्हें कहीं भी जाना अच्छा नहीं लगता, मगर मैं तो बहुत ख़ुश हो गया, कि गाड़ी में ‘ज़ूम’ से जाने को मिलेगा, और इसलिए मैं फ़ौरन चीखा:  “चलो, जाएँगे! कोई बहस ही नहीं!” 

अलेक्सान्द्र सिम्योनिच भी ऐसे उछले, जैसे किसी ने काटा हो, और ज़ोर से गरजे:   “राईट! हुर्रे! चलो!...” अब पापा भी मान गए और उन्होंने सिर्फ इतना कहा:  “सिर्फ जाएँगे-और-आएँगे. जल्दी से! जिससे तीन बजे तक वापस!” अलेक्सान्द्र सिम्योनिच ने ठहाका लगाया और सीने पे हाथ रखा:  “दो बजे तक!” और क़सम खाई, “नहीं तो मैं इसी जगह धरती में समा जाऊँ! दो बजते-बजते हम यहाँ होंगे. बिल्कुल घड़ी की नोंक पर!”

मैं और पापा कपड़े बदलने चले गए, फिर हमने गाड़ी को अलेक्सान्द्र सिम्योनिच के आँगन से बाहर निकाला, और वो लोग सामने बैठे, पापा स्टीयरिंग पे. मुझे पीछे वाली सीट पर भेज दिया और दोनों दरवाज़ों को लॉक कर दिया. मैं फ़ौरन पापा की पीठ के पीछे खड़ा हो गया, जिससे कि सामने की ओर देख सकूँ, रास्ते पर, स्पीडोमीटर पर, जंगल को, सामने से आने वाली गाड़ियों को, और ये कल्पना कर सकूँ कि गाड़ी मैं चला रहा हूँ, मैं, न कि पापा, और ये, कि ये गाड़ी नहीं, बल्कि स्पेस-शिप है, और आकाश में उड़ने वाला, ठण्डे सितारों पर जाने वाला – मैं पहला इन्सान हूँ.

मुझे गाड़ी में जाने में बहुत मज़ा आ रहा था, बेहद ख़ुशी हो रही थी! चारों ओर ख़ूब हरियाली थी. घास, और बड़े-बड़े पेड़, और पतले-पतले बर्च के पेड़ – चारों ओर ख़ूब हरियाली थी. हवा इतनी तेज़ और गर्माहट भरी थी, और वो भी हरियाली की सुगंध से सराबोर थी.

मैं पापा के पीछे खड़ा था और सीटी बजा रहा था, सामने रास्ते की ओर देख रहा था; रास्ता चाँदी की तरह चमक रहा था, और, अगर सिर नीचा करूं, तो दिखाई दे रहा था कि कैसे गर्म हवा उसके ऊपर गोल-गोल चक्कर लगा रही है.

कहीं रास्ते में एक बोर्ड गिरा पड़ा है – ज़ाहिर है, कि किसी ट्रक ने गिरा दिया है, या घास की छोटी सी पूली, साफ़ समझ में आ रहा था कि वो रास्ते पे कैसे आई, या ड्राइवर का हाथ पोंछने का कपड़ा. ऐसा लग रहा था, कि रास्ता बता रहा है कि मेरे, पापा के और अलेक्सान्द्र सिम्योनिच के जाने से पहले उसके ऊपर से कौन गुज़रा था. 

अब हम काफ़ी स्पीड से जा रहे थे, स्पीडोमीटर 70 दिखा रहा था, और अंत में मैं स्पेस-शिप का खेल खेलने ही लगा. मैंने उपकरणों को चालू किया, पैडल्स दबाए, लीवर्स खटखटाए, और उड़ने लगा और ‘मार्स’ और ‘मून’ के क़रीब से, और भी ज़्यादा-ज़्यादा दूर, और जल्दी ही मैंने फ़ैसला कर लिया कि भारहीनता की स्थिति आ गई है, और मैं उछलने–कूदने लगा, जिससे कि जाँच कर सकूँ कि मैं भार वाला हूँ या भारहीन. 

मगर पापा ने बिना मुड़े कहा:  “चुपचाप खड़ा रह!”

 मैं फिर से रास्ते की ओर देखने लगा. जैसे ही मैंने सामने की ओर नज़र डाली, मैंने अचानक देखा कि एक छोटी लड़की रास्ते से गुज़र रही है! मतलब, वो ठीक हमारे कार के सामने ही भाग रही है. भाग रही है- बस भागती जा रही है. ये आई कहाँ से, अब तक तो नहीं थी. जैसे ज़मीन के नीचे से बाहर उछली हो! हमारी कार तेज़ी से दाईं ओर मुड़ी, और भयानक ज़ोर से हॉर्न बजा...मैंने बस इतना देखा, कि लड़की भी दाईं ओर मुड़ी, फिर से कार के नीचे, और तभी एक चिंघाड़ती सी आवाज़, खड़खड़ाहट और चीत्कार सुनाई दी, ऐसा लगा जैसे कार को किसी ने पूँछ पकड़ कर खींच लिया हो, इसके आगे कुछ भी समझ में नहीं आया. मुझे लगा कि मेरे भीतर से इलेक्ट्रिक शॉक गुज़र गया, और कोई चीज़ बड़ी दयनीयता से झनझना रही है, और फिर जैसे चूर चूर हो गई है, हॉर्न लगातार बजे जा रहा था, और मैं पूरा सामने की सीट से चिपक गया, मैंने उसे हाथों से, कुहनियों से, सीने से कस के पकड़ा था, और अचानक मैंने देखा कि खिड़की से बाहर बर्च के पेड एक साथ बाईं ओर गिर गए हैं, जैसे उन्हें काट दिया हो, वे फ़ौरन फिर से दिखाई दिए और फिर से बाईं ओर गिर गए...इसके बाद सब कुछ जैसे ठहर गया. मैं चारों – हाथों-पैरों पर खड़ा था. मेरे ऊपर थी खुली खिड़की, जैसे मैं पनबुब्बी में था या किसी कुँए के अन्दर. फिर अचानक, न जाने क्यों, मैं बिल्ली की तरह घिसटने लगा, और जो हाथ आया उसी को पकड़ लिया – चाहे कवर हो या कोई हैंडिल हो, जो भी मिला उसीको – और, एक पल में कूदकर बाहर आ गया. हमारी कार ढलान पे जैसे एक करवट पड़ी थी. उसमें कोई काँच नहीं थे. इंजिन के नीचे से थोड़ा सा धुँआ निकल रहा था. छत पुरानी हैट की तरह चपटी हो गई थी. कार लगातार हॉर्न बजाए जा रही थी. उसके पहिए ऐसे घूम रहे थे, जैसे उल्टे पड़े भौंरे के पंजे चलते रहते हैं. 

दूसरी खिड़की से एक आदमी बाहर आया. ये अलेक्सान्द्र सिम्योनिच थे. वो बाहर निकल कर फ़ौरन मेरे पास आए. उन्होंने कहा;  “क्या तुझे मालूम है कि मेरा बायाँ जूता कहाँ है?”

 सही में, उनके एक पैर में जूता नहीं था...उन्होंने कार की तरफ़ देखा, अपना सिर पकड़ लिया और फिर से कहा;  “समझ में नहीं आता कि जूता कहाँ चला गया...ढूँढ़ तो.” मैं घास में ढूँढ़ने लगा. 

जूता कहीं भी नहीं था, और कार पूरे समय दुख भरी आवाज़ में हॉर्न बजाए जा रही थी. मैं ये सुन न सका, मेरे दिमाग़ में चीटियाँ रेंगने लगीं, और मैं उससे दूर हट गया. 

रास्ते के किनारे पे एक लॉरी रुकी, उसमें से सिपाही कूदे और नीचे की ओर, हमारे पास, दौड़े. एक सिपाही ने कार में झाँक़ा और हाथ हिला-हिलाकर औरों से कहने लगा:

“यहाँ एक आदमी है! जल्दी!...” सिपाहियों ने कार को पकड़ा और उठाकर वापस पहियों पर रख दिया, वो हॉर्न बजाए ही जा रही थी, जैसे पुकार रही हो. तभी मुझे याद आया, कि वहाँ, स्टीयरिंग पे, मेरे पापा बैठे हैं!

मैं इस बारे में भूल कैसे गया! मुझे बहुत डर लगा...मैं कार के पास भागा. 

पापा बैठे थे, बुरी तरह से गुड़ीमुड़ी हुए, पूरा शरीर पीछे की ओर मुड़ गया था, जैसे वह पीछे वाली खिड़की से देख रहे हों. उनका हाथ स्टीयरिंग पर था, वो हॉर्न दबा रहा था. कलाई के पास वाली हाथ की हड्डी स्टीयरिंग व्हील में फँस गई थी. हाथ नीला पड़ गया था, फूल गया था, और उसमें से ख़ून बह रहा था. 

सिपाहियों ने स्टीयरिंग व्हील को उखाड़ा. उन्होंने दरवाज़े खोले, और पापा बाहर आए. उनका चेहरा सफ़ेद हो गया था, और आँखें सफ़ॆद थीं, हाथ लटक रहा था, जैसे वो किसी और आदमी का हाथ हो. मैं पापा के पास भागा और उनके सामने खड़ा हो गया, मगर वो मुझे देख नहीं पाए, क्योंकि इसी समय मोटरसाइकल पर मिलिशियामैन आ गए थे.

उनमें से एक ने कहा:  “लाइसेन्स दिखाइए!” पापा साइड से खड़े थे, और इस मिलिशियामैन ने उनका हाथ नहीं देखा था, मगर पापा धीरे-धीरे, फ़ूहड़पन से अपनी दाईं जेब में अपना बायाँ हाथ डालने लगे मगर हाथ अन्दर डाल ही नहीं सके. तब मैं उनके बिल्कुल पास सरका और लाइसेन्स निकाला. पापा ने मेरी ओर देखा. ज़ाहिर था कि उन्हें, सिर्फ अभी याद आया कि मैं पूरे समय उनके साथ था. उन्होंने बाएँ हाथ से मेरे कंधे को पकड़ा और मेरे बिल्कुल ऊपर झुके. उन्होंने, जैसे बहुत दूर से, पूछा: “ये तू है?” और वो मुझे झकझोरने लगे, और चिल्लाए, “कहाँ दर्द है? बोल...” मैंने कहा:  “कहीं भी दर्द नहीं है. मैं एकदम सही-सलामत हूँ...”

 पापा नीचे बैठ गए और पहिए पर लुढ़क गए. उनका चेहरा गीला हो रहा था. उनके माथे से पसीने की मोटी-मोटी बूँदें बह रही थीं. वो अचानक एक साईड पे फिसलने लगे, जैसे लेटना चाहते हों. मैंने फ़ौरन उनकी कमीज़ पकड़ ली, जिससे वो ज़मीन पे न लेटॆं. मगर तभी उनके पास सफ़ेद एप्रन पहने एक आदमी बढ़ा. वो पापा के सामने घुटनों पर बैठा और उसने अचानक उनका दायाँ हाथ पकड़ लिया.

पापा बोले:  “भाड़ में जाओ...” डॉक्टर उठ कर खड़ा हो गया, वो बोला:

 “फ्रेक्चर. डबल.” और उसने पापा को उठाया और उन्हें बड़ी गाड़ी के पास लाया. चारों ओर बहुत सारे लोग इकट्ठे हो गए थे, और रास्ते के किनारे पर बसें, और ‘मस्क्विच’ और ‘गाज़िक’ गाड़ियाँ खड़ी थीं. मैंने देखा कि हमारे रास्ते वाला रोड-रोलर भी वहाँ था. मैं डॉक्टर के और पापा के पीछे गया, मगर भीड़ ने मुझे दूर धकेल दिया और मैं बड़ी मुश्किल से पीछे से आगे सरकने की कोशिश कर रहा था. जब पापा ढलान के ऊपर चढ़े, तो मैंने देखा कि उनके पास नीले चेहरे वाला ‘वर्कर’ भागा, वो ही जिसने बहुत पहले मेरे पैरों पर टहनी से मारा था. उसने चलते-चलते पापा से कुछ कहा, और पापा ने सिर हिलाया. फिर पापा ‘एम्बुलेन्स’ में बैठने लगे, और मैं समझ गया कि वो फिर से मेरे बारे में एकदम भूल गए हैं. मगर, मैंने फ़ैसला कर लिया कि मैं पापा के पीछे और गाड़ी के पीछे भागूँगा, जब तक उन्हें पकड़ नहीं लेता. तभी पापा मुड़े और उन्होंने चिल्लाकर मुझसे कुछ कहा. मैं सुन नहीं पाया था कि उन्होंने क्या कहा था. गाड़ी आगे बढ़ी और चल पड़ी , मैं उसके पीछे भागा, मगर चढ़ाव पे नहीं भाग सका – बहुत ऊँचा था, और मैं रुक गया, क्योंकि दिल बुरी तरह से धड़क रहा था.

 ऊपर से हमारी ‘वोल्गा’ दिखाई दे रही थी. वो नष्ट हुए टैंक की तरह खड़ी थी. उसके पीछे से अलेक्सान्द्र सिम्योनिच निकले और बोले:  “ज़रा सोच, जूता डिक्की में पड़ा था. फ़न्टास्टिक!” 

मिलिशियामैन उनके पास आया. “तो,” उसने कहा और अपनी नोटबुक में कुछ लिखने लगा, “अब अपनी बात जारी रखते हैं...और ये लड़का, शायद कवच पहने पैदा हुआ था. एक भी खरोंच नहीं! ये, शायद, आपकी कार है?” 

मैं उससे पूछना चाहता था कि पापा को कब वापस लाएँगे, मगर तभी ऊपर से कोई चिल्लाया:  “कॉम्रेड चीफ़! हम बच्चे को अपने साथ ले जा रहे हैं, यहाँ धूप में क्यों तपता रहे!...हम उसकी वाली सड़क पर ही डामर बिछा रहे हैं. ठीक उनके घर के पास. बच्चे, इधर आओ!” 

 ये नीले चेहरे वाला आदमी अपनी गाड़ी से चिल्ला रहा था. 

मिलिशियामैन ने पूछा:

 “जाएगा?” मुझे मालूम नहीं था कि क्या जवाब देना है, क्योंकि मुझे अलेक्सान्द्र सिम्योनिच को अकेला छोड़ कर जाना अच्छा नहीं लग रहा था. वो समझ गए, कि मैं क्या सोच रहा हूँ, और बोले:  “कोई बात नहीं, चला जा...”

मगर मैं अपनी जगह से नहीं हिला. 

तब ऊपर से वो सुन्दर लड़की कूदी, जो नीले चेहरे वाले के पास बैठी थी. उसने मेरा हाथ पकड़ा और कहा:

 “और हम उसे स्टीयरिंग पकड़ने देंगे. हाँ, वान्या? कॉम्रेड चीफ़, आप प्लीज़ उसे स्टीयरिंग पकड़ने की इजाज़त दीजिए. वो ख़ुद हमारी गाड़ी चलाएगा, पक्का प्रॉमिस! वो, अगर चाहे, तो हॉर्न भी बजाएगा, सब लोग उससे जलेंगे, और आप, कॉम्रेड चीफ़, शायद, आप भी जलेंगे. हाँ? आ जा यहाँ, बच्चे, मेरे सोना, ले, स्टीयरिंग पकड़, तू तन्दुरुस्त रहे!” 

वो मेरे ऊपर इस तरह गा रही थी, जैसे बिल्कुल छोटॆ बच्चे के लिए गाते हैं, और उसने मुझे नीले आदमी के सामने बिठा दिया. उससे पेट्रोल की तेज़ गंध आ रही थी. उसने मेरे हाथों को स्टीयरिंग पे रख दिया, और बगल में अपने हाथ रखे, और मैंने देखा कि उसकी कैसी मोटी-मोटी ऊँगलियाँ हैं, काली किनार वाले चौड़े-चौड़े नाखूनों वाली. 

उसने पैडल दबाया, लीवर्स को खटखट किया, और हम तीनों उस डरावनी जगह से दूर चल पड़े. 

चारों ओर हरियाली थी – घास, और पतले-पतले बर्च के पेड़, - और हवा से हरियाली की ख़ुशबू आ रही थी, जैसे कि कुछ हुआ ही न हो. हम चुपचाप जा रहे थे, और, हालाँकि मैं हाथों से स्टीयरिंग पकड़े था, मैं कुछ भी नहीं खेल रहा था. मेरा दिल ही नहीं चाह रहा था. और नीले चेहरे वाले अंकल ने अचानक अपनी असिस्टेंट से कहा;  ‘तू देख, फ़ीर्का, कैसे पापा हैं इस शैतान के! हर कोई ऐसी रिस्क नहीं लेगा...मतलब, अनजान बच्ची की ज़िन्दगी नहीं छीनना चाहते थे. गाड़ी तोड़ दी! हालाँकि, गाड़ी तो लोहे की है, उसका तो ये होता ही रहता है, वो दुरुस्त हो जाएगी. मगर बच्ची को कुचलना नहीं चाहते थे, ये सबसे महत्वपूर्ण बात है...नहीं चाहते थे, बिल्कुल नहीं. अपने ख़ुद के बेटे को ख़तरे में डाल दिया. मतलब, आदमी की रूह बहादुर है, दमकती हुई है....मतलब, महान रूह है. ऐसे लोगों की तो, फीर्का, युद्ध के मोर्चे पर बेहद इज़्ज़त करते थे... 

उसने मेरी नाक पकड़ कर दबाई, जैसे होर्न हो....

 “ज़्ज़्ज़्ज़ीन्....”

मेरे पापा के लिए उसने इतनी अच्छी बातें कही थीं, कि मैंने उसकी मोटी ऊँगली पकड़ ली और रो पड़ा.


*********



53.

गाते हैं पहिये – त्रा-त्ता-त्ता


इन गर्मियों में पापा को काम से यास्नागोर्स्क शहर जाना था, और जाने के दिन उन्होंने कहा:  “मैं डेनिस्का को अपने साथ ले जाऊँगा!” मैंने फ़ौरन मम्मा की ओर देखा. मगर मम्मा चुप रही. तब पापा ने कहा;  “उसे अपने स्कर्ट से बांध के रख लो. तुम्हारे पीछे-पीछे जाएगा, हिलगा हुआ.” 

   मम्मा की आँखें फ़ौरन झरबेरी जैसी हरी-हरी हो गईं. उसने कहा:

 “जो जी में आए, करो! चाहे तो अन्टार्क्टिका भी ले जाओ!”


उसी शाम को मैं और पापा ट्रेन में बैठकर निकल पड़े. हमारे कम्पार्टमेंट में अलग-अलग तरह के कई लोग थे: बूढ़ी औरतें और सैनिक, जवान लड़के, और कण्डक्टर्स, और गाइड्स, और एक छोटी बच्ची. ख़ूब शोर हो रहा था, बहुत ख़ुशी का माहौल था. हमने खाने के बन्द डिब्बे खोले, होल्डर में रखे गिलासों में चाय पी, और सॉसेज के बड़े बड़े टुकड़े खाए. फिर एक नौजवान ने अपना कोट उतार दिया और सिर्फ बनियान पहने रहा; उसके खूब गोरे हाथ थे और गोल-गोल मसल्स थे, बॉल्स जैसे. उसने ऊपर वाली बर्थ से एकॉर्डियन उठाया और बजाने लगा, वो एक कम्सोमोल (यंग कम्युनिस्ट लीग का सदस्य – अनु.) के बारे में दुखभरा गीत गाने लगा, कि कैसे वह घास पे, अपने घोड़े के पैरों के पास गिर पड़ा और अपनी भूरी आँखें बन्द कर लीं, और लाल खून हरी घार पर बहने लगा.

मैं खिड़की के पास गया, और खड़ा रहा. मैं देख रहा था कि कैसे अंधेरे में रोशनी झिलमिला रही है, और कम्सोमोल के बारे में ही सोचता रहा, कि अगर मैं भी उसके साथ जासूसी के काम पर घोड़े पे जाता, तो हो सकता है, कि उसे नहीं मारते. फिर पापा मेरे पास आए, हम दोनों कुछ देर चुपचाप खड़े रहे, पापा ने कहा:  “तू ‘बोर’ मत होना. हम परसों लौट आएँगे, और तब मम्मा को बताना कि कितना मज़ा आया.”

वो जाकर बिस्तर बिछाने लगे, फिर उन्होंने मुझे बुलाया और पूछा:  “तू किस तरफ़ सोएगा? दीवार के पास?” मगर मैंने कहा:

 “बेहतर है कि तुम ही दीवार के पास सो जाओ. मैं किनारे पे सोऊँगा.” पापा दीवार के पास लेट गए, करवट लेकर, और मैं किनारे पे लेटा, मैं भी करवट पे लेटा था, और ट्रेन के पहिए खड़खड़ा रहे थे: त्रत्ता-ता - त्रत्ता-ता...

अचानक मेरी नींद खुल गई, मैं आधा हवा में लटक रहा था और एक हाथ से मैंने छोटी वाली मेज़ पकड़ रखी थी, जिससे गिर न जाऊँ. ज़ाहिर था, कि पापा नींद में ख़ूब हाथ-पाँव चला रहे थे, और उन्होंने मुझे बर्थ के एकदम किनारे पे धकेल दिया था. मैं आराम से लेटना चाहता था, मगर अब नींद मेरी आँखों से उड़ गई थी, और मैं बर्थ के किनारे पे बैठकर चारों ओर देखने लगा.

कम्पार्टमेन्ट में उजाला हो गया था, और चारों तरफ़ से अलग-अलग हाथ और पैर लटक रहे थे. पैर अलग-अलग रंगों के मोज़ों में थे या नंगे थे, और बच्ची का छोटा सा पैर भी था, जो एक छोटे से भूरे ब्लॉक जैसा था.

हमारी ट्रेन बहुत धीरे-धीरे चल रही थी. पहिये घिसट रहे थे, खड़खड़ा रहे थे. मैंने देखा कि हरी-हरी टहनियाँ हमारी खिड़कियों को क़रीब-क़रीब छू रही हैं, और ऐसा लग रहा था, जैसे हम जंगल के कॉरीडोर से गुज़र रहे हैं, मैं ये सब देखना चाहता था, कि ऐसा कैसे हो रहा है, और मैं नंगे पाँव ही वेस्टिब्यूल में भागा. वहाँ दरवाज़ा पूरा खुला था, और मैंने हैण्डल पकड़े और सावधानी से पैर लटका दिए. बैठने में ठण्ड लग रही थी, क्यों कि मैं सिर्फ शोर्ट्स में था, और लोहे का फ़र्श मुझे एकदम ठण्डा कर रहा था, मगर कुछ देर में वो गरम हो गया और मैं हाथों को बगल में दबाए बैठ गया. हवा धीमी थी, मुश्किल से चल रही थी, और ट्रेन धीरे-धीरे चल रही थी, वो पहाड़ पे चढ़ रही थी, पहिये खड़खड़ा रहे थे, मैं हौले-हौले उनकी धुन में समाता गया और मैंने गाना बना लिया : 

चल रही है ट्रेन – कितनी है सुंदरता!

गाते हैं पहिये – त्रा-त्ता-त्ता!


बाइ चान्स, मैंने दाईं ओर नज़र दौड़ाई और हमारी ट्रेन का आख़िरी सिरा देखा: वो आधा गोल था, पूँछ जैसा.

तब मैंने बाईं ओर देखा तो मुझे हमारा इंजिन नज़र आया: वो ऊपर-ऊपर रेंग रहा था, जैसे कोई भौंरा हो. मैंने अंदाज़ लगाया कि यहाँ कोई मोड़ है.

 ट्रेन के बिल्कुल साथ-साथ पगडंडी थी, बिल्कुल संकरी, मैंने देखा कि इस पगडंड़ी पर एक आदमी जा रहा है. दूर से वो बिल्कुल छोटा नज़र आ रहा था, मगर ट्रेन तो उससे ज़्यादा तेज़ चल रही थी, और धीरे-धीरे मैंने देखा कि ये तो बड़ा आदमी है, उसने नीली कमीज़ पहनी है, और भारी-भारी जूते पहने हैं. इन जूतों से पता चल रहा था कि आदमी चलते-चलते थक गया है. उसने हाथों में कुछ पकड़ा था. जब ट्रेन उसके पास पहुँची, तो ये अंकल अपनी पगडंड़ी से छिटक कर ट्रेन के साथ-साथ भागने लगा, उसके जूते कंकरों पर चरमरा रहे थे, और भारी जूतों के नीचे से कंकर उड़ कर इधर उधर उड़ रहे थे. अब मैं उसके बराबर आया, उसने तौलिए में लिपटी हुई अपनी जाली वाली थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई और मेरी बगल में भागता रहा, उसका चेहरा लाल और गीला था. वो चिल्लाया:  “थैली पकड़, बच्चे!” और उसने हौले से उसे मेरे घुटनों पे घुसा दिया. मैंने थैली को कस के पकड़ लिया, और अंकल हैण्डल पकड़ कर आगे झुका, फूटबोर्ड पे उछला और मेरी बगल में बैठ गया:  “मुश्किल से चढ़ पाया...” मैंने कहा;  “ये रही आपकी थैली.” मगर उसने नहीं ली. उसने पूछा:  “तेरा नाम क्या है?” मैंने जवाब दिया:  “डेनिस.” उसने सिर हिलाया और कहा:

 “और मेरे बच्चे का – सिर्योझ्का.” मैंने पूछा:  “वो कौन सी क्लास में है?” अंकल ने कहा;  “दूसरा में.”  “ऐसे कहना चाहिए: दूसरी में,” मैंने कहा. तब वह खीझते हुए मुस्कुराया और थैली से तौलिया हटाने लगा. तौलिए के नीचे चांदी जैसी चमचमाती पत्तियाँ थीं, और ऐसी ख़ुशबू आ रही थी, कि मैं बस पागल होते-होते बचा. अंकल इन पत्तियों को एक एक करके अच्छी तरह हटाने लगा, और मैंने क्या देखा - रसभरी से पूरा भरा हुआ थैला था. हालाँकि वो बेहद लाल थीं, कहीं कहीं चांदी जैसी भी थीं, सफ़ेद; मगर हर फल अलग अलग था, जैसे बहुत कड़ा हो. मैं आँखें फ़ाड़े रसभरी की तरफ़ देख रहा था.

 “ये हल्की ठण्ड ने इसे ढाँक दिया है, कोहरे से धुंधली हो गई है,” अंकल ने कहा. “चल, खा!” मैंने एक बेरी उठाई और खा ली, फिर एक और खाई, और उसे जीभ से दबाया, इस तरह एक एक करके खाने लगा, ख़ुशी के मारे मैं पिघला जा रहा था, और अंकल बैठा हुआ मुझे देखे जा रहा था, उसका चेहरा ऐसा हो रहा था, जैसे मैं बीमार हूँ और उसे मुझ पर दया आ रही है. उसने कहा;  “तू ऐसे एक-एक न खा. पूरी मुट्ठी भर-भर के खा.”              और उसने मुँह फेर लिया. शायद इसलिए कि मैं शरमा न जाऊँ. मगर मैं उससे ज़रा भी नहीं शरमा रहा था: मैं अच्छे लोगों से नहीं शरमाता, मैं फ़ौरन मुट्ठी भर-भर के खाने लगा और मैंने फ़ैसला कर लिया कि चाहे मेरा पेट फूट ही क्यों न जाए, मैं इन रसभरियों को ख़तम कर दूँगा.

 अपने मुँह में इतना अच्छा स्वाद मैंने कभी महसूस नहीं किया था और दिल को भी इतनी ख़ुशी कभी नहीं हुई थी. मगर फिर मुझे सिर्योझा की याद आई और मैंने अंकल से पूछा:

 “क्या आपके सिर्योझा ने खा लीं?”  “कैसे नहीं खाईं,” उसने कहा, “एक समय था, जब खाता था.” मैंने पूछा:  “एक समय क्यो? मेरा मतलब है, क्या आज उसने खा लीं?” अंकल ने जूता उतारा और उसमें से छोटा सा कंकर बाहर झटका.”  “पैर में चुभता है, दर्द पहुँचाता है, देख! और कहने को है इत्ता छोटा कंकर.”

वो कुछ देर ख़ामोश रहा और कहने लगा:  “मगर रूह को छोटी सी बात लहूलुहान कर सकती है. सिर्योझ्का, मेरे नन्हे भाई, अब शहर में रहता है, मुझसे दूर चला गया.” मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. कैसा लड़का है! दूसरी क्लास में है, और पापा से दूर भाग गया!

मैंने पूछा:  “क्या वो अकेला भाग गया, या किसी दोस्त के साथ गया है?” मगर अंकल ने ग़ुस्से से कहा:  “अकेला क्यों? अपनी माँ के साथ! उसे, समझ रहा है, पढ़ने का शौक चर्राया! वहाँ उसके रिश्तेदार हैं, दोस्त हैं, परिचित हैं....जैसे फ़िल्म में होता है: सिर्योझा रहता है शहर में, और मैं यहाँ. अजीब है ना?”

मैंने कहा:  “फ़िकर न कीजिए, ड्राइवर का काम सीख लेगा और वापस आएगा. इंतज़ार कीजिए.”

उसने कहा:  “बहुत लम्बा इंतज़ार करना होगा.” मैंने पूछा:  “और, वो कौन से शहर में रहता है?”  “कुर्स्की में.”

मैंने कहा:  “कुर्स्क में – ऐसे कहना चाहिए.”

अब अंकल फिर से हँसने लगा – भर्राते हुए, जैसे ज़ुकाम हो गया हो, और फिर चुप हो गया. वो मेरी तरफ़ झुका और बोला:  “ठीक है, बहुत तेज़ दिमाग़ है तेरा. मैं भी पढूँगा. युद्ध की वजह से मैं स्कूल नहीं जा सका. जब तेरी उमर का था, तो पेड़ की छाल उबाल कर खाता था.” वो सोचने लगा. फिर अचानक हाथ हिलाकर जंगल की ओर इशारा करते हुए बोला,   “ये, इसी जंगल में, भाई. इसके पीछे, देख, अभी क्रास्नोए गाँव आएगा. मेरे हाथों से ये गाँव बना है. मैं वहीं उतर जाऊँगा.”

मैंने कहा: ”मैं बस एक और मुट्ठी खाऊँगा, फिर आप अपनी रसभरी बांध लीजिए.”

मगर उसने थैली को मेरे घुटनों पर ही दबाए रखा:  “बात ये नहीं है. तू ले ले.” उसने मेरी नंगी पीठ पर हाथ रखा, और मैंने महसूस किया कि कितना भारी और मज़बूत था उसका हाथ, सूखा, गर्माहट भरा, और खुरदुरा, और उसने कस के मुझे अपनी नीली कमीज़ से चिपटा लिया, और मैंने महसूस किया कि वो पूरा गरम है, उससे रोटी की और तमाखू की गंध आ रही थी, और सुनाई दे रहा था कि वो कैसे धीरे-धीरे और शोर मचाते हुए साँस ले रहा है.

उसने इसी तरह कुछ देर मुझे पकड़े रखा और बोला:  “तो, ऐसा होता है, बेटा. देख, अच्छी तरह रहना...”

उसने मुझे सहलाया और अचानक रास्ते में कूद गया. मैं संभल भी न पाया, और वो पीछे रह गया, और मैंने फिर से सुना कि उसके भारी जूतों के नीचे कंकर कैसे चरमरा रहे हैं.

मैंने देखा, कि वो कैसे मुझसे दूर होने लगा, जल्दी से ऊपर चढ़ाई पे चला गया, नीली कमीज़ और भारी जूतों वाला इतना अच्छा आदमी.

 जल्दी ही हमारी ट्रेन तेज़ रफ़्तार से जाने लगी, हवा भी काफ़ी तेज़ हो गई, और मैंने बेरीज़ का थैला उठाया और उसे कम्पार्टमेन्ट में ले आया, और पापा के पास पहुँच गया.  

रसभरी अब पिघलने लगी थी और अब इतनी सफ़ेद नहीं नज़र आ रही थी, मगर ख़ुशबू वैसी ही थी, जैसे पूरा गार्डन हो.

पापा सो रहे थे; वो हमारी बर्थ पे फ़ैल के सो गए थे, और मुझे बैठने के लिए ज़रा भी जगह नहीं थी. कोई भी नहीं था जिसे मैं ये बेरीज़ दिखाऊँ और नीली कमीज़ वाले अंकल के बारे में और उसके बेटे के बारे में बताऊँ.  

कम्पार्टमेंट में सब सो रहे थे, और चारों ओर, पहले ही की तरह अलग-अलग रंगों की एडियाँ लटक रही थीं. 

मैंने थैली फ़र्श पे रख दी और देखा कि मेरा पूरा पेट, और हाथ और घुटने लाल हो गए हैं, ये बेरीज़ का रस था, और मैंने सोचा, कि इसे धो लेना चाहिए, मगर अचानक मैंने सिर हिलाया. 

कोने में बड़ी सूटकेस खड़ी थी, कस के बंधी हुई, वो सीधी खड़ी थी; कल हमने उस पर खाने के डिब्बे खोले थे और सॉसेज काटा था. मैं उसके पास गया और उस पे कुहनियाँ और सिर टिका दिया, ट्रेन अचानक ज़ोर-ज़ोर से खड़खड़ाने लगी, मुझे कुछ गर्माहट महसूस हो रही थी और मैं देर तक ये आवाज़ सुनता रहा, और फिर से मेरे दिमाग़ में गाना तैरने लगा: 

चल रही है ट्रेन – 

कितनी है 

सुं

रता!

गाते हैं पहिये – 

त्रा-

त्ता-

त्ता!


*******








54.

युक्रेन की शांत रात

   

 

                     

हमारी लिटरेचर की टीचर रईसा इवानव्ना बीमार हो गईं. उनकी जगह पे हमारी क्लास में आईं एलिज़ाबेता निकलायेव्ना. वैसे तो एलिज़ाबेता निकलायेव्ना हमें भूगोल और विज्ञान पढ़ाती हैं, मगर आज कोई ख़ास बात थी, और हमारे डाइरेक्टर ने उनसे बीमार रईसा इवानव्ना की क्लास लेने के लिए कहा.                           

एलिज़ाबेता निकलायेव्ना आईं. हमने नमस्ते किया, और वो टीचर वाली मेज़ पे बैठ गईं. वो, मतलब, बैठी, और मैंने और मीश्का ने अपना ‘युद्ध’ जारी रखा – आजकल समुद्री-युद्ध का फ़ैशन है. एलिज़ाबेता निकलायेव्ना के आने तक इस मैच में मेरे पॉइन्ट्स ज़्यादा थे: मैंने मीश्का के डेस्ट्रॉयर को टक्कर मार दी थी और उसकी तीन पनडुब्बियों को बेकार कर दिया था. अब मुझे सिर्फ ये पता करना था कि उसके बैटलशिप पर कहाँ से वार करूँ. मैंने अपने   दिमाग़ पर ज़ोर दिया और अपने अगले मूव के बारे में मीश्का को बताने के लिए मुँह खोला ही था, कि तभी एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने रजिस्टर में देखा और कहा;  “कराब्ल्योव!” मीश्का फ़ौरन फ़ुसफ़ुसाया:  “डाइरेक्ट अटैक!” मैं खड़ा हो गया.

एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने कहा:  “ब्लैक बोर्ड के पास आओ!” मीश्का फिर से फ़ुसफ़ुसाया:  “अलबिदा, प्यारे कॉम्रेड!” मैंने मातमी चेहरा बनाया. और मैं ब्लैकबोर्ड के पास आया. एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने कहा:  “डेनिस्का, सीधे खड़े रहो! और मुझे बताओ, कि लिटरेचर में आजकल आप लोग क्या पढ़ रहे हो.”  “हम ‘पल्तावा’ पढ़ रहे हैं, एलिज़ाबेता निकोलायेव्ना,” मैंने कहा.  “लेखक का नाम बताओ,” उसने कहा; ज़ाहिर था कि वो परेशान हो रही थीं कि मुझे मालूम है या नहीं.

  “पूश्किन, पूश्किन.” मैंने शांति से जवाब दिया.

“तो,” उन्होंने कहा, “ग्रेट पूश्किन, अलेक्सान्द्र सिर्गेयेविच, लेखक हैं लाजवाब कविता ‘पल्तावा’ के. सही है. अच्छा, बताओ तो, क्या तुमने इस कविता की कुछ पंक्तियाँ याद की हैं?”  “बेशक,” मैंने कहा.  “कौन सी पंक्तियाँ याद कीं हैं?” एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने पूछा. 

 “शांत है युक्रेनी रात...”  “बहुत ख़ूब,” एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने कहा और वो ख़ुशी से झूम उठीं. – “शांत है युक्रेनी रात...” ये मेरी पसन्द की पंक्ति है! सुनाओ, कराब्ल्योव.”

 उनकी पसंद की पंक्ति! ये बढ़िया बात हुई! ये तो मेरी भी पसन्द की पंक्ति है! मैंने उसे तभी याद कर किया था, जब मैं छोटा था. तब से, जब भी मैं ये कविता सुनाता हूँ, बोल कर या मन ही मन, मुझे हर बार ऐसा लगता है, कि हालाँकि मैं अभी उसे सुना रहा हूँ, मगर कोई दूसरा उसे सुना रहा है, न कि मैं, और असली वाला मैं तो गरम, दिन भर में तप चुके लकड़ी के बरामदे में खड़ा हूँ, सिर्फ एक कमीज़ पहने नंगे पाँव, और क़रीब-क़रीब सो रहा हूँ, और सिर इधर-उधर घुमाता हूँ, और लड़खड़ा रहा हूँ, मगर फिर भी ये आश्चर्यजनक सुन्दरता देख रहा हूँ: उनींदा सा छोटा सा शहर अपने चांदी जैसे पोप्लर वृक्षों समेत; छोटा सा सफ़ेद चर्च देख रहा हूँ, कि वो भी कैसे सो रहा है और घुंघराले बादल के ऊपर मेरे सामने तैर रहा है, और ऊपर तारे हैं, वो टिड्डों के समान चहचहा रहे हैं और सीटी बजा रहे हैं; और कहीं मेरे पैरों के पास एक मोटा, दूध में नहाया कुत्ता सो रहा है और नींद में पंजे हिला रहा है, जो इस कविता में नहीं है. मगर मैं चाहता हूँ कि वो भी होता, और पास ही बरामदे में हल्के बालों वाले मेरे दद्दू बैठे हैं और गहरी-गहरी साँस ले रहे हैं, वो भी इस कविता में नहीं हैं, मैंने उन्हें कभी नहीं देखा, वो युद्ध में शहीद हो गए, वो इस दुनिया में नहीं हैं, मगर मैं उनसे इत्ता प्यार करता हूँ, कि मेरा दिल भर आता है...  “सुना, डेनिस, क्या कर रहा है!” एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने आवाज़ ऊँची की. मैं आराम से खड़ा होकर कविता सुनाने लगा: 

...शांत युक्रेनी रात.  साफ़ है आसमान. चमचमाते सितारे.

उनींदेपन को अपने नहीं चाहती खोना हवा. सरसराते हौले हौले  चांदी से पोप्लर के पत्ते.

चमकता है चाँद ख़ामोशी से ऊँचाई पे ऊपर सफ़ेद चर्च के ...  

 “स्टॉप, स्टॉप, बस है!” एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने मुझे रोक दिया. “हाँ, महान है पूश्किन, विशाल! तो, कराब्ल्योव, अब मुझे ये बताओ इस कविता से तुमने क्या समझा?”

आह, उन्होंने मुझे क्यों रोक दिया! कविता तो और भी बची थी, और उन्होंने मुझे तभी रोक दिया जब मैं पूरे फॉर्म में था. मैं अभी होश में नहीं आया था! इसलिए, मैंने ऐसा दिखाया, कि मैं सवाल नहीं समझ पाया, और मैंने कहा:  “क्या? कौन? मैं?”  “हाँ, तुम. तो, क्या समझ में आया?”  “सब कुछ,” मैंने कहा. “मैं सब समझ गया. चाँद, चर्च. पोप्लर्स. सब सो रहे हैं.”  “हुँ...” नाराज़गी से एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने शब्द को खींचते हुए कहा, “ये तू कुछ सतही तौर पे समझा है... गहराई से समझना चाहिए. छोटे नहीं हो. आख़िर ये पूश्किन है...”  “तो फिर कैसे,” मैंने पूछा, “कैसे पूश्किन को समझना चाहिए?” और, मैंने मासूम सा चेहरा बनाया.  “एक एक वाक्य से चलो,” उसने अप्रसन्नता से कहा. “जब तू ऐसा है. “शांत युक्रेनी रात...” इससे क्या समझ में आया?”

 “मैंने समझा कि शांत रात है.”  “नहीं,” एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने कहा. “तू ये समझ कि “शांत युक्रेनी रात” इन शब्दों में बड़ी बारीकी से बताया गया है कि युक्रेन मुख्यभूमि में हवा की जो गतिविधि होती है, उससे हट के है, एक तरफ़ को है. तुम्हें ये बात जानना और समझना चाहिए. कराब्ल्योव! पक्का? आगे सुना!”  “पारदर्शी आसमान,” मैंने कहा, “आसमान, मतलब, पारदर्शक है. साफ़ है. पारदर्शक आसमान. ऐसा ही लिखा है. “आसमान पारदर्शी”.

 “ऐह, कराब्ल्योव, कराब्ल्योव,” दुख से और कुछ निराशा से एलिज़ाबेता निकलायेव्ना ने कहा. “ये क्या तू, तोते की तरह, एक ही बात कह रहा है: पारदर्शी आसमान, पारदर्शी आसमान”. गाए जा रहा है. मगर इन दो शब्दों में कितना बड़ा मतलब छिपा है. जैसे, इन दो, बेमतलब से शब्दों में पूश्किन ने हमें बताया है कि इस प्रदेश में अवक्षेपण की मात्रा बहुत कम है, जिसके कारण हम निरभ्र आकाश देख सकते हैं. क्या अब तुम समझे कि पूश्किन की योग्यता कितनी ज़बर्दस्त है? चल, आगे.”

मगर न जाने क्यों अब मेरा दिल ही नहीं कर रहा था पढ़ने को. हर चीज़ उकताने लगी. और इसलिए मैं जल्दी-जल्दी बुदबुदाया: 

.... चमचमाते सितारे.

उनींदेपन को अपने नहीं चाहती खोना हवा.. 

 “मगर क्यों?” एलिज़ाबेता मानो जोश में आ गई.

 “क्या क्यो?” मैंने कहा.  “क्यों नहीं चाहती?” उन्होंने दुहराया.   “क्या नहीं चाहती?”  “उनींदेपन को खोना.”  “कौन?”  “हवा.”  “कौन सी?”  “क्या कौनसी – युक्रेनी! तुमने ख़ुद ही तो अभी बताया था: ‘उनींदेपन को अपने नहीं चाहती खोना हवा..’ तो वो क्यों नहीं चाहती?”  

 “नहीं चाहती, और बस,” मैंने अपने दिल से जवाब दिया. “जागना नहीं चाहती! ऊँघना चाहती है, और बस!”  “ओह, नहीं,” एलिज़ाबेता निकलायेव्ना को गुस्सा आ गया और उसने मेरी नाक के सामने इधर से उधर अपनी तर्जनी घुमाई. ऐसा लग रहा था, मानो वो कहना चाहती हो कि: “आपकी हवा के साथ ये नख़रे नहीं चलेंगे”. मगर नहीं, उसने दुहराया. “यहाँ बात ये है कि पूश्किन इस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि युक्रेन के ऊपर सात सौ चालीस मिलिमीटर्स दबाव का एक छोटा चक्रवात का केन्द्र स्थित है. और जैसा कि हम जानते हैं, चक्रवात में हवा बाहरी किनारों से भीतर की ओर चलती है. इस चमत्कार ने ही कवि को अमर पंक्तियाँ लिखने की प्रेरणा दी: ‘सरसराते हौले-हौले, म्-म्-म्...म्-म्-म्, किन्हीं पोप्लर वृक्षों के पत्ते!’ समझा कराब्ल्योव ? आत्मसात् कर लिया! बैठ जा!”

मैं बैठ गया. क्लास के बाद मीश्का ने अचानक मुझसे मुँह फेर लिया, वो लाल हो गया, और बोला:  “और मेरी पसन्दीदा कविता है – चीड़ के बारे में: जंगली उत्तर में खड़ा अकेला, नंगी चोटी पर चीड़... जानता है?”    “बेशक जानता हूँ,” मैंने कहा. “क्यों नहीं जानूँगा?” मैंने वैज्ञानिकों जैसा चेहरा बनाया.  “जंगली उत्तर में” – इन शब्दों में लेरमंतव हमें सूचित करते हैं, कि चीड़ का पेड़, चाहे कुछ भी कहो, ठण्ड का मुक़ाबला करने वाला पेड़ है. और शब्द रचना “ नंगी चोटी पर खड़ा है”, ये भी बताती है कि चीड़ एक सुपर-मज़बूत जड़ वाला पेड़ है...”

मीश्का ने घबराकर मेरी तरफ़ देखा. और मैंने उसकी तरफ़. और फिर हम दोनों ने ठहाका लगाया. बड़ी देर तक ठहाके लगाते रहे, पागलों जैसे. पूरा इंटरवल. 


*********

 
















55

मज़दूर तोड़ते पत्थर


 



इस बार गर्मियों के शुरू होते ही हम तीनों को, मीश्का को, कोस्तिक को और मुझे, वाटर-स्टेशन ‘दिनामो’ की लत लग गई और हम क़रीब-क़रीब हर रोज़ वहाँ जाने लगे. पहले हमें तैरना नहीं आता था, मगर बाद में धीरे-धीरे सबने कहीं-कहीं जाकर तैरना सीख लिया: किसी ने – गाँव में, किसी ने – पायनीयर कैम्प्स में, और मैं, मिसाल के तौर पे, दो महीने हमारे स्विमिंग पूल ‘मॉस्को’ जाता रहा. जब हम सब तैरना सीख गए तो हमें फ़ौरन समझ में आ गया कि तैरने का उतना मज़ा कहीं नहीं आयेगा, जितना वाटर-स्टेशन में. ग्यारंटी.

ओह, कितना अच्छा लगता है एक साफ़-सुबह को वाटर-स्टेशन के नम और गर्माहट भरे रास्तों पर लेटना, पूरी नाक से नदी से आ रही ताज़ा और उत्तेजित करने वाली ख़ुशबू सूंघना! ये देखना कि कैसे ऊँचे-ऊँचे मस्तूलों और पतली-पतली छड़ों पर रंगबिरंगे रेशमी झण्डे हवा में फ़ड़फ़ड़ा रहे हैं और तुम्हारे ठीक नीचे, लकड़ी की दरारों में पानी हिलोरें ले रहा है और थपकियाँ दे रहा है; अच्छा लगता है इस तरह हाथों को फ़ैलाये लेटना, और चुपचाप पड़े रहना, और धूप तापना, और कुहनी के नीचे से देखना, कि कैसे वाटर-स्टॆशन से दूर, बहाव से कुछ ऊपर, पत्थर तोड़ने वाले मज़दूर पुल की मरम्मत कर रहे हैं और गुलाबी पत्थर पे हथौड़ों से वार कर रहे हैं, और आवाज़ उनके मारने के कुछ देर बाद तुम तक पहुँच रही है, इतनी महीन और नज़ाकत भरी, जैसे कोई काँच के हथौड़ों से चाँदी का ज़ाइलोफ़ोन बजा रहा हो.  और, ख़ास तौर से अच्छा तब लगता है, जब धूप में पर्याप्त तपने के बाद, पानी में छलाँग लगाना, और जी भर के तैरना, और मीटर के निशान वाले प्लेटफॉर्म से कूदना, जी भर के डाइव लगाना, इतना कि थक के चूर हो जाओ. फिर, जब थक जाओ, तो अपने दोस्तों के पास जाना अच्छा लगता है, गरम-गरम बोर्ड्स के ऊपर चल कर जाना, पेट को भीतर खींच कर और सीने को बाहर निकाले, पैर फ़ैलाते हुए, हाथ के मसल्स फुलाते हुए, और पैरों के पंजे भीतर की ओर मोड़े, क्योंकि ये बहुत ख़ूबसूरत लगता है, और वाटर-स्टॆशन पर सब इसी तरह चलते हैं, किसी और तरह से चल ही नही सकते. ये कोई गन्दी रेत और कागज़ के टुकड़ों वाला काम चलाऊ ‘बीच’ नहीं है, यहाँ कोई घास वाला किनारा नहीं है – जहाँ तुम जो चाहो, जैसा चाहो, कर सकते हो, - बल्कि ये, वाटर-स्टॆशन है, यहाँ बड़ी अच्छी व्यवस्था है, सफ़ाई है, फुर्ती है, स्पोर्ट्स है, हर चीज़ चकाचक है, और इसलिए सब लोग यहाँ चैम्पियन्स की तरह चलते हैं, “एक्सेलेंट” ग्रेड जैसे, फ़ैशनेबल तरीके से चलते हैं – कभी कभी तो जितना अच्छा तैरते हैं, उससे भी ज़्यादा बढ़िया चलते हैं.

और इसलिए हम तीनों – मीश्का, कोस्तिक और मैं – हम कोई भी दिन नहीं छोड़ते थे, पूरी गर्मियाँ यहाँ तैरने के लिए आते रहे, और धूप सेंकते-सेंकते हमारा रंग शैतानों जैसा हो गया, हम ख़ूब अच्छी तरह तैरना सीख गए, और हमारे मसल्स भी ख़ूब बन गए, बाइसेप्स और ट्राइसेप्स भी, और हम अपने वाटर-स्टेशन के सभी ओनों-कोनों पर घूमते. हम जान गए थे कि मेडिकल-पॉइन्ट कहाँ है, गेम्स कहाँ हैं वगैरह, वगैरह, और आख़िरकार जैसे यहाँ की हर चीज़ हमें अपनी और साधारण लगने लगी. हमें आदत हो गई. 

एक बार हम हमेशा की तरह लकड़ी के बोर्ड्स पर लेटे थे और धूप सेंक रहे थे, अचानक कोस्तिक ने बे-बात के पूछा:  “डेनिस्का! क्या तू सबसे ऊँचे टॉवर से पानी में छलांग मार सकता है?” मैंने टॉवर की ओर नज़र डाली और देखा कि वो कोई बहुत ज़्यादा ऊँचा नहीं है, कोई डरने वाली बात नहीं है, दूसरी मंज़िल से ज़्यादा ऊँचा नहीं है, उसमें कुछ भी ख़ास नहीं है. 

इसलिए मैंने फ़ौरन कोस्तिक को जवाब दिया:  “बेशक, मार सकता हूँ! क्या बकवास है.” मीश्का ने फ़ौरन कहा:

“फेंकू!”

मैंने कहा:  “बेवकूफ़ है तू, मीश्का, पक्का बेवकूफ़!”

कोस्तिक ने कहा:  “वो क़रीब दस मीटर्स है!”  “तो, तो क्या?” मैंने कहा.  “फेंकू!” कोस्तिक ने मेरी बात काट दी. 

मीश्का उसीकी साइड ले रहा था:  “फेंकू, सही में, फेंकू!” और  आगे बोला, “फेंकू–कीं-कूँ!!!”

मैंने कहा: ”तुम दोनों ही बेवकूफ़ हो! पक्के बेवकूफ़!” 

मैं फ़ौरन खड़ा हो गया, पैरों को चौड़ा किया, हाथों के मसल्स फुलाने लगा और टॉवर की ओर चल पड़ा. जब मैं चल रहा था, तो पूरे समय पंजों को अन्दर की ओर मोड़ रहा था.

पीछे से कोस्तिक चिल्लाया:  “फें-कू-कीं-को-के!” मगर मैंने उसे कोई जवाब नहीं दिया. मैं टॉवर पे चढ़ रहा था. 

जबसे हमने वाटर-स्टेशन जाना शुरू किया था, मैं रोज़ देखता था कि इस टॉवर से बड़े अंकल लोग पानी में छलांग लगाते थे. मैं देखता था कि जब वो बटरफ़्लाय स्टाइल में कूदते थे, तो कितनी ख़ूबसूरती से अपनी पीठ को झुकाते, ये भी देखता था कि कैसे वे अपने सिर को डेढ़ बार घुमाते, या कमर को इधर-उधर घुमाते, या हवा में दुहरे हो जाते और पानी में हौले-हौले, एकदम सही-सही गिरते, ज़रा भी पानी उछाले बिना, और जब बाहर निकलते, तो लकड़ी के बोर्ड तक आते, हाथों के मसल्स फुलाए और सीना बाहर निकाले...

ये बेहद ख़ूबसूरत और आसान था, और मुझे पूरी ज़िन्दगी यक़ीन था कि मैं भी इन अंकल लोगों से बुरा नहीं कूदता, मगर इस समय, जब मैं चढ़ रहा था, तो मैंने फ़ैसला किया कि हवा में कोई भी कलाबाज़ी नहीं दिखाऊँगा, सिर्फ सीधे सीधे कूदूँगा, अटेन्शन में खड़े सैनिक की तरह, - ये सबसे आसान है! शुरू में मैं, बस, सादगी से, बिना किसी दिखावे के कूदूँगा, और बाद में, अगली बार ख़ास तौर से मीश्का के लिए, ऐसी ऐसी कलाबाज़ियाँ दिखाऊँगा कि उसका मुँह खुला रह जाएगा. बेहतर है कि वो और कोस्तिक चुप रहें बजाय इसके कि मेरे पीछे चिल्लाएँ ‘फेंकू-की-को-का!!!’.”

जब मैं ये सब सोच रहा था, मेरा मूड बहुत अच्छा था, और मैं फ़ौरन भाग कर छोटी-छोटी सीढ़ियाँ चढ़ गया, और मैंने ध्यान ही नहीं दिया कि कितनी जल्दी मैं सबसे ऊँचे ‘डेक’ पर पहुँच गया हूँ, स्टेशन से दस मीटर्स की ऊँचाई पर.

यहाँ आकर अचानक मैंने देखा कि ये डेक बहुत छोटा है, और उसके सामने, और किनारों पे, और चारों तरफ़ दूर तक कोई फ़ैला हुआ, खूब बड़ा और ख़ूबसूरत शहर है, वो किसी हल्के कोहरे में लिपटा है, और यहाँ, डेक पर, हवा शोर मचा रही है, पूरी भयंकरता से तूफ़ान की तरह शोर मचा रही है, देखते देखते तुम्हें इस डेक से उड़ा देगी. मज़दूरों के पत्थर तोड़ने की आवाज़ बिल्कुल भी सुनाई नहीं दे रही है, हवा ने उनके काँच के हथौड़ों को गूँगा बना दिया है. और जब मैंने नीचे नज़र दौड़ाई तो मुझे अपना वाटर-स्टॆशन दिखाई दिया, वो नीला-नीला था, मगर इतना छोटा सा था, जैसे सिगरेट का पैकेट हो, मैंने सोचा कि अगर मैं कूदता हूँ, तो मुश्किल से ही उसमें गिरूँगा, चूक जाने की संभावना बहुत ज़्यादा है, ऊपर से ये हवा जो बोफ़ोर्ट स्केल पर ज़रूर 6 पॉइंट्स होगी, देखते-देखते मुझे किसी कोने में उड़ा ले जाएगी, या तो नदी में, या हो सकता है कि मैं रेस्टॉरेंट में धम् से किसी के सिर पे गिरूँ, हंगामा हो जाएगा! या, हो सकता है कि मैं सीधा किचन में जा गिरूँ, सूप वाली कड़ाही में! ये भी कम मज़ेदार नहीं होगा. इन ख़यालों से मेरे घुटनों में कुछ खुजली होने लगी, और मेरा दिल फिर से पुल की मरम्मत कर रहे मज़दूरों के हथौड़ों की आवाज़ सुनने के लिए, कोस्तिक और मीश्का को अपने साथ देखने के लिए बेचैन होने लगा, आख़िर वो मेरे दोस्त जो हैं...

 और मैं धीरे-धीरे कुछ क़दम पीछे हटा, हैण्डल्स पकड़ लिए और नीचे उतरने लगा, और जब मैं नीचे उतर रहा था, तो मेरा मूड फिर से अच्छा हो गया और दिल में इत्ता हल्का-हल्का महसूस हो रहा था, जैसे कंधों से पहाड़ उतर गया हो. जब मैंने मीश्का और कोस्तिक को देखा, तो बहुत ख़ुश हो गया, मैं उनकी ओर भागा, मगर जब उनके पास पहुँचा तो जैसे ज़मीन में गड़ गया!...ये बेवकूफ़ गला फाड़ कर ठहाके लगा रहे थे और ऊँगली से मेरी तरफ़ इशारा कर रहे थे! ऐसा लग रहा था कि हँसते-हँसते उनके पेट फट जाएँगे. 

वो चीख़ रहे थे:  “ये कूदा!”  “हा-हा-हा!”

“इसने छलाँग लगाई!”

“हो-हो-हो!”  “बटरफ्लाय स्टाइल में!”  “हे-हे-हे!”

 “सैनिक जैसे!”  “ही-ही-ही!”  “बहादुर!”  “शाबाश!”  “शेख़ीमार!” मैं उनके पास बैठा और बोला;  “तुम लोग सिर्फ बेवकूफ़ हो, और कुछ नहीं! कहीं तुम लोग ये तो नहीं सोच रहे हो, कि मैं डर गया?” अब तो वो जैसे चीत्कार करने लगे:  “नहीं! हा-हा-हा!”  “नहीं सोचते! हो-हो-हो!”  “तू डरा थोड़े ही था!”  “तू, बस, थोड़ा घबरा गया!”  “अब हम तेरे बारे में अख़बार में लिखेंगे!”  “कि तुझे मेडल  दिया जाए!”  “ख़ूबसूरती से सीढ़ियाँ उतरने के लिए!” 

मैं गुस्से से उबलने लगा! कैसे बेशरम हैं, ये पतली डंडी जैसा कोस्तिक और ख़ासतौर से मीश्का, भद्दी आवाज़ वाला! शायद वे सचमुच में समझ रहे हैं कि मैं डर गया! कैसी बेवकूफ़ी है! आसमानी बादशाह के उल्लू! 

मगर मैंने उन्हें गालियाँ नहीं दीं, न ही उनका अपमान किया, जैसे उन्होंने मेरा किया था. क्योंकि मुझे तो मालूम था कि इतने छोटे टॉवर से कूदना मेरे लिए कोई बड़ी बात नहीं है! इसलिए मैंने बड़ी शांति और शराफ़त से कहा: “थूकता हूँ, तुम पर!”

और मैं तीर की तरह टॉवर की तरफ़ लपका, और पाँच ही सेकण्ड में ऊपर तक चढ़ गया! इस समय सूरज बादल के पीछे छुप गया था. यहाँ ठण्ड थी और उदासी थी, हवा चिंघाड़ रही थी, और टॉवर कुछ चरमरा रहा था और हिल रहा था. मगर मैं रुका नहीं, मैं बिल्कुल किनारे की तरफ़ गया, हाथ अटेन्शन की मुद्रा में रखे, आँखें सिकोड़ीं, छलाँग लगाने से पहले घुटने थोड़े-से मोड़े, और...अचानक, एकदम अप्रत्याशित रूप से मुझे मम्मा की याद आई. और पापा की भी. और दादी की. मुझे याद आया कि आज सुबह, जब मैं ‘डिनामो’ आ रहा था, मैंने उन्हें बाय-बाय नहीं कहा था और ये कि, हो सकता है, मैं गिरकर मर जाऊँ, और मैंने सोचा, कि उनके लिए ये कितना बड़ा दुर्भाग्य होगा. दुख का पहाड़ टूट पड़ेगा. उनकी ज़िन्दगी में कोई भी नहीं होगा जिसे वे प्यार कर सकें. मैंने कल्पना की, कि कैसे मम्मा मेरी फोटो की ओर देखा करेगी और रोती रहेगी, क्योंकि मैं उसका इकलौता बच्चा जो हूँ और पापा का भी. उनके लिए तो ज़िन्दगी में हमेशा मातम ही रहेगा, और वो कभी किसी के घर नहीं जाएँगे, फिल्म देखने भी नहीं जाएँगे – ये भी कोई ज़िन्दगी है? और, जब वो बूढ़े हो जाएँगे, तो उनका ख़याल कौन रखेगा? मुझे भी उनके बगैर अच्छा नहीं लगेगा, मैं भी तो उनसे प्यार करता हूँ! हालाँकि मुझे तो बुरा नहीं लगेगा, क्योंकि मैं तो ज़िन्दा ही नहीं होऊँगा, मैं तो मर चुका होऊँगा, और नीले आसमान को फिर कभी न देख सकूँगा, पुल पर मज़दूर कितनी नज़ाकत से पत्थर तोड़ते हैं, ये भी नहीं सुन पाऊँगा!...

ये सब इन बेवकूफों की वजह से – डंडी कोस्तिक और मक्खी मीश्का की वजह से! 

मैं बेहद परेशान हो गया और गुस्से से उबलने लगा, कि इन बेवकूफ़ों के कारण इतने लोग दुख उठाएँगे, और मैंने सोचा कि इससे बेहतर है कि मैं जाकर उन्हें एक-एक झापड़ जमा दूँ, और ये जितनी जल्दी करूँ उतना ही अच्छा होगा.

 और मैं फिर से नीचे उतर गया. 

जब कोस्तिक ने मुझे देखा, तो वो चौपायों जैसा खड़ा हो गया और उसने अपना सिर फर्श में गड़ा लिया. और इस तरह, सिर के बल वो गोल-गोल घूमा, जैसे कोई भौंरा चक्कर लगाता है. और मीश्का तो पूरा नीला हो गया और वह फुफुफुफु कर रहा था, उसे हँसी का दौरा पड़ा था. उनके पास एक छोटा सा ग्रुप बैठा था, लड़के और लड़कियाँ. वो भी हँस रहे थे. ज़ाहिर है, कि कोस्तिक और मीश्का ने उन्हें सारी बात बता दी थी. वो बहुत ख़ुशी से हँस रहे थे, ये अनजान लोग, और मेरे दोस्त उनके साथ मिलकर मुझ पर हँस रहे थे, वे सब एक होकर मुझ पर हँस रहे थे... 

तब मैंने महसूस किया, कि जो अब तक हुआ – वो पागलपन था! मैं समझ नहीं पाया था कि इसका मतलब क्या है! मगर अब, शायद, समझ गया. और मैं मुड़कर वापस टॉवर पे चढ गया. तीसरी बार! वो लोग पीछे से मुझे हूट कर रहे थे, चिढ़ा रहे थे. मगर मैं ऊपर तक चढ़ गया और बिल्कुल किनारे पे आया. मेरे घुटने काँप रहे थे. मगर मैंने हाथों से उन्हें थामा और दबाया, और हौले से अपने आप से कहने लगा, और जब मैं कह रहा था, तो सुन रहा था, कि मेरी आवाज़ कैसे काँप रही है और दाँत किटकिटा रहे हैं.

 मैं बुदबुदाया:

 “रोतले!...पोतले!! मोतले!...कूद अभ्भी! चल! वर्ना मैं तुझसे बात नहीं करूँगा! तुझसे हाथ भी नहीं मिलाऊँगा! चल1 कूद भी! तूतले! कतूतले! वतूतले!” 

और जब मैंने अपने आप को वतूतले कहा, तो मैं अपमान को सह नहीं पाया और मैंने क़दम आगे बढ़ा दिया. मेरा पेट और दिल जैसे लुढ़क कर गले तक आ गए. और मैं, जब उड़ रहा था, तो कुछ भी नहीं सोच पाया, मैं सिर्फ इतना जानता था कि मैंने छलांग लगा दी है. मैं कूद गया! मैं कूद गया! आख़िर कूद ही गया!!! 

और, जब मैं बाहर निकला, तो मीश्का और कोस्तिक ने हाथ बढ़ाए और मुझे बोर्ड पर खींचा. हम पास पास लेट गए, मीश्का और कोस्तिक ख़ामोश थे. 

मगर मैं लेटा था और सुन रहा था कि कैसे मज़दूर गुलाबी पत्थर को हथौड़ों से तोड़ रहे हैं. आवाज़ यहाँ तक पहुँच रही थी हल्के से, नज़ाकत से, शरमाते हुए, जैसे कोई काँच के हथौड़े से चाँदी का ज़ाइलोफ़ोन बजा रहा हो.


*********















56.


आऊट हाऊस में आग, या हिम पर कारनामा


मैं और मीश्का हॉकी खेलने में इतने मगन हो गए, कि बिल्कुल दुनिया की सुध भी भूल गए, और जब पास से गुज़रते हुए एक अंकल से टाईम पूछा, तो उसने कहा:  “एक्ज़ेक्ट दो बजे हैं.”

  

मैंने और मीश्का ने अपने-अपने सिर पकड़ लिए. दो बज गए! कोई पाँच मिनट ही खेले होंगे, और दो भी बज गए! ये तो भयानक बात हो गई! हम तो स्कूल में लेट हो गए! मैंने अपनी बैग उठाई और चिल्लाया:  “चल भाग, मीश्का!” और हम लपके, बिजली की तरह. मगर बहुत जल्दी थक गए और धीरे-धीरे चलने लगे. 

“जल्दी मत कर, देर तो हो ही गई है.” मैंने कहा:  “ओह, पड़ेगी...पेरेन्ट्स को बुलाएँगे! बिना किसी वाजिब कारण के देर जो हो गई.” मीश्का ने कहा:

“कारण सोचना पड़ेगा. वर्ना अनुशासन कमिटी में बुला लेंगे. चल, जल्दी से सोचते हैं!” मैंने कहा:  “चल, कह देंगे कि हमारे दाँतों में दर्द था और हम उन्हें निकलवाने गए थे.” मगर मीश्का ने मेरी हँसी उड़ाई:  “दोनों के दाँत एकदम दर्द करने लगे, हाँ? कोरस में दर्द कर रहे थे!...नहीं, ऐसा नहीं होता. और फिर! अगर हमने उन्हें निकलवा दिया, तो छेद कहाँ हैं?” मैंने कहा:  “क्या किया जाए? समझ में नहीं आ रहा...ओय, कमिटी में बुलाएँगे और पेरेन्ट्स को बुलाएँगे!...सुन, पता है, क्या? कोई मज़ेदार और हिम्मतवाला बहाना सोचना चाहिए, जिससे कि देर से आने पर भी हमारी तारीफ़ की जाए, समझा?” 

मीश्का ने कहा;  “वो कैसे?”  “हूँ, मिसाल के तौर पे, सोचते हैं, कि जैसे कहीं आग लगी थी, और हमने एक छोटे बच्चे को आग से बाहर निकाला, समझ गया?” 

मीश्का ख़ुश हो गया:  “आहा, समझ गया! आग के बारे में बहाना बना सकते हैं, वर्ना, अगर और भी बढ़िया बात बनानी हो, तो ये कह सकते हैं कि तालाब की सतह पर जमी बर्फ की सतह टूट गई, और ये बच्चा – धड़ाम्! ...पानी में गिर गया! और हमने उसे बाहर खींचा...ये भी बढ़िया है!”  “हाँ, है तो,” मैंने कहा, “टूटे हुए तालाब वाली बात ज़्यादा मज़ेदार है!” हमने कुछ देर और बहस की, कि इन दोनों में से ज़्यादा मज़ेदार और बहादुरी वाला कारनामा कौन सा है, मगर हम बहस पूरी न कर सके और स्कूल पहुँच गए. क्लोक-रूम में हमारी क्लोक-रूम वाली पाशा आण्टी ने अचानक कहा:  “ये तू इतना टूटा-फूटा कहाँ से आ रहा है, मीश्का? तेरी कॉलर के तो सारे के सारे बटन उखड़ गए हैं. ऐसे चीथड़े को पहन कर तो क्लास में नहीं जा सकता. अब तुझे देर तो हो ही गई है, चल तेरे बटन ही सी देती हूँ! ये देख, मेरे पास बटन्स का पूरा डिब्बा है. और तू, डॆनिस्का, क्लास में जा, यहाँ डोलने की कोई ज़रूरत नहीं है!” मैंने मीश्का से कहा:  “तू जल्दी से आ जाना, वर्ना, क्या मैं अकेला ही तूफ़ान का सामना करूँगा?”

मगर पाशा आण्टी ने मुझे भगाया:  “जा, तू चल, और ये तेरे पीछे-पीछे आ रहा है! मार्च!”

मैंने हौले से अपनी क्लास का दरवाज़ा थोड़ा सा खोला, सिर अन्दर घुसाया, और देखा कि कैसे पूरी क्लास बैठी है, सुना कि कैसे रईसा इवानव्ना किताब में से डिक्टेशन दे रही हैं:

“चूज़े चहचहाते हैं...” और ब्लैकबोर्ड के पास खड़ा है वालेर्का और तिरछे अक्षरों में लिख रहा है:

 “चूज़े हचहचाते हैं...” 

मैं अपने आप को रोक न सका और हँस पड़ा, रईसा इवानव्ना ने नज़र उठाई और मुझे देखा. मैंने फ़ौरन पूछा:  “क्या मैं अन्दर आ सकता हूँ, रईसा इवानव्ना ?”  “आह, ये तू है, डेनिस्का,” रईसा इवानव्ना  ने कहा. “आ जा! इंटरेस्टिंग, तू कहाँ ग़ायब हो गया था?” 

मैं क्लास में घुसा और अलमारी के पास रुक गया. रईसा इवानव्ना  ने मेरी तरफ़ देखा और ‘आह-आह’ करने लगी:  “ये क्या हाल बना रखा है? तू कहाँ से लोट-लोट के आ रहा है? आँ?  संक्षेप में बताओ!” 

मैंने तो अभी तक कुछ सोचा ही नहीं था, और मैं संक्षेप में जवाब नहीं दे सकता, बल्कि हर चीज़ विस्तार से बताने लगा, जिससे कि समय खिंचता जाए: ”मैं, रईसा इवानव्ना , अकेला नहीं था...मैं और मीश्का...हम दोनों थे...तो, ऐसा हुआ. ओहो!...कैसा तो हुआ. ऐसे और वैसे! वगैरह, वगैरह.” रईसा इवानव्ना  बोलीं:

 “क्या-क्या? तू थोड़ी साँस ले ले, शांत हो जा, धीरे-धीरे बोल, वर्ना तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है! क्या हुआ था? तुम लोग कहाँ थे? बोल, तो सही!” मुझे बिल्कुल भी नहीं मालूम था कि कहना क्या है. मगर बोलना तो पड़ेगा. मगर बोलूँगा क्या, जब बोलने के लिए कुछ है ही नहीं? तो मैं कहने लगा:  “मैं और मीश्का. हाँ. वो...जा रहे थे, जा रहे थे. किसी को नहीं छू रहे थे. हम स्कूल जा रहे थे, जिससे कि देर न हो जाए. और अचानक - ऐसी बात! ऐसी बात हुई, रईसा इवानव्ना , कि बस हो-हो-हो! ओह, तू! आय-आय-आय.”

 अब तो क्लास में सब हँसने लगे और शोर मचाने लगे. वालेर्का तो ख़ास तौर से ख़ूब ज़ोर से हँस रहा था. क्योंकि उसे अपने ‘चूज़ों’ के लिए ‘वेरी पुअर’ ग्रेड मिलने का आभास हो गया था. मगर, अब क्लास में पाठ रुक गया था, और मेरी तरफ़ देखकर ठहाके लगाए जा सकते थे. वो लोटपोट होने लगा. मगर रईसा इवानव्ना  ने जल्दी से इस ‘बज़ार’ को बन्द कर दिया.  “धीरे,” उन्होंने कहा, “चल, बात को समझने की कोशिश करते हैं! कराब्ल्योव ! जवाब दे, तुम लोग कहाँ थे? मीशा कहाँ है?” मेरे दिमाग़ में इन सब कारनामों से उथल-पुथल होने लगीं, और मैंने फ़ौरन बक दिया:  “वहाँ आग लगी थी!” सब लोग फ़ौरन चुप हो गए. रईसा इवानव्ना का मुँह बदरंग हो गया और वो बोलीं:  “कहाँ थी आग?” मैंने कहा:  “हमारे घर के पास. कम्पाऊण्ड में. आऊट-हाऊस में. धुआँ निकल रहा है – घने-घने बादलों की तरह. और मैं और मीश्का उसके नज़दीक से गुज़र रहे हैं...क्या कहते हैं...पिछले प्रवेश द्वार के पास से! इस दरवाज़े पर किसी ने बाहर से लकड़ी का बोर्ड लगा दिया था. तो ये बात थी. हम जा रहे हैं! और वहाँ से निकल रहा है धुआँ! और कोई बारीक आवाज़ में चीख रहा है. उसका दम घुट रहा है. तो, हमने बोर्ड हटाया, और वहाँ है एक छोटी बच्ची. रो रही है. उसका दम घुट रहा है. हमने उसके हाथ-पैर पकड़े – बचा लिया. तभी उसकी मम्मा भागी-भागी आई और बोली: “तुम लोगों का उपनाम क्या है, बच्चों? मैं अख़बार में तुम्हारे बारे में ‘थैन्क्स’ लिखूँगी”. मैंने और मीश्का ने कहा: “ये आप क्या कह रही हैं, इतनी छोटी बच्ची के लिए थैन्क्स की कोई बात ही नहीं है! थैन्क्स की कोई ज़रूरत नहीं है. हम शर्मीले टाइप के लड़के हैं”. बस. और मैं और मीश्का वहाँ से निकल गए. क्या मैं बैठ सकता हूँ, रईसा इवानव्ना ?”

 वो उठकर मेज़ के पीछे से बाहर निकलीं और मेरे पास आईं. उनकी आँखों में गंभीरता थी और उनमें सुख की भावना थी. उन्होंने कहा:  “कितनी अच्छी बात है! मैं बहुत, बहुत ख़ुश हूँ, कि तुम और मीश्का इतने बहादुर हो! जा बैठ. बैठ जा. बैठ ना...” मैंने देखा कि वो मुझे सहलाना और ‘किस’ करना चाहती थीं. मगर मुझे ये सब अच्छा नहीं लग रहा था. मैं चुपचाप अपनी जगह पे गया, पूरी क्लास मेरी ओर देख रही थी, जैसे मैंने सचमुच में कुछ ‘ख़ास’ किया हो. मेरी रूह को जैसे बिल्लियाँ खरोंच रही थीं. मगर तभी दरवाज़ा खुला, और देहलीज़ पे दिखाई दिया मीश्का. सब मुड़े और उसकी ओर देखने लगे. रईसा इवानव्ना  ख़ुश हो गईं.                  “अन्दर आ जा,” उन्होंने कहा, “अन्दर आ, मीशुक, बैठ, बैठ जा, बैठ ना, शांत हो जा. तू भी शायद बेहद परेशान हुआ था.”

 “और नहीं तो क्या!” मीश्का कहने लगा. “डर रहा था कि आप गुस्सा हो जाएँगी.”  “हूँ, जब तेरे पास कोई वाजिब कारण है,” रईसा इवानव्ना  ने कहा, “तो, तुझे परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं थी. आख़िर तूने और डेनिस्का ने एक इन्सान को बचाया है. रोज़ रोज़ तो ऐसा नहीं होता.” 

मीश्का ने अचरज से मुँह भी खोल दिया. ज़ाहिर था, कि वो पूरी तरह भूल गया था कि हमने किस बारे में बात की थी.  “इ-इ-इन्सान को?” मीश्का बोलने लगा, वो हकला भी रहा था. “ब-ब-बचाया? मगर क-क-किसने बचाया?” अब मैं समझ गया कि मीशा सब गुड़-गोबर कर देगा. मैंने उसकी मदद करने का फ़ैसला किया, जिससे उसे झंझोडूँ और उसे याद आ जाए, और मैं उसकी तरफ़ देखकर बड़े प्यार से मुस्कुराया और बोला:  “कुछ नहीं कर सकते, मीश्का, ये नाटक बन्द कर...मैंने सब कुछ बता दिया है!” 

मैं उसे आँखों से इशारे कर रहा था, कि मैंने झूठ बोल दिया है, और वो भंडा न फ़ोड़ दे! मैं उसे आँख़ मार रहा था, दोनों आँखों से, और अचानक मैंने देखा – उसे याद आ गया था! मैंने फ़ौरन अंदाज़ा लगा लिया कि आगे क्या करना है! हमारे प्यारे मीशेन्का ने आँखें झुका लीं, जैसे दुनिया में मम्मा का सबसे शर्मीला बच्चा हो, और इतनी बेसुरी, शराफ़त भरी आवाज़ से बोलने लगा.

 “तूने ऐसा क्यों किया! छोटी सी बात...”

वो असली आर्टिस्ट के समान लाल भी हो गया. ओय, तू भी न, मीश्का! मुझे उससे इसकी उम्मीद नहीं थी. वो अपनी सीट पे यूँ बैठ गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो और नोट-बुक खोलने लगा. सारे लोग इज़्ज़त से उसकी तरफ़ देख रहे थे, और मैं भी. शायद, बात यहीं ख़तम भी हो जाती, मगर तभी जैसे शैतान ने मीश्का की ज़ुबान खींची, उसने चारों तरफ़ देखा और बिना बात के बोल पड़ा;

 “वो बिल्कुल भी भारी नहीं था. क़रीब दस-पन्द्रह किलो, इससे ज़्यादा नहीं...” रईसा इवानव्ना  ने पूछा:  “कौन? कौन भारी नहीं था, दस-पन्द्रह किलो का?”

 “वही लड़का.”

 “कौन सा लड़का?”  “वही, जिसे हमने बर्फ की पर्त के नीचे से बाहर खींचा था...” ”तू कुछ गड़बड़ कर रहा है,” रईसा इवानव्ना  ने कहा, “वो तो लड़की थी ना! और फिर वहाँ बर्फ की जमी हुई सतह कहाँ से आई?” मीश्का अपना ही राग अलापे जा रहा था:

 “कैसे – कहाँ से बर्फ? सर्दियों का मौसम है, इसीलिए जमी हुई बर्फ की पर्त है! पूरा ‘चिस्तिये प्रूदी’ तालाब जम गया है. मैं और डेनिस जा रहे हैं, सुनते क्या हैं – कि टूटी हुई बर्फ के नीचे से कोई चिल्ला रहा है. हाथ-पैर मार रहा है और चीं-चीं कर रहा है. खुरच रहा है, हिल रहा है और हाथों से उसे पकड़ रहा है. ऊह, बर्फ भी कैसी! बर्फ़, बेशक, टूट रही थी! तो, मैं और डेनिस रेंगते हुए वहाँ पहुँचे, इस लड़के को हाथों से, पैरों से पकड़ा – और खींच लिया किनारे पे. तभी उसके दादा भागते हुए वहाँ पहुँचे, ख़ूब आँसू बहा रहे थे... 

अब मैं कुछ भी नहीं कर सकता था: मीश्का ऐसे झूठ बोले जा रहा था, जैसे लिख कर लाया हो, मुझसे भी ज़्यादा अच्छा. क्लास में सब समझ गए कि वो झूठ बोल रहा है, और ये कि मैं भी झूठ बोला था, और मीशा के हर शब्द के बाद सब लोट-पोट हो रहे थे, मैं उसे इशारे किए जा रहा था, जिससे वो चुप हो जाए और ये झूठ बन्द करे, क्योंकि वो, वैसा झूठ नहीं बोल रहा था, जैसा बोलना चाहिए था, मगर कहाँ! मीश्का ने मेरे इशारों को देखा ही नहीं और तोते की तरह बके जा रहा था:  “तो, उस दद्दू ने हमसे कहा: “इस बच्चे की ख़ातिर मैं तुम्हें घड़ी प्रेज़ेंट करता हूँ”. हमने कहा: “ज़रूरत नहीं है, हम बड़े शर्मीले लड़के हैं!” अब मैं अपने आप को रोक नहीं पाया और चिल्लाया: 

 “मगर ये आग थी! मीश्का गड़बड़ा गया है!”

 “तेरा दिमाग़, क्या सरक गया है? बर्फ के छेद में आग कैसे हो सकती है? तू ही सब भूल गया है.” 

 क्लास के लड़के तो ठहाके मार-मार के जैसे बेहोश होने लगे, जैसे मर रहे हैं. रईसा इवानव्ना ने इत्ती ज़ो-र से मेज़ थपथपाई! सब चुप हो गए. मीश्का वैसे ही खड़ा रहा- मुँह खोले. रईसा इवानव्ना ने कहा:  “झूठ बोलते हुए शर्म नहीं आती! कितने शर्म की बात है! मैं तो इन्हें अच्छे लड़के समझती थी!...अपना पाठ जारी रखते हैं.” 

सबने एकदम हमारी ओर देखना बन्द कर दिया. क्लास में शांति और कैसी-तो उकताहट थी. और, मैंने मीश्का को चिट्ठी दी: देख रहा है ना, सच ही बोलना चाहिए था!” उसने जवाब लिखा: “हाँ, बेशक! या तो सच बोलो या फिर ज़्यादा अच्छी तरह तय करके बोलो”. 


*******












57.

जब मैं अंकल मीशा के घर गया  

एक बार ऐसा हुआ कि हफ़्ते भर में मुझे लगातार कई दिनों की छुट्टियाँ आ गई, और पूरे हफ़्ते मेरे पास करने के लिए कुछ भी नहीं था. हमारे स्कूल के टीचर्स जैसे एक साथ बीमार हो गए. किसी को एपेन्डिसाइटिस, किसी को फ्लू, किसी को टॉन्सिल्स. पढ़ाने वाला कोई था ही नहीं. तभी मीशा अंकल आए. जब उन्होंने सुना कि मैं पूरे हफ़्ते आराम कर सकता हूँ, तो सीधे छत तक उछल गए, और फिर मम्मा के पास बैठकर उससे भेदभरी आवाज़ में बोले:  “मेरे पास एक आइडिया है!” मम्मा ने फ़ौरन मुझे अपने पास खींचा.  “बोलो,” उसने कुछ नाराज़ सुर में कहा.

यही तो बात है – आदमी अपनी बात पूरी कर ही नहीं पाता, और मम्मा को अच्छा नहीं लगता. मुसीबत! हमेशा ऐसा ही होता है! बिल्कुल पनिशमेन्ट! मगर मैं ख़ामोश रहा, और अंकल मीशा ने कहा:  “आज मैं वापस जा रहा हूँ. मैं डेनिस्का को अपने साथ ले जाऊँ? घूम आएगा! लेनिनग्राद देख लेगा, ख़ूबसूरत शहर, क्रांति का उद्गम स्थल, नेवा नदी पर ऐतिहासिक जहाज़ अव्रोरा खड़ा है, बिल्कुल ज़िन्दा जहाज़ जैसा, पता है कितना दिलचस्प है!” मम्मा ने भँवें चढ़ाईं और बोली:  “और वापस कैसे आएगा?”  “मैं उसे रिसीव कर लूँगा,” पापा ने कहा. “तो! कहो ‘हाँ’ और इनाम में हम तुम्हें ‘किस’ करेंगे.”

 

 और वो लपके मम्मा को ‘किस’ करने के लिए. उसने हाथ झटके और बोली: ”बदमाश कहीं के!” फिर आगे कहा: “मेरा क्या, जाइए,” और गहरी साँस ली. 

मैं अंकल मीशा के साथ निकल पड़ा. लेनिनग्राद के रास्ते के बारे में मैं कुछ नहीं बता सकता, क्योंकि ट्रेन चली थी रात को ग्यारह पचास पे, और मैं फ़ौरन सो गया, मुर्दे की तरह. कम्पार्टमेंट में सिर्फ सुबह ही नज़र दौड़ाई, और मुझे सब कुछ बहुत अच्छा लगा. टॉयलेट, और कॉरीडोर, और ऊपर वाली बर्थ पे जाने के लिए छोटी सी सीढ़ी. अंकल मीशा ने कहा:  “तो? अब अपने चचेरे भाई दीम्का से मिलेगा. आख़िर उससे तेरी मुलाक़ात हो जाएगी!”

हम रेल्वे स्टेशन से बाहर आए और ट्रॉलीबस में बैठे, और चले भी नहीं थे कि पता चला कि हमें उतरना है. 

हम भागकर दूसरी मंज़िल पर चढ़े और दरवाज़ा खोला, वहाँ कोई लड़का बैठा था और गरम-गरम समोसे खा रहा था. वो सरका और मुझसे बोला:  “चल, मेरा साथ दे!” मैं उसके पास बैठ गया और जल्दी ही उससे दोस्ती कर ली. ”तू स्कूल क्यों नहीं गया?” अंकल मीशा ने पूछा. 

 “आज पापा आ रहे हैं!” दीम्का ने जवाब दिया और मुस्कुराया. वो और ज़्यादा प्यारा लगने लगा. “अकेले नहीं, बल्कि भाई के साथ. तो, कैसे? मिलना है ना!” 

अंकल मीशा खिलखिलाए और अपने कारख़ाने चले गए. दीम्का दरवाज़े तक उनके साथ गया, और हम, कुछ और समोसे खाकर, फ़ौरन लेनिनग्राद देखने निकल पड़े. दीम्का को वो मुँह ज़ुबानी याद था, और सबसे पहले हम नेवा की तरफ़ भागे – कितनी चौड़ी है. हम किनारे पे दौड़ते रहे, कोई भी रास्ता पार नहीं किया, और अचानक देखा – जहाज़ खड़ा है, और उस पर पूरा काम हो रहा है. हर चीज़ ‘नेवी’ जैसी – नाविक, फ्लैग्स, और जहाज़ पे लिखा था: “अव्रोरा”. दीम्का ने कहा:  “देख, कैसा जहाज़ है.”

मैंने कहा; ”अव्रोरा”. दीम्का ने कहा: “क्या जहाज़ है...इसने अक्टूबर क्रांति में हिस्सा लिया था!”  मेरी साँस रुकने लगी, कि मैं अपनी आँखों से ‘अव्रोरा’ देख रहा हूँ. मैंने इस जहाज़ के सम्मान में अपनी कैप उतार दी.

फिर दीम्का और आगे की तरफ़ दौड़ा, और मैं – उसके पीछे. लेनिनग्राद को जानना दिलचस्प है. हम बसों में बैठे, और कहीं उतरे, और फिर से बसों में बैठे. हमने पूश्किन का स्मारक देखा एक छोटे से गोल स्क्वेयर पे. पूश्किन छोटा था, वैसा नहीं, जैसा हमारे मॉस्को में है - पूश्किन स्क्वेयर पे. नहीं, इससे क्या मुक़ाबला! यहाँ वो हमारे वाले पूश्किन से ज़्यादा जवान था, मानो दसवीं क्लास का स्टूडेंट हो. वो छोटा था, मगर बेहद ख़ूबसूरत और बेहद प्यारा था. मगर तभी दीम्का ने कहा:  “मुझे भूख लगी है,” और वो किसी दरवाज़े के अन्दर चला गया. मैं – उसके पीछे. देखो, इसे अभी से भूख लग गई! अभी अभी तो मन भर समोसे खाए हैं और अभी से! इसे भूख लग गई! क्या छोकरा है! ऐसे लड़के के साथ तुम सुरक्षित रहोगे.

और, हम एक बड़े हॉल में घुसे, जिसमें मेज़ें लगी हुई थीं. ये एक कैफ़े था. हमने ‘पाइज़’ खाईं – ऐसी ट्यूब जैसी जिनमें माँस भरा होता है, पैनकेक्स जैसी. ओह, कितनी स्वादिष्ट थीं! इसके बाद एक-एक और ली, फिर तीसरी भी ली. इसके बाद, जब खा चुके, तो दीम्का ने शान से पूछा: 

“हमें कितना देना है?”

उसने पैसे दिए, मैं भौंचक्का सा उसकी ओर देख रहा था. वह मुस्कुराया:  “क्या देख रहा है? ये पापा ने मुझे पैसे दिए थे, ख़ास तौर से इसलिए कि तुझे खिलाऊँ. आख़िर तू हमारा मेहमान है, सही है ना?”    और जब हम घर जा रहे थे, तो दीम्का ने कहा:  “अब कुछ खा लेंगे, और फिर एर्मिताझ.” मैंने कहा:  “फिर खा लेंगे? तेरे क्या दो पेट हैं? और फिर, मैं एर्मिताझ पहले ही जा चुका हूँ. मॉस्को में. मैंने वहाँ सर्दियों में टीलों से स्केटिंग की थी. जब दूसरी क्लास में था, तभी!” दीमा का मुँह लाल हो गया:  “ये तू क्या कह रहा है, तुझे पता नहीं है कि तुम्हारा मॉस्को का एर्मिताझ – ये सिर्फ चिल्ड्रेन्स पार्क है, मगर हमारे लेनिनग्राद में एर्मिताझ - चित्रों की गैलरी है! म्यूज़ियम, समझा?” 

और जब हम स्क्वेयर पे स्थित ख़ूबसूरत घर की ओर आये और मैंने देखा कि छत को विशालकाय पुतलों ने थाम रखा है, तो मैं अचानक समझ गया कि बेहद थक गया हूँ, और मैंने दीम्का से कहा:  “ऐसा करें, कि चित्रों की गैलरी कल देखते हैं?आँ? वर्ना, मैं तो बहुत थक गया हूँ. बड़ी देर से चल रहे हैं.” दीम्का ने मेरा हाथ पकड़ा और पूछा:  “क्या ट्राम तक चल सकते हो?”

मैंने सिर हिलाया, और हम जल्दी ही ट्राम-स्टॉप पे पहुँच गए और चल पड़े. पता चला कि ट्राम में काफ़ी देर तक सफ़र करना पड़ा. 

शाम को मेरी आँखें अपने आप बन्द हो रही थीं. गाल्या आण्टी ने कॉट बिछा दी और मैं फ़ौरन सो गया. सुबह दीम्का मेरा पैर पकड़ कर कॉट से खींचने लगा:  “उठ जा, स्लीपिंग जैक!” मैंने पूछा: ”क्या सुबह हो गई?” दीम्का ने कहा:  “सुबह, सुबह! जल्दी से उठ, एर्मिताझ भागना है!” जब हम सब ब्रेकफ़ास्ट कर रहे थे, तो दीम्का बार-बार दुहरा रहा था: “चल, जल्दी!” गाल्या आण्टी ने कहा:  “दीमा, डेनिस्का के पीछे न पड़, उसके गले में निवाला अटक रहा है. और वैसे भी, थोड़ा इंतज़ार तो कर सकता है.”

और उसने किसी मक़सद से उसकी ओर देखा. दीम्का ने कहा:  “इंतज़ार किस बात का? जितनी जल्दी हो सके भागना चाहिए!” अंकल मीशा और गाल्या आण्टी मुस्कुराने लगे. इसी समय घण्टी बजी. दीम्का ने मुँह बनाया, जैसे अचानक उसके सारे दाँत दर्द करने लगे हों. उसने कहा:  “हो गया. नहीं निकल पाए.” 

गाल्या आण्टी दरवाज़ा खोलने गई, और हमने छोटी लड़कियों की आवाज़ें, हँसी और गाल्या आण्टी की आवाज़ सुनीं:

 “दीमच्का! तेरे टीचर्स आ गए.”   “दीम्का, तू क्या पढ़ाई में पिछड़ गया है?” तभी कमरे में दो लड़कियाँ आईं. एक लाल थी, उसकी भौंहे लाल थीं और पलकें भी लाल; और दूसरी कुछ अजीब थी. उसकी आँखें खूब लम्बी थीं, बिल्कुल कनपटियों तक पहुँच रही थीं. मैंने कहा:  “दीम्का, इस साँवली की आँखें कित्ती बड़ी-बड़ी हैं!”  “आ!, दीम्का ने कहा. “ये ईर्का रोदिना है. मिलों!”

लड़कियों ने दीम्का को जल्दी से ‘लेसन’ समझा दिया और हम सब मिलकर एर्मिताझ गए. 

मुझे एर्मिताझ में बहुत अच्छा लगा. वहाँ इतने ख़ूबसूरत हॉल्स हैं और सीढ़ियाँ हैं! जैसे कि राजाओं और राजकुमारियों वाली किताबों में होता है. चारों ओर तस्वीरें लटक रही हैं. मैं हॉल्स में घूमते-घूमते थक गया, अचानक मेरी नज़र एक तस्वीर पर पड़ी और मैं उसके पास गया. उसमें दो आदमी दिखाए गए थे, बूढ़े ही थे, एक गंजा, दूसरा दाढ़ी वाला. एक के हाथ में किताब थी, और दूसरे के हाथ में चाभी. उनके चेहरे बड़े ग़ज़ब के थे, उदास, थके हुए मगर फिर भी कोई शक्ति थी उनमें. तस्वीर कुछ असाधारण रंग में बनाई गई थी, मैंने ऐसा रंग पहले कभी नहीं देखा था. मैं खड़ा होकर इस तस्वीर को देखने लगा, और दीम्का और लड़कियाँ भी देख रहे थे. हम सब खड़े थे और देख रहे थे. फिर मैं उसके और नज़दीक गया. वहाँ रखी प्लेट पर लिखा था: “एल् ग्रेको”. 

मैं उछल पड़ा! एल् ग्रेको! मैंने उसके बारे में पढ़ा था, ये क्रीट द्वीप का था. उसका असली नाम था दोमेनिको तियोतोकोपूली. ये बहुत बढ़िया कलाकार था! मैंने कहा: ”कितनी अच्छी तस्वीर है!”  “अब तू समझा,” दीम्का ने कहा. “कि एर्मिताझ क्या होता है! ये कोई टीले से स्केटिंग करने की जगह नहीं है!” और, ईर्का रोदिना ने कहा: ”इस तस्वीर के रंग ऐसे हैं, जैसे हीरे-जवाहरात हों...” मुझे अचरज भी हुआ. बच्ची है, और वो भी समझती है! फिर हम उस हॉल में आए, जहाँ इजिप्ट के फूलदान रखे हैं. इन फूलदानों पर सब लोग एक साइड से दिखाए गए थे, और उनकी आँखें लम्बी-लम्बी थीं. कनपटियों तक. मैंने कहा;  “देख, दीम्का, ईर्का रोदिना की आँखें वैसी ही हैं, जैसी फूलदान पे हैं.”

दीम्का मुस्कुराया:  “हमारी ईर्का – आँखों वाला फूलदान है!” 

मैं और दीम्का और भी बहुत सारी जगहों पर गए. हम रूसी म्यूज़ियम में गए, और पूश्किन के फ्लैट में गए. इसाकोव्स्की चर्च के गुम्बद पे गए और त्सार्स्कोए-सेलो भी गए वहाँ अंकल मीशा हमें ले गए. 

जब मैं मॉस्को वापस लौटा तो मम्मा ने पूछा: 

 “तो, ट्रेवलर, तुझे लेनिनग्राद कैसा लगा?” मैंने कहा:  “मम्मा! वहाँ खड़ा है जहाज़ ‘अव्रोरा!’ सचमुच का, पता है, वही वाला! और एर्मिताझ में कलाकार एल् ग्रेको की तस्वीर है. और तू और भी पूछेगी! वहाँ मैं एक लड़की से भी मिला. उसका नाम है ईरा रोदिना. उसकी आँख़ें बिल्कुल वैसी ही हैं, जैसी इजिप्शियन फूलदान पे थीं, सही में! मैं उसे ख़त लिखूँगा.” पापा ने पूछा:  “तूने इस बेक्की थेचेर का पता लिया?” मैंने कहा:  “ओय, भूल गया...” पापा ने मेरी नाक पर टक-टक  किया:  “ऐह, तू, बुद्धू!” मैंने कहा:  “कोई बात नहीं, पापा! मैं दीम्का को लिखूँगा, और वो मुझे उसका पता देगा. मैं उसे ज़रूर ख़त लिखूँगा!” 

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58.

व्हाइट फ़िन्चेज़*


हमारी बिल्डिंग के पास एक इश्तेहार लगा, इत्ता सुन्दर और चटकदार, कि उसे देखे बिना वहाँ से गुज़र ही नहीं सकते. उसमें अलग अलग तरह के पंछियों के चित्र बने थे और लिखा था: ‘गाने वाले पंछियों की नुमाइश’. मैंने फ़ौरन तय कर लिया कि ज़रूर जाकर देखूँगा कि ये कौन सी नई चीज़ है.

 

और, सण्डे को क़रीब दो बजे, मैं तैयार हुआ, मैंने गरम कपड़े पहने और मीशा को फ़ोन किया, जिससे उसे भी साथ ले चलूँ. मगर मीश्का भुनभुनाया कि उसे मैथ्स में ‘2’ नंबर मिले हैं – ये है पहली बात; और उसके पास जासूसों के बारे में नई किताब आई है – ये है दूसरी बात. 

तब मैंने अकेले जाने का फ़ैसला किया. मम्मा ने ख़ुशी ख़ुशी मुझे जाने दिया, क्योंकि मैं उसके सफ़ाई के काम को डिस्टर्ब कर रहा था, और मैं चल पड़ा. गाने वाले पंछी दिखाए जा रहे थे पीपल्स एक्ज़िबिशन में, और मैं आराम से वहाँ मेट्रो से पहुँच गया. काऊंटर के पास क़रीब-क़रीब कोई नहीं था, मैंने खिड़की में बीस कोपेक का सिक्का बढ़ाया, मगर कैशियर ने मुझे टिकट के साथ दस कोपेक भी लौटाए, इसलिए कि मैं स्कूल का स्टूडेंट हूँ. ये मुझे बहुत अच्छा लगा. ये तो ऐसा हुआ कि मुझे दस कोपेक इसलिए दिए जा रहे हैं, कि मैं तीसरी क्लास में पढ़ता हूँ, दस कोपेक और टिकट! मुझे ऐसे कन्सेशन के बारे में पता नहीं था! अब, ऐसे नियमों की बदौलत मुझे अलग-अलग तरह की एक्ज़िबिशन्स और ‘शो’ज़ में जाना पड़ेगा! इस तरह से मैं कैमेरे के लिए पैसे जमा कर सकता हूँ! मतलब, यदि कैमेरा 40 रूबल्स का है, तो, वेरी सिम्पल, मुझे चार सौ एक्ज़िबिशन्स में जाना होगा, और काम ख़तम! बिल्कुल ठीक. मेरे पास अपना कैमेरा होगा! ये सोचकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई, और मैं बड़े अच्छे मूड में पंछियों की तरफ़ गया. चारों ओर कई तरह के छोटे-छोटे घर थे, कुछ टॉवर्स जैसे, कुछ महलों जैसे, कुछ किसी के भी जैसे नहीं थे. ये सब एक्ज़िबिशन की पेविलियन्स थीं. कुछ मम्मियाँ और पापा लोग अपने बच्चों को त्रोयका में घुमा रहे थे, क्योंकि इस समय यहाँ विन्टर-फ़ेस्टिवल चल रहा था और घोड़ों तथा रेन्डियर्स पर घूमना संभव था. दुख कि बात ये थी कि इस घुड़सवारी के लिए लाइन बेहद लम्बी थी, और हालाँकि मैं उसमें कुछ देर खड़ा रहा, मगर मुझे फ़ौरन समझ में आ गया कि अगर ये ऐसा ही रहा तो मेरा नम्बर, शायद, क़रीब डेढ़ हफ़्टे बाद आएगा, और मुझे तो गाने वाले पंछियों को देखना था. इसलिए मैं घोड़ों और रेन्डियर्स को धता बता कर आगे चल पड़ा. ‘इलेक्ट्रोनिक’ वाली पेविलियन के पास आते आते मैं थक गया. तब मैंने पास ही से जाती हुई एक लड़की से पूछा:  “क्या गाने वाले पंछियों की पेविलियन अभी काफ़ी दूर है?”

उसने हाथ से दिखाते हुए कहा;  “देख, ये पास में ‘सुअर-पालन’ की पेविलियन देख रहा है? वहीं तेरे पंछी हैं. जल्दी जा.”

मैं ‘सुअर-पालन’ वाली पेविलियन में गया. जैसे ही मैंने दरवाज़ा खोला, मैं समझ गया कि यहाँ आना बेकार नहीं गया. मेरे आस-पास, दीवारों पे, चारों तरफ़, क़रीब-क़रीब छत तक, एक के पीछे एक, क्यूबिकल्स के समान छोटॆ-छोटे पिंजरे रखे थे. हर पिंजरे में एक-एक पंछी था. वे सब एक साथ गा रहे थे. कोरस में. मगर हर पंछी का अपना-अपना गाना था. कोई ‘चिरिक-चिरिक’, कोई ‘फ़्यू-फ़्यू’, कोई ‘चेकि-श्येक’, और कोई ‘पी-पी-पी’. सब मिलाकर हमारी क्लास जैसा लग रहा था, सुबह, रईसा इवानव्ना  के आने तक, तब हम भी अपना अपना राग अलापते हैं. और फिर, ये पंछी इत्ते ख़ूबसूरत थे कि मैं सोच भी नहीं सकता था. मैंने कभी पास से ऐसे पंछियों को नहीं देखा था. पास से मैंने सिर्फ चिड़ियों को देखा था.  बेशक, चिड़िया भी बहुत ख़ूबसूरत और प्यारी होती हैं, इसपे बहस नहीं हो सकती, मगर यहाँ तो आश्चर्यजनक पंछी थे, जिन्हें कभी देखा ही नहीं था. मिसाल के तौर पे, ये है बुल्फ़िन्च. अकडू, खाया- पिया, गोल-मटोल, न किसी से कुछ लेना, न देना, ढलते हुए लाल सूरज की रोशनी में तैरते हुए साबुन के बुलबुले जैसा. यहीं टेढ़ी चोंच वाले क्रॉसबिल्स थे, फूले गालों वाले टिटमाऊस थे, और वार्ब्लर पंछी -  देखने में इतने ताज़ा तरीन और इतने फूले-फूले कि लगता था, इन्हें ज़िन्दा ही खा जाओगे... बेशक, ये मैं मज़ाक में कह रहा हूँ... ठनठनाती आवाज़ वाली पिलक चिड़िया थी, मज़बूत और हरी-हरी, दलदल जैसी, और थे काले रॉबिन पंछी. एक पूरा कॉरीडोर कबूतरों से भरा था. हालाँकि वो गाने वाले पंछी नहीं हैं, मगर उन्हें इन सबके साथ जानबूझकर रखा गया था. क्योंकि यदि कबूतर जैकोबियन है, तो वो भी ख़ूबसूरती में अन्य पंछियों के मुक़ाबले में कम नहीं है. वो एस्टर जैसा होता है और अलग-अलग रंगों का होता है: सफ़ेद, हल्का गुलाबी-जामुनी, और भूरा. वण्डरफुल! और काली पूँछ वाले ‘मॉन्क्स’! भयानक आँखों वाले ड्रैगन्स! और डाक ले जाने वाले जो ‘वोल्गा’ की स्पीड से उड़ते हैं! ग़ज़ब!

न गाने वाले, मगर आश्चर्यचकित करने वाले पंछियों के बीच दो किस्म के तोते थे. एक था सफ़ेद, बड़ा उसे, कॉकटू कहते हैं. उसकी नाक डिब्बा खोलने वाले ओपनर जैसी होती है, और खोपड़ी से हरी प्याज़ का गुच्छा निकल रहा होता है. दूसरा था क्यूबा का अमाज़ोन. क्यूबा का! हरा! उसके सीने पे लाल टाई थी, जैसे पायनियर्स बच्चे लगाते हैं. वो पूरे समय मेरी ओर देख रहा था, और मैं भी उसे देखकर मुस्कुरा रहा था, जिससे कि उसे पता चले कि मैं उसका दोस्त हूँ. मगर इस लाजवाब पैविलियन में यही सबसे ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं था. बात ये थी कि वहाँ एक छोटा सा कोना था, और धीरे धीरे, एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे की ओर जाते हुए मैं वहाँ भी पहुँचा, बिल्कुल न जानते हुए, कि यहीं तो है, यहीं तो रखा गया है सबसे क़ीमती ख़ज़ाना.  

यहाँ लोगों के झुण्ड के झुण्ड खड़े थे. लोग यहाँ से हट ही नहीं रहे थे और ज़रा भी शोर नहीं कर रहे थे, बल्कि चिपक-चिपक कर लाइनों में खड़े थे. मैं भी हौले से इन झुण्डों में स्क्रू की तरह गोल-गोल घूमते हुए घुस गया और धीरे-धीरे सबसे आगे वाली लाइन में आकर खड़ा हो गया. ये फिन्च पंछी थे. छोटे-छोटे, बर्फ के सफ़ेद गोलों जैसे, बेरों जैसी चमकदार चोंच वाले, आधी उँगली के साइज़ के. ये कहाँ से आए थे? शायद, वो आसमान से गिरे थे. शायद बारिश जैसे गिरे थे, और फिर ज़िन्दा हो गए, बर्फ़ीले टीलों से बाहर आ गए और हमारे कम्पाऊण्ड में, गलियों में, खिड़कियों के सामने उड़ने लगे, घूमने लगे और अंत में ‘सुअरपालन’ वाली इस पेविलियन में घुस गए, और अब थक गए हैं और अपने अपने घर में बैठ गए हैं, आराम फ़रमा रहे हैं. लोगों के झुण्ड उनके सामने खड़े हैं, चुपचाप, बिना हिले-डुले, और उनसे बेहद प्यार करते हैं. हाँ, हाँ. सब उनसे प्यार करते हैं. एकमत से. तभी सुनहरे दाँत वाली एक आण्टी अचानक बोल पड़ी:  “आह, कितने छोटे....दुबले-पतले... इन्हें कहाँ...” 

सबने बड़ी संजीदगी से उसकी ओर देखा, एक दद्दू ने टेढ़ा मुँह करके ज़हरीले अंदाज़ में कहा:  “बेशक, मुर्गी – वो भी इनसे मोटी...”

सबने फिर से आण्टी के सुनहरे दाँत की ओर देखा, वो लाल हो गई और चली गई. और हम सब, जो वहाँ खड़े थे, समझ गए कि आण्टी की कोई गिनती ही नहीं थी, क्योंकि वो हमारे ग्रुप की नहीं थी. हम उसी तरह से चुपचाप काफ़ी देर तक खड़े रहे, पंछियों को देखने से मन ही नहीं भर रहा था. वो, ज़ाहिर है, किसी सातवें आसमान से आए थे, जादुई दुनिया से, जिसके बारे में एण्डरसन ने लिखा है. इत्ते छोटे, इत्ते कमज़ोर और इत्ते नाज़ुक थे ये पंछी, मगर, शायद इसी में इनकी शक्ति थी, इन छोटे-छोटे, कमज़ोर पंछियों की, कि हम उनके सामने स्तब्ध खड़े थे, जैसे ज़मीन में गड़ गए हों – क्या बच्चे और क्या बूढ़े. शायद हम यहाँ से कभी नहीं हटते, मगर तभी रेडिओ पे किसी की आवाज़ सुनाई दी:  “अटेन्शन, प्लीज़. अभी पेविलियन नं. 2 में गाने वाली कनेरीज़ की प्रतियोगिता होगी, ठीक दस मिनट बाद! कृपया पेविलियन नं. 2 में आइए!”

और दद्दू, जिसने आण्टी को चिढ़ाया था, मानो हड़बड़ाकर बोला:  “जाना चाहिए...सिम्योनवों के पंछियों का गाना सुनेंगे. उशाकवों के पंछियों का भी.” उसने मेरा कंधा छुआ: “चल, बच्चे...” और वो ख़ुद आगे बढ़ा, मैंने देखा कि उसका जूता पीछे से फ़ट रहा है, और उसमें से पुआल का गुच्छा बाहर निकल रहा है.

 पेविलियन नं. 2 में एक छोटा सा हॉल था, स्टेज था और कुर्सियाँ थीं. स्टेज पर, एक किनारे, अनाऊन्सर के लिए स्टेण्ड था, और बीच में – एक मेज़ थी, जिसके पीछे पंछियों के गाने की प्रतियोगिता के जज बैठे थे. मुझे बहुत अचरज हुआ, मगर आण्टी को सताने वाला दद्दू इस मेज़ के बीचों बीच बैठ गया. लगता है कि वो वहाँ प्रमुख था; मुझे नहीं मालूम, मगर जो लोग वहाँ बैठे थे, उन सबने हाथ मिलाकर उसका अभिवादन किया और वैसे भी वो उसका आदर कर रहे थे. जब सब शांत हो गए, तो इस दद्दू ने कहा:  “तो, सिम्योनव, चल, शुरू कर...” कहीं से एक ऊँचे अंकल निकल कर आए. उनके सीने पर बारह मेडल्स लटक रहे थे, मैंने गिन लिए. उनके हाथों में एक चपटी सूटकेस थी. उसने उसे खोला. सूटकेस में ख़ूब सारे छोटे-छोटे पिंजरे थे, और उनमें कनेरी पंछी थे. उसने एक पिंजरा बाहर निकाला, उसमें पीला-पीला ‘लिमोन’ फ़ुदक रहा था. सिम्योनव ने इस पिंजरे को अनाऊन्सर वाली डेस्क पर रखा. और लिमोन्चिक ने ऐसी पोज़ बनाई मानो वो वाक़ई में कुछ प्रस्तुत करने जा रहा हो, मगर चूँकि अभी उसके प्रोग्राम में पाँच मिनट बाकी हैं, इसलिए तब तक वो फ़ुदक रहा है. सब लोग एकदम ख़ामोश थे और इंतज़ार कर रहे थे कि लिमोन्चिक कब गाएगा. मगर उसका तो गाने का इरादा ही नहीं था. वो बस फुदक रहा था और अपने पंख फ़ड़फ़ड़ा रहा था. किसी ने पीछे से फुसफुसाकर कहा:  “अगर दस मिनट में इसने गाना शुरू नहीं किया, तो उसे प्रतियोगिता से बाहर कर देंगे. ऐसा है सिम्योनव.”

मगर लिमोन्चिक तो बस, यहाँ वहाँ फ़ुदके जा रहा था, फिर जैसे उसने फ़ैसला कर लिया, अपनी चोंच खोली, मगर, जैसे हम सबको चिढ़ा रहा था, उसने गाना शुरू नहीं किया और फिर से फुदकने लगा. मैं तो इंतज़ार करते-करते ‘बोर’ हो गया, और मैं वहाँ से जाने ही वाला था, मगर प्रमुख दद्दू ने अचानक कहा, और वैसे ही व्यंग्य से:  

 “तो, सिम्योनव, क्या ये कभी गाएगा? या शरमा रहा है? हो सकता है, कि आज उसका मूड न हो?” सब धीरे से हँस दिए, बेचारे सिम्योनव को देखने से दया आ रही थी. वो अपने लिमोन्चिक की तरफ़ झुका और अचानक चुपके से ‘सी...” करके सीटी बजाने लगा:  “सीसीसीसी....सीसीसीसी.....सीसीसीसी....”

लिमिन्चिक ने उसे ध्यान से सुना, अपनी चमकदार आँखों से उसकी ओर देखा, ज़ाहिर है, वो उसे पहचान गया था, फिर अपनी चोंच खोली, मगर फिर इरादा बदल दिया और दुबारा ऐसे फ़ुदकने लगा, जैसे कुछ हुआ ही न हो. दद्दू ने फ़ौरन कहा – उसे शायद मज़ाक करना अच्छा लगता था:  “इसकी आवाज़ ख़राब है...”

 दद्दू के शब्दों को सुनकर सिम्योनव रोने-रोने को हो गया. उसने एक तीली निकाली और उसे माचिस की डिब्बी पे घिसने लगा. मगर लिमोन्चिक ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई. उसने तीली की तरफ़ देखा भी नहीं. तब दद्दू ने हाथ से इशारा किया, कि सिम्योनव तीली घिसना बन्द करे, और ख़ुद लिमोन्चिक की ओर झुका, और अचानक मुश्किल से सुनाई दिया... वो चीं-चीं करके चहचहाया! हाँ! वो चहचहाने लगा, और लिमोन्चिक को जैसे इसी का इंतज़ार था, वो चौंक गया, सीधा हो गया, तन गया, सिकुड़ गया और गाने लगा!

वो बड़ी देर तक गाता रहा, बिना रुके, सीटी बजाते-बजाते, और खींच कर एक लाइन में गा रहा था, जैसे उस कविता में है : “ हज़ारों तरह से खींचा, खूब बरसा”, और जब गा रहा था तो और ज़्यादा सिकुड़ गया, जैसे पिघल रहा हो, और इस दौरान, जब वो गा रहा था, मैं भी उसके साथ गा रहा था, सिर्फ अपने आप में, भीतर से. मैं लिमोन्चिक के साथ गा रहा था, और देख रहा था सिम्योनव का चेहरा कैसे ख़ुशी से दमक रहा है, और लाल हो रहा है, और दद्दू के चेहरे पर थे गर्व के और व्यंग्य के भाव. उसने दिखा दिया कि वो अकेला ही पंछी को गाने के लिए मजबूर कर सकता है. और जब अंत में लिमोन्चिक ने गाना बन्द किया और सबने तालियाँ बजाईं, तो दद्दू कुर्सी की पीठ से टिक गए और लापरवाही से बोले:  “गोल्ड मेडल! हटा, सिम्योनव! इंटरवल.”

 सिम्योनोव ने लिमोन्चिक को डेस्क से हटा कर सूटकेस में छुपा लिया. साफ़ दिखाई दे रहा था, कि उसके हाथ थरथरा रहे हैं. चारों ओर बैठे हुए लोग उठ गए, शोर मचाने लगे और सिगरेट पीने के लिए चल दिए. 

इस पल मैं सोच रहा था कि अपने लोगों को ये सब बताना कितना अच्छा रहेगा, और मैं, ज़्यादा सोचे बगैर, मेट्रो की ओर भागा, और जब घर पहुँचा, तो पापा और मम्मा मेरा इंतज़ार ही कर रहे थे. पापा ने कहा:  “बता. अच्छा लगा?” मैंने कहा:  “बेहद!” मम्मा घबरा गई:  “ये तेरी आवाज़ कैसी निकल रही है? तुझे क्या हुआ है? तू सीसी क्यों कर रहा है?” मैंने कहा;  “क्योंकि मैं गा रहा था! मेरी आवाज़ बैठ गई और मैं सिसियाने लगा.” पापा चहके:  “तूने कहाँ गाया था, कज़्लोव्स्की?” मैंने कहा:  “मैंने कॉम्पिटीशन में गाया था!”  “बता, सारी बात बता!” मम्मा ने कहा. मैंने कहा:  “मैं कनेरी के साथ गा रहा था!” पापा फ़ौरन हँसते-हँसते लोट पोट हो गए.  “मैं कल्पना कर सकता हूँ,” उन्होंने कहा, “कितना बढ़िया रहा होगा! क्या तुझे ‘वन्स-मोर’ मिला था?”  “हँसो मत, पापा,” मैंने सिसियाते हुए कहा, “मैं अपने आप में गा रहा था. अपने भीतर.”  “आ! तब दूसरी बात है,” पापा कुछ शांत हुए, “तब थैन्क्स गॉड!”

मम्मा ने मेरे माथे पे हाथ रखा:  “कैसा महसूस कर रहा है?”  “वंडरफुल,” मैंने और ज़्यादा भर्राते हुए कहा और अचानक आगे कहा:   “और लिमोन्चिक को गोल्ड-मेडल मिला...”  “ये तो अनाप-शनाप बक रहा है,” मम्मा ने रुआँसे होकर कहा.  “उसका दिमाग़ अनुभवों से भर गया है,” पापा ने समझाया, “उसे गरम दूध दे, मिनरल वाटर के साथ. ये भर्राहट मुझे परेशान कर रही है...”

...रात को मैं बड़ी देर तक सो न सका, मैं इस असाधारण दिन को याद करता रहा: आश्चर्यजनक चीज़ों से भरी ‘सुअरपालन’ वाली पैविलियन, और दद्दू, और आण्टी, और सिम्योनव, और लिमोन्चिक, और सबसे ख़ास – मेरी आँखों के सामने छोटे-छोटे और हल्के बर्फ के गोले, सफ़ेद फिन्च उड़ रहे थे, वे मेरे दिल से चिपक गए थे, ये बेर जैसी चोंच वाले... और मैं पड़े-पड़े अंधेरे में देख रहा था, और जान गया था कि अब मैं उन्हें कभी नहीं भूलूँगा.

नहीं भूल सकूँगा. 

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* फ़िन्च – एक प्रकार का गाने वाला छोटा पक्षी. ये सफ़ेद, गुलाबी, सुनहरे आदि रंग़ों में पाया जाता है




59

दूरबीन 


मैं कमीज़ को घुटनों तक खींच कर खिड़की की सिल पे बैठा था, क्योंकि मेरी पतलून मम्मा के हाथ में थी.

 “नहीं,” मम्मा ने कहा और सुई धागा एक ओर सरका दिया. “मैं इस बच्चे की हरकतें और ज़्यादा बरदाश्त नहीं कर सकती!”  “हाँ,” पापा ने कहा और अख़बार रख दिया. “ उस पर जैसे शैतान सवार हो जाते हैं, वो फ़ेन्सिंग्स पे चढ़ जाता है, पेड़ों पे कूदता है और छतों पे भागता है. इसका दिल भी नहीं भरता!” पापा कुछ देर चुप रहे, गुस्से से मेरी ओर देखा और आख़िर में फ़ैसला सुनाया: ”आख़िरकार मैंने एक तरीका ढूँढ़ निकाला है, जो एक ही बार में हमेशा के लिए हमें मुसीबत से छुटकारा दिला देगा.”

 


“मैं जानबूझ कर नहीं करता,” मैंने कहा. “क्या मैं जानबूझ कर करता हूँ, हाँ? वो अपने आप हो जाता है.”  “बेशक, वो अपने आप ही होता है,” मम्मा ने व्यंग्य से कहा. “तेरी पतलूनें इतने अजीब स्वभाव की हैं कि वो दिन-दिन भर, जानबूझ के हर कील से टकराती हैं, उससे उलझ जाती हैं और फिर फट जाती हैं, ख़ास तौर से इसलिए कि तेरी मम्मा को गुस्सा दिलाएँ. ऐसी शैतान हैं पतलूनें! वो अपने आप! वो अपने आप!” मम्मा ‘वो अपने आप’ सुबह तक भी चिल्लाती रहती, क्योंकि उसकी नसें तन गई थीं, ये बिना चश्मे के भी साफ़ दिखाई दे रहा था. इसलिए मैंने पापा से पूछा:  “तो, तुमने क्या सोचा है?” पापा ने चेहरे पर गंभीरता लाते हुए मम्मा से कहा:

 “तुम्हें अपनी सभी योग्यताओं का उपयोग करके एक उपकरण का आविष्कार करना होगा, जो तुम्हें अपने बेटे पर नज़र रखने में मदद करे. जब वो तुम्हारे सामने न हो, तब भी. मेरे पास तो आज ज़रा भी टाइम नहीं हैं, आज ‘स्पार्ताक’ – ‘टोर्पीडो’ के बीच मैच है, और तुम, तुम मेज़ के पास बैठो, और बिना समय खोए, फ़ौरन एक दूरबीन बनाओ. तुम ये बहुत अच्छी तरह से कर सकती हो, मुझे मालूम है, कि इस लिहाज़ से तुम एक बेहद क़ाबिल इन्सान हो.”

पापा उठे, उन्होंने अपनी मेज़ की दराज़ से कुछ सामान निकाल कर मम्मा के सामने रख दिया – टूटे कोने वाला एक छोटा सा आईना, काफ़ी बड़ा मैग्नेट और अलग-अलग तरह की कुछ कीलें, एक बटन और कुछ और.

 “ये रहा ज़रूरी सामान,” उन्होंने कहा, “जुट जाओ, बहादुरों और जिज्ञासुओं!”

मम्मा उन्हें दरवाज़े तक छोड़ने गई, फिर वापस लौटी और मुझे भी घूमने के लिए कम्पाऊण्ड में जाने दिया. शाम को जब हम सब डिनर के लिए मेज़ पे बैठे, तो मम्मा की ऊँगलियाँ गोंद से सनी थीं, और मेज़ पर एक प्यारी सी नीली, मोटी ट्यूब पड़ी थी. मम्मा ने उसे उसे उठाया, दूर से मुझे दिखाया और बोली:  “तो, डेनिस, ध्यान से देख!”  “ये क्या है?” मैंने पूछा.  “ये दूरबीन है! मेरा आविष्कार!” मम्मा ने जवाब दिया. मैंने पूछा:  “क्या आस-पास की चीज़ें देखने के लिए?” वो मुस्कुराई:  “कोई आसपास की चीज़ें नहीं! तुम पर नज़र रखने के लिए.” मैंने पूछा:  “वो कैसे?”

 “बिल्कुल आसान है!” मम्मा ने कहा. “मैंने इस दूरबीन का आविष्कार करके इसे पेरेन्ट्स के लिए बनाया है, नाविकों के टेलिस्कोप की तरह, मगर उससे कहीं ज़्यादा बेहतर.”

पापा ने कहा:  “तुम, प्लीज़, सीधी-सादी भाषा में समझाओ कि ये क्या चीज़ है, किस सिद्धांत पर बनाई गई है, किन समस्याओं को हल करती है, और...वगैरह. प्लीज़!”

मम्मा मेज़ के पास खड़ी हो गई, जैसा ब्लैक बोर्ड के पास टीचर खड़ी रहती है, और फिर उसने भाषण देने के अंदाज़ में कहना शुरू किया:

 “ डेनिस, अब, जब मैं घर से बाहर जाया करूँगी, तो हमेशा तुझे देखती रहूँगी. चाहे मैं घर से पाँच से आठ किलोमीटर्स की दूरी पर क्यों न रहूँ, मगर जैसे ही मुझे महसूस होगा, कि बड़ी देर से तुझे देखा नहीं है और मैं देखना चाहूँगी कि तू अभी क्या गुल खिला रहा है, तो मैं फ़ौरन – चिक्! हमारे घर की दिशा में अपनी ट्यूब घुमाऊँगी – और रेडी! – तुझे देख लूँगी.”

 “एक्सेलेंट! श्नीत्सेल-तुत्सेर इफ़ेक्ट!” मैं थोड़ा चौंक गया. मैंने कभी नहीं सोचा था कि मम्मा ऐसी चीज़ का आविष्कार कर सकती है. देखने में तो इत्ती दुबली-पतली, मगर देखो तो! श्नीत्सेल-तुत्सेर इफ़ेक्ट!

मैंने पूछा:  “मगर मम्मा, तुम जानोगी कैसे कि हमारा घर कहाँ है?” उसने फ़ौरन जवाब दिया:  “मेरी ट्यूब में मैग्नेटिक-कम्पास लगा है. वो हमेशा हमारे घर की दिशा में है.”  “बाब्किन-न्यान्स्की रिएक्शन,” पापा ने कहा.  “बिल्कुल सही,” मम्मा ने आगे कहा. “इस तरह, डॆनिस, अगर तू फ़ेन्सिंग पर या कहीं और चढ़ता है, तो मुझे फ़ौरन दिखाई देगा.”

मैंने कहा:  “वहाँ, अन्दर, क्या है? कोई स्क्रीन है क्या?” उसने जवाब दिया:  “बेशक. आईने की याद है? वो तेरी तस्वीर को सीधे मेरे दिमाग़ के अन्दर परावर्तित करता है. मैं फ़ौरन देख लेती हूँ कि क्या तू गुलेल चला रहा है या सिर्फ गेंद घुमा रहा है, बगैर किसी मतलब के.”  “क्रान्त्स- निचिखान्त्स का साधारण नियम. इसमें कोई ख़ास बात नहीं है,” पापा बुदबुदाए और उन्होंने अचानक जोश में आकर पूछा: “एक्सक्यूज़ मी, एक्सक्यूज़ मी, प्लीज़, मैं तुम्हारी बात काट रहा हूँ. क्या एक छोटा सा सवाल पूछ सकता हूँ?”  “हाँ, पूछो,” मम्मा ने कहा.  “क्या तुम्हारी दूरबीन बिजली पे चलती है या सेमीकण्डक्टर्स पे?”  “बिजली पे,” मम्मा ने कहा.  “ओह, तब मैं तुम्हें आगाह करता हूँ,” पापा ने कहा, “तुम शॉर्ट सर्किट से सावधान रहना. वर्ना, अगर कहीं शॉर्ट सर्किट हो गया तो तुम्हारे दिमाग़ में विस्फ़ोट हो जाएगा.”

 “नहीं होगा,” मम्मा ने कहा. “और फ्यूज़ किसलिए है?” 

 “ओह, तब दूसरी बात है,” पापा ने कहा. “मगर फिर भी तुम होशियार रहना, वर्ना, तुम्हें मालूम है, कि मैं परेशान होता रहूँगा.” मैंने कहा:  “क्या तुम ऐसी चीज़ मेरे लिए भी बना सकती हो? जिससे कि मैं भी तुम पर नज़र रख सकूँ?”

 “वो किसलिए?” मम्मा फिर मुस्कुराई. “मैं कोई फ़ेन्सिंग पे थोड़े ही चढ़ती हूँ!”

 “ये अभी तक पता नहीं चला है,” मैंने कहा, “हो सकता है, कि फ़ेन्सिंग पे तुम, शायद नहीं चढ़ोगी, मगर, हो सकता है कि तुम कारों के बीच फँस गई हो? या उनके सामने बकरी की तरह उछल रही हो?”  “या सफ़ाई वालों से झगड़ा कर रही हो? या मिलिशिया से बहस कर रही हो?” पापा ने मेरा समर्थन करते हुए कहा और गहरी साँस ली: “ हाँ, अफ़सोस, हमारे पास ऐसी मशीन नहीं है, ताकि हम तुम पर नज़र रख सकें...” मगर मम्मा ने हमें ज़ुबान चिढ़ाई:  “सिर्फ एक ही अदद मशीन का आविष्कार और निर्माण किया गया है, क्या लगा रखा है?” वो मेरी ओर मुड़ी: “तो, अब तुम जान लो, अब मैं तुम्हें हमेशा अपने कन्ट्रोल में रखूँगी!”

मैंने सोचा कि ऐसे आविष्कार से तो ज़िन्दगी बेहद बेमज़ा हो जाएगी. मगर मैंने कुछ नहीं कहा, बल्कि सिर हिला दिया और फिर सोने चला गया. मगर जब उठा और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी जीने लगा, तो मैं समझ गया कि अब मेरे बेहद काले दिन आ गए हैं. मम्मा के आविष्कार के कारण मेरी ज़िन्दगी बेहद दर्दभरी हो गई. जैसे, मिसाल के तौर पे, सोचो कि कोस्तिक पिछले कुछ दिनों से बेहद बदमाशी कर रहा है और उसकी गर्दन पकड़ के झापड़ जमाने का टाइम आ गया है, मगर तुम कुछ कर नहीं पाते, क्योंकि ऐसा लगता है कि मम्मा की दूरबीन तुम्हारी पीठ की ओर ही फ़िक्स की गई है. ऐसे हालात में कोस्तिक को झापड़ लगाना नामुमकिन है. मैं ये नहीं कह रहा हूँ, कि मैंने ‘चिस्तिये प्रूदी’ तालाब पे जाना एकदम बन्द कर दिया, जिससे वहाँ अपने लिए पूरी जेबें भर-भरके मेंढ़क पकड़ सकूँ. और मेरी पहले वाली सुखी, ख़ुशनुमा ज़िन्दगी अब मेरे लिए ख़त्म हो गई है. मेरे दिन इतने दुख में बीत रहे थे, कि मैं किसी मोमबती की तरह पिघल रहा था, मुझे कोई रास्ता नहीं सूझता था. इस सब का अंत शायद बड़ा दर्दनाक होता, मगर अचानक, एक बार जब मम्मा चली गई, और मैं अपनी फुटबॉल की पुरानी जाली ढूँढ़ रहा था, तो दराज़ में, जहाँ मैं सब अटर-फ़टर रखता हूँ, मुझे अचानक दिखाई दी...मम्मा की दूरबीन! हाँ, वो रद्दी सामान के बीच पड़ी थी, जैसे कोई अनाथ हो, ऊपर का कवर उखड़ा हुआ, एकदम भद्दी. उसे देखने से साफ़ पता चल रहा था कि मम्मा ने कई दिनों से उसका इस्तेमाल नहीं किया है, उसके बारे में अब वो सोचती भी नहीं है. मैंने उसे उठा लिया और उसका कवर नोच लिया, ये देखने के लिए कि उसके भीतर क्या है, वो कैसे बनाई गई है, मगर, क़सम से, वो खाली थी, उसके भीतर कुछ भी नहीं था. एकदम ख़ाली, गेंद की तरह गोल गोल घुमा लो!

अब मैं समझ गया कि इन लोगों ने मुझे धोखा दिया है और मम्मा ने कोई आविष्कार-वाविष्कार नहीं किया है, बल्कि वो मुझे अपनी नकली दूरबीन से डरा रही थी, और मैं, किसी बेवकूफ़ की तरह, उस पर भरोसा कर रहा था और डर रहा था, और बेहद अच्छे बच्चे की तरह बर्ताव कर रहा था. इस सबसे मैं पूरी दुनिया पे, और मम्मा पे, और पापा पे और इन सब हरकतों पे इतना गुस्सा हो गया, कि मैं पागल की तरह कम्पाऊण्ड में भागा और वहाँ कोस्तिक, अन्द्र्यूशा और अल्योन्का के साथ अर्जेन्ट लड़ाई शुरू कर दी. हालाँकि उन तीनों ने मिलकर मेरी फन्टास्टिक धुलाई कर दी, मगर मेरा मूड एकदम एक्सेलेंट हो गया, और लड़ाई के बाद हम चारों गोदाम में घुस गए, और छत पर चढ़ गए, और फिर पेड़ों पर चढ़ गए, फिर नीचे सेलार में, सीधे बॉयलर-रूम में घुस गए, कोयले के ढेर पे, और थक के चूर होने तक उछलते-कूदते रहे. इस दौरान मुझे लग रहा था, जैसे मेरे दिल से कोई बोझ हट गया है. अच्छा लग रहा था, रूह को आज़ादी महसूस हो रही थी, हल्का लग रहा था और इतनी ख़ुशी हो रही थी, जैसी पहली मई को होती है.


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60.

चिकी-ब्रीक 

हाल ही की बात है, मैं बस जैसे मर ही गया था. हँसते-हँसते. और सब इस मीशा की वजह से. एक बार पापा ने कहा: ”कल, डेनिस्का, हम घास चरने जाएँगे. कल मम्मा की भी छुट्टी है और मेरी भी. अपने साथ किसे ले जाएँगे?”  “ज़ाहिर है, किसे – मीश्का को.” मम्मा ने पूछा:  “क्या उसे जाने देंगे?”  “अगर हमारे साथ जा रहा है, तो जाने देंगे. उसमें क्या है?” मैंने कहा. “चलो, मैं उसे इन्वाइट करके आता हूँ.”

घर में घुसा तो कहा, “नमस्ते!” उसकी मम्मा ने मुझे जवाब नहीं दिया, बल्कि उसके पापा से कहा:  “देखो, कैसा अच्छा बच्चा है, नहीं तो हमारा...” मैंने उन्हें सारी बात समझाई, कि हम मीश्का को कल शहर से बाहर, गाँव में, घूमने के लिए इन्वाइट कर रहे हैं, और उन्होंने फ़ौरन इजाज़त दे दी, और अगली सुबह हम निकल पड़े. 

बहुत मज़ा आ रहा था इलेक्ट्रिक ट्रेन में जाने में, बहुत ज़्यादा!

 

पहली बात, बेंचों के हत्थे चमक रहे थे. दूसरी बात, अलार्म चेन्स – लाल-लाल, बिल्कुल आँखों के सामने लटक रही हैं. और चाहे कितनी ही बार क्यों न जाओ, हमेशा उस चेन को खींचने का या कम से कम हाथ से सहलाने का मन करता है. और सबसे ख़ास बात – खिड़की से बाहर देख सकते हो, वहाँ एक ख़ास छोटी सी सीढ़ी थी. अगर कोई बहुत छोटा है, तो इस सीढ़ी पे खड़े होकर सिर बाहर निकाल सकता है. मैंने और मीश्का ने फ़ौरन एक खिड़की पे कब्ज़ा कर लिया, दोनों एक ही खिड़की से बाहर देख रहे थे, बहुत बढ़िया लग रहा था ये देखना कि चारों ओर एकदम नई घास बिखरी है और फ़ेन्सिंग्स पर रंग बिरंगी चादरें टंगी हैं, ख़ूबसूरत, जैसे जहाज़ों पर फ़हराते हुए झण्डे.

मगर पापा और मम्मा हमें चैन से देखने नहीं दे रहे थे. वे हर मिनट पीछे से पतलून पकड़ कर हमें पीछे खींचते और चिल्लाते:  “बाहर सिर मत निकालो, कह रहे हैं तुमसे! वर्ना बाहर लुढ़क जाओगे!” मगर हम बाहर झाँकते ही रहे. तब पापा ने चालाकी से काम लिया. उन्होंने सोच लिया था कि चाहे जो हो जाए, हमें खिड़की से हटा ही देंगे. इसलिए उन्होंने मज़ाकिया चेहरा बनाया और जानबूझ कर सर्कस वालों जैसी आवाज़ में कहा:  “ऐ, बच्चा लोग! अपनी-अपनी जगह पे बैठ जाओ! ‘शो’ शुरू होने जा रहा है!” मैं और मीश्का फ़ौरन खिड़की से दूर उछले और बगल में ही बेंच पे बैठ गए, क्योंकि मेरे पापा मशहूर मसख़रे हैं, और हम समझ गए कि अब कोई मज़ेदार चीज़ होगी. कम्पार्टमेंट के सारे पेसेंजर्स ने भी अपने सिर घुमाए और वो पापा की तरफ़ देखने लगे. और वो, जैसे कुछ हुआ ही न हो, अपनी बात कहते रहे:  “सम्माननीय दर्शकों! अब आपके सामने प्रोग्राम पेश करेगा काले जादू का, नींद में चलने का, और सम्मोहन का मास्टर, जिसे आज तक कोई हरा नहीं सका!!! पूरी दुनिया में जाने-माने जादूगर ऑस्ट्रेलिया और मलाखोव्का के चहेते, तलवारें, खाने के बन्द डिब्बे और जलते हुए इलेक्ट्रिक बल्ब्स निगलने वाले, प्रोफेसर एडवर्ड कन्द्रात्येविच किओ-सिओ! ऑर्केस्ट्रा – म्यूज़िक! त्रा-बी-बो-बूम-ल्या-ल्या! त्रा-बी-बो-बूम-ल्या-ल्या!”

सबकी नज़रें पापा पे जम गईं, और वो मेरे और मीश्का के सामने खड़े होकर बोले:  “मौत की रिस्क वाला आइटम! ज़िन्दा तर्जनी को पब्लिक के सामने उखाड़ना! कमज़ोर दिल वालों से निवेदन है कि बेहोश होकर फर्श पे न गिर जाएँ, बल्कि हॉल से बाहर चले जाएँ. अटेन्शन, प्लीज़!”

 अब पापा ने अपने हाथ इस तरह से रखे कि मुझे और मीश्का को लगा, जैसे वो अपने दाएँ हाथ से बाईं तर्जनी को पकड़ रहे हैं. फिर पापा पूरे तन गए, लाल हो गए, उन्होंने चेहरा भयंकर बना लिया, मानो वो दर्द से मर रहे हैं, और फिर अचानक वो गुस्से में आ गए, अपनी हिम्मत बटोरी और...अपनी ऊँगली उखाड़ दी! हाँ, सही में!... हमने ख़ुद देखा...ख़ून नहीं था. मगर ऊँगली भी नहीं थी! वहाँ एकदम चिकनी जगह थी. ग्यारंटी से कहता हूँ!

पापा ने कहा:  “वॉयला!” 

मुझे ये भी नहीं मालूम कि इसका मतलब क्या होता है. मगर फिर भी मैंने तालियाँ बजाईं, और मीश्का ने कहा ‘वन्स मोर’.

तब पापा ने दोनों हाथ झटके, कॉलर के पीछे ले गए, और बोले:  “आले-ओप्! चिकी-ब्रिक!” और ऊँगली वापस लगा दी! हाँ-हाँ! न जाने कहाँ से पुरानी जगह पे नई ऊँगली आ गई! बिल्कुल वैसी ही, पहली वाली से ज़रा भी फ़रक नहीं, स्याही का धब्बा भी, वो भी वैसा ही था! मैं तो, बेशक समझ गया कि ये कोई जादू है और मैं हर हाल में पापा से जान लूँगा, कि इसे कैसे किया जाता है, मगर मीश्का तो बिल्कुल भी नहीं समझ पाया. उसने कहा:  “ऐसा कैसे हो गया?” पापा सिर्फ मुस्कुरा दिए:  “जब बड़े हो जाओगे, तो काफ़ी कुछ जान जाओगे!” तब मीश्का ने दयनीयता से कहा: ”प्लीज़, एक बार और दुहराइए! चिकी-ब्रिक!” 

पापा ने सब कुछ फिर से दुहराया, ऊँगली उखाड़ी और वापस बिठा दी, और फिर से सॉलिड सरप्राइज़. इसके बाद पापा ने झुककर अभिवादन किया, और हम समझे कि ‘शो’ ख़तम हो गया, मगर, पता चला कि ऐसा कुछ भी नहीं था. पापा ने कहा: 

”काफ़ी सारी फ़रमाइशों को देखते हुए, ‘शो’ जारी रहता है! अब आप देखेंग़े फ़कीर की कुहनी पर घिसटता हुआ सिक्का! माएस्ट्रो, त्रिबो-बि-बुम-ल्या-ल्या!”

और पापा ने सिक्का निकाला, उसे अपनी कुहनी पे रखा और इस सिक्के को सरकाते हुए अपने कोट में गिराने की कोशिश करने लगे. मगर वो कहीं भी नहीं सरका, बल्कि पूरे समय गिरता ही रहा, तब मैं पापा के ऊपर ख़ूब हँसने लगा. मैंने कहा: ”ऐख़, ऐख! ये फ़कीर है! सिर्फ मुसीबत, न कि फ़कीर!”

सब लोग ठहाका लगाने लगे, पापा ख़ूब लाल हो गए और चिल्लाए:  “ऐ, तू, सिक्के! फ़ौरन घिसट! वर्ना मैं तुझे उस अंकल को दे दूँगा आइस्क्रीम ख़रीदने के लिए! तू भी क्या याद रखेगा!”    और सिक्का मानो पापा से डर गया और फ़ौरन कुहनी पर घिसटने लगा. और ग़ायब हो गया.

 “क्या, डेनिस्का, हार गया?” पापा ने कहा. “कौन चिल्ला रहा था कि मैं मुसीबत-फ़कीर हूँ? और अब देखिए: तमाशा-मूकाभिनय! खोए हुए सिक्के का बेहतरीन बच्चे मीश्का की नाक से निकलना! चिकी-ब्रिक!” और पापा ने मीश्का की नाक से सिक्का खींच कर बाहर निकाला. ओह, दोस्तों, मैं नहीं जानता था कि मेरे पापा इत्ते सुपर हैं! मीश्का तो गर्व से दमक रहा था. वो अचरज से चमक रहा था और उसने फिर से ज़ोर से चिल्लाकर पापा से कहा;  “प्लीज़, एक बार और चिकी-ब्रिक दुहराइए!” 

पापा ने फिर से सब कुछ दुहराया, और इसके बाद मम्मा ने कहा: 

 “इंटरवल! अब हम रेस्टारेंट में जाएँगे.” 

और उसने हमें एक-एक सॉसेज वाला सैण्डविच दिया. मैं और मीशा इन सैण्डविचेस पे झपट पड़े, हम खा रहे थे, पैर हिला रहे थे, और इधर-उधर देख रहे थे. अचानक मीश्का बिना बात के बोल पड़ा:  “मुझे मालूम है कि आपकी हैट किसके जैसी है.” मम्मा ने पूछा:  “अच्छा, बता – किसके जैसी है?”  “कास्मोनॉट के हेल्मेट जैसी.”

पापा ने कहा:  “करेक्ट. वाह, मीश्का, बिल्कुल सही निरीक्षण किया! और सच में, ये हैट कास्मोनॉट के हेल्मेट जैसी ही है. कुछ नहीं कर सकते, फ़ैशन कोशिश करती है कि मॉडर्न ज़माने से पिछड़ न जाए. अच्छा, मीश्का, इधर आ!” और पापा ने हैट लेकर मीश्का के सिर पे रख दी.  “बिल्कुल पपोविच!” मम्मा ने कहा.

मीश्का वाक़ई में किसी छोटे कास्मोनॉट जैसा था. वो इतनी शान से बैठा था, और इतना मज़ेदार दिख रहा था, कि वहाँ से गुज़रने वाले सब लोग उसकी तरफ़ देखते और मुस्कुराने लगते. और पापा भी मुस्कुरा रहे थे, और मम्मा भी, और मैं भी मुस्कुरा रहा था कि मीश्का इतना प्यारा है. फिर हमारे लिए एक-एक आइस्क्रीम ख़रीदी गई, और हम उसे खाने लगे और चाटने लगे, मगर मीश्का ने मुझसे पहले ख़तम कर ली और फिर से खिड़की की तरफ़ गया. उसने चौखट पकड़ ली, छोटी वाली सीढ़ी पर चढ़ा और बाहर की ओर झुका. 

हमारी इलेक्ट्रिक ट्रेन तेज़ और एक समान गति से भागी जा रही थी, खिड़की से बाहर नज़ारे मानो उड़ रहे थे, और ऐसा लग रहा था कि मीश्का को कास्मोनॉट वाली हेल्मेट पहन कर खिड़की से बाहर सिर निकालने में मज़ा आ रहा था, वो इतना ख़ुश था कि उसे दुनिया में किसी और चीज़ की ज़रूरत नहीं थी. मैं उसकी बगल में खड़ा होना चाह रहा था, मगर तभी मम्मा ने मुझे कुहनी मारी और आँखों से पापा की तरफ़ इशारा किया. 

पापा हौले से उठे और पंजों के बल चलते हुए कम्पार्टमेण्ट के दूसरे हिस्से में गए, वहाँ भी खिड़की खुली थी, और उसमें से कोई भी नहीं देख रहा था. पापा बड़े रहस्यमय लग रहे थे, चारों ओर सब लोग शांत हो गए और पापा की तरफ़ ध्यान देने लगे. वो दबे पाँव इस दूसरी वाली खिड़की के पास आए, सिर बाहर निकाला और सामने देखने लगे, ट्रेन की दिशा में, उसी तरफ़, जिधर मीश्का देख रहा था. फिर पापा ने धीरे-धीरे अपना दाहिना हाथ बाहर निकाला, सावधानी से मीश्का की ओर बढ़ाया और अचानक बिजली की तेज़ी से उसके सिर से मम्मा की हैट खींच ली! पापा फ़ौरन खिड़की से दूर उछले और हैट को पीठ के पीछे छुपा लिया, वहीं उसे बेल्ट से लटका दिया. मैंने बड़ी अच्छी तरह ये सब देखा. मगर मीश्का ने तो नहीं देखा! उसने सिर पकड़ लिया, वहाँ मम्मा की हैट न पाकर डर गया, खिड़की से पीछे उछला और डरते हुए मम्मा के सामने खड़ा हो गया. मम्मा चहकी:  “क्या बात है? क्या हुआ, मीश्का? मेरी नई हैट कहाँ है? कहीं हवा में तो नहीं उड़ गई? मैंने तुझसे कहा था: बाहर सिर न निकाल. मेरा दिल मुझसे कह रहा था, कि मैं बिना हैट के रह जाऊँगी! अब मैं क्या करूँ?”

मम्मा ने दोनों हाथों में अपना चेहरा छुपा लिया और कंधे हिलाने लगी, जैसे वो ज़ोर ज़ोर से रो रही हो. बेचारे मीश्का की ओर देखकर बड़ी दया आ रही थी, वो धीमी आवाज़ में बुदबुदा रहा था:  “रोइए नहीं...प्लीज़. मैं आपको नई हैट ख़रीद दूँगा...मेरे पास पैसे हैं...सैंतालीस कोपेक. मैंने डाक टिकटों के लिए इकट्ठा किए थे...”

उसके होंठ थरथरा रहे थे, और पापा, बेशक, ये बर्दाश्त न कर सके. उन्होंने फ़ौरन अपना चेहरा मज़ाकिया बना लिया और सर्कस वालों जैसी आवाज़ में चिल्लाए:  “नागरिकों, अटेन्शन प्लीज़! रोइए नहीं और शांत हो जाइए! आप ख़ुशनसीब हैं कि महान जादूगर एडवर्ड कन्द्रात्येविच किओ-सिओ को जानते हैं! अभी एक शानदार ट्रिक दिखाई जाएगी: “हैट की वापसी, जो नीली एक्स्प्रेस से बाहर गिर गई थी”. होशियार! अटेन्शन! चिकी-ब्रिक!”

और पापा के हाथों में मम्मा की हैट दिखाई दी. मैं भी नहीं देख पाया था, कि कितनी चालाकी से पापा ने उसे पीठ के पीछे से निकाला था. सब लोग ‘आह-आह!’ करने लगे. मीश्का का चेहरा ख़ुशी से चमकने लगा. अचरज के मारे उसकी आँख़ें माथे तक चढ़ गईं. वो इतना उत्तेजित था, कि बस उड़ने ही वाला था. वो जल्दी से पापा के पास गया, उनसे हैट ली, भागकर वापस आया और पूरी ताक़त से उसे सचमुच में खिड़की से बाहर फेंक दिया. 

फिर वो मुड़ा और मेरे पापा से बोला;  “प्लीज़, एक बार और दुहराइए...चिकी-ब्रिक!”

तभी तो ये हुआ कि हँसी के मारे मैं बस मर ही नहीं गया.


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