शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

Oopar Neeche, Aade Tirchhe

ऊपर-नीचे, आड़े-तिरछे!

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनु. : आ. चारुमति रामदास

उस साल गर्मियों में, जब मैं अभी स्कूल नहीं जाता था, हमारे कम्पाउण्ड में मरम्मत का काम चल रहा था. चारों ओर ईंटें और लकड़ी के फ़ट्टे पड़े हुए थे और कम्पाउण्ड के बीचोंबीच रेत का एक बड़ा ढेर लगा था. और इस ढेर पर हम ‘मॉस्को के निकट फ़ासिस्टों की हार’ नामक खेल खेलते थे, या किले बनाते या यूँ ही कुछ-कुछ खेलते.

हमें बहुत अच्छा लगता था, और हमने मज़दूरों से दोस्ती भी कर ली थी, हम मरम्मत के काम में उनकी मदद भी करते थे : एक बार मैं प्लम्बर-अंकल ग्रीशा के लिए उबले हुए पानी की केतली लाया, और दूसरी बार अल्योन्का ने इलेक्ट्रिशियन्स को बताया कि हमारा चोर-दरवाज़ा कहाँ है. हम और भी बहुत सारी मदद करते थे, बस अब इस समय मुझे हर चीज़ याद नहीं है.
और फिर पता ही नहीं चला कि मरम्मत का काम कब पूरा हो चला, एक के बाद एक मज़दूर जाने लगे, अंकल ग्रीशा ने हाथ पकड़कर हमसे बिदा ली, उसने मुझे लोहे का एक भारी टुकड़ा गिफ्ट में दिया और वो भी चला गया.    

और अंकल ग्रीशा की जगह कम्पाउण्ड में आईं तीन लड़कियाँ. उन सबने बड़े बढ़िया कपड़े पहने थे : आदमियों जैसी लम्बी-लम्बी पतलूनें पहनी थीं, जिन पर अलग-अलग तरह के रंग लगे थे और वे एकदम कड़क थीं. जब ये लड़कियाँ चलतीं से तो उनकी पतलूनें ऐसी गरजतीं जैसे छत पर पड़ी लोहे की चादर गरजती है. इन लड़कियों ने सिर पे अख़बारों की टोपियाँ पहनी थीं. ये लड़कियाँ पेंटर थीं और उन्हें कहते थे ब्रिगेड. वे बड़ी ख़ुशमिजाज़ और फुर्तीली थीं, उन्हें हँसना अच्छा लगता था और वे हमेशा ‘वादी के फूल, वादी के फूल’ गाती रहती थीं. मगर मुझे ये गाना अच्छा नहीं लगता. और अल्योन्का को भी. और मीश्का को भी ये पसन्द नहीं है. मगर हम सबको ये देखना अच्छा लगता था कि ये पेंटर-लड़कियाँ कैसे काम करती हैं और कैसे उनका हर काम एकदम सही और साफ़-सुथरा होता है. हमें पूरी ब्रिगेड के नाम मालूम थे. उनके नाम थे सान्का, राएच्का और नेल्ली.
और एक दिन जब हम उनके पास पहुँचे तो सान्या आंटी ने कहा, “बच्चों, भाग कर जाओ, और कहीं से पता करो कि कितने बजे हैं.”
मैं भाग कर गया, पता कर के आया और कहा, “बारह बजने में पाँच मिनट हैं, सान्या आंटी...”
उसने कहा, “शाबाश, बच्चों! मैं – डाइनिंग हॉल चली!” - और वह कम्पाउण्ड से चली गई.
उसके पीछे-पीछे राएच्का आंटी और नेल्ली आंटी भी लंच करने चली गईं.
और रंग वाली छोटी बैरल वहीं छोड़ गईं. और रबर का होज़-पाइप भी.
हम फ़ौरन नज़दीक गए और बिल्डिंग के उस हिस्से को देखने लगे जहाँ पर उन्होंने अभी-अभी रंग लगाया था. बहुत बढ़िया था : एक-सा और भूरा, थोड़ी सी लाली लिए. मीश्का ने देखा, देखा और फिर कहने लगा, “
 “मज़ेदार है, और अगर मैं पम्प मारूँ, तो क्या रंग निकलेगा?”
अल्योन्का ने कहा, “शर्त लगाते हैं, नहीं निकलेगा!”
तब मैंने कहा, “और हम शर्त लगाते हैं कि निकलेगा!”
अब मीश्का ने कहा, “बहस करने की ज़रूरत नहीं है. मैं अभ्भी कोशिश करता हूँ. पकड़, डेनिस्का, ये होज़-पाइप, और मैं पम्प मारता हूँ.”
और वो लगा पम्प मारने. एक बार – दो बार - तीन बार मारा, और अचानक पाइप में से रंग बाहर भागने लगा! वो फुसफुसा रहा था, साँप की तरह, क्योंकि पाइप के सिरे पर सुराखों वाली टोपी थी, जैसे पौधों को पानी देने वाले फुहारे में होती है. सिर्फ यहाँ सुराख़ बहुत ही छोटे-छोटे थे, और रंग इस तरह निकल रहा था, जैसे हेयर कटिंग सेलून में यूडीकोलोन निकल रहा हो, बस वो थोड़ा सा दिखाई दे रहा था.
मीश्का ख़ुश हो गया और चीख़ा, “पेंट कर जल्दी! जल्दी से कुछ पेंट कर!”
मैंने फ़ौरन पाइप को साफ़ दीवार की ओर घुमा दिया. रंग की फुहार निकलने लगी, और वहाँ फ़ौरन हल्का-भूरा दाग बन गया – मकड़ी जैसा. 
 “हुर्रे!” अल्योन्का चिल्लाई. “चल गया! चल गया! – दौड़ने लगा!” और उसने अपना पैर रंग के नीचे रख दिया.
 मैंने फ़ौरन घुटने से उँगलियों तक उसका पैर रंग दिया. फ़ौरन, हमारी ही आँखों के सामने, पैर से खरोंचों के निशान और नील गायब हो गए! उल्टे, अल्योन्का का पैर इतना चिकना, भूरा-भूरा, चमकदार हो गया, जैसा नया, चमचमाता गेंदों वाले खेल का डंडा.
मीश्का चिल्लाया, “बढ़िया हो रहा है! दूसरा पैर भी रख, जल्दी!”
और अल्योन्का ने ज़िन्दादिली से दूसरा पैर भी रख दिया, और मैंने पल भर में उसे ऊपर से नीचे तक दो बार रंग दिया.  
तब मीश्का ने कहा, “भले इन्सानों, कितना ख़ूबसूरत है! पैर तो ऐसे हो रहे हैं जैसे सचमुच के रेड-इंडियन के हों! रंग दे उसे, जल्दी!”
 “पूरी? पूरी की पूरी रंग दूँ? सिर से पैर तक?”
और अल्योन्का भी जोश में चीख़ी, “चलो, भले इन्सानों! रंग दो सिर से पैर तक! मैं सचमुच की रेड-इंडियन बन जाऊँगी.”
तब मीश्का पम्प पर पिल पड़ा और पूरी ताक़त और जोश से चलाने लगा, और मैं अल्योन्का पर रंग की बौछार करने लगा. मैंने बड़ी ख़ूबसूरती से उसे रंग डाला : उसकी पीठ, और उसके पैर, और हाथ, और कंधे, और पेट, और उसके शॉर्ट्स भी. और वो पूरी भूरी हो गई, सिर्फ बाल सफ़ेद-सफ़ेद  रह गए थे.
 मैंने पूछा, “मीश्का, क्या ख़याल है, बाल भी रंग दूँ?”
मीश्का ने जवाब दिया, “बेशक! रंग, ज---ल्दी! फ़ौरन रंग डाल!”
और अल्योन्का भी जल्दी मचाने लगी, “चल-चल! बाल भी रंग दे! और कान भी!”
मैंने जल्दी-जल्दी उसका रंग पूरा किया और कहा, “जा, अल्योन्का, सूरज में सुखा ले! ऐख़, अब और क्या रंगा जाए?”
और मीश्का बोला, “वो, देख रहा है, हमारे कपड़े सूख रहे हैं? रंग उन्हें भी फ़ौ--रन!”
मगर ये काम मैंने फ़ौरन पूरा कर लिया! दो तौलिए और मीश्का की कमीज़ मैंने सिर्फ एक ही मिनट में ऐसे रंग दी कि देखने में भी बहुत प्यारा लग रहा था!
और मीश्का पर तो मानो भूत चढ़ गया, वह इस तरह से पम्प मारने लगा जैसे कारख़ाने का मज़दूर हो. और सिर्फ चिल्लाए ही जा रहा था, “ चल, रंग! जल्दी से! ये नया दरवाज़ा है, देख, हमारा फ्रंट-डोअर, चल, चल, जल्दी से रंग दे!”
और मैं दरवाज़े पर आया. ऊपर से नीचे! नीचे से ऊपर! ऊपर से नीचे, आड़े-तिरछे!
मगर तभी अचानक दरवाज़ा खुला, और उसमें से हमारा केयर-टेकर अलेक्सेइ अकीमिच सफ़ेद सूट में निकला.
वह तो बस बुत बन गया. और मैं भी. हम दोनों पर मानो किसी ने जादू कर दिया हो. ख़ास बात ये थी कि मैं उस पर रंग डाले जा रहा था और डर के मारे होज़-पाइप दूर हटाने की बात भी समझ नहीं सका, बस उसे घुमाए जा रहा था: ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर. और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं, मगर उसके भी दिमाग में नहीं आया कि कम से कम एक कदम ही दाएँ या बाएँ हट जाए...
और मीश्का है कि पम्प मारे जा रहा है और अपना ही राग अलापे जा रहा है, “रंग, और जल्दी! चल, रंग दे!”
और अल्योका बाज़ू से नाचते हुए बाहर आई:
 “मैं रेड-इंडियन! मैं रेड-इंडियन!”
भयानक!
.... हाँ, जम के ली गई थी हमारी ख़बर. मीश्का पूरे दो हफ़्ते तक कपड़े धोता रहा. और अल्योन्का को न जाने कितनी बार टरपेंटाइन से घिस-घिस के नहलाया गया...
अलेक्सेइ अकीमिच को नया सूट ख़रीद कर दिया गया. और मम्मा तो मुझे बिल्कुल कम्पाउण्ड में जाने ही नहीं देना चाहती थी, मगर मैं किसी तरह निकल ही गया. सान्या आंटी, राएच्का आंटी और नेल्ली आंटी ने मुझसे कहा, “ बड़ा हो जा, डेनिस, जल्दी से बड़ा हो जा, हम तुझे अपनी ब्रिगेड में ले लेंगे. पेंटर   
बनेगा!”
और तब से मैं जल्दी-जल्दी बड़ा होने की कोशिश कर रहा हूँ.

...  .  

Pavel Uncle

पावेल अंकल

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनु.: आ. चारुमति रामदास

जब मारिया पेत्रोव्ना हमारे कमरे में भागती हुई आई, तो वह पहचानी नहीं जा रही थी. वह पूरी लाल हो रही थी, बिल्कुल मिस्टर टमाटर की तरह. वह तेज़-तेज़ साँस ले रही थी. उसे देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे वह पूरी उबल रही हो, बर्तन में उबलते सूप की तरह. जैसे ही वह तीर की तरह हमारे घर में घुसी, फ़ौरन चीख़ी:
 “लो, हो गई छुट्टी!” और दीवान पर ढेर हो गई.
मैंने कहा, “नमस्ते, मारिया पेत्रोव्ना!”
उसने जवाब दिया, “हाँ, हाँ.”
 “क्या हुआ है?” मम्मा ने पूछा, “चेहरा कैसा तो हो रहा है!”
 “आप सोच सकती हैं? मरम्मत!” मारिया पेत्रोव्ना फूट पड़ी और मम्मा की ओर देखने लगी. वो बिल्कुल रोने-रोने को हो रही थी.
मम्मा मारिया पेत्रोव्ना की ओर देख रही थी, मारिया पेत्रोव्ना मम्मा की ओर, और मैं उन दोनों की ओर देख रहा था. आख़िर में मम्मा ने बड़ी सावधानी से पूछा, “मरम्मत....कहाँ?”
 “हमारे यहाँ! मारिया पेत्रोव्ना ने कहा. “पूरे घर की मरम्मत कर रहे हैं! आप समझ रही हैं, उनकी छतें टपक रही हैं, बस, वो उन्हीं की मरम्मत कर रहे हैं.”
 “बड़ी अच्छी बात है,” मम्मा ने कहा, “ये तो बहुत बढ़िया बात है!”
 “पूरे घर में बस, मचान ही मचान,” बदहवासी से मारिया पेत्रोव्ना बोली. पूरा घर मचानों से भरा है, और मेरी बाल्कनी भी मचानों से अटी पड़ी है. उसे बन्द कर दिया है! दरवाज़े को कीलें ठोंककर बन्द कर दिया! और ये कोई एक दिन की बात नहीं है, न ही दो दिनों की बात है, ये तीन महीने से कम की बात नहीं है. पूरी तरह पागल कर दिया है! भयानक!”
 “ भयानक किसलिए?” मम्मा ने कहा. “ज़ाहिर है कि ऐसा ही होना चाहिए!”
 “अच्छा?” मारिया पेत्रोव्ना फिर चीख़ी. “आपके हिसाब से ऐसा ही होना चाहिए? तो फिर, मुलाहिज़ा फ़रमाइए, मेरा मोप्स्या कहाँ घूमेगा? हाँ? मेरे मोप्स्या पूरे पाँच साल से बाल्कनी में टहलता है. उसे बाल्कनी में घूमने की आदत हो गई है!”
 “बर्दाश्त कर लेगा आपका मोप्स्या,” ज़िन्दादिली से मम्मा ने कहा, “यहाँ इन्सानों की ख़ातिर मरम्मत कर रहे हैं, उनकी छतें सूखी रहेंगी, क्या आपके कुत्ते की वजह से सदियों तक छतें गीली ही रहें?”
 “ये मेरा सिरदर्द नहीं है!” मारिया पेत्रोव्ना ने बात काटते हुए कहा. “रहें गीली, अगर हमारी हाउसिंग कमिटी ही ऐसी है...”
वो शांत ही नहीं हो रही थी और ज़्यादा-ज़्यादा उबल रही थी, ऐसा लग रहा था कि वो ख़ूब ज़्यादा उबल जाएगी, जिससे ढक्कन उछलने लगेगा, और बर्तन का सूप किनारों से बाहर उफ़न जाएगा.
 “कुत्ते की वजह से!” उसने दुहराया, “हाँ, मेरा मोप्स्या किसी भी इन्सान के मुक़ाबले में ज़्यादा होशियार और बढ़िया है! वो पिछले पंजों पर चल सकता है, वो तेज़ रफ़्तार से पोलिश डान्स कर सकता है, मैं उसे प्लेट में खिलाती हूँ. आप समझ रही हैं कि इसका क्या मतलब है?”
 “इन्सानों की भलाई दुनिया में हर चीज़ से ज़्यादा महत्वपूर्ण है!” मम्मा ने शांति से कहा.
मगर मारिया पेत्रोव्ना ने मम्मा पर बिल्कुल ध्यान नहीं दिया.
 “मैं उनको सीधा कर दूँगी,” उसने धमकी दे डाली, “मैं मॉससोवियत में शिकायत करूँगी!”
मम्मा ख़ामोश हो गई. वो, शायद, मारिया पेत्रोव्ना से झगड़ा करना नहीं चाहती थी, उसे मारिया पेत्रोव्ना की कर्कश आवाज़ से तकलीफ़ हो रही थी. मम्मा के जवाब का इंतज़ार किए बग़ैर ही मारिया पेत्रोव्ना थोड़ी शांत हो गई और अपने भारी-भरकम पर्स में कुछ ढूँढ़ने लगी.
 “क्या आपने ‘आर्तेक’ सूजी ख़रीद ली है?” उसने व्यस्तता के अन्दाज़ में पूछा.
  “नहीं,” मम्मा ने कहा.
 “बेकार में,” मारिया पेत्रोव्ना ने ताना दिया. “ ‘आर्तेक’ सूजी से बहुत फ़ायदेमन्द पॉरिज बनाते हैं. आपके डेनिस्का को, मिसाल के तौर पर, थोड़ा तन्दुरुस्त होना बुरा नहीं होगा. मैंने तो तीन-तीन पैकेट ख़रीद लिए!”
 “आपको इतने पैकेट्स किसलिए चाहिए,” मम्मा ने पूछा, “आपके घर में तो बच्चे ही नहीं हैं ना?”
मारिया पेत्रोव्ना ने अचरज से आँखें फाड़ीं. उसने मम्मा की ओर इस तरह देखा, जैसे मम्मा ने कोई भयानक बेवकूफ़ी भरी बात कह दी हो, क्योंकि वो कुछ समझ ही नहीं पा रही है, साधारण सी बात भी!
  “और मोप्स्या?” थरथराते हुए मारिया पेत्रोव्ना चीख़ी. “और मेरा मोप्स्या? उसके लिए तो ‘आर्तेक’ बहुत फ़ायदेमन्द है, ख़ासकर जब उसे खुजली हो जाती है. वह हर रोज़ लंच के समय दो प्लेटें खा जाता है, और फिर भी उसे कुछ और चाहिए होता है!”
 “वो इसलिए आपसे मांगता है,” मैंने कहा, “क्योंकि उसकी चर्बी बढ़ रही है.”
 “बड़े लोगों की बातों में नाक मत घुसेड़,” कटुता से मारिया पेत्रोव्ना ने कहा. “बस इसी बात की कमी थी! जा, जाकर सो जा!”
 “बिल्कुल नहीं,” मैंने कहा, “ ’सोने-वोने’ का अभी सव्वाल ही नहीं है. इतनी जल्दी तो कोई सो ही नहीं सकता!”
 “देखो,” मारिया पेत्रोव्ना ने कहा और अपना मोर्चा मम्मा की ओर मोड़ दिया, “देखिए! मुलाहिज़ा फ़रमाइए, कैसे होते हैं बच्चे! वो बहस भी करता है! उसे तो चुपचाप बात माननी चाहिए! जब कहा है, ‘सो जा’ – मतलब ‘सो जाना’ चाहिए. मैं तो जैसे ही अपने मोप्स्या से कहती हूँ :’सो जा!’ वो फ़ौरन कुर्सी के नीचे रेंग जाता है और एक ही सेकंड में खर् र् र्...ख र् र् र्... बस, सो जाता है! मगर बच्चा! वो, देख रही हैं ना, बहस भी करता है!”
मम्मा अचानक लाल-लाल हो गई : उसे, ज़ाहिर है, मारिया पेत्रोव्ना पर बड़ा गुस्सा आ रहा था, मगर वो मेहमान के साथ झगड़ा नहीं करना चाह्ती थी. मम्मा तो शराफ़त के मारे कोई भी बेवकूफ़ी बर्दाश्त कर सकती है, मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता. मुझे मारिया पेत्रोव्ना पर बेहद गुस्सा आया, कि वो मेरा मुक़ाबला अपने मोप्स्या से कर रही है. मैं उससे कहना चाहता था, कि वो बेवकूफ़ औरत है, मगर मैंने अपने आप पर क़ाबू कर लिया, जिससे कि बात और न बढ़ जाए. मैंने अपना ओवरकोट उठाया, कैप ली और कम्पाउण्ड में भागा. वहाँ कोई भी नहीं था. सिर्फ हवा चल रही थी. तब मैं बॉयलर-रूम में भागा. वहाँ हमारा पावेल अंकल रहता है और काम करता है, वह बड़ा ख़ुशमिजाज़ है, उसके दांत एकदम सफ़ेद, और बाल घुंघराले हैं. मुझे वो अच्छा लगता है. मुझे अच्छा लगता है जब वो मेरी तरफ़ झुकता है, एकदम मेरे चेहरे तक, और मेरा छोटा सा हाथ अपने बड़े और गर्माहट भरे हाथ में लेता है, और मुस्कुराता है, और अपनी भारी आवाज़ में प्यार से कहता है:
 “नमस्ते, न्सान!”
....     

सोमवार, 11 जनवरी 2016

Ek Boond Ghode ko maar Daalti Hai

एक बूंद घोड़े को मार डालती है

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनु. : आ. चारुमति रामदास

जब पापा बीमार पड़े तो डॉक्टर आए और बोले:
 “डरने की कोई बात नहीं है, सिर्फ़ थोड़ा ज़ुकाम है. मगर मैं आपको सलाह दूँगा की सिगरेट पीना छोड़ दीजिए, आपके सीने में हल्की सी घरघराहट है.”
और जब वो चले गए तो मम्मा ने कहा:
 “ इन नासपीटी सिगरेटों की वजह से अपनी तबियत को इस हद तक ख़राब करना – कितनी बेवकूफ़ी की बात है! अभी तो तुम इतने जवान हो, और अभी से सीने में घरघराहट और साँय-साँय होने लगी.”
 “ओह,” पापा ने कहा, “तुम तो बहुत बढ़ा-चढ़ा कर कह रही हो! ऐसी कोई ख़ास घरघराहट नहीं है, साँय-साँय तो बिल्कुल भी नहीं है. बस एक मामूली सी घरघराहट है. इसकी कोई गिनती नहीं है.”
 “नहीं – गिनती है!” वो चहकी, तुम्हें मामूली घरघराहट की नहीं, बल्कि और ज़्यादा चरमराहट, झनझनाहट, और किटकिटाहट की ज़रूरत है, मैं तुम्हें अच्छी तरह जानती हूँ...”
 “जो भी हो, मगर मुझे आरी की आवाज़ की ज़रूरत नहीं है,” पापा ने उसकी बात काटी.
 “मैं तुम पर आरी नहीं चला रही हूँ,” मम्मा का चेहरा लाल हो गया, “मगर तुम समझ लो कि ये वाक़ई में ख़तरनाक है. तुम्हें तो मालूम है कि सिगरेट के ज़हर की एक बूंद तन्दुरुस्त घोड़े को भी मार डालती है!”
तो ये बात है! मैंने पापा की ओर देखा. वो हट्टे-कट्टे हैं, इसमें कोई शक नहीं, मगर घोड़े के मुक़ाबले में कम ही हैं. वो बस मुझसे या फिर मम्मा से बड़े हैं, मगर, चाहे कितना ही घुमा फिरा कर क्यों न कहो, घोड़े से कम ही हैं और सबसे मरियल गाय से भी कम ही हैं. गाय तो हमारे दीवान पर आ ही नहीं सकती थी, मगर पापा आराम से उसमें समा जाते हैं. मैं बहुत डर गया. मैं किसी हालत में नहीं चाहता था कि उन्हें ऐसे ज़हर की बूँद मार डाले. नहीं चाहता था मैं ये, कभी नहीं और किसी कीमत पर नहीं. इन विचारों के कारण मैं बड़ी देर तक सो न सका, इतनी देर, कि पता ही नहीं चला कि आख़िर कब आँख लग गई.    
शनिवार को पापा अच्छे हो गए, और हमारे घर मेहमान आए. अंकल यूरा आए, कात्या आण्टी के साथ, बोरिस मिखाइलोविच और तमारा आण्टी आए. सब आए और बडी शराफ़त से पेश आए, और तमारा आण्टी तो जैसे ही आई, बस, गिरगिर-गिरगिर घूमती ही रही, खुड़बुड़ाहट करती रही, और वह पापा की बगल में चाय पीने बैठ गई. मेज़ पर वह पापा की ओर ध्यान देती रही, उनकी फ़िकर करती रही, पूछती रही कि वे आराम से तो बैठे हैं, खिड़की से हवा तो नहीं ना आ रही है, और आख़िरकार उसने पापा की इतनी ज़्यादा फ़िकर कर डाली और उनका इतना ज़्यादा ध्यान रख डाला कि उनकी चाय में तीन चम्मच शक्कर डाल दी. पापा ने शक्कर मिलाई, चाय चखी और त्यौरियाँ चढ़ा लीं.
 “मैंने पहले ही इस गिलास में एक बार शक्कर डाली थी,” मम्मा ने कहा, और उसकी आँखें हरी-हरी हो गईं, गूज़बेरी जैसी.      
 मगर तमारा आण्टी ठहाका मारकर हँस पड़ी. वह इस तरह ठहाके लगा रही थी जैसे मेज़ के नीचे कोई उसके पंजों पे गुदगुदी कर रहा हो. और पापा ने वो बेहद मीठी चाय एक कोने में सरका दी. फिर तमारा आण्टी ने अपने पर्स से एक पतला-सा सिगरेट-केस निकाला और पापा को प्रेज़ेंट किया.
 “लो, ये बरबाद हुई चाय के बदले तुम्हें दे रही हूँ,” उसने कहा. “हर बार, सिगरेट पीते समय, तुम इस वाक़ये को याद करोगे और इसके क़ुसूरवार को भी.”
इस बात के लिए मैं तो उस पर ख़ूब गुस्सा हो गया. वो पापा को सिगरेट की याद क्यों दिला रही है, जबकि बीमारी के दौरान उनकी आदत क़रीब-क़रीब छूट चुकी है? जबकि सिगरेट के ज़हर की बस एक ही  बूंद घोड़े की जान ले लेती है, और ये है कि याद दिला रही है. मैंने कहा :
 “ आप बेवकूफ़ हो, तमारा आण्टी! ये क्या लगा रखा है! फ़ौरन मेरे घर से निकल जाइए. आपके मोटे –मोटे पैर इस घर में न नज़र आएँ.”आप
ये मैंने अपने आप से ही कहा, ख़यालों में, इसलिए कोई भी कुछ भी समझ नहीं सका.
पापा ने सिगरेट-केस हाथ में लिया और उसे घुमाकर देखने लगे.
 “थैंक्यू, तमारा सेर्गेयेव्ना,” पापा ने कहा, “आपने मेरे दिल को छू लिया. मगर इसमें तो मेरी एक भी सिगरेट नहीं आएगी, सिगरेट-केस इतना छोटा हि, और मैं ‘कज़्बेक’ पीता हूँ. ऊपर से...”
अब पापा ने मेरी ओर देखा.
 “अच्छा, तो डेनिस,” उन्होंने कहा, “रात के वक़्त चाय की तीसरी प्याली पीने के बदले तू मेरी राइटिंग टेबल के पास जा, वहाँ ‘कज़्बेक’ का पैकेट ले और इन सिगरेट्स को इस तरह से छोटा कर दे कि वे इस सिगरेट-केस में आ जाएँ. कैंची बीच वाली दराज़ में है!”
मैं टेबल के पास आया, सिगरेट का पैकेट और कैंची ढूँढ़ी , सिगरेट-केस की नाप ली और सब कुछ वैसा ही किया जैसा उन्होंने कहा था. फिर मैंने भरा हुआ सिगरेट-केस लाकर पापा को दे दिया. पापा ने सिगरेट-केस खोला, मेरी कारीगरी को देखा, फिर मुझे देखा और ज़ोर से हँसने लगे:
 “मुलाहिज़ा फ़रमाइए, देखिये, मेरे होशियार बेटे ने क्या किया है!”
अब सारे मेहमान एक दूसरे से सिगरेट-केस ले लेकर देखने लगे और कानों को बहरा कर देने वाले ठहाके लगाने लगे. तमारा आण्टी तो ख़ास तौर से खूब ज़ोर से ठहाके लगा रही थी. जब उसकी हँसी रुकी तो उसने अपना हाथ मोड़ा और उँगलियों की हड्डियों से मेरे सिर पर ठकठक करने लगी.
 “ये तुमने सोचा कैसे, नीचे वाला माउथ-पीस साबुत रख कर ऊपर की क़रीब-क़रीब पूरी तंबाकू काट कर फेंक दी? कश तो तंबाकू का लगाते हैं ना, और तूने उसी को काट कर फेंक दिया! तेरे दिमाग़ में क्या भरा है – मिट्टी या भूसा?”
 “तेरे ही दिमाग में भूसा भरा है, तमारीश्चे सातमनवाली!”
बेशक, ये मैंने ख़यालों में ही, अपने आप से कहा. वर्ना मम्मा डाँट लगाती. वैसे भी वो मेरी ओर एकटक बड़ी गहरी नज़र से देख रही थी.
 “अच्छा, इधर आ,” मम्मा ने मेरी ठोढ़ी पकड़ते हुए कहा, “मेरी आँखों में देख!”
मैं मम्मा की आँखों में देखने लगा और मुझे महसूस हो रहा था कि मेरे गाल लाल-लाल, बिल्कुल झण्डे जैसे लाल हो गए हैं.
 “ये तूने जानबूझकर किया है?” मम्मा ने पूछा.
मैं उसे धोखा नहीं दे सका.
 “हाँ,” मैंने कहा, “ये मैंने जानबूझकर किया है.”
 “तब कमरे से निकल जा,” पापा ने कहा, “वर्ना मेरे हाथों में खुजली हो रही है.”
ज़ाहिर है कि पापा कुछ भी समझ नहीं पाए. मगर मैंने उन्हें समझाने की कोशिश नहीं की और कमरे से बाहर निकल गया.
क्या कोई मज़ाक की बात है – तंबाकू के ज़हर की एक बूंद घोड़े को मार डालती है!

...  

शनिवार, 9 जनवरी 2016

Jaadui Akshar

जादुई अक्षर

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनु. : आ. चारुमति रामदास

कुछ दिन पहले हम कम्पाऊण्ड में घूम रहे थे : अल्योन्का, मीश्का और मैं.. अचानक कम्पाऊण्ड में एक ट्रक आया. और उसमें पड़ी है क्रिसमस-ट्री. हम ट्रक के पीछे भागे. वो केयर-टेकर के पास गया, रुक गया, और हमारे चौकीदार के साथ ड्राइवर क्रिसमस ट्री को उतारने लगे. वे एक दूसरे पर चिल्ला रहे थे.:
 “धीरे! उठा! उठा! दाएँ! बाएँ! उसे आधार पे रख! आराम से, वर्ना पूरा सिरा तोड़ देगा.”
और जब उसे उतार लिया गया, तो ड्राइवर ने कहा:
 “अब इस क्रिसमस ट्री को सजाना चाहिए,” और चला गया.
और हम क्रिसमस ट्री के पास रुक गए.
वह ज़मीन पर पड़ा था, – बहुत बड़ा, खुरदुरा, और उसमें से बर्फ की इतनी प्यारी ख़ुशबू आ रही थी, कि हम बेवकूफ़ों के समान खड़े रहे और मुस्कुराते रहे. फिर अल्योन्का ने एक टहनी पकड़ी और कहा:
 “देखो, क्रिसमस ट्री पर ‘सीस्की’*  लटक रही हैं.”
 “सीस्की!” ये उसने गलत बोला था! मैं और मीश्का ज़ोर से हँस पड़े. हम दोनों एक जैसा हँस रहे थे, मगर फिर मीश्का और भी ज़ोर से हँसने लगा, जिससे कि मुझे हरा सके.
तो, मैंने भी ज़ोर-ज़ोर से हँसना शुरू किया, जिससे कि वो ये न समझे कि मैं हार मान गया हूँ. मीश्का ने हाथों से पेट पकड़ लिया, जैसे उसे बहुत दर्द हो रहा हो, और चिल्लाया:
 “ओय, ओय, हँसी के मारे मर जाऊँगा! सीस्की!”
 और मैंने भी जोश में आकर कहा:
 “पाँच साल की हो गई है लड़की, और कहती है “सीस्की”...हा-हा-हा!
फिर मीशा हँसते हँसते अपने होश खो बैठा और कराहते हुए बोला:
 “आह, मेरी तबियत बिगड़ रही है! सीस्की...”
और वो हिचकियाँ लेने लगा:
 “ईक्!...सीस्की. ईक्! ईक्! मर जाऊँगा हँसी के मारे! ईक्!”
तब मैंने बर्फ का एक गोला उठाया और उसे अपने माथे पर रखने लगा, मानो मेरा दिमाग़ सुलग रहा हो और मैं पागल हो गया हूँ. मैं गरजा:
 “लड़की पाँच साल की है, जल्दी ही उसकी शादी करनी पड़ेगी! और वो कहती है – सीस्की!”
अल्योन्का का निचला होंठ इस तरह से मुड़ा कि वह कान के पीछे चला गया.
 “मैंने ठीक ही बोला था! वो तो मेरा दाँत टूट गया है और उसमें से हवा निकल जाती है. मैं कहना चाहती हूँ ‘सीस्की’ , और मेरे मुँह से सीटी की तरह निकलता है ‘सीस्की’...”
 मीश्का ने कहा:
 “ऐख़, ऐसा कहीं होता है! उसका दाँत गिर गया है! मेरे तो पूरे तीन गिर गए हैं, और दो हिल रहे हैं, मगर मैं फिर भी सही-सही बोलता हूँ! सुन” “ख़ीख़्की!” क्या? सही में, ज़ोर से बोल – ख़ीख़ख़- कीई! देख, मेरा कैसा बढ़िया निकलता है : ख़ीख़्की! “
मगर अल्योन्का ज़ोर से चीख़ती है. वह अकेली हम दोनों से ज़्यादा ज़ोर से चिल्लाती है:
 “गलत! गलत! हुर्रे! तू कह रहा है ख़ीख़्की, और कहना चाहिए सीस्की!”
और मीश्का अपनी ही बात पर अड़ा है:
 “सही में, सीस्की नहीं, बल्कि ख़ीख्की कहना चाहिए.”
और वो दोनों बस चिल्लाए जा रहे हैं.  ‘सीस्की! – ‘ख़ीख्की!’ – ‘सीस्की!’ बस इतना ही सुनाई दे रहा है.
उनकी ओर देखते हुए मैं इतने ठहाके लग रहा था, कि मुझे भूख भी लग आई. मैं घर की ओर चलने लगा और पूरे समय मैं सोच रहा था : ‘ वे इतनी बहस क्यों कर रहे थे, जबकि वे दोनों ही गलत बोल रहे हैं? ये तो बड़ा आसान शब्द है. मैं रुक गया और ज़ोर से बोला:
 “कोई सीस्की नहीं है. कोई ख़ीख्की भी नहीं है, बल्कि छोटा सा, साफ़ ‘फ़ीफ़्की!’ है.
बस, यही फ़ाइनल है!

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  • असल में सही शब्द है ‘शीश्की’ जिसका मतलब है – छोटे छोटे फल. ये तीनों बच्चे 5-8 वर्ष की आयु के हैं, तीनों के दूध के दाँत टूट गए हैं इसलिए वे ‘श’ का उच्चारण नहीं कर पाते . उसी शब्द को सीस्की, ख़ीख्की और फ़ीफ़्की कहते हैं. तो ‘श’ जादुई अक्षर हुआ जो हरेक को अलग अलग प्रतीत होता है. – अनु.      

Mazak ka Madda Hona Chahiye

मज़ाक का माद्दा होना चाहिए

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनु: आ. चारुमति रामदास

एक बार मैं और मीश्का होमवर्क कर रहे थे. हमने अपने सामने नोट-बुक्स रख लीं और किताब में से लिखने लगे. साथ ही साथ मैं मीश्का को लंगूरों के बारे में भी बता रहा था, कि उनकी बड़ी-बड़ी आँखें होती हैं, जैसे कंचे, और ये कि मैंने लंगूर की तस्वीर भी देखी है, कैसे उसने बॉल-पेन पकड़ रखा था, खुद तो बहुत छोटा-छोटा था और बड़ा प्यारा था. 
फिर मीशा ने कहा:
 “लिख लिया?”
मैंने कहा:
“कब का.”
”तू मेरी नोट-बुक जाँच ले,” मीश्का ने कहा, “और मैं – तेरी.”
और हमने नोट-बुक्स बदल लीं.
और जैसे ही मैंने देख कि मीश्का ने क्या लिखा है, तो एकदम हँसने लगा.
देखता क्या हूँ – मीश्का भी हँस-हँस के लोटपोट हुआ जा रहा हि, हँसते-हँसते वह नीला पड़ गया.
 “ मीश्का, ये तू लोट-पोट क्यों हो रहा हि?”
और वह बोला:
 “मैं इसलिए लोट-पोट हो रहा हूँ, क्योंकि तूने गलत-सलत लिख लिया है! और तू क्यों हँस रहा हि?”
मैंने जवाब दिया:
 “मैं भी इसीलिए, बस, तेरे बारे में. देख, तूने लिखा है : “बफ गिरने लगी”. ये - “बफ” कौन है?”
 मीश्का लाल हो गया:
 “बफ – शायद , बर्फ है. और देख, तूने लिखा है: ‘सर्दियाँ आ पची.’ ये क्या है?”
 “हाँ,” मैंने कहा, “ – ‘पची’ नहीं, बल्कि ’पहुँची’. कुछ नहीं कर सकते, फिर से लिखना पड़ेगा. ये सब लंगूरों की वजह से हुआ.”
और हम दुबारा लिखने लगे. और जब पूरा लिख लिया तो मैंने कहा:
  “चल सवाल पूछते हैं!”
 “चल,” मीश्का ने कहा.
इसी समय पापा आए. उन्होंने कहा :
 “हैलो, कॉम्रेड स्टुडेंट्स...”
और वो मेज़ के पास बैठ गए.
मैंने कहा:
 “लो, सुनो, पापा, मैं मीश्का से कैसा सवाल पूछता हूँ : मान ले, मेरे पास दो एपल्स हैं, और हम तीन लोग हैं, तो उन्हें तीनों में बराबर-बराबर कैसे बाँटना चाहिए?”
मीश्का ने फ़ौरन गाल फुला लिए और सोचने लगा. पापा ने गाल नहीं फुलाए, मगर वो भी सोचने लगे. वे बड़ी देर तक सोचते रहे.
फिर मैंने कहा:
 “हार गया, मीश्का?”
मीश्का ने कहा:
 “हार गया!”
मैंने कहा:
 “ हम तीनों को बराबर-बराबर हिस्सा मिले इसलिए इन एपल्स का स्ट्यू बनाना चाहिए.” और मैं ठहाके लगाने लगा : “ये मुझे मीला बुआ ने सिखाया था!...”
मीश्का ने और भी गाल फुला लिए. तब पापा ने अपनी आँखें सिकोड़ीं और कहा:
 “डेनिस, अगर तो इतना चालाक है, तो चल, मैं तुझसे सवाल पूछूँगा.”
 “पूछो, पूछो!” मैंने कहा.
पापा कमरे में घूमने लगे.
 “तो, सुन,” पापा ने का, “ एक लड़का क्लास पहली ‘बी’ में पढ़ता है. उसके परिवार में पाँच लोग हैं. मम्मा सात बजे उठती है और कपड़े पहनने में दस मिनट खर्च करती है. फिर पाँच मिनट पापा ब्रश करते हैं. दादी दुकान जाकर आने में उतना समय लगाती है जितना मम्मा कपड़े पहनने में प्लस पापा ब्रश करने में लगाते हैं. और दादा जी अख़बार पढ़ते हैं – उतनी देर, जितनी देर दादी दुकान में लगाती है, मायनस, जितने बजे मम्मा उठती है.       
जब वे सब इकट्ठे होते हैं तो वे इस पहली ‘बी’ क्लास के लड़के को उठाना शुरू करते हैं. इस पर उतना समय लगता है जितने में दादा जी अख़बार पढ़ते हैं , प्लस दादी दुकान जाकर आती है.
जब पहली ‘बी’ क्लास का लड़का उठता है, तो वह उतनी देर अलसाता रहता है, जितने में मम्मा कपड़े पहनती है प्लस पापा ब्रश करते हैं. और वह नहाता उतनी देर है जितनी देर दादा जी अख़बार पढ़ते  हैं डिवाइडेड बाइ दादी दुकान जाकर आती है. स्कूल में वह इतना लेट पहुँचता है, जितना समय अलसाने में लेता है प्लस नहाता है माइनस मम्मा का उठना मल्टिप्लाईड बाय पापा का ब्रश करना.

सवाल ये है: ये पहली ’बी’ क्लास का लड़का कौन है और अगर उसका काम इसी तरह चलता रहा तो उसे किस बात का ख़तरा है? बस!”
यहाँ पापा कमरे के बीच में खड़े हो गए और मेरी ओर देखने लगे. और मीश्का ज़ोर से ठहाका मारते हुए हँसने लगा और वह भी मेरी ओर देखने लगा. वे दोनों मेरी ओर देख रहे थे और ठहाके लगा रहे थे.
मैंने कहा:
 “ये सवाल मैं एकदम से नहीं हल कर सकता, क्योंकि हमने अभी तक ऐसे सवाल किए नहीं हैं.”
इसके अलावा मैंने एक भी लब्ज़ नहीं कहा और कमरे से निकल गया, क्योंकि मुझे फ़ौरन इस बात का अन्दाज़ा हो गया था कि इस सवाल के जवाब में निकलता है एक आलसी लड़का और उसे जल्दी ही स्कूल से भगा दिया जाएगा. मैं कमरे से निकल कर कॉरीडोर में आया और हैंगर के पीछे चला गया और सोचने लगा कि अगर ये सवाल मेरे बारे में है, तो ये सही नहीं है, क्योंकि मैं हमेशा फ़ौरन उठ जाता हूँ और बस थोड़ी ही देर अलसाता हूँ, बस उतना ही, जितना ज़रूरी है. और मैंने ये भी सोचा कि अगर पापा को मेरे बारे में इस तरह कहानियाँ बनानी हैं, तो, ठीक है, मैं घर से चला जाऊँगा – सीधे बंजर धरती पर. वहाँ हमेशा काम मिल जाता है, वहाँ लोगों की ज़रूरत रहती है, ख़ासकर नौजवानों की. मैं वहाँ प्रकृति को सँवारूंगा., और पापा अपने डेलिगेशन के साथ अल्ताय प्रदेश में आएँगे, मुझे देखेंगे, और मैं एक मिनट रुक कर कहूँगा:
 “नमस्ते, पापा,” और आगे चल पडूँगा ज़मीन सँवारने.
और वो कहेंगे:
 “मम्मा तुझे प्यार भेजती है...”
और मैं कहूँगा:
 “थैंक्यू... कैसी है मम्मा?”  
और वो कहेंगे:
 “ठीक है.”
और मैं कहूँगा:
 “शायद वह अपने इकलौते बेटे को भूल गई है?”
और वो कहेंगे:
 “क्या बात करता है, उसका वज़न सैंतीस किलो कम हो गया है! इतना याद करती है!”

और आगे मैं उनसे क्या कहूँगा, मैं सोच नहीं पाया, क्योंकि मुझ पर एक ओवरकोट गिरा और पापा अचानक हैंगर के पीछे घुसे. उन्होंने मुझे देखा और बोले:
 “आह, तो तू यहाँ है! ये तेरी आँखों को क्या हुआ है? कहीं तूने इस सवाल को अपने ऊपर तो नहीं ले लिया?”
उन्होंने कोट उठाकर जगह पर टाँग दिया और आगे कहा:
 “ये सब तो मैंने बस सोचा था. ऐसा बच्चा तो इस पूरी दुनिया में है ही नहीं, तेरी क्लास की तो बात ही नहीं है!”
और पापा ने हाथ पकड़ कर मुझे हैंगर्स के पीछे से बाहर निकाला.
फिर उन्होंने एक बार और एकटक मेरी ओर देखा और मुस्कुराए:
 “इन्सान में मज़ाक का माद्दा होना चाहिए,” उन्होंने मुझसे कहा और उनकी आँखों में प्यारी-प्यारी मुस्कुराहट तैर गई. “ मगर, था ये मज़ाहिया सवाल, है ना? तो! अब हँस भी दे!”
और मैं हँस पड़ा.
और वो भी.
और हम कमरे में गए.


....

Voh Zinda hai.....

“वो ज़िन्दा है और चमक रहा है...”

लेखक: विक्टर द्रागून्स्की
अनु: आ. चारुमति रामदास

एक बार शाम को मैं आँगन में बैठा था, बालू के पास, और मम्मा का इंतज़ार कर रहा था. वह, शायद इंस्टिट्यूट में, या दुकान में अटक गई थी, या, हो सकता है कि उसे काफ़ी देर तक बस स्टॉप पर खडे रहना पड़ा हो. मालूम नहीं. सिर्फ हमारे आँगन में सभी के मम्मा-पापा आ चुके थे, और बच्चे उनके साथ अपने-अपने घर चले गए थे और, हो सकता है ब्रेड-रिंग्स और चीज़ के साथ चाय भी पी रहे हों, मगर मेरी मम्मा अभी तक नहीं आई थी...
अब तो खिड़कियों में रोशनी भी होने लगी, और रेडिओ से म्यूज़िक सुनाई देने लगा, और आसमान में काले बादल चलने लगे – वे दाढ़ी वाले बूढ़ों जैसे लग रहे थे...
मुझे भूख भी लग रही थी, मगर मम्मा का तो पता ही नहीं था, और मैं सोच रहा था कि अगर मुझे ये मालूम होता कि मेरी मम्मा को भूख लगी है और वह दुनिया के किसी कोने में मेरा इंतज़ार कर रही है, तो मैं फ़ौरन दौड़ता हुआ उसके पास आ जाता, बिल्कुल देर नहीं करता और उसे बालू पर बैठकर इंतज़ार करने और ‘बोर’ होने पर मजबूर न करता.   

इसी समय मीश्का आँगन में निकला. उसने कहा:
 “हैलो!”
और मैंने भी जवाब दिया:
 “हैलो!”
मीश्का मेरी बगल में बैठ गया और डम्प-ट्रक लेकर देखने लगा.
 “ओ हो!” मीश्का ने कहा. “कहाँ से लिया? और क्या ये ख़ुद बालू इकट्ठा करता है? ख़ुद नहीं करता? और ख़ुद गिराता है? हाँ? और हैण्डल? ये किसलिए? इसे घुमा सकते हैं? हाँ? ओ हो! मुझे घर ले जाने देगा?”
मैंने  कहा :
 “नहीं, नहीं दूँगा. गिफ्ट है. पापा ने जाने से पहले मुझे दिया था.”

मीश्का ने मुँह फुला लिया और मुझसे दूर हट गया. आँगन में अंधेरा और गहरा हो गया.
मैं गेट की तरफ़ ही देख रहा था जिससे कि मम्मा के आने का मुझे फ़ौरन पता चल जाए. मगर वह आ ही नहीं रही थी. ज़ाहिर है कि उसे रोज़ा आंटी मिल गई हो, और वे दोनों खड़े होकर बातें कर रही हों, और मेरे बारे में सोच भी नहीं रही हों. मैं बालू पर लेट गया.

मीश्का ने कहा:
”डम्प-ट्रक नहीं देगा?”
 “छोड़ ना, मीश्का.”
तब मीश्का ने  कहा:
”इसके बदले मैं तुझे एक ग्वाटेमाला और दो बार्बादोस दूँगा!”
मैंने कहा:
  “ ले, कर ले मुकाबला डम्प-ट्रक का बार्बादोस से...”
और मीश्का बोला:
 “अच्छा, मैं तुझे स्विमिंग-रिंग दूँ?”
मैंने कहा:
 “तेरी रिंग तो फूटी हुई है.”
मीश्का पीछे हटने को तैयार नहीं था:
 “तू उसे चिपका लेना!”
मुझे गुस्सा भी आ गया.
 “और तैरूँगा कहाँ? बाथरूम में? हर मंगलवार को? ”
मीश्का ने फिर से मुँह फुला लिया. मगर फिर बोला:
 “चल, जो चाहे सो हो! तू भी क्या याद करेगा! ले!”
और उसने मेरी ओर माचिस की डिबिया बढ़ाई. मैंने उसे ले लिया.
 “तू इसे खोलकर देख,” मीश्का ने कहा, “तब पता चलेगा!”
मैंने डिबिया खोली. शुरू में तो मुझे कुछ भी नज़र नहीं आया, मगर फिर देखी हल्की-हरी रोशनी, जैसे कि दूर, मुझसे बहुत दूर एक नन्हा-सा तारा चमक रहा है, और साथ ही मैं उसे अपने हाथों में पकड़े हुए हूँ.
 “ये क्या है, मीश्का,” मैंने फुसफुसाकर कहा, “ये क्या चीज़ है?”
 “ये जुगनू है,” मीश्का ने कहा. “ क्यों, अच्छा है ना? ये ज़िन्दा है, फिकर न कर.”
 “मीश्का,” मैंने कहा, “मेरा डम्प-ट्रक ले ले, लेना है? हमेशा के लिए ले ले, हमेशा के लिए! मगर मुझे ये नन्हा सितारा दे दे, मैं इसे घर ले जाऊँगा...”
मीश्का ने लपक कर मेरा डम्प-ट्रक ले लिया और घर भाग गया. मैं अपने जुगनू के साथ रह गया, उसकी ओर देखता रहा, देर तक देखता रहा, मगर जी ही नहीं भर रहा था: कैसा हरा-हरा है ये, जैसे किसी फेयरी-टेल में हो, और कैसे ये, हाँलाकि पास ही है, हथेली पर, मगर चमक इस तरह से रहा है, जैसे बहुत दूर हो...मैं ठीक से साँस नहीं ले पा रहा था, और मैं सुन रहा था कि मेरा दिल कैसे धड़क रहा है, और कोई चीज़ हौले-हौले नाक में चुभ रही थी, जैसे मैं बस रोने ही वाला हूँ.
मैं बड़ी देर तक इसी तरह बैठा रहा, खू-ऊ-ऊ-ऊ-ब देर तक. चारों ओर कोई भी नहीं था. मैं दुनिया की हर चीज़ के बारे में भूल गया था.
मगर तभी मम्मा आ गई मैं बहुत ख़ुश हो गया और हम घर की ओर चले. और जब हम ब्रेड-रिंग्ज़ और चीज़ के साथ चाय पीने लगे, तो मम्मा ने पूछा:
 “तो, क्या कहता है तेरा डम्प-ट्रक?”
और मैंने कहा:
 “मम्मा, मैंने उसे बदल लिया.”
मम्मा ने कहा:
”बहुत अच्छे! किस चीज़ से बदल लिया?”
मैंने जवाब दिया:
 “जुगनू से! ये रहा वो, डिबिया में रहता है. लाइट बन्द करो ना!”
और मम्मा ने लाइट बन्द कर दी, कमरे में अंधेरा हो गया, और हम दोनों मिलकर हल्के-हरे सितारे की ओर देखने लगे.
फिर मम्मा ने लाइट जला दी.
 “हाँ,” उसने कहा, “ये जादू है! मगर तूने अपनी इतनी कीमती चीज़ – डम्प-ट्रक, इस कीड़े से कैसे बदल ली?”
 “मैं इतनी देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था,” मैंने कहा, “मुझे इतना बुरा लग रहा था, और ये जुगनू, मुझे दुनिया के हर डम्प-ट्रक से ज़्यादा अच्छा लगा.”
मामा ने एकटक मेरी ओर देखा और पूछा:
 “ये ज़्यादा अच्छा क्यों लगा?”
मैंने  जवाब दिया:


”तुम समझ क्यों नहीं रही हो, मम्मा?! ये ज़िन्दा है! और चमक रहा है!...”